मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५३ पुराणोंकी नामावलि और उनका संक्षिप्त परिचय
२०६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| येषु वै स्थास्यते क्षत्रमुत्पत्स्यन्ते नृपाश्च ये।<br>तेषामायुःप्रमाणं च नामतश्चैव तान् नृपान्॥ ६९<br>कृतयुगप्रमाणं च त्रेताद्वापरयोस्तथा।<br>कलियुगप्रमाणं च युगदोषं युगक्षयम्॥ ७०<br>सुखदुःखप्रमाणं च प्रजादोषं युगस्य तु।<br>एतत् सर्वं प्रसंख्याय पृच्छतां ब्रूहि नः प्रभो॥ ७१ | यह क्षत्रिय-जाति जिन-जिन वंशोंमें स्थित रहेगी और उनमें जो-जो नरेश उत्पन्न होंगे, उनके क्या नाम होंगे तथा उनकी आयुका प्रमाण कितना होगा? कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग—इन चारों युगोंकी कितनी-कितनी अवधि होगी? प्रत्येक युगमें क्या-क्या दोष होंगे? तथा उन युगोंका विनाश कैसे होगा? सुख और दुःखका प्रमाण क्या होगा? तथा प्रत्येक युगकी प्रजाओंमें क्या-क्या दोष उत्पन्न होंगे? प्रभो! यह सब क्रमशः हमें बतलाइये; क्योंकि हमलोग इसे जानना चाहते हैं॥ ६८-७१॥ |
| सूत उवाच<br>यथा मे कीर्तितं पूर्वं व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>भाव्यं कलियुगं चैव तथा मन्वन्तराणि च॥ ७२<br>अनागतानि सर्वाणि ब्रुवतो मे निबोधत।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भविष्या ये नृपास्तथा॥ ७३<br>ऐडैक्ष्वाकान्वये चैव पौरवे चान्वये तथा।<br>येषु संस्थास्यते तच्च ऐडैक्ष्वाकुकुलं शुभम्।<br>तान् सर्वान् कीर्तयिष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥ ७४<br>तेभ्योऽपरेऽपि ये त्वन्ये ह्युत्पत्स्यन्ते नृपाः पुनः।<br>क्षत्राः पारशवाः शूद्रास्तथान्ये ये बहिश्चराः॥ ७५<br>अन्धाः शकाः पुलिन्दाश्च चूलिका यवनास्तथा।<br>कैवर्ताभीरशबरा ये चान्ये म्लेच्छसम्भवाः।<br>पर्यायतः प्रवक्ष्यामि नामतश्चैव तान् नृपान्॥ ७६<br>अधिसीमकृष्णश्चैतेषां प्रथमं वर्तते नृपः।<br>तस्यान्यवाये वक्ष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥ ७७<br>अधिसीमकृष्णपुत्रस्तु विवक्षुर्भविता नृपः।<br>गङ्गाया तु हृते तस्मिन् नगरे नागसाह्वये॥ ७८<br>त्यक्त्वा विवक्षुर्नगरं कौशाम्ब्यां तु निवत्स्यति।<br>भविष्याष्टौ सुतास्तस्य महाबलपराक्रमाः॥ ७९<br>भूरिज्येष्ठः सुतस्तस्य तस्य चित्ररथः स्मृतः।<br>शुचिद्रवश्चित्ररथाद् वृष्णिमांश्च शुचिद्रवात्॥ ८०<br>वृष्णिमतः सुषेणश्च भविष्यति शुचिर्नृपः।<br>तस्मात् सुषेणाद् भविता सुनीथो नाम पार्थिवः॥ ८१<br>नृपात् सुनीथाद् भविता नृचक्षुः सुमहाद्यशाः।<br>नृचक्षुषस्तु दायादो भविता वै सुखीबलः॥ ८२<br>सुखीबलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः।<br>परिष्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृपः॥ ८३<br>मेधावी तस्य दायादो भविष्यति न संशयः।<br>मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरञ्जयः॥ ८४ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें अक्लिष्टकर्मा व्यासजीने मुझसे भावी कलियुग तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें जैसा वर्णन किया था, वही मैं आपलोगोंको बतला रहा हूँ; सुनिये। इसके बाद अब मैं उन्हीं राजाओंका वर्णन करने जा रहा हूँ, जो भविष्यमें ऐड (ऐल) और इक्ष्वाकुके वंशमें तथा पौरववंशमें उत्पन्न होनेवाले हैं। जिन राजाओंमें ये मङ्गलमय ऐड और इक्ष्वाकुवंश स्थित रहेंगे, भविष्यमें होनेवाले उन सभी तथाकथित नरेशोंका मैं वर्णन करूँगा। इनके अतिरिक्त भी जो अन्य नृपतिगण क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिन्द, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर और शबर जातियोंमें उत्पन्न होंगे तथा दूसरे जो म्लेच्छ-जातियोंमें पैदा होंगे, उन सभी नरेशोंका पर्याय क्रमसे