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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
५९ वृक्ष लगानेकी विधि
पृष्ठ 240स्थायी लिंक
| २३० | * मत्स्यपुराण * |
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सत्तावनवाँ अध्याय
रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धि-<br>युक्तः पुमान् भूपकुलान्वितः स्यात्।<br>मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यग्<br>व्रतं समाचक्ष्व तदिन्दुमौले ॥ १ | **नारदजीने पूछा—**चन्द्रभाल! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>त्वया पृष्टमिदं सम्यगुक्तं चाक्षय्यकारकम्।<br>रहस्यं तव वक्ष्यामि यत्पुराणविदो विदुः ॥ २ | **श्रीभगवान्ने कहा—**नारद! तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें वह गोपनीय व्रत बतलाता हूँ, जो अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है तथा जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् ही जानते हैं। |
| रोहिणीचन्द्रशयनं नाम व्रतमिहोत्तमम्।<br>तस्मिन् नारायणस्यार्चामर्चयेदिन्दुनामभिः॥ ३ | इस लोकमें 'रोहिणीचन्द्रशयन' नामक व्रत बड़ा ही उत्तम है। इसमें चन्द्रमाके नामोंद्वारा भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। |
| यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्वचित्।<br>अथवा ब्रह्मणक्षत्रं पौर्णमास्यां प्रजायते ॥ ४ | जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा-तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणीनक्षत्र हो, |
| तदा स्नानं नरः कुर्यात् पञ्चगव्येन सर्षपैः।<br>आप्यायस्वेति च जपेद् विद्वानष्ट शतं पुनः॥ ५ | उस दिन मनुष्य सबेरे पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे। |
| शूद्रोऽपि परया भक्त्या पाखण्डालापवर्जितः।<br>सोमाय वरदायाथ विष्णवे च नमो नमः॥ ६ | यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों—विधर्मियोंसे बातचीत न करे। |
| कृतजप्यः स्वभवनमागत्य मधुसूदनम्।<br>पूजयेत् फलपुष्पैश्च सोमनामानि कीर्तयन्॥ ७ | जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। |
| सोमाय शान्ताय नमोऽस्तुपादा-<br>वनन्तधाम्नेति च जानुजङ्घे।<br>ऊरुद्वयं चापि जलोदराय<br>सम्पूजयेन्मेढ्रमनन्तबाहोः ॥ ८ | 'सोमाय नमः' से भगवान्के दक्षिण चरण और 'शान्ताय नमः' से वाम चरणका, 'अनन्तधाम्ने नमः' का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियोंका, 'जलोदराय नमः' से दोनों जाँघोंका और 'अनन्तबाहवे नमः' से जननेन्द्रियका पूजन करे। |
| नमो नमः कामसुखप्रदाय<br>कटिः शशाङ्कस्य सदार्चनीया।<br>अथोदरं चाप्यमृतोदराय<br>नाभिः शशाङ्काय नमोऽभिपूज्या॥ ९ | 'कामसुखप्रदाय नमो नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान्के कटिभागकी सदा अर्चना करनी चाहिये। इसी प्रकार 'अमृतोदराय नमः' से उदरका और 'शशाङ्काय नमः' से नाभिका पूजन करे। |
| नमोऽस्तु चन्द्राय प्रपूज्य कण्ठं<br>दन्ता द्विजानामधिपाय पूज्याः।<br>आस्यं नमश्चन्द्रमसेऽभिपूज्य-<br>मोष्ठौ कुमुद्वन्तवनप्रियाय ॥ १० | 'चन्द्राय नमोऽस्तु' से कण्ठका और 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतोंका पूजन करना चाहिये। 'चन्द्रमसे नमः' से मुँहका पूजन करे। 'कुमुद्वन्तवनप्रियाय नमः' से |
