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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

९९- विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

३३०* मत्स्यपुराण *

| पार्श्वौ चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।<br>ऊरू चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत् ॥ १२<br>अनन्तैश्वर्यनाथाय जानुनी चार्चयेद् बुधः।<br>प्रधानाय नमो जङ्घे गुल्फौ व्योमात्मने नमः ॥ १३<br>व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठं च पूजयेत्।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै पार्वतीं चापि पूजयेत् ॥ १४<br>ततस्तु वृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।<br>शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १५<br>प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्।<br>ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद् भक्तितः शुभान्।<br>पृषदाज्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावुदङ्मुखः ॥ १६<br>पञ्चदश्यां च सम्पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।<br>तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वं समाचरेत् ॥ १७<br>चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम्।<br>ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान् निबोध क्रमादिह ॥ १८<br>मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।<br>शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक ॥ १९<br>त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम्।<br>नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम् ॥ २०<br>नमः पशुपते नाथ नमस्ते शाम्भवे पुनः।<br>नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे ॥ २१<br>नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ २२<br>पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरचागुरुं यवाः।<br>तिलाः कृष्णाश्च विधिवत् प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।<br>प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम् ॥ २३ | ‘अनन्तधर्माय नमः’ से दोनों पार्श्वभागोंकी, ‘ज्ञानभूताय नमः’ से कटिकी और ‘अनन्तवैराग्यसिंहाय नमः’ से ऊरुओंकी अर्चना करे। बुद्धिमान् व्रतीको ‘अनन्तैश्वर्यनाथाय नमः’ से जानुओंका, ‘प्रधानाय नमः’ से जङ्घाओंका और ‘व्योमात्मने नमः’ से गुल्फोंका पूजन करना चाहिये। फिर ‘व्योमकेशात्मरूपाय नमः’ से बालों और पीठकी अर्चना करे। ‘पुष्ट्यै नमः’ एवं ‘तुष्ट्यै नमः’ से पार्वतीका भी पूजन करे। तत्पश्चात् जलपूर्ण कलशसहित, श्वेत पुष्पमाला और वस्त्रसे सुशोभित, पञ्चरत्नयुक्त स्वर्णमय वृषभको नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंके साथ ब्राह्मणको दान कर दे और यों प्रार्थना करे—‘पिनाकधारी देवाधिदेव सद्योजात मेरे व्रतमें प्रसन्न हों।’ तदनन्तर माङ्गलिक ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन एवं दक्षिणा आदि देकर तृप्त करे और स्वयं दधिमिश्रित घी खाकर रात्रिमें उत्तराभिमुख हो भूमिपर शयन करे। पूर्णिमा तिथिको प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके पश्चात् मौन होकर भोजन करे। उसी प्रकार कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें भी यह सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ ५—१७॥<br><br>इसी प्रकार सभी चतुर्दशी तिथियोंमें पूर्ववत् शिवपार्वतीका पूजन करना चाहिये। अब प्रत्येक मासमें जो विशेषताएँ हैं, उन्हें क्रमशः (बतला रहा हूँ,) सुनिये। मार्गशीर्ष आदि प्रत्येक मासमें क्रमशः इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—‘शंकराय नमस्तेऽस्तु’— आप शंकरके लिये मेरा नमस्कार प्राप्त हो। ‘नमस्ते करवीरक’—करवीरक! आपको नमस्कार है। ‘त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु’—आप त्र्यम्बकके लिये प्रणाम है। इसके बाद ‘महेश्वराय नमः’—महेश्वरको अभिवादन है। ‘महादेव नमस्तेऽस्तु’—महादेव! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। उसके बाद ‘स्थाणवे नमः’—स्थाणुको प्रणाम है। ‘पशुपतये नमः’—पशुपतिको अभिवादन है। ‘नाथ नमस्ते’—नाथ! आपको नमस्कार है। पुनः ‘शाम्भवे नमः’—शम्भुको प्रणाम है। ‘परमानन्द नमस्ते’—परमानन्द! आपको अभिवादन है। ‘सोमार्थधारिणे नमः’—ललाटमें अर्धचन्द्र धारण करनेवालेको नमस्कार है। ‘भीमाय नमः’—भयंकर रूपधारीको प्रणाम है। ऐसा कहकर अन्तमें कहे कि ‘मैं आपके शरणागत हूँ।’ प्रत्येक मासकी दोनों चतुर्दशी तिथियोंमें गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, पञ्चगव्य, बेल, कर्पूर, अगुरु, यव और काला तिल—इनमेंसे क्रमशः एक-एक पदार्थका प्राशन बतलाया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक मासकी दोनों |

