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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

४६० * मत्स्यपुराण *


एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम्।<br>सपताकाध्वजवतां दृश्यन्ते गिरिशृङ्गवत्॥ २३<br>नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत्पुराण्यपि।<br>स्वर्गातिरिक्तश्रीकाणि तत्र कन्यापुराणि च॥ २४<br>आरामैश्च विहारैश्च तडागवटचत्वरैः।<br>सरोभिश्च सरिद्भिश्च वनैश्चोपवनैरपि॥ २५<br>दिव्यभोगोपभोगानि नानारत्नयुतानि च।<br>पुष्पोत्करैश्च सुभगास्त्रिपुरस्योपनिर्गमाः।<br>परिखाशतगम्भीराः कृता मायानिवारणैः॥ २६<br>निशम्य तद्दुर्गविधानमुत्तमं<br>कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा।<br>दितेः सुता दैववराजवैरिणः<br>सहस्रशः प्रापुरनन्तविक्रमाः॥ २७<br>तदा सुरैर्दर्पितवैरीमर्दनै-<br>र्जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसंनिभैः।<br>बभूव पूर्णं त्रिपुरं तथा पुरा<br>यथाम्बरं भूरिजलैर्जलप्रदैः॥ २८थे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो पर्वतोंकी चहारदीवारी हो। उस एक-एक पुरमें सैकड़ों गोपुर बने थे, जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे पर्वत-शिखरके समान दीख रहे थे। उस त्रिपुरमें नूपुरोंकी झनकार होती थी, जिससे वे अत्यन्त रमणीय लग रहे थे। उन पुरोंका सौन्दर्य स्वर्गसे भी बढ़कर था। उनमें कन्यापुर भी बने हुए थे। वे बगीचों, विहारस्थलों, तड़ागों, वटवृक्षके नीचे बने चबूतरों, सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनोंसे सम्पन्न थे। वे दिव्य भोगकी सामग्रियों और नाना प्रकारके रत्नोंसे परिपूर्ण थे। उस त्रिपुरके बाहर निकलनेवाले मार्गोंपर पुष्प बिखेरे गये थे, जिससे वे बड़े सुन्दर लग रहे थे। उनमें मायाको निवारण करनेवाले उपकरणोंद्वारा सैकड़ों गहरी खाइयाँ बनायी गयी थीं। अद्भुत पराक्रमयुक्त कर्म करनेवाले मयके द्वारा निर्मित उस उत्तम दुर्गकी रचनाका वृत्तान्त सुनकर देवराज इन्द्रके शत्रु अनन्त पराक्रमी हजारों दैत्य वहाँ आ पहुँचे। उस समय वह त्रिपुर गर्वीले शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले, जनताके लिये कष्टदायक तथा पर्वतीय गजेन्द्रोंके समान विशालकाय असुरोंसे उसी प्रकार खचाखच भर गया, जैसे अधिक जलवाले बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है॥ २१—२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

सूत उवाच<br>निर्मिते त्रिपुरे दुर्गे मयेनासुरशिल्पिना।<br>तद् दुर्गं दुर्गतां प्राप बद्धवैरैः सुरासुरैः॥ १<br>सकलत्राः सपुत्राश्च शस्त्रवन्तोऽन्तकोपमाः।<br>मयादिष्टानि विविशुर्गृहाणि हृषिताश्च ते॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार असुरशिल्पी मयने त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया, परंतु अन्ततोगत्वा परस्पर बँधे हुए वैरवाले देवताओं और असुरोंके लिये वह दुर्ग दुर्गम हो गया। उस समय वे सभी शस्त्रधारी दैत्य जो यमराजके समान भयंकर थे, मयके आदेशसे अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ हर्षपूर्वक उन गृहोंमें