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| * अध्याय ५७ * | २३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नासा च नाथाय वनौषधीना-<br>मानन्दबीजाय पुनर्ध्रुवौ च।<br>नेत्रद्वयं पद्मनिभं तथेन्दो-<br>रिन्दीवरव्यासकराय शौरेः॥ ११<br><br>नमः समस्ताध्वरवन्दिताय<br>कर्णद्वयं दैत्यनिषूदनाय ।<br>ललाटमिन्दोरुदधिप्रियाय<br>केशाः सुषुम्नाधिपतेः प्रपूज्याः॥ १२<br><br>शिरः शशाङ्काय नमो मुरारे-<br>र्विश्वेश्वरायेति नमः किरीटिने।<br>नमः श्रियै रोहिणिनामलक्ष्म्यै<br>सौभाग्यसौख्यामृतसागरायै ॥ १३<br><br>देवीं च सम्पूज्य सुगन्धपुष्पै-<br>र्नैवेद्यधूपादिभिरिन्दुपत्नीम् । | ओठोंका, 'वनौषधीनां नाथाय नमः' से नासिकाका, 'आनन्दबीजाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्दीवरव्यासकराय नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके कमल-सदृश दोनों नेत्रोंका, 'समस्ताध्वरवन्दिताय दैत्यनिषूदनाय नमः' से दोनों कानोंका, 'उदधिप्रियाय नमः' से चन्द्रमाके ललाटका, 'सुषुम्नाधिपतये नमः' से केशोंका पूजन करे। 'शशाङ्काय नमः' से मस्तकका और 'विश्वेश्वराय नमः' से भगवान् मुरारिके किरीटका पूजन करे। फिर 'रोहिणीनामलक्ष्म्यै सौभाग्यसौख्यामृतसागराय पद्मश्रियै नमः'—रोहिणी नाम धारण करनेवाली सौभाग्य और सुखरूप अमृतके समुद्र लक्ष्मीको नमस्कार है—इस मन्त्रका उच्चारण कर सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदिके द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणीदेवीका पूजन करे॥ २—१३ १/२॥ |
| सुप्त्वाथ भूमौ पुनरुत्थितेन<br>स्नात्वा च विप्राय हविष्ययुक्तः॥ १४<br><br>दद्यात् प्रभाते सहिरण्यवारि-<br>कुम्भं नमः पापविनाशनाय।<br>सम्प्राश्य गोमूत्रममांसमन्न-<br>मक्षारमष्टावथ विंशतिं च।<br>ग्रासान् पयःसर्पियुतानुपोष्य<br>भुक्त्वाेतिहासं शृणुयान्मुहूर्तम् ॥ १५<br><br>कदम्बनीलोत्पलकेतकानि<br>जाती सरोजं शतपत्रिका च।<br>अम्लानकुब्जान्यथ सिन्धुवारं<br>पुष्पं पुनर्नारद मल्लिकायाः।<br>शुभ्रं च विष्णोः करवीरपुष्पं<br>श्रीचम्पकं चन्द्रमसे प्रदेयम् ॥ १६<br><br>श्रावणादिषु मासेषु क्रमादेतानि सर्वदा।<br>यस्मिन् मासे व्रतादिः स्यात् तत्पुष्पैरर्चयेद्धरिम्॥ १७ | इसके बाद रात्रिके समय भूमिपर शयन करे और सबेरे उठकर स्नानके पश्चात् 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत और सुवर्णसहित जलसे भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करनेके पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित अन्नके अट्ठाईस ग्रास, दूध और घीके साथ भोजन करे। तदनन्तर दो घड़ीतक इतिहास, पुराण आदिका श्रवण करे। नारद! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णुको कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जाती-पुष्प, कमल, शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा—ये ही फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियोंमेंसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोंमें क्रमशः अर्पण करे। जिस महीनेमें व्रत प्रारम्भ किया जाय, उस समय जो भी पुष्प सुलभ हों, उन्हींके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये ॥ १४—१७॥ |
| एवं संवत्सरं यावदुपास्य विधिवन्नरः।<br>व्रतान्ते शयनं दद्याद् दर्पणोपस्करान्वितम्॥ १८<br><br>रोहिणीचन्द्रमिथुनं कारयित्वाथ काञ्चनम्।<br>चन्द्रः षडङ्गुलः कार्यों रोहिणी चतुरङ्गुला॥ १९ | इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करके समाप्तिके समय व्रतीको चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियोंके साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा—दोनोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा छः अङ्गुलके और रोहिणी चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। |