* अध्याय ९५ *३३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।<br>सिन्धुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः॥ २४<br>अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्न्या तथोत्पलैः।<br>एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत् पार्वतीपतिम्॥ २५चतुर्दशी तिथियोंमें मन्दार (पारिभद्र), मालती, धतूरा, सिन्दुवार, अशोक, मल्लिका, पाटल (पाँढर पुष्प या लाल गुलाब), मन्दार-पुष्प (सूर्यमुखी), कदम्ब, शतपत्री (श्वेत कमल या गुलाब) और कमल—इनमेंसे क्रमशः एक-एकके द्वारा पार्वतीपति शंकरकी अर्चना करनी चाहिये॥ १८–२५॥
पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते संतर्पयेद् द्विजान्।<br>अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥ २६<br>कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः।<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह॥ २७<br>मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृताम्।<br>सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्॥ २८<br>ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।<br>स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च॥ २९<br>ज्येष्ठसामविदे देयं न वकव्रतिने क्वचित्।<br>गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि॥ ३०<br>अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदा कल्याणकारिणे।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः॥ ३१<br>गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात् पतत्यधः॥ ३२पुनः कार्तिकमास आनेपर अन्न, नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ, वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंको पूर्णरूपसे तृप्त करे। व्रती मनुष्यको वेदोक्त विधिके अनुसार नील वृषका भी उत्सर्ग करनेका विधान है। तत्पश्चात् अगहनीके चावलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रपर स्वर्णनिर्मित उमा, महेश्वर और वृषभकी मूर्तिको स्थापित कर दे और उसके निकट आठ मोती रख दे, फिर उसे गौके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। साथ ही दो श्वेत चादरोंसे आच्छादित तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त घटसहित एक शय्या भी दान करनी चाहिये। यह दान ऐसे ब्राह्मणको देना चाहिये, जो शान्तस्वभाव, वेदव्रत-परायण और ज्येष्ठसामका ज्ञाता हो। बगुलाव्रती (कपटी) ब्राह्मणको कभी भी दान नहीं देना चाहिये। वस्तुतस्तु गुणज्ञ, वेदपाठी, तत्त्ववेत्ता, सुडौल अङ्गोंवाले, सौम्यस्वभाव, कल्याणकारक एवं सपत्नीक आचार्यकी वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे भलीभाँति पूजा करके यह दान उन्हींको देना चाहिये। यदि गुरु (आचार्य) उस समय उपस्थित हों तो उन्हींको दान देनेका विधान है। उनकी अनुपस्थितिमें अन्य ब्राह्मणको दान दिया जा सकता है। इस दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसके दोषसे कर्ताका अधःपतन हो जाता है॥ २६–३२॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।<br>सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३३<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>पितृभिर्भ्रातृभिर्वापि तत् सर्वं नाशमाप्नुयात्॥ ३४<br>दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धि-<br>रत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम् ।<br>गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटि-<br>शतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः॥ ३५जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शिवचतुर्दशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके द्वारा अथवा उसके पिता या भाईद्वारा इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें वह दीर्घायु, नीरोगता, कुल और अन्नकी समृद्धिसे युक्त होता है और मरणोपरान्त स्वर्गलोकमें चार भुजाधारी होकर गणाधिप हो जाता है। वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक निवास कर शम्भु-पद—शिवलोकको चला जाता है।