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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

९६- सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य

३२४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तमेव पूजयेद् भक्त्या द्वौ वा त्रीन् वा यथाविधि ।<br>एकमप्यर्चयेद् भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् ।<br>दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान् ॥ ११३<br>लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यदा वित्तं भवेद् बहु ।<br>यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन् कामान् विधानतः ॥ ११४<br>पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः ।<br>यावत् कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११५<br>सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि ।<br>स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते ॥ ११६<br>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् ।<br>भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम् ॥ ११७<br>भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् ।<br>यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः ।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ ११८<br>अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।<br>आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥ ११९स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये; क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दरी पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १०६-११८॥
पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जनैः ।<br>होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च ।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे ॥ १२०<br>कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः ।<br>योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम् ॥ १२१<br>द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ।<br>त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता ॥ १२२<br>उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला ।<br>द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते ॥ १२३<br>वितस्तिमात्रा योनिःस्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता ।<br>कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता ॥ १२४<br>गजोष्ठसदृशी तद्वदायता छिद्रसंयुता ।<br>एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते ॥ १२५मुने! प्रयत्नपूर्वक दी गयी आहुतियों, दक्षिणाओं और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप और वेदीमें कुछ विशेषता है, वह मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। इस कोटिहोममें सब ओरसे चौकोर चार हाथके परिमाणवाला कुण्ड बनाना चाहिये। वह दो योनिमुखों और तीन मेखलाओंसे युक्त हो। विद्वानोंको पहली मेखला दो अङ्गुल ऊँची बनानी चाहिये। उसी प्रकार दूसरी मेखला तीन अङ्गुल ऊँची बतलायी गयी है और तीसरी मेखला ऊँचाई और चौड़ाईमें चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। पहली दोनों मेखलाओंकी चौड़ाई तो दो अङ्गुलकी ही ठीक मानी गयी है। इनके ऊपर एक बित्ता लम्बी और छः-सात अङ्गुल चौड़ी योनि होनी चाहिये। उसका मध्य-भाग कछुवेकी पीठकी तरह ऊँचा और दोनों पार्श्वभाग एक अङ्गुल ऊँचा हो। वह हाथीके होंठके समान लम्बी और छिद्र (घी गिरनेका मार्ग) युक्त हो। सभी कुण्डोंमें यही योनिका लक्षण बतलाया जाता है।
  • अध्याय ९३ * ३२५
मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम्।<br>वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्॥ १२६<br>चतुरस्त्रा समन्ताच्य त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता।<br>वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः॥ १२७<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्॥ १२८<br>यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।<br>अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः॥ १२९<br>अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।<br>एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूर्ववत् पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १३०<br>रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम्।<br>पूर्वेतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः॥ १३१<br>शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।<br>पाठयेद् दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्॥ १३२<br>सुपर्णमथ वैराजमाग्रेयं रुद्रसंहिताम्।<br>ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्॥ १३३<br>शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम्।<br>पौष्टिकं च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्॥ १३४<br>पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्योऽत्र पूर्ववत्।<br>स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्त एव मुनिसत्तम॥ १३५<br>वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते।<br>अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्॥ १३६<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति॥ १३७<br>अश्वमेधसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>कृत्वा यत् फलमाप्नोति कोटिहोमात् तदश्नुते॥ १३८योनि सभी मेखलाओंके ऊपर पीपलके पत्तेके सदृश होनी चाहिये। कोटिहोममें चार बित्ता लम्बी, चारों ओरसे चौकोर और तीन परिधियोंसे युक्त एक वेदी होनी चाहिये। परिधियोंका प्रमाण तथा वेदियोंकी ऊँचाई पहले कही जा चुकी है। पुनः सोलह हाथ लम्बे-चौड़े मण्डपकी स्थापना करे, जिसमें चारों दिशाओंमें दरवाजे हों। बुद्धिसम्पन्न यजमान उसके पूर्वद्वारपर ऋग्वेदके पारगामी ब्राह्मणको, दक्षिण द्वारपर यजुर्वेदके ज्ञाताको, पश्चिमद्वारपर सामवेदीको और उत्तरद्वारपर अथर्ववेदीको नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त वेद एवं वेदाङ्गोंके ज्ञाता आठ ब्राह्मणोंको हवन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार इस कार्यमें बारह ब्राह्मणोंको नियुक्त करनेका विधान है। इन सभी ब्राह्मणोंका वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला, चन्दन आदि सामग्रियोंद्वारा पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ ११९—१३०॥<br><br>(कार्यारम्भ होनेपर) पूर्वद्वारपर स्थित ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तराभिमुख हो परम माङ्गलिक रात्रिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त तथा अन्यान्य शान्ति-सूक्तोंका पाठ करता रहे। दक्षिणद्वारपर स्थित श्रेष्ठ यजुर्वेदी ब्राह्मणसे शक्तिसूक्त, शक्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्डसूक्त तथा शान्ति-सूक्तका पाठ करवाना चाहिये। पश्चिमद्वारपर स्थित सामवेदी ब्राह्मण सुपर्ण, वैराज, आग्नेय—इन ऋचाओं, रुद्रसंहिता, ज्येष्ठसाम तथा शान्तिपाठोंका गान करे। उत्तरद्वारपर नियुक्त अथर्ववेदी ब्राह्मण शान्ति (शांतातीय १९)-सूक्त, सूर्यसूक्त, माङ्गलिक शकुनिसूक्त, पौष्टिक एवं महाराज्य (सूक्त)-का पाठ करे। मुनिश्रेष्ठ ! इसमें भी पूर्ववत् पाँच अथवा सात ब्राह्मणोंद्वारा हवन कराना चाहिये। स्नान और दानके लिये वे ही पूर्वकथित मन्त्र इसमें भी हैं। लक्षहोममें केवल वसोर्धाराका विधान विशेष होता है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे कोटिहोमका विधान करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मरनेपर विष्णुलोकमें चला जाता है। जो मनुष्य तीनों प्रकारके ग्रहयज्ञोंका पाठ अथवा श्रवण करता है उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और अन्तमें वह इन्द्रलोकमें चला जाता है। धर्मज्ञ मनुष्य अठारह हजार अश्वमेधयज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त करता है, वह फल कोटिहोम नामक यज्ञसे प्राप्त हो जाता