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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२४०- राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान

९९४* मत्स्यपुराण *

दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय

वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय

गर्ग उवाचगर्गजीने कहा—
अतिवृष्टिरनावृष्टिर्दुर्भिक्षादि भयं मतम्।<br>अनृतौ तु दिवानन्ता वृष्टिर्ज्ञेया भयानका॥ १मुने! अतिवृष्टि और अनावृष्टि—ये दोनों दुर्भिक्षादिजन्य भयका कारण मानी गयी हैं। वर्षा-ऋतुके बिना दिनमें अनन्त वृष्टिका होना अत्यन्त भयानक है।
अनभ्रे वैकृता चैव विज्ञेया राजमृत्यवे।<br>शीतोष्णानां विपर्यासे नृपाणां रिपुजं भयम्॥ २बादलरहित आकाशमें विकृत हुई वृष्टिको राजाकी मृत्युका कारण जानना चाहिये। शीतकालमें गर्मी एवं ग्रीष्ममें सर्दी पड़नेसे राजाओंपर शत्रुपक्षसे भय होता है।
शोणितं वर्षते यत्र तत्र शस्त्रभयं भवेत्।<br>अङ्गारपांशुवर्षेषु नगरं तद् विनश्यति॥ ३जिस स्थानपर आकाशसे रक्तकी वर्षा होती है वहाँ शस्त्रभय प्राप्त होता है। अङ्गार और धूलिकी वृष्टि होनेपर वह नगर विनष्ट हो जाता है।
मज्जास्थिस्नेहमांसानां जनमारभयं भवेत्।<br>फलं पुष्पं तथा धान्यं परेणातिभयाय तु॥ ४मज्जा, हड्डी, तेल और मांसकी वृष्टि होनेपर प्रजावर्गमें मृत्युका भय उपस्थित होता है। आकाशसे फल, पुष्प तथा अन्नकी वृष्टि शत्रुपक्षसे अत्यन्त भयका द्योतन करती है।
पांशुजन्तूपलानां च वर्षतो रोगजं भयम्।<br>छिद्रे चान्नप्रवर्षेण सस्यानां भीतिवर्धनम्॥ ५धूलि, जन्तु और उपलोंके गिरनेसे रोगजन्य भय प्राप्त होता है। रुक-रुककर अन्नकी वृष्टि होनेसे फसलके भयकी वृद्धि होती है।
विरजस्के रवौ व्यभ्रे यदा छाया न दृश्यते।<br>दृश्यते तु प्रतीपा वा तत्र देशभयं भवेत्॥ ६सूर्यके बादल एवं धूलिसे रहित रहनेपर जब परछाई नहीं दीखती अथवा विपरीत दिखायी पड़ती है, तब सारे देशको भय प्राप्त होता है।
निरभ्रे वाथ रात्रौ वा श्वेतं याम्योत्तरेण तु।<br>इन्द्रायुधं तथा दृष्ट्वा उल्कापातं तथैव च॥ ७बादलरहित रात्रिमें दक्षिण अथवा उत्तर दिशामें श्वेत रंगका इन्द्रधनुष, उल्कापात,
दिग्दाहपरिवेषौ च गन्धर्वनगरं तथा।<br>परचक्रभयं ब्रूयाद् देशोपद्रवमेव च॥ ८दिशाओंमें दाह, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डल तथा गन्धर्वनगर दिखायी पड़े तो उस समय देशपर शत्रु-पक्षकी सेनाका आक्रमण और देशमें विविध उपद्रवोंके संघटित होनेकी सम्भावना कहनी चाहिये।
सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां<br>यागस्तु कार्यो विधिवद् द्विजेन्द्र।<br>धनानि गौः काञ्चनदक्षिणा च<br>देया द्विजानामघनाशहेतोः॥ ९द्विजेन्द्र! ऐसे अवसरपर सूर्य, चन्द्रमा, मेघ और वायुके उद्देश्यसे विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये और इस पापके विनाशके लिये ब्राह्मणोंको धन, गौ तथा सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये॥ १—९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ वृष्टिवैकृतिप्रशमनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें वृष्टि-विकारशमन नामक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३३॥