* अध्याय १३१ * । ४६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सिंहा वनमिवानेके मकरा इव सागरम्।<br>रोषैश्चैवातिपारुष्यैः शरीरमिव संहतैः॥ ३<br>तद्वद् बलिभिरध्यस्तं तत्पुरं देवतारिभिः।<br>त्रिपुरं संकुलं जातं दैत्यकोटिशताकुलम्॥ ४<br>सुतलादपि निष्पत्य पातालाद् दानवालयात्।<br>उपतस्थुः पयोदाभा ये च गिर्युपजीविनः॥ ५<br>यो यं प्रार्थयते कामं सम्प्राप्तस्त्रिपुराश्रयात्।<br>तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति सः॥ ६<br>सचन्द्रेषु प्रदोषेषु साम्बुजेषु सरःसु च।<br>आरामेषु सचूतेषु तपोधनवनेषु च॥ ७<br>स्वङ्गाश्चन्दनदिग्धाङ्गा मातङ्गाः समदा इव।<br>मृष्टाभरणवस्त्राश्च मृष्टस्रगनुलेपनाः॥ ८<br>प्रियाभिः प्रियकामाभिर्भावभावप्रसूतिभिः।<br>नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः॥ ९प्रविष्ट हुए। जैसे अनेकों सिंह वनको, अनेकों मगरमच्छ सागरको और क्रोध एवं अत्यन्त कठोरता परस्पर सम्मिलित होकर शरीरको अपने अधिकारमें कर लेते हैं, वैसे ही उन महाबली देव-शत्रुओंद्धारा वह पुर व्याप्त हो गया। इस प्रकार वह त्रिपुर असंख्य (अरबों) दैत्योंसे भर गया। उस समय सुतल और पाताल (दानवोंके निवासस्थान)-से निकलकर आये हुए दानव तथा (देवताओंके भयसे छिपकर) पर्वतोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले दैत्य भी, जो काले बादलकी-सी कान्तिवाले थे, (शरणार्थीके रूपमें) वहाँ उपस्थित हुए। त्रिपुरमें आश्रय लेनेके कारण जो असुर जिस वस्तुकी कामना करता था, उसकी उस कामनाको मयदानव मायाद्वारा पूर्ण कर देता था। जिनके सुडौल शरीरपर चन्दनका अनुलेप लगा था, जो निर्मल आभूषण, वस्त्र, माला और अङ्गरागसे अलंकृत थे तथा मतवाले गजेन्द्रसरीखे दीख रहे थे, ऐसे दानव चाँदनी रातोंमें एवं सायंकालके समय कमलसे सुशोभित सरोवरोंके तटपर, आमके बगीचों और तपोवनोंमें अपनी पत्नियोंके साथ निरन्तर हर्षपूर्वक विहार करते थे॥ १—९॥
मयेन निर्मिते स्थाने मोदमाना महासुराः।<br>अर्थे धर्मे च कामे च निदधुस्ते मतीः स्वयम्॥ १०<br>तेषां त्रिपुरयुक्तानां त्रिपुरे त्रिदशारिणाम्।<br>व्रजति स्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा॥ ११<br>शुश्रूषन्ते पितॄन् पुत्राः पत्न्यश्चापि पतींस्तथा।<br>विमुक्तकलहाश्चापि प्रीतयः प्रचुराभवन्॥ १२<br>नाधर्मस्त्रिपुरस्थानां बाधते वीर्यवानपि।<br>अर्चयन्तो दितेः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम्॥ १३<br>पुण्याहशब्दानुच्चैरुराशीर्वादांश्च वेदगान्।<br>स्वनूपुररवन्मिश्रान् वेणुवीणारवानपि॥ १४<br>हासश्च वरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः।<br>त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥ १५इस प्रकार मयद्वारा निर्मित उस स्थानपर निवास करते हुए वे महासुर आनन्दका उपभोग कर रहे थे। उन्होंने स्वयं ही धर्म, अर्थ और कामके सम्पादनमें अपनी बुद्धि लगायी। त्रिपुरमें निवास करनेवाले उन देव-शत्रुओंका समय ऐसा सुखमय व्यतीत हो रहा था, जैसे स्वर्गवासियोंका व्यतीत होता है। वहाँ पुत्र पितृगणोंकी तथा पत्नियाँ पतियोंकी सेवा करती थीं। वे परस्पर कलह नहीं करते थे। उनमें परम प्रेम था। किसी प्रकारका अधर्म प्रबल होनेपर भी त्रिपुर-निवासियोंको बाधा नहीं पहुँचाता था। वे दैत्य शिव-मन्दिरमें शङ्करजीकी अर्चना करते हुए वेदोक्त माङ्गलिक शब्दों एवं आशीर्वादोंका उच्चारण करते थे। त्रिपुरमें आनन्द मनानेवाले दानवेन्द्रोंके अपने नूपुरकी झनकारसे मिश्रित वेणु एवं वीणाके शब्द तथा सुन्दरी नारियोंके चित्तको व्याकुल कर देनेवाले हास सदा सुनायी पड़ते थे।