नामनिर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इन सबमें सर्वप्रथम राजा अधिसोमकृष्ण हैं, जो सम्प्रति वर्तमान हैं। इनके वंशमें भविष्यमें उत्पन्न होनेवाले राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। अधिसीमकृष्णका पुत्र राजा विवक्षु होगा। गङ्गाद्वारा हस्तिनापुर नगरके डुबो (बहा) दिये जानेपर विवक्षु उस नगरका परित्याग कर कौशाम्बी नगरीमें निवास करेगा। उसके महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न आठ पुत्र होंगे। उसका ज्येष्ठ पुत्र भूरि होगा और उसका पुत्र चित्ररथ नामसे विख्यात होगा। चित्ररथसे शुचिद्रव, शुचिद्रवसे वृष्णिमान् और वृष्णिमान्से परम पवित्र राजा सुषेण उत्पन्न होगा। उस सुषेणसे सुनीथ नामका राजा होगा। राजा सुनीथसे महायशस्वी नृचक्षुकी उत्पत्ति होगी। नृचक्षुका पुत्र सुखीबल होगा। सुखीबलका पुत्र भावी राजा परिष्णव और परिष्णवका पुत्र राजा सुतपा होगा। उसका पुत्र निस्संदेह मेधावी होगा। मेधावीका पुत्र पुरञ्जय होगा। |
| * अध्याय ५१ * | २०७ |
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| उर्वो भाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मजः ।<br>तिग्माद् बृहद्रथो भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात् ॥ ८५<br>वसुदाम्न्नः शतानीको भविष्योदयनस्ततः ।<br>भविष्यते चोदयनाद् वीरो राजा वहीनरः ॥ ८६<br>वहीनरात्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति ।<br>दण्डपाणेर्निरमित्रो निरमित्रात्तु क्षेमकः ॥ ८७<br>अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतो विप्रैः पुरातनैः ।<br>ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे ॥ ८८<br>इत्येष पौरवो वंशो यथावदिह कीर्तितः ।<br>धीमतः पाण्डुपुत्रस्य चार्जुनस्य महात्मनः ॥ ८९ | उसका भावी पुत्र उर्व और उसका पुत्र तिग्मात्मा होगा। तिग्मात्मासे बृहद्रथ और बृहद्रथसे वसुदामाका जन्म होगा। वसुदामासे शतानीक और उससे उदयनकी उत्पत्ति होगी। उदयनसे वीरवर राजा वहीनर उत्पन्न होगा। वहीनरका पुत्र दण्डपाणि होगा। दण्डपाणिसे निरमित्र और निरमित्रसे क्षेमकका जन्म होगा। इस वंशपरम्पराके विषयमें प्राचीनकालिक विप्रोंद्वारा एक श्लोक गाया गया है, जिसका आशय यह है कि 'ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी योनिस্বরূপ यह वंश, जो देवर्षियोंद्वारा सत्कृत है, कलियुगमें राजा क्षेमकको प्राप्त कर समाप्त हो जायगा।' इस प्रकार पुरु-वंशका तथा पाण्डुपुत्र परम बुद्धिमान् महात्मा अर्जुनके वंशका वर्णन मैंने यथार्थरूपसे कर दिया॥ ७२—८९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे पुरुवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५०
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पुरुवंशानुकीर्तन नामक पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५० ॥
इक्यावनवाँ अध्याय
अग्नि-वंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन
| ऋषय ऊचुः<br>ये पूज्याः स्युर्द्विजातीनामग्नयः सूत सर्वदा ।<br>तानिदानीं समाचक्ष्व तद्वंशं चानुपूर्वशः ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>योऽसावग्निरभिमानी स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे ।<br>ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्तस्मात् स्वाहा व्यजायत ॥ २<br>पावकं पवमानं च शुचिरग्निश्च यः स्मृतः ।<br>निर्मथ्यः पवमानोऽग्निर्वैद्युतः पावकात्मजः ॥* ३<br>शुचिरग्निः स्मृतः सौरः स्थावराश्चैव ते स्मृताः ।<br>पवमानात्मजो ह्यग्निः कव्यवाहन उच्यते ॥ ४<br>पावकिः सहरक्षस्तु हव्यवाहः शुचेः सुतः ।<br>देवानां हव्यवाहोऽग्निः पितॄणां कव्यवाहनः ॥ ५<br>सहरक्षोऽसुराणां तु त्रयाणां ते त्रयोऽग्नयः ।<br>एतेषां पुत्रपौत्राश्च चत्वारिंशन्नवैव च ॥ ६ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! जो अग्नि द्विजातियोंके लिये सदा परम पूज्य माने गये हैं, अब उनका तथा उनके वंशका आनुपूर्वी वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो ! स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें जो ये अग्निके अभिमानी देवता कहे गये हैं, वे ब्रह्माके मानस पुत्र हैं। स्वाहाने उनके संयोगसे पावक (दक्षिणाग्नि), पवमान (गार्हपत्य) और शुचि (आहवनीय) नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जो अग्नि भी कहलाते हैं। उनमेंसे पावकको वैद्युत (जलबिजलीसे उत्पन्न), पवमानको निर्मथ्य (निर्मन्थन करनेपर उत्पन्न) और शुचिको सौर (सूर्यके सम्बन्धसे उत्पन्न) अग्नि कहा जाता है। ये सभी अग्नि स्थावर (स्थिर स्वभाववाले) माने गये हैं। पवमानके पुत्र जो अग्नि हुए, उन्हें कव्यवाहन कहा जाता है। पावकके पुत्र सहरक्ष और शुचिके पुत्र हव्यवाहन हुए। देवताओंके अग्नि हव्यवाह हैं, जो ब्रह्माके प्रथम पुत्र हैं। सहरक्ष असुरोंके अग्नि हैं तथा पितरोंके अग्नि कव्यवाहन हैं। इस प्रकार ये तीनों देव-असुर-पितर—इन तीनोंके पृथक्-पृथक् अग्नि हैं। इनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या उनचास हैं। |
* 'अव्योनिर्वैद्युतः स्मृतः' इति पाठान्तरम् ।
२०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रवक्ष्ये नामतस्तान् वै प्रविभागेन तान् पृथक्।<br>पावनो लौकिको ह्यग्निः प्रथमो ब्रह्मणश्च यः॥ ७<br>ब्रह्मौदनाग्निस्तत्पुत्रो भरतो नाम विश्रुतः।<br>वैश्वानरः सुतस्तस्य वहन् हव्यं समाः शतम्॥ ८<br>सम्भृतोऽथर्वणः पुत्रो मथितः पुष्करादधि।<br>सोऽथर्वा लौकिको ह्यग्निर्दध्यङ्ङाथर्वणःसुतः॥ ९<br>भृगोः प्रजायताथर्वा दध्यङ्ङाथर्वणः स्मृतः।<br>तस्य ह्याल्लौकिको ह्यग्निर्दाक्षिणाग्निः स वै स्मृतः॥ १० | उनको मैं विभागपूर्वक पृथक्-पृथक् नामनिर्देशानुसार बतला रहा हूँ। सर्वप्रथम पावन नामक लौकिक अग्निदेव हुए, जो ब्रह्माके पुत्र हैं। उनके पुत्र ब्रह्मौदनाग्नि हुए, जो भरत नामसे भी विख्यात हैं। वैश्वानर नामक अग्नि सौ वर्षोंतक हव्यको वहन करते रहे। पुष्कर (या आकाश)-का मन्थन करनेपर अथर्वाके पुत्ररूपमें जो अग्नि उत्पन्न हुए, वे दध्यङ्ङाथर्वणके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्हींको दक्षिणाग्नि भी कहा जाता है। भृगुसे अथर्वाकी और अथर्वासे अङ्गिराकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। उनसे अलौकिक अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिसे दक्षिणाग्नि भी कहते हैं॥ २—१०॥ |
| अथ यः पवमानस्तु निर्मथ्योऽग्निः स उच्यते।<br>स च वै गार्हपत्योऽग्निः प्रथमो ब्रह्मणः स्मृतः॥ ११<br>ततः सभ्यावसथ्यौ च संशत्यास्तौ सुतावुभौ।<br>ततः षोडश नद्यस्तु चकमे हव्यवाहनः।<br>यः खल्वाहवनीयोऽग्निरभिमानी द्विजैः स्मृतः॥ १२<br>कावेरीं कृष्णवेणां च नर्मदां यमुनां तथा।<br>गोदावरीं वितस्तां च चन्द्रभागामिरावतीम्॥ १३<br>विपाशां कौशिकीं चैव शतद्रुं सरयूं तथा।<br>सीतां मनस्विनीं चैव ह्लादिनीं पावनां तथा॥ १४<br>तासु षोडशधाऽऽत्मानं प्रविभज्य पृथक् पृथक्।<br>तदा तु विहरंस्तासु धिष्ण्येच्छः स बभूव ह॥ १५<br>स्वाभिधानस्थिता धिष्ण्यास्तासूतपन्नाश्च धिष्णवः।<br>धिष्ण्येषु जज्ञिरे यस्मात् ततस्ते धिष्णवः स्मृताः॥ १६<br>इत्येते वै नदीपुत्रा धिष्ण्येषु प्रतिपेदिरे।<br>तेषां विहरणीया ये उपस्थेयाश्च ताञ्शृणु।<br>विभुः प्रवाहणोऽग्नीध्रस्तत्रस्था धिष्णावोऽपरे॥ १७<br>विहरन्ति यथास्थानं पुण्याहे समुपक्रमे।<br>अनिर्देश्यानिवार्याणामग्नीनां शृणुत क्रमम्॥ १८<br>वासवोऽग्निः कृशानुर्यो द्वितीयोत्तरवेदिकः।<br>सम्राडग्निसुतो ह्यष्टावुपतिष्ठन्ति तान् द्विजाः॥ १९ | हम पहले कह चुके हैं कि जो पवमान अग्नि हैं, वे ही निर्मथ्य नामसे भी कहे जाते हैं। वे ही ब्रह्माके प्रथम पुत्र गार्हपत्य* अग्नि हैं। फिर संशतिसे सभ्य और आवसथ्य—इन दो पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर आहवनीय नामक अग्निने जिन्हें ब्राह्मणोंने अग्निके अभिमानी देवता नामसे अभिहित किया है, अपनेको सोलह भागोंमें विभक्त कर कावेरी, कृष्णवेणा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा, इरावती, विपाशा, कौशिकी (कोसी), शतद्रु (सतलज), सरयू, सीता, मनस्विनी, ह्लादिनी तथा पावना—इन सोलह नदियोंके साथ पृथक्-पृथक् विहार किया। उनके साथ विहार करते समय अग्निको स्थान-प्राप्तिकी इच्छा उत्पन्न हो गयी थी, इसलिये उन नदियोंके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र उस इच्छाके अनुसार धिष्णु (या धिष्ण्य) कहलाये। चूँकि वे यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थानपर पैदा हुए थे, इसलिये धिष्णु नामसे कहे जाने लगे। इस प्रकार ये सभी नदीपुत्र धिष्ण्य (यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थान)-में उत्पन्न हुए थे। अब इनके विहार एवं उपासनायोग्य स्थानका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। यज्ञादि पुण्य अवसरके उपस्थित होनेपर विभु, प्रवाहण, अग्नीध्र आदि अन्यान्य धिष्णु वहाँ उपस्थित होकर यथास्थान विचरते रहते हैं। अब अनिर्देश्य और अनिवार्य अग्नियोंके क्रमको सुनिये। वासव नामक अग्नि, जिसे कृशानु भी कहते हैं, यज्ञकी दूसरी वेदीके उत्तर भागमें स्थित होते हैं। उन्हीं अग्निका एक नाम सम्राट् भी है। इन अग्निके आठ पुत्र हैं, जिनकी विप्रगण उपासना करते हैं। |
* इन अग्नियोंकी वैदिक २१ यज्ञसंस्थाओंमें बड़ी प्रतिष्ठा है। इनका विस्तृत विवरण आश्वलायनादि (२।१-२) श्रौतसूत्रों, कौशिकसूत्र, महाभारत, ब्रह्माण्डपुराणादिमें हैं। वासुदेवशरण अग्रवालने 'Matsya Puran A Study' में, अनेक कर्मोंमें अग्निनाम संग्रहमें विधानपारिजातकारने तथा 'यज्ञमीमांसा' ग्रन्थमें वेणीराम शर्माने बहुत श्रम किया है।
| * अध्याय ५१ * | २०९ |
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| पर्जन्यः पवमानस्तु द्वितीयः सोऽनुदृश्यते।<br>पावकोष्णाः समूह्यास्तु वोत्तरे सोऽग्निरुच्यते॥ २०<br>हव्यसूदो ह्यसम्मूज्यः शामित्रः स विभाव्यते।<br>शतधामा सुधाज्योती रौद्रैश्वर्यः स उच्यते॥ २१<br>ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा ब्रह्मस्थानीय उच्यते।<br>अजैकपादुपस्थेयः स वै शालामुखो यतः॥ २२<br>अनिर्देश्यो ह्यहिर्बुध्न्यो बहिरन्ते तु दक्षिणे।<br>पुत्रा ह्येते वासवस्य उपस्थेया द्विजैः स्मृताः॥ २३ | पवमान नामक जो द्वितीय अग्नि हैं, वे पर्जन्यके रूपमें देखे जाते हैं और उत्तर दिशामें स्थित पावक नामक अग्निको समूह्या अग्नि कहा जाता है। असम्मृज्य हव्यसूद अग्निको शामित्र कहा जाता है। शतधामा अग्नि सुधाज्योति हैं, इन्हें रौद्रैश्वर्य नामसे अभिहित किया जाता है। ब्रह्मज्योति अग्निको वसुधाम और ब्रह्मस्थानीय भी कहते हैं। अजैकपाद् उपासनीय अग्नि हैं, इन्हें शालामुख भी कहा जाता है। अहिर्बुध्न्य अनिर्देश्य अग्नि हैं, ये वेदीकी दक्षिण दिशामें परिधिके अन्तमें स्थित होते हैं। वासव नामक अग्निके ये आठों पुत्र ब्राह्मणोंद्वारा उपासनीय बतलाये गये हैं॥ ११-२३॥ |
