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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२६- देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना

* अध्याय २४ * ९७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा।<br>अथ देवासुरं युद्धमभूद् वर्षशतत्रयम्॥ ३७<br>प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद् विजयी तयोः।<br>ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुखः॥ ३८<br>अनयोर्विजयी कः स्याद् रजियंत्रैति सोऽब्रवीत्।<br>जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥ ३९<br>दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्।<br>नासूरैः प्रतिपन्नं तत् प्रतिपन्नं सुरैस्तथा॥ ४०<br>स्वामी भव त्वमस्माकं संग्रामे नाशय द्विषः।<br>ततो विनाशिताः सर्वे येऽवध्या वज्रपाणिना॥ ४१<br>पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः।<br>दत्त्वेन्द्राय तदा राज्यं जगाम तपसे रजिः॥ ४२प्रदान किये, जिससे वे उस समय देवों, असुरों और मनुष्योंके विजेता हो गये। तदनन्तर प्रह्लाद और इन्द्रका भयंकर देवासुर-संग्राम छिड़ गया, जो तीन सौ वर्षोंतक चलता रहा; परंतु उन दोनोंमें कोई किसीपर विजय नहीं पा रहा था। तब देवताओं और असुरोंने मिलकर देवाधिदेव ब्रह्मासे पूछा—'ब्रह्मन्! इन दोनोंमें कौन (पक्ष) विजयी होगा?' यह सुनकर ब्रह्माने उत्तर दिया—'जिस पक्षमें राजा रजि रहेंगे (वही विजयी होगा)।' तब दैत्योंने राजाके पास जाकर अपनी विजयके लिये उनसे प्रार्थना की कि 'आप हमारे सहायक हो जायें।' उनकी प्रार्थना सुनकर रजिने कहा—'यदि मैं आप लोगोंका स्वामी हो जाऊँ तभी उपयुक्त सहायता हो सकेगी।' परंतु असुरोंने उस प्रस्तावको स्वीकार नहीं किया, किंतु देवताओंने उसे स्वीकार करते हुए कहा—'राजन् ! आप हमलोगोंके स्वामी हो जायें और संग्राममें शत्रुओंका संहार करें।' तदनन्तर राजा रजिने उन सभी असुरोंको मौतके घाट उतार दिया, जो इन्द्रद्वारा अवध्य थे। इस कर्मसे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र राजाके पुत्र बन गये। तब राजा रजि इन्द्रको राज्य समर्पित कर स्वयं तपस्या करनेके लिये चले गये॥ ३२—४२ ॥
रजिपुत्रैस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम्।<br>यज्ञभागं च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः॥ ४३<br>राज्याद् भ्रष्टस्तदा शक्रो रजिपुत्रैर्निपीडितः।<br>प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः॥ ४४<br>न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च बृहस्पते।<br>राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप॥ ४५<br>ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद् बलदर्पितम्।<br>ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा॥ ४६<br>गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान् बृहस्पतिः।<br>जिनधर्मे समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित्॥ ४७<br>वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः।<br>वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्॥ ४८<br>जघान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान्।<br>नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान् सप्तैव धार्मिकान्॥ ४९<br>यतिर्ययातिः संयातिरुद्भवः पचिरेव च।<br>शर्यातिर्मेघजातिश्च सप्तैते वंशवर्धनाः॥ ५०तत्पश्चात् तपस्या, बल और गुणोंसे सम्पन्न रजिपुत्रोंने इन्द्रके वैभव, यज्ञभाग और राज्यको बलपूर्वक छीन लिया। इस प्रकार रजि-पुत्रोंद्वारा सताये गये एवं राज्यसे भ्रष्ट हुए दीन-दुःखी इन्द्र बृहस्पतिके पास जाकर बोले—'गुरुदेव ! मैं रजिके पुत्रोंद्वारा सताया जा रहा हूँ, मुझे अब यज्ञमें भाग नहीं मिलता तथा मेरा राज्य जीत लिया गया, अतः धिषणाधिप! (बृहस्पते) पुनः मेरी राज्य-प्राप्तिके लिये किसी उपायका विधान कीजिये।' तब बृहस्पतिने ग्रह-शान्तिके विधानसे तथा पौष्टिक कर्मद्वारा इन्द्रको बलसम्पन्न बना दिया और रजि-पुत्रोंके पास जाकर उन्हें मोहमें डाल दिया। उन वेदज्ञ बृहस्पतिने वेदोंद्वारा बहिष्कृत जिनधर्मका आश्रय लेकर उन्हें वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)-से परिभ्रष्ट कर दिया। तदुपरान्त इन्द्रने उन्हें हेतुवाद (तर्कवाद-नास्तिक्य)-से समन्वित और वेदबाह्य जानकर अपने वज्रसे उन सभी धर्मबहिष्कृत रजि-पुत्रोंका संहार कर डाला। अब मैं नहुषके सात धार्मिक पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम हैं—यति, ययाति, संयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति। ये सातों वंश-विस्तारक थे॥ ४३—५०॥