४६२ * मत्स्यपुराण *


Sanskrit ShlokasHindi Translation
तेषामर्चयतां देवान् ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्।<br>धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत॥ १६<br><br>अथालक्ष्मीरसूया च तृड्बुभुक्षे तथैव च।<br>कलिश्च कलहश्चैव त्रिपुरं विविशुः सह॥ १७<br><br>संध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरं च भयावहाः।<br>समध्यासुः समं घोराः शरीराणि यथाऽऽमयाः॥ १८<br><br>सर्व एते विशन्तस्तु मयेन त्रिपुरान्तरम्।<br>स्वप्ने भयावहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान्॥ १९<br><br>उदिते च सहस्रांशौ शुभभासाकरे रवौ।<br>मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः॥ २०<br><br>मेरूकूटनिभे रम्ये आसने स्वर्णमण्डिते।<br>आसीनाः काञ्चनगिरेः शृङ्गे तोयमुचो यथा॥ २१<br><br>पार्श्वयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्माली च दानवः।<br>उपविष्टौ मयस्यान्ते हस्तिनः कलभाविव॥ २२इस प्रकार देवताओंकी अर्चना और ब्राह्मणोंको नमस्कार करनेवाले तथा धर्म, अर्थ एवं कामके साधक उन दैत्योंका महान् समय व्यतीत होता गया। तदनन्तर अलक्ष्मी (दरिद्रता), असूया (गुणोंमें दोष निकालना), तृष्णा, बुभुक्षा (भूख), कलि और कलह—ये सब एक साथ मिलकर त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। इन भयदायक दुर्गुणोंने सायंकाल त्रिपुरमें प्रवेश किया था। इन्होंने राक्षसोंपर ऐसा अधिकार जनाया, जैसे भयंकर व्याधियाँ शरीरोंको काबूमें कर लेती हैं। त्रिपुरके भीतर प्रवेश करते हुए इन दुर्गुणोंको मयने स्वप्नमें दानवोंके शरीरमें भयानक रूपसे प्रविष्ट होते हुए देख लिया। तब सहस्र किरणधारी एवं उज्ज्वल प्रकाश करनेवाले सूर्यके उदय होनेपर मयने (तारक और विद्युन्मालीके साथ) दो सूर्योंसे युक्त बादलकी तरह सभाभवनमें प्रवेश किया। वहाँ वे मेरुगिरिके शिखरके समान सुन्दर स्वर्णमण्डित रमणीय आसनपर आसीन हो गये। उस समय वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सुमेरुगिरिके शिखरपर बादल उमड़ आये हों। मयदानवके निकट एक ओर तारकासुर और दूसरी ओर दानवश्रेष्ठ विद्युन्माली बैठे हुए थे, जो हाथीके बच्चेकी तरह दीख रहे थे॥ १६—२२॥
ततः सुरारयः सर्वेऽशेषकोपा रणाजिरे।<br>उपविष्टा दृढं विद्धा दानवा देवशत्रवः॥ २३<br><br>तेष्वासीनेषु सर्वेषु सुखासनगतेषु च।<br>मयो मायाविजनक इत्युवाच स दानवान्॥ २४<br><br>खेचराः खेचरारावा भो भो दाक्षायणीसुताः *।<br>निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः॥ २५<br><br>चतस्रः प्रमदास्तत्र त्रयो मर्त्या भयावहाः।<br>कोपानलादीप्तमुखाः प्रविष्टास्त्रिपुरार्दिनः॥ २६तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होनेके कारण जिनके क्रोध शेष रह गये थे, वे सभी देवशत्रु दानव वहाँ आकर यथास्थान बैठ गये। इस प्रकार उन सबके सुखपूर्वक आसनपर बैठ जानेके पश्चात् मायाके उत्पादक मयने उन दानवोंसे इस प्रकार कहा—'अरे दाक्षायणीके पुत्रो! तुमलोग आकाशमें विचरण करनेवाले तथा आकाशचारियोंमें विशेषरूपसे गर्जना करनेवाले हो। मैंने यह एक भयानक स्वप्न देखा है, उसे तुमलोग ध्यानपूर्वक सुनो। मैंने स्वप्नमें चार स्त्रियों और तीन पुरुषोंको पुरमें प्रवेश करते हुए देखा है। उनके रूप भयानक थे तथा

* दक्षकी कन्या दनुको ही यहाँ दाक्षायणी कहा गया है। सभी दानव कश्यपजीके द्वारा उत्पन्न इन्हीं दनुके पुत्र थे। दैत्यगण दितिके पुत्र थे।