| ततो विहरणीयांस्तु वक्ष्याम्यष्टौ तु तान् सुतान्।<br>होत्रियस्य सुतो ह्यग्निर्बर्हिषो हव्यवाहनः॥ २४<br>प्रशंस्योऽग्निः प्रचेतास्तु द्वितीयः संसहायकः।<br>सुतो ह्यग्नेर्विश्ववेदा ब्राह्मणाच्छंसिरुच्यते॥ २५<br>अपां योनिः स्मृतः स्वाम्भः सेतुर्नाम विभाव्यते।<br>धिष्ण्य आहरणा ह्येते सोमेनेज्यन्त वै द्विजैः॥ २६<br>ततो यः पावको नाम्ना यः सद्भिर्योग उच्यते।<br>अग्निः सोऽवभृथो ज्ञेयो वरुणेन सहेज्यते॥ २७ | अब मैं उन आठ विहरणीय अग्निपुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। बर्हिष् नामक होत्रिय अग्निके पुत्र हव्यवाहन अग्नि हैं। इसके पश्चात् प्रचेता नामक प्रशंसनीय अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिनका दूसरा नाम संसहायक है। पुनः अग्निपुत्र विश्ववेदा हुए, जिन्हें ब्राह्मणाच्छंसी¹ भी कहा जाता है। जलसे उत्पन्न होनेवाले प्रसिद्ध स्वाम्भ अग्नि सेतु नामसे भी अभिहित होते हैं। इन धिष्ण्यसंज्ञक अग्नियोंका यज्ञमें यथास्थान आवाहन होता है और ब्राह्मणलोग सोम-रसद्वारा इनकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् जो पावक नामक अग्नि हैं, जिन्हें सत्पुरुषगण योग नामसे पुकारते हैं, उन्हींको अवभृथ अग्नि² समझना चाहिये। उनकी वरुणके साथ पूजा होती है। |
| हृदयस्य सुतो ह्यग्नेर्जठरेऽसौ नृणां पचन्।<br>मन्युमाञ्जठरश्चाग्निर्विद्वाग्निः सततं स्मृतः॥ २८<br>परस्परोत्थितो ह्यग्निर्भूतानीह विभुर्दहन्।<br>अग्नेर्मन्युमतः पुत्रो घोरः संवर्तकः स्मृतः॥ २९<br>पिबन्नपः स वसति समुद्रे वडवामुखे।<br>समुद्रवासिनः पुत्रः सहरक्षो विभाव्यते॥ ३०<br>सहरक्षस्तु वै कामान् गृहे स वसते नृणाम्।<br>क्रव्यादग्निः सुतस्तस्य पुरुषान् योऽत्ति वै मृतान्॥ ३१<br>इत्येते पावकस्याग्नेर्द्विजैः पुत्राः प्रकीर्तिताः।<br>ततः सुतास्तु सौवीर्याद् गन्धर्वैरसुरैर्हताः॥ ३२<br>मथितो यस्त्वरण्यां तु सोऽग्निराप समिन्धनम्।<br>आयुर्नाम्ना तु भगवान् पश्चौ यस्तु प्रणीयते॥ ३३<br>आयुषो महिमान् पुत्रो दहनस्तु ततः सुतः।<br>पाकयज्ञेष्वभीमानी हुतं हव्यं भुनक्ति यः॥ ३४ | हृदय नामक अग्निके पुत्र मन्युमान् हैं, जिन्हें जठराग्नि भी कहते हैं। ये मनुष्योंके उदरमें स्थित रहकर भक्षित पदार्थोंको पचाते हैं। परस्परके संघर्षसे उत्पन्न हुए प्रभावशाली अग्निको, जो जगत्में निरन्तर प्राणियोंको जलाते रहते हैं, विद्वाग्नि कहते हैं। मन्युमान् अग्निके पुत्र संवर्तक हैं जो अत्यन्त भयंकर बताये जाते हैं। वे समुद्रमें बडवामुखद्वारा निरन्तर जलपान करते हुए निवास करते हैं। समुद्रवासी संवर्तक अग्निके पुत्र सहरक्ष बतलाये जाते हैं। सहरक्ष मनुष्योंके घरोंमें निवास करते हैं और उनकी सभी कामनाओंको सम्पन्न करते रहते हैं। सहरक्षके पुत्र क्रव्यादग्नि हैं, जो मरे हुए पुरुषोंका भक्षण करते हैं। इस प्रकार ये सभी ब्राह्मणोंद्वारा पावक नामक अग्निके पुत्र बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य पुत्र हैं, उन्हें सौवीर्यसे गन्धर्वों और असुरोंने हरण कर लिया था। अरणीमें मन्थन करनेसे जो अग्नि उत्पन्न होता है, वह तो इन्धनके आश्रित रहता है। पृथु-योनिके लिये जिन अग्निकी नियुक्ति हुई है, उन ऐश्वर्यशाली अग्निका नाम आयु है। आयुके पुत्र महिमान् और उनके पुत्र दहन हैं, जो पाकयज्ञोंके अभिमानी देवता हैं। वे ही उन यज्ञोंमें हवन किये गये हविको खाते हैं। |
१. यह अग्निष्टोमके १६ ऋत्विजोंमेंसे भी एक होता है, जिसका इस अग्निपरिचर्यासे विशेष सम्बन्ध होता है।
२. यज्ञान्तहवन एवं अवभृथ स्नानके समय इसका उपयोग होता है।
| २१० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वस्माद् देवलोकाच्च हव्यं कव्यं भुनक्ति यः।<br>पुत्रोऽस्य स हितो ह्यग्निरद्भुतः स महायशाः॥ ३५<br>प्रायश्चित्तेष्वभीमानी हुतं हव्यं भुनक्ति यः।<br>अद्भुतस्य सुतो वीरो देवांशस्तु महान् स्मृतः॥ ३६<br>विविधाग्निस्ततस्तस्य तस्य पुत्रो महाकविः।<br>विविधाग्निसुतादर्कादग्नयोऽष्टौ सुताः स्मृताः॥ ३७ | दहनके पुत्र अद्भुत नामक अग्नि हैं, जो समस्त देवलोकोंमें दिये गये हव्य एवं कव्यका भक्षण करते हैं। वे महान् यशस्वी और जनताके हितकारी हैं। ये प्रायश्चित्तनिमित्तक यज्ञोंके अभिमानी देवता हैं, इसी कारण उन यज्ञोंमें हवन किये गये हव्यको खाते हैं। अद्भुतके पुत्र वीर नामक अग्नि हैं, जो देवांशसे उद्भूत और महान् कहे जाते हैं। उनके पुत्र विविधाग्नि हैं और विविधाग्निके पुत्र महाकवि हैं। विविधाग्निके दूसरे पुत्र अर्कसे आठ अग्नि-पुत्रोंकी उत्पत्ति बतलायी जाती है॥ २४—३७॥ |