* अध्याय २३५ *९९५

दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय

जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय

SanskritHindi
गर्ग उवाच<br><br>नगरादपसर्पन्ते समीपमुपयान्ति च।<br>नद्यो ह्रदप्रस्रवाणि विरसाश्च भवन्ति च॥ १<br><br>विवर्णं कलुषं तप्तं फेनवज्जन्तुसंकुलम्।<br>स्नेहं क्षीरं सुरां रक्तं वहन्ते व्याकुलोदकाः॥ २<br><br>षण्मासाभ्यन्तरे तत्र परचक्रभयं भवेत्।<br>जलाशया नदन्ते वा प्रज्वलन्ति कथञ्चन॥ ३<br><br>विमुञ्चन्ति तथा ब्रह्मन् ज्वालाधूमरजांसि च।<br>अखाते वा जलोत्पत्तिः सुसत्त्वा वा जलाशयाः॥ ४<br><br>संगीतशब्दाः श्रूयन्ते जनमारभयं भवेत्।<br>दिव्यमम्भोमयं सर्पिर्मधुतेलावेसेचनम्॥ ५<br><br>जप्तव्या वारुणा मन्त्रास्तैश्च होमो जले भवेत्॥ ६<br><br>मध्वाज्ययुक्तं परमान्नमत्र<br>देयं द्विजानां द्विजभोजनार्थम्।<br><br>गावश्च देयाः सितवस्त्रयुक्ता-<br>स्तथोदकुम्भाः सलिलाघशान्त्यै॥ ७**गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब नदियाँ, सरोवर या झरने नगरसे दूर हट जाते हैं या अत्यन्त समीप चले आते हैं, सूख जाते हैं, मलिन, कलुषित, संतप्त तथा फेनके समान जन्तुओंसे व्याप्त हो जाते हैं, तेल, दूध, मदिरा और रक्त बहाने लगते हैं अथवा उनका जल विक्षुब्ध हो उठता है, तब छः महीनेके भीतर उस देशपर शत्रुपक्षकी सेनासे भय प्राप्त होनेकी सम्भावना होती है। जब किसी प्रकारसे जलाशय शब्द करने लगते हैं या जलने लगते हैं तथा लपटें, धुआँ एवं धूलि फेंकने लगते हैं, बिना खोदे ही जल निकलने लगता है, जलाशय बड़े-बड़े जन्तुओंसे भर जाते हैं और उनमेंसे संगीतकी ध्वनियाँ सुनायी पड़ने लगती हैं, तब प्रजावर्गके मरणका भय उपस्थित होता है। ऐसे अवसरपर घी, मधु और तैलसे जलाशयोंका अभिषेक कर वरुणके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और उन्हीं मन्त्रोंका उच्चारण कर जलमें हवन करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजनार्थ मधु तथा घृत मिलाकर श्रेष्ठ अन्न देना चाहिये और जलके महापापकी शान्तिके लिये श्वेत वस्त्रोंसे युक्त गौएँ और जल रखनेके घड़े दान करने चाहिये॥ १-७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ सलिलाशयवैकृत्यं नाम चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें जलाशय-विकार-शान्ति नामक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३४॥


दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय

प्रसवजनित विकारका वर्णन और उसकी शान्ति

SanskritHindi
गर्ग उवाच<br><br>अकालप्रसवा नार्यः कालातीतप्रजास्तथा।<br>विकृतप्रसवाश्चैव युग्मसम्प्रसवास्तथा॥ १<br><br>अमानुषा ह्यतुण्डाश्च संजातव्यसनास्तथा।<br>हीनाङ्गा अधिकाङ्गाश्च जायन्ते यदि वा स्त्रियः॥ २**गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब स्त्रियाँ बिना समय पूरा हुए अथवा पूरे समयके बहुत बाद प्रसव करती हैं, विकृत एवं जुड़वीं संतान पैदा करती हैं तथा मानवसे भिन्न, मुखहीन, जन्मते ही मर जानेवाले, अङ्गहीन और अधिक अङ्गवाले बच्चोंको जन्म देती हैं,