* अध्याय १३१ *
४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रविश्य रुषितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमाः ।<br>प्रविष्टाः स्म शरीराणि भूत्वा बहुशरीरिणः ॥ २७<br><br>नगरं त्रिपुरं चेदं तमसा समवस्थितम् ।<br>सगृहं सह युष्माभिः सागराम्भसि मज्जितम् ॥ २८<br><br>उलूकं रुचिरा नारी नग्नाऽऽरूढा खरं तथा।<br>पुरुषः सिन्दुतिलकश्चतुरङ्घ्रिस्त्रिलोचनः ॥ २९<br><br>येन सा प्रमदा नुन्ना अहं चैव विबोधितः।<br>ईदृशी प्रमदा दृष्टा मया चातिभयावहा ॥ ३०<br><br>एष ईदृशिकः स्वप्नो दृष्टो वै दितिनन्दनाः।<br>दृष्टः कथं हि कष्टाय असुराणां भविष्यति ॥ ३१<br><br>यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्थ चेद्धितम् ।<br>निबोधध्वं सुमनसो न चासूयितुमर्हथ ॥ ३२<br><br>कामं चेष्र्याँ च कोपं च असूयां संविहाय च।<br>सत्ये दमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत ॥ ३३<br><br>शान्तयश्च प्रयुज्यन्तां पूज्यतां च महेश्वरः ।<br>यदि नामास्य स्वप्नस्य ह्येवं चोपरमो भवेत् ॥ ३४<br><br>कुप्यते नो ध्रुवं रुद्रो देवदेवस्त्रिलोचनः ।<br>भविष्याणि च दृश्यन्ते यतो नस्त्रिपुरेऽसुराः ॥ ३५<br><br>कलहं वर्जयन्तश्च अर्जयन्तस्तथाऽऽर्जवम् ।<br>स्वप्नोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च ॥ ३६मुख क्रोधाग्निसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे ऐसा लगता था मानो वे त्रिपुरके विनाशक हैं। वे अतुल पराक्रमशाली प्राणी क्रोधसे भरे हुए थे और पुरोंमें प्रवेश करके अनेकों शरीर धारणकर दानवोंके शरीरोंमें भी घुस गये हैं। यह त्रिपुर नगर अन्धकारसे आच्छन्न हो गया है और गृह तथा तुमलोगोंके साथ ही सागरके जलमें डूब गया है। एक सुन्दरी स्त्री नंगी होकर उलूकपर सवार थी तथा उसके साथ एक पुरुष था, जिसके ललाटमें लाल तिलक लगा था। उसके चार पैर और तीन नेत्र थे। वह गधेपर चढ़ा हुआ था। उसने उस स्त्रीको प्रेरित किया, तब उसने मुझे नींदसे जगा दिया। इस प्रकारकी अत्यन्त भयावनी नारीको मैंने स्वप्नमें देखा है। दितिपुत्रो! मैंने इस प्रकारका स्वप्न देखा है और यह भी देखा है कि यह स्वप्न असुरोंके लिये किस प्रकार कष्टदायक होगा। इसलिये यदि तुमलोग हमें अपना उचितरूपसे राजा मानते हो और यह समझते हो कि इनका कथन हितकारक होगा तो मन लगाकर मेरी बात सुनो। तुमलोग किसीकी असूया (झूठी निन्दा) मत करो। काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुर्गुणोंको एकदम छोड़कर सत्य, दम, धर्म और मुनिमार्गका आश्रय लो। शान्तिदायक अनुष्ठानोंका प्रयोग करो और महेश्वरकी पूजा करो। सम्भवतः ऐसा करनेसे स्वप्नकी शान्ति हो जाय। असुरो! (ऐसा प्रतीत हो रहा है कि) त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव भगवान् रुद्र निश्चय ही हमलोगोंपर कुपित हो गये हैं; क्योंकि हमारे त्रिपुरमें भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाएँ अभीसे दीख पड़ रही हैं। अतः तुमलोग कलहका परित्याग तथा सरलताका आश्रय लेकर इस दुःस्वप्नके परिणामस्वरूप आनेवाले कालकी प्रतीक्षा करो'॥ २३—३६॥
श्रुत्वा दाक्षायणीपुत्रा इत्येवं मयभाषितम् ।<br>क्रोधेष्र्यावस्थया युक्ता दृश्यन्ते च विनाशगाः ॥ ३७इस प्रकार मयदानवका भाषण सुनकर सभी दानव क्रोध और ईर्ष्याके वशीभूत हो गये तथा विनाशकी ओर जाते हुए-से दीखने लगे। अलक्ष्मीद्वारा प्रभावित हुए वे
विनाशमुपपश्यन्तो ह्यलक्ष्म्याध्यापितासुराः ।<br>तत्रैव दृष्ट्वा तेऽन्योन्यं संक्रोधापूरितेक्षणाः ॥ ३८असुर अपने भावी विनाशको संनिकट देखते हुए भी परस्पर एक-दूसरेकी ओर देखकर वहीं क्रोधसे भर गये।

