मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७- देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| १०० | * मत्स्यपुराण * |
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| शतानीक उवाच<br>ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः।<br>कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्॥ ४<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन।<br>आनुपूर्व्याच्च मे शंस पूरोर्वंशधरान् नृपान्॥ ५ | **शतानीकने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे पूरुके सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये॥ ४-५॥ |
| शौनक उवाच<br>ययातिरासीद् राजर्षिर्देवराजसमद्युतिः।<br>तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा॥ ६<br>तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो राजसत्तम।<br>देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च॥ ७<br>सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः।<br>ऐश्वर्यं प्रति सङ्घर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे॥ ८<br>जिगीषया ततो देवा वब्रुराङ्गिरसं मुनिम्।<br>पौरोहित्ये च यज्ञार्थे काव्यं तूर्शनसं परे॥ ९<br>ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यं स्पर्धिनौ भृशम्।<br>तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान्॥ १०<br>तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात्।<br>ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाञ्चक्रिरे सुरान्॥ ११<br>असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि।<br>न तान् स जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः॥ १२<br>न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्यवान्।<br>सञ्जीवनीं ततो देवा विषादमगमन् परम्॥ १३ | **शौनकजीने कहा—**राजसत्तम! राजर्षि ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिरूपमें जिस प्रकार वरण किया था, वह सब प्रसङ्ग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ। एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ, उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने यज्ञ-कार्यके लिये अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिको पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाँट रखते थे। देवता उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारते थे, उन्हें शुक्राचार्य अपनी संजीवनी-विद्याके बलसे पुनः जीवित कर देते थे। वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगते; परंतु असुरगण युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारते, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते; क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीवनी-विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको न था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ॥ ६-१३॥ |
| अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा।<br>ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः॥ १४<br>भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम्।<br>यासौ विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि॥ १५<br>शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागमग्र्यौ भविष्यसि।<br>वृषपर्वणः समीपेऽसौ शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः॥ १६<br>रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान्।<br>तमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चिदृते त्वया॥ १७<br>देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः।<br>तामाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते॥ १८ | देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो गये। तब वे बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले—'ब्रह्मन्! हम तुम्हारी शरणमें हैं। तुम हमें अपनाओ और हमारी उत्तम सहायता करो। अमित तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी-विद्या है, उसे तुम शीघ्र सीख लो, इससे तुम हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकोगे। राजा वृषपर्वाके समीप तुम्हें विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है। वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं; किंतु जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। उनकी आराधना करनेके लिये तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा तुम्हीं प्रसन्न कर सकते हो। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है। |
- अध्याय २५ * । १०१
| शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।<br>देवयान्यां तु तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥ १९<br>तदा हि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।<br>तथेत्युक्त्वा तु स प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः॥ २०<br>स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्पूजितः कचः।<br>असुरेन्द्रपुरे शुक्रं प्रणम्येदमुवाच ह॥ २१<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः।<br>नाम्ना कचेति विख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ २२<br>ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो।<br>अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रपरिवत्सरान्॥ २३ | अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर तुम निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लोगे।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पति-पुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गया। राजन्! देवताओंद्वारा भेजा गया कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिला और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'भगवन्! मैं अङ्गिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें। ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षांतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ १४-२३॥ |
| शुक्र उवाच<br>कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः।<br>अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २४ | **शुक्राचार्यने कहा—**कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका (ही) आदर-सत्कार होगा॥ २४॥ |
| शौनक उवाच<br>कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम्।<br>आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २५<br>व्रतं च व्रतकालं च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत।<br>आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २६<br>नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगोचराम्।<br>गायन् नृत्यन् वादयँश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २७<br>संशीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम्।<br>पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भार्गवीम् ॥ २८<br>देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतचारिणम्।<br>अनुगायन्ती ललना रहः पर्यचरत् तदा॥ २९<br>पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो भृशम्।<br>तत्तत्तीव्रं व्रतं बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ ३०<br>गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येनममर्षिताः।<br>जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषात्संञ्जिंरक्षार्थमेव च॥ ३१<br>हत्वा सालावृकेभ्यश्च प्रायच्छंस्तिलशः कृतम्।<br>ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वनिवेशनम् ॥ ३२ | **शौनकजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण किया। राजन्! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी—दोनोंकी नित्य आराधना करने लगा। वह नवयुवक था और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखता था। आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आता तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करता। (इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वह सदा उसे प्रसन्न रखता था।) देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उसकी सेवा करती थी। इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी-विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला। उन्होंने मारनेके बाद उसके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं। जब |
१०२ * मत्स्यपुराण *
| ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचो नाभ्यागतो वनात्।<br>उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम् ॥ ३३<br>हुतं चैवाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो।<br>अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३४<br>व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३५ | देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं है, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा—'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देता। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारा गया है या पकड़ लिया गया है। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी'॥ २५—३५॥ |
| शुक्र उवाच<br>अथेह्येहीति शब्देन मृतं संजीवयाम्यहम्।<br>ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत् ॥ ३६<br>आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।<br>हतोऽहमिति चाचख्यौ राक्षसैर्धिषणात्मजः ॥ ३७<br>स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया।<br>वनं ययौ कचो विप्रः पठन् ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ ३८<br>वने पुष्पाणि चिन्वन्तं ददृशुर्दानवाश्च तम्।<br>ततो द्वितीये तं हत्वा दग्धं कृत्वा च चूर्णवत्।<br>प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ३९<br>देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।<br>पुष्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४०<br>व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४१ | शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं मरे हुए कचको अभी 'आओ, आओ'—इस प्रकार बुलाकर जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी-विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा। फिर तो गुरुके पुकारनेपर सरस्वतीन्दन कच दूरसे ही दौड़ पड़ा और शुक्राचार्यके निकट आकर उन्हें प्रणाम कर बोला—'गुरो! राक्षसोंने मुझे मार डाला था।' पुनः देवयानीने स्वेच्छानुसार वनसे पुष्प लानेके लिये कचको आज्ञा दी, तब ब्राह्मण कच सनातन ब्रह्म (वेद)-का पाठ करते हुए वनमें गया। दानवोंने वनमें उसे पुष्पोंका चयन करते हुए देख लिया। तत्पश्चात् असुरोंने दूसरी बार मारकर आगमें जलाया और उसकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे शुक्राचार्यको ही पिला दिया। अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—'पिताजी! आज मैंने उसे फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वह दिखायी नहीं दिया। तात! जान पड़ता है कि वह मार दिया गया या मर गया। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती'॥ ३६—४१॥ |
| शुक्र उवाच<br>बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः।<br>विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४२<br>मैवं शुचो मा रुद देवयानि<br>न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।<br>यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च<br>सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च ॥ ४३<br>सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-<br>मुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।<br>अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः<br>स जीवितो यो वध्यते चैव भूयः ॥ ४४ | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी! बृहस्पतिका पुत्र कच मर गया। मैंने विद्यासे उसे कई बार जिलाया तो भी वह इस प्रकार मार दिया जाता है, अब मैं क्या करूँ। देवयानि! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है।) ॥४२—४४॥ |