| काम्यास्विष्टिष्वभीमानी रक्षोहा यतिकृच्च यः।<br>सुरभिर्वसुमान् नादो हर्यश्वश्चैव रुक्मवान्॥ ३८<br>प्रवर्ग्यः क्षेमवांश्चैव इत्यष्टौ च प्रकीर्तिताः।<br>शुच्यग्रेस्तु प्रजा ह्येषा अग्नयश्च चतुर्दश॥ ३९<br>इत्येते ह्यग्नयः प्रोक्ताः प्रणीता ये हि चाध्वरे।<br>समतीते तु सर्गे ये यामैः सह सुरोत्तमैः॥ ४०<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमग्नयस्तेऽभिमानिनः।<br>एते विहरणीयेषु चेतनाचेतनेष्विह॥ ४१<br>स्थानाभिमानिनोऽग्नीध्राः प्रागासन् हव्यवाहनाः।<br>काम्यनैमित्तिकाद्यास्ते ये ते कर्मस्ववस्थिताः॥ ४२<br>पूर्वे मन्वन्तरेऽतीते शुक्लैर्यामैश्च तैः सह।<br>एते देवगणैः सार्धं प्रथमस्यान्तरे मनोः॥ ४३<br>इत्येता योनयो ह्युक्ताः स्थानाख्या जातवेदसाम्।<br>स्वारोचिषादिषु ज्ञेयाः सवर्णान्तेषु सप्तसु॥ ४४<br>तैरेवं तु प्रसंख्यातं साम्प्रतानागतेष्विह।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु लक्षणं जातवेदसाम्॥ ४५<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु नानारूपप्रयोजनैः।<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च यामैर्देवैः सहाग्नयः॥ ४६<br>अनागतैः सुरैः सार्धं वत्स्यन्तोऽनागतास्त्वथ।<br>इत्येष प्रचयोऽग्नीनां मया प्रोक्तो यथाक्रमम्।<br>विस्तरेणानुपूर्व्या च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ॥ ४७ | कामना-पूर्तिके निमित्त किये जानेवाले यज्ञोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका नाम रक्षोहा अग्नि है। उनका दूसरा नाम यतिकृत् भी है। इनके अतिरिक्त सुरभि, वसुरत्न, नाद, हर्यश्व, रुक्मवान्, प्रवर्ग्य और क्षेमवान्—ये आठ अग्नि कहे गये हैं। ये सभी शुचि नामक अग्निकी संतान हैं। इन सबकी संख्या चौदह है। इस प्रकार मैंने उन सभी अग्नियोंका वर्णन कर दिया, जिनका यज्ञ-कार्यमें प्रयोग किया जाता है। प्रलयकालमें ये सभी अग्निपुत्र याम नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सभी चेतन एवं अचेतन विहरणीय पदार्थोंके अभिमानी देवता थे। इस पूर्व मन्वन्तरके समाप्त हो जानेपर पुनः प्रथम मन्वन्तरमें ये सभी अग्निगण शुक्र एवं याम नामक देवगणोंके साथ स्थानाभिमानी देवता बनकर अग्नीध्र नामक अग्निके साथ हव्य-वहनका कार्य करते थे और काम्य एवं नैमित्तिक आदि जो यज्ञ किये जाते थे, उन कर्मोंमें अवस्थित रहते थे। इस प्रकार मैंने अग्नियोंकी स्थानाम्नी योनियोंका वर्णन कर दिया। उन्हें स्वारोचिष् मन्वन्तरसे लेकर सावर्णि मन्वन्तरतकके सातों लोकोंमें वर्तमान जानना चाहिये। ऋषियोंने वर्तमान एवं भविष्यमें आनेवाली सभी मन्वन्तरोंमें इसी प्रकार अग्नियोंके लक्षणका वर्णन किया है। ये सभी अग्नि समस्त मन्वन्तरोंमें नाना प्रकारके रूप और प्रयोजनोंसे समन्वित हो वर्तमानकालीन याम नामक देवताओंके साथ वर्तमान थे और इस समय भी हैं तथा भविष्यमें भी उत्पन्न होकर इन नये उत्पन्न होनेवाले देवगणोंके साथ निवास करेंगे। इस प्रकार मैं अग्नियोंके वंश-समूहका क्रमशः विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर चुका। अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ३८—४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽग्निवंशो नामैकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अग्निवंश-वर्णन नामक इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५१॥
| * अध्याय ५२ * | २११ |
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बावनवाँ अध्याय