४६४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ दैवपरिव्ध्वस्ता दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>हित्वा सत्यं च धर्मं च अकार्याण्युपचक्रमुः॥ ३९उनकी आँखें लाल हो गयीं। तदनन्तर दैव (भाग्य)-से परिच्युत हुए त्रिपुरनिवासी दानव सत्य और धर्मका परित्याग कर निन्द्य कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये।
द्विषन्ति ब्राह्मणान् पुण्यान्न चार्चन्ति हि देवताः।<br>गुरुं चैव न मन्यन्ते ह्यन्योन्यं चापि चुक्रुधुः॥ ४०वे पवित्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगे। उन्होंने देवताओंकी अर्चना छोड़ दी। वे गुरुजनोंका मान नहीं करते थे और परस्पर क्रोधपूर्ण व्यवहार करने लगे।
कलहेषु च सज्जन्ते स्वधर्मेषु हसन्ति च।<br>परस्परं च निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः॥ ४१वे कलहमें प्रवृत्त होकर अपने धर्मका उपहास करने लगे और 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहते हुए परस्पर एक-दूसरेकी निन्दा करने लगे।
उच्चैर्गुरून् प्रभाषन्ते नाभिभाषन्ति पूजिताः।<br>अकस्मात् साश्रुनयना जायन्ते च समुत्सुकाः॥ ४२वे गुरुजनोंसे कड़े शब्दोंमें बोलते थे। स्वयं सत्कृत होनेपर भी उन्होंने अपनेसे नीची कोटिवालोंसे बोलना भी छोड़ दिया। उनकी आँखोंमें अकस्मात् आँसू उमड़ आते थे और वे उत्कण्ठित-से जो जाते थे।
दधिसक्तून् पयश्चैव कपित्थानि च रात्रिषु।<br>भक्षयन्ति च शेरन्त उच्छिष्टाः संवृतास्तथा॥ ४३वे रातमें दही, सत्तू, दूध और कैथका फल खाने लगे। जूठे मुँह रहकर घिरे हुए स्थानमें शयन करने लगे।
मूत्रं कृत्वोपस्पृशन्ति चाकृत्वा पादधावनम्।<br>संविशन्ति च शय्यासु शौचाचारविवर्जिताः॥ ४४उनका शौचाचार ऐसा विनष्ट हो गया कि वे मूत्र-त्यागकर जलका स्पर्श तो करते, परंतु बिना पैर धोये ही बिछौनोंपर शयन करने लगे।
संकुचन्ति भयाच्चैव मार्जाराणां यथाऽऽखुकः।<br>भार्यां गत्वा न शुध्यन्ति रहोवृत्तिषु निस्त्रपाः॥ ४५वे अकस्मात् भयसे इस प्रकार संकुचित हो जाते थे, जैसे बिलावको देखकर चूहे हो जाते हैं। उन्होंने स्त्री-सहवासके बाद शरीरकी शुद्धि करना छोड़ दिया और गोपनीय कार्योंमें भी निर्लज्ज हो गये।
पुरा सुशीला भूत्वा च दुःशीलत्वमुपागताः।<br>देवांस्तपोधनांश्चैव बाधन्ते त्रिपुरालयाः॥ ४६वे त्रिपुरनिवासी दैत्य पहले सुशील थे, पर अब बड़े क्रूर हो गये तथा देवताओं और तपस्वियोंको कष्ट देने लगे।
मयेन वार्यमाणापि ते विनाशमुपस्थिताः।<br>विप्रियाण्येव विप्राणां कुर्वाणाः कलहैषिणः॥ ४७मयके मना करनेपर भी वे विनाशकी ओर बढ़ने लगे। उनके मनमें कलहकी इच्छा जाग उठी, जिससे वे ब्राह्मणोंका अपकार ही करते थे।
वैभ्राजं नन्दनं चैव तथा चैत्ररथं वनम्।<br>अशोकं च वराशोकं सर्वर्तुकमथापि च॥ ४८<br><br>स्वर्गं च देवतावासं पूर्वदेववशानुगाः।<br>विध्वंसयन्ति संक्रुद्धास्तपोधनवनानि च॥ ४९इस प्रकार जो पहले देवताओंके वशीभूत थे, वे दानवगण सम्प्रति त्रिपुरका आश्रय पानेसे संक्रुद्ध होकर वैभ्राजके नन्दन, चैत्ररथ, अशोक, वराशोक, सर्वर्तुक आदि वनों, देवताओंके निवास-स्थान स्वर्ग तथा तपस्वियोंके वनोंका विध्वंस करने लगे। उस समय देव-मन्दिर और आश्रम नष्ट कर दिये गये। देवताओं और ब्राह्मणोंके उपासक मार