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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

९२- शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचल-दानका महत्त्व

* अध्याय ८३ * ३०३


| गाश्च दद्याच्चतुर्विंशत्यथवा दश नारद।<br>नव सप्त तथाष्टौ वा पञ्च दद्यादशक्तिमान् ॥ ३७<br>एकापि गुरवे देया कपिला च पयस्विनी।<br>पर्वतानामशेषाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३८<br>त एव पूजने मन्त्रास्त एवोपस्करा मताः।<br>ग्रहाणां लोकपालानां ब्रह्मादीनां च सर्वदा ॥ ३९<br>स्वमन्त्रेणैव सर्वेषु होमः शैलेषु पठ्यते।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते ॥ ४०<br>विधानं सर्वशैलानां क्रमशः शृणु नारद।<br>दानकाले च ये मन्त्राः पर्वतेषु च यत्फलम् ॥ ४१<br>अन्नं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते ॥ ४२<br>अन्नमेव ततो लक्ष्मीरन्नमेव जनार्दनः।<br>धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम ॥ ४३<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् धान्यमयं गिरिम्।<br>मन्वन्तरशतं साग्रं देवलोके महीयते ॥ ४४<br>अप्सरोगणगन्धर्वैराकीर्णेन विराजता।<br>विमानेन दिवः पृष्ठमायाति स्म निषेवितः।<br>धर्मक्षये राजराज्यमाप्नोतीह न संशयः ॥ ४५ | देना चाहिये। नारद! इसके बाद चौबीस, दस, नौ, आठ, सात अथवा पाँच गौ दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान कर दे। सभी पर्वतदानोंके लिये यही विधि कही गयी है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। नारद! अब तुम सभी पर्वतदानोंकी विधि, दानकालमें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र और उन दानोंसे प्राप्त होनेवाला जो फल है, वह सब क्रमशः सुनो। (दान देते समय धान्यशैलसे यों प्रार्थना करनी चाहिये—) 'पर्वतश्रेष्ठ! अन्नको ही ब्रह्म कहा जाता है; क्योंकि अन्नमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्नसे जगत् वर्तमान है, इसलिये अन्न ही लक्ष्मी है, अन्न ही भगवान् जनार्दन है, इसलिये धान्यशैलके रूपसे तुम मेरी रक्षा करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे वह स्वर्गलोकमें आता है और उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्यक्षय होनेपर वह इस लोकमें निस्संदेह राजाधिराज होता है॥ ३१—४५॥ |


इति श्रीमत्स्ये महापुराणे दानमाहात्म्यं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दानमाहात्म्य नामक तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८३ ॥

३०४ * मत्स्यपुराण *


चौरासीवाँ अध्याय

लवणाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—नारद! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके$^१$ दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य शिव-संयुक्त लोकोंको अर्थात् शिवलोकोंको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये; क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और (चार$^२$) द्रोणसे बना हुआ अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार एक द्रोणसे कुछ अधिकका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भपर्वतोंका निर्माण कराना उचित है। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय लोकपालोंके स्थापनाका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दानमन्त्रोंको सुनो—'पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे$^३$ प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये उसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते, अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १—९॥
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लवणाचलमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति शिवसंयुतान्॥ १<br><br>उत्तमः षोडशद्रोणैः कर्तव्यो लवणाचलः।<br>मध्यमः स्यात् तदर्धेन चतुर्भिरधमः स्मृतः॥ २<br><br>वित्तहीनो यथाशक्त्या द्रोणादूर्ध्वं तु कारयेत्।<br>चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वतान् कारयेत् पृथक् ॥ ३<br><br>विधानं पूर्ववत् कुर्याद् ब्रह्मादीनां च सर्वदा।<br>तद्वद्धेममयान् सर्वांल्लोकपालान् निवेशयेत्॥ ४<br><br>सरांसि कामदेवादींस्तद्वदत्रापि कारयेत्।<br>कुर्याज्जागरणं चापि दानमन्त्रान् निबोधत॥ ५<br><br>सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणाचलः।<br>तद्दानकर्तृत्वेन त्वं मां पाहि नगोत्तम॥ ६<br><br>यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना।<br>प्रियं च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br><br>विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्।<br>तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥ ८<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्याल्लवणपर्वतम्।<br>उमालोके वसेत् कल्पं ततो याति परां गतिम्॥ ९