९८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यतिः कुमारभावेऽपि योगी वैखानसोऽभवत्।<br>ययातिश्चाकरोद् राज्यं धर्मैकशरणः सदा॥ ५१<br>शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद् दुहिता वृषपर्वणः।<br>भार्गवस्यात्मजा तद्वद्देवयानी च सुव्रता॥ ५२<br>ययातेः पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः।<br>देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्॥ ५३<br>तथा द्रुह्युमनुं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत् सुतान्।<br>यदुः पूरुश्चाभवतां तेषां वंशविवर्धनौ॥ ५४<br>ययातिर्नाहुषश्चासीद् राजा सत्यपराक्रमः।<br>पालयामास स महीमीजे च विधिवन्मखैः॥ ५५<br>अतिभक्त्या पितॄनर्च्च देवांश्च प्रयतः सदा।<br>अथाजयत् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः॥ ५६<br>स शाश्वतीः समा राजा प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>जरामाच्छेन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्॥ ५७<br>जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत्।<br>यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च पार्थिवः॥ ५८<br>यौवनेन चलान् कामान् युवा युवतिभिः सह।<br>विहर्तुमहमिच्छामि सहायं कुरुतात्मजाः॥ ५९(इनमें सबसे) ज्येष्ठ यति जब अपनी कुमारावस्थामें ही वैखानसका रूप धारण करके योगी हो गये, तब दूसरे पुत्र ययाति सदा एकमात्र धर्मका ही आश्रय लेकर राज्यभार सँभालने लगे। उस समय दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा तथा शुक्राचार्यकी कन्या व्रतपरायणा देवयानी—ये दोनों ययातिकी पत्नियाँ हुईं। इनके गर्भसे राजा ययातिके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका मैं नाम-निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको पैदा किया। इनमें यदु और पूरु—ये दोनों वंशका विस्तार करनेवाले हुए। नहुषनन्दन राजा ययाति सत्यपराक्रमी एवं अजेय थे। उन्होंने (धर्मपूर्वक) पृथ्वीका पालन किया और विधिपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा जितेन्द्रिय होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवों और पितरोंकी अर्चना करके सारी प्रजाओंपर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार नहुष-पुत्र राजा ययाति अनेकों वर्षोंतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे। इसी बीच वे रूपको विकृत कर देनेवाली महान् भयंकर वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। बुढ़ापाके वशीभूत हुए राजा ययातिने अपने यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक पुत्रोंसे ऐसी बात कही—'पुत्रो! यद्यपि युवावस्थाके साथ-साथ मेरी कामनाएँ भी चली गयीं, तथापि मैं पुनः युवा होकर युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, इस विषयमें तुमलोग मेरी सहायता करो॥ ५१–५९॥
तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरब्रवीत्।<br>साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभिर्यौवनेन किम्॥ ६०यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने राजासे कहा—'पिताजी! हमलोगोंको अपनी युवावस्थाद्वारा आपकी कौन-सी सहायता करनी है।' तब ययातिने अपने पुत्रोंसे कहा—
ययातिरब्रवीत् पुत्रा जरा मे प्रतिगृह्यताम्।<br>यौवनेनाथ भवतां चरेयं विषयानहम्॥ ६१<br>यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्छोशनसो मुनेः।<br>कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहं तेन पुत्रकाः॥ ६२<br>स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः।<br>अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम्॥ ६३<br>न तेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम्।<br>चतुरस्तान् स राजर्षिरशपच्चेति नः श्रुतम्॥ ६४<br>तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः।<br>जरां मां देहि नवया तन्वा मे यौवनात् सुखी॥ ६५'तुमलोग मेरा बुढ़ापा ले लेना, तत्पश्चात् मैं तुमलोगोंकी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। पुत्रो! दीर्घकालव्यापी अनेकों यज्ञोंके अनुष्ठान तथा महर्षि शुक्राचार्यके शापसे मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गये हैं, इसी कारण मैं उनसे तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसलिये तुमलोगोंमेंसे कोई अपने शरीरद्वारा इस बुढ़ापेको स्वीकार करे और मैं उसके अभिनव शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर विषयोंका उपभोग करूँ।' परंतु जब यदु आदि चार पुत्रोंने पिताकी वृद्धावस्थाको ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तब राजर्षि ययातिने उन्हें शाप दे दिया—ऐसा हमलोगोंने सुन रखा है। तत्पश्चात् सबसे कनिष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने राजासे कहा—'पिताजी! आप अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिये और मेरे नूतन शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर सुखोंका उपभोग कीजिये।
* अध्याय २५ *९९
अहं जरां तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया।<br>एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्॥ ६६<br>संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।<br>पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः॥ ६७<br>ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः॥ ६८<br>अतृप्त इव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।<br>त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः॥ ६९<br>पौरवो वंश इत्येष ख्यातिं लोके गमिष्यति।<br>ततः स नृपशार्दूलः पूरुं राज्येऽभिषिच्य च॥ ७०<br>कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान्।<br>पूरुवंशं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः।<br>यत्र ते भारता जाता भरतान्वयवर्धनाः॥ ७१मैं आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करके आपके आज्ञानुसार राजकार्य सँभालूँगा।' पूरुके यों कहनेपर राजर्षि ययातिने अपने तपोबलका आश्रय लेकर उस महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपने बुढ़ापेको स्थापित किया और वे स्वयं पूरुकी युवावस्थाको लेकर तरुण हो गये। तदनन्तर ययातिकी वृद्धावस्थासे युक्त हुए पूरु राजकाजका संचालन करने लगे। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भी अजेय ययाति कामोपभोगसे अतृप्त-से ही बने रहे। तब उन्होंने अपने पुत्र पूरुसे कहा—'बेटा! अकेले तुम्हींसेमैं पुत्रवान् हूँ और तुम्हीं मेरे वंशविस्तारक पुत्र हो। आजसे यह वंश पूरुवंशके नामसे लोकमें विख्यात होगा।' तदनन्तर राजसिंह ययाति पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं उससे उपराम हो गये और बहुत समय बीतनेके पश्चात् कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हो गये। श्रेष्ठ ऋषियो! अब मैं जिस वंशमें भरत-वंशकी वृद्धि करनेवाले भारत नामसे प्रसिद्ध नरेश हो चुके हैं, उस पूरुवंशका वर्णन करने जा रहा हूँ, आपलोग समाहितचित्त होकर श्रवण कीजिये॥ ६०—७१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना

ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं पौरवो वंशः श्रेष्ठत्वं प्राप भूतले।<br>ज्येष्ठस्यापि यदोर्वंशः किमर्थं हीयते श्रिया॥ १<br>अन्यद् ययातिचरितं सूत विस्तरतो वद।<br>यस्मात् तत्पुण्यमायुष्यमभिनन्द्यं सुरैरपि॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (अनुज होकर भी) पूरुका वंश भूतलपर श्रेष्ठताको क्यों प्राप्त हुआ और ज्येष्ठ होते हुए भी यदुका वंश (राज्य-) लक्ष्मीसे हीन क्यों हो गया? इसका तथा ययातिके चरितका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि यह पुण्यप्रद, आयुवर्धक और देवताओंद्वारा भी अभिनन्दनीय है॥ १-२॥
सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः शतानीकेन शौनकः।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं ययातिचरितं महत्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें शतानीकने (भी) महर्षि शौनकसे ययातिके इसी पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक एवं महत्त्वशाली चरितके विषयमें (इस प्रकार) प्रश्न किया था॥ ३॥