कर्मयोगकी महत्ता
| संस्कृत (मूल श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>इदानीं प्राह यद् विष्णुः पृष्टः परममुत्तमम्।<br>तमिदानीं समाचक्ष्व धर्माधर्मस्य विस्तरम्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! सूर्यपुत्र मनुद्वारा पूछे जानेपर भगवान् विष्णुने उनसे धर्म और अधर्मके जिस परम उत्तम प्रसङ्गको विस्तारपूर्वक कहा था, वह इस समय आप हमलोगोंको बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>एवमेकार्णवे तस्मिन् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>विस्तारमादिसर्गस्य प्रतिसर्गस्य चाखिलम्॥ २<br>कथयामास विश्वात्मा मनवे सूर्यसूनवे।<br>कर्मयोगं च सांख्यं च यथावद् विस्तारान्वितम्॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रलयकालके उस एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपधारी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने सूर्यपुत्र मनुके प्रति सर्गके विस्तारका पूर्णरूपसे वर्णन किया था। साथ ही कर्मयोग और सांख्ययोगको भी उन्हें विस्तारपूर्वक यथार्थरूपसे बतलाया था (उसे ही मैं आपलोगोंको सुनाना चाहता हूँ)॥ २-३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>श्रोतुमिच्छामहे सूत कर्मयोगस्य लक्षणम्।<br>यस्मादविदितं लोके न किंचित् तव सुव्रत॥ ४ | **ऋषियोंने पूछा—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सूतजी! आपके लिये लोकमें कोई वस्तु अज्ञात तो है नहीं, अतः हमलोग आपसे कर्मयोगका लक्षण सुनना चाहते हैं॥ ४॥ |
| सूत उवाच<br>कर्मयोगं च वक्ष्यामि यथा विष्णुविभाषितम्।<br>ज्ञानयोगसहस्राद्धि कर्मयोगः प्रशस्यते॥ ५<br>कर्मयोगोद्भवं ज्ञानं तस्मात् तत्परमं पदम्।<br>कर्मज्ञानोद्भवं ब्रह्म न च ज्ञानमकर्मणः॥ ६<br>तस्मात् कर्मणि युक्तात्मा तत्त्वमाप्नोति शाश्वतम्।<br>वेदोऽखिलो धर्ममूलमाचारश्चैव तद्विदाम्॥ ७<br>अष्टावात्मगुणास्तस्मिन् प्रधानत्वेन संस्थिताः।<br>दया सर्वेषु भूतेषु क्षान्ती रक्षाऽऽतुरस्य तु॥ ८<br>अनसूया तथा लोके शौचमन्तर्बहिर्द्विजाः।<br>अनायासेषु कार्येषु माङ्गल्याचारसेवनम्॥ ९<br>न च द्रव्येषु कार्पण्यमार्तेषूपार्जितेषु च।<br>तथास्पृहा परद्रव्ये परस्त्रीषु च सर्वदा॥ १० | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! विष्णुभगवान्ने जिस प्रकार कर्मयोगकी व्याख्या की थी, उसे मैं बतला रहा हूँ। कर्मयोग ज्ञानयोगसे हजारोंगुना अधिक प्रशस्त है; क्योंकि ज्ञान कर्मयोगसे ही प्रादुर्भूत होता है; अतः वह परमपद है। ब्रह्म भी कर्मज्ञानसे उद्भूत होता है। कर्मके बिना तो ज्ञानकी सत्ता ही नहीं है। इसीलिये कर्मयोगके अभ्यासमें संलग्न मनुष्य अविनाशी तत्त्वको प्राप्त कर लेता है। सम्पूर्ण वेद और वेदज्ञोंके आचार-विचार धर्मके मूल हैं। उनमें आठ प्रकारके आत्मगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहते हैं; जैसे समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, दुःखसे पीडित प्राणीको आश्वासन प्रदान करना और उसकी रक्षा करना, जगत्में किसीसे ईर्ष्या-द्वेष न करना, बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता, परिश्रमरहित अथवा अनायास प्राप्त हुए कार्योंके अवसरपर उन्हें माङ्गलिक आचार-व्यवहारके द्वारा सम्पन्न करना, अपने द्वारा उपार्जित द्रव्योंसे दीन-दुखियोंकी सहायता करते समय कृपणता न करना तथा पराये धन और परायी स्त्रीके प्रति सदा निःस्पृह |