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे लवणाचलकीर्तनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें लवणाचलकीर्तन नामक चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८४॥


१. बल्लालसेनने 'दानसागर' इसे मत्स्य अ० ८४का कहकर 'विष्णुदैवत दान' माना है। यह वर्णन पद्मपु० १।१२१।११७–३५, भविष्योत्तरपु० १२६ और महाभारत आदिमें भी आता है।
२. यह 'विधानपारिजात' कार मदनभूपालका मत है। उन्होंने सर्वत्र लम्बी टिप्पणियाँ लिखी हैं।
३. यह वर्णन पहले सौभाग्यशयनमें आ चुका है।

* अध्याय ८५ *३०५

पचासीवाँ अध्याय

गुड़पर्वतके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि गुडपर्वतमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् स्वर्गमाप्नोति पूजितम्॥ १<br>उत्तमो दशभिर्भारैर्मध्यमः पञ्चभिर्मतः।<br>त्रिभिर्भारैः कनिष्ठः स्यात् तदर्धेनाल्पवित्तवान्॥ २<br>तद्वदामन्त्रणं पूजां हेमवृक्षसुरार्चनम्।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वत् सरांसि वनदेवताः॥ ३<br>होमं जागरणं तद्वल्लोकपालाधिवासनम्।<br>धान्यपर्वतवत् कुर्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ ४<br>यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः।<br>सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ ५<br>प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा।<br>तथा रसानां प्रवरः सदैवक्षुरसो मतः॥ ६<br>मम तस्मात् परां लक्ष्मीं ददस्व गुडपर्वत।<br>यस्मात् सौभाग्यदायिन्या भ्राता त्वं गुडपर्वत।<br>निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् गुडमयं गिरिम्।<br>पूज्यमानः स गन्धर्वैर्गौरीलोके महीयते॥ ८<br>ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।<br>आयुरायोग्यसम्पन्नः शत्रुभिश्चापराजितः॥ ९ | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं (उस) उत्तम गुड़पर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुड़से बना हुआ गुड़पर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन-देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करे—'जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद* योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें ॐकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षु-रस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुड़पर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुड़पर्वत! चूँकि तुम सौभाग्यदायिनी पार्वतीके भ्राता और निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुड़पर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोंद्वारा पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है॥ १—९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे गुडपर्वतकीर्तनं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें गुड़पर्वतकीर्तन नामक पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८५॥


* इस पुराणमें सामवेदकी सर्वत्र प्रमुख रूपसे चर्चा है, यह ध्येय है।

३०६* मत्स्यपुराण *

छियासीवाँ अध्याय

सुवर्णाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच<br><br>अथ पापहरं वक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम्।<br>यस्य प्रदानाद् भवनं वैरिञ्च्यं याति मानवः॥ १<br><br>उत्तमः पलसाहस्रो मध्यमः पञ्चभिः शतैः।<br>तदर्धेनाधमस्तद्वदल्पवित्तोऽपि शक्तितः।<br>दद्यादेकपलादूर्ध्वं यथाशक्त्या विमत्सरः॥ २<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वं विदध्यान्मुनिपुङ्गव।<br>विष्कम्भशैलास्तद्वच्च ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादयेत्॥ ३<br><br>नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय ते नमः।<br>यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय॥ ४<br><br>यस्मादग्नेरपत्यं* त्वं यस्मात् तेजो जगत्पतेः।<br>हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम॥ ५<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्यात् कनकपर्वतम्।<br>स याति परमं ब्रह्मलोकमानन्दकारकम्।<br>तत्र कल्पशतं तिष्ठेत् ततो याति परां गतिम्॥ ६ | ईश्वरने कहा— नारद! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। मुनिश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर उन्हें ऋत्विजोंको दान करनेका विधान है। (प्रार्थना-मन्त्र इस प्रकार है—) 'शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम आनन्ददायक ब्रह्मलोकमें जाता है और वहाँ सौ कल्पोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है॥ १–६॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सुवर्णाचलकीर्तनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सुवर्णाचलकीर्तन नामक छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८६॥


* सुवर्णकी अग्नि-अपत्यता (अग्निकी पुत्रता) प्रसिद्ध है। इस विषयमें एक श्लोक सर्वत्र मिलता है, जो इस प्रकार है— 'अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः। लोकत्रयं तेन भवेत् प्रदत्तं यः काञ्चनं गां च महीं प्रदद्यात्॥'