| २१२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टावात्मगुणाः प्रोक्ताः पुराणस्य तु कोविदैः ।<br>अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्य साधकः ॥ ११<br><br>कर्मयोगं विना ज्ञानं कस्यचिन्नेह दृश्यते ।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममुपतिष्ठेत् प्रयत्नतः ॥ १२<br><br>देवतानां पितॄणां च मनुष्याणां च सर्वदा ।<br>कुर्यादहरहर्यज्ञैर्भूतर्षिगणतर्पणम् ॥ १३<br><br>स्वाध्यायैरर्चयेच्चर्षीन् होमैर्विद्वान् यथाविधि ।<br>पितॄञ्छ्राद्धैरन्नदानैर्भूतानि बलिकर्मभिः ॥ १४<br><br>पञ्चैते विहिता यज्ञाः पञ्चसूनापनुत्तये ।<br>कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भी प्रमार्जनी ॥ १५<br><br>पञ्च सूना गृहस्थस्य तेन स्वर्गं न गच्छति ।<br>तत्पापनाशनायामी पञ्च यज्ञाः प्रकीर्तिताः * ॥ १६ | रहना—पुराणोंके ज्ञाता विद्वानोंद्वारा ये आठ आत्मगुण बतलाये गये हैं। यही कर्मयोग ज्ञानयोगका साधक है। जगत्में कर्मयोगके बिना किसीको ज्ञानकी प्राप्ति हुई हो, ऐसा नहीं देखा गया है; इसलिये श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा कहे गये धर्मका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। प्रतिदिन सर्वदा देवताओं, पितरों और मनुष्योंको यज्ञोंद्वारा तृप्त करना चाहिये। साथ ही पितरों और ऋषियोंके तर्पणका कार्य भी कर्तव्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह स्वाध्यायद्वारा देवताओंकी, हवनद्वारा ऋषियोंकी, श्राद्धद्वारा पितरोंकी, अन्नद्वारा अतिथियोंकी तथा बलिकर्मद्वारा मृत प्राणियोंकी विधिपूर्वक अर्चना करे। गृहस्थोंके घरमें जीवहिंसाके पाँच प्रकारके स्थानोंपर घटित हुए पापकी निवृत्तिके लिये इन पाँच प्रकारके यज्ञोंका विधान बतलाया गया है। गृहस्थके घरमें जीवहिंसाके पाँच स्थान ये हैं—कण्डनी (वस्तुओंके कूटनेका पात्र ओखली, खरल आदि), पेषणी (पीसनेका उपकरण चक्की, सिलवट आदि), चुल्ली (चूल्हा), जलकुम्भी (पानी रखे जानेवाले घड़े) और प्रमार्जनी (झाडू आदि)। इन स्थानोंपर उत्पन्न हुए पापके कारण गृहस्थ पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता, अतः उन पापोंके विनाशके लिये ये पाँचों यज्ञ बतलाये गये हैं॥ ५—१६॥ |
| द्वात्रिंशच्च तथाष्टौ च ये संस्काराः प्रकीर्तिताः ।<br>तद्युक्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्वात्मगुणवर्जितः ॥ १७<br><br>तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकर्म समाचरेत् ।<br>गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत् ॥ १८ | द्विजातियोंके लिये जो चालीस प्रकारके संस्कार बतलाये गये हैं, उनसे संस्कृत होनेपर भी जो मनुष्य (उपर्युक्त आठ) आत्मगुणोंसे रहित है, वह मोक्षका भागी नहीं हो सकता। इसलिये आत्मगुणोंसे सम्पन्न होकर ही वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। गृहस्थको सदा उपार्जित धनद्वारा गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण करना चाहिये। |
| गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकेन च ।<br>पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्रवस्वात्मकं शिवम् ॥ १९<br><br>व्रतोपवासैर्विधिवच्छ्रद्धया च विमत्सरः ।<br><br>योऽसावतीन्द्रियः शान्तः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।<br>वासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयो ह्यमी ॥ २० | उसका कर्तव्य है कि वह व्रत एवं उपवास आदि करके गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, वस्त्र, गन्ध, माला और जल आदिसे ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, रुद्र और वसुस्वरूप शिवकी श्रद्धापूर्वक विधिसहित पूजा करे; इसमें कृपणता न करे। जो ये इन्द्रियोंके अगोचर, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अव्यक्त, अविनाशी एवं विश्वस्वरूप भगवान् वासुदेव हैं, |
* ये १३—१६ तकके ४ श्लोक मनुस्मृति ३। ६८—७१ में भी प्राप्त होते हैं। और आठ गुणोंके निर्देशक श्लोक गौतमधर्मसूत्र ८। २४—२५, शङ्ख स्मृ० १। १७, चाणक्य० १२। १५ आदिमें उपलब्ध भी हैं।