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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७- साधारण एवं आभ्युदयिक श्राद्धकी विधिका विवरण

६०* मत्स्यपुराण *

| नाम्ना सत्यवती लोके पितृलोके तथाष्टका।<br>आयुरारोग्यदा नित्यं सर्वकामफलप्रदा॥ १९<br>भविष्यसि परे काले नदीत्वं च गमिष्यसि।<br>पुण्यतोया सरिच्छ्रेष्ठा लोके ह्यच्छोदनामिका॥ २०<br>इत्युक्त्वा स गणस्तेषां तत्रैवान्तरधीयत।<br>साप्यवाप च तत् सर्वं फलं यदुदितं पुरा॥ २१ | इस प्रकार मनुष्य-लोकमें सत्यवती और पितृलोकमें आयु एवं आरोग्य प्रदान करनेवाली तथा नित्य सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंकी प्रदात्री अष्टका नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। कालान्तरमें तुम मनुष्यलोकमें नदियोंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला अच्छोदा नामसे नदीरूपमें जन्म धारण करोगी।' ऐसा कहकर पितरोंका वह समुदाय वहीं अन्तर्हित हो गया तथा अच्छोदाको अपने उन समस्त कर्मफलोंकी प्राप्ति हुई, जो पहले कहे जा चुके हैं॥ ९—२१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
विभ्राजा नाम चान्ये तु दिवि सन्ति सुवर्चसः।<br>लोका बर्हिषदो यत्र पितरः सन्ति सुव्रताः॥ १ऋषियो! स्वर्गमें विभ्राज नामक अन्य तेजस्वी लोक भी हैं, जहाँ परम श्रेष्ठ उत्तम व्रतपरायण बर्हिषद् नामक पितर निवास करते हैं।
यत्र बर्हिणयुक्तानि विमानानि सहस्रशः।<br>सङ्कल्पा बर्हिषो यत्र तिष्ठन्ति फलदायिनः॥ २जहाँ मयूरोंसे युक्त हजारों विमान विद्यमान रहते हैं। जहाँ संकल्पके लिये प्रयुक्त हुए बर्हि (कुश) फल देनेके लिये उन्मुख होकर उपस्थित रहते हैं
यत्राभ्युदयशालासु मोदन्ते श्राद्धदायिनः।<br>यांश्च देवासुरगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः॥ ३<br>यक्षरक्षोगणाश्चैव यजन्ति दिवि देवताः।एवं जहाँकी अभ्युदयशालाओंमें पितरोंको श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग आनन्द मनाते रहते हैं। देवताओं और असुरोंके गण, गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह तथा यक्षों और राक्षसोंके समुदाय स्वर्गमें उन पितरोंके निमित्त यज्ञका विधान करते रहते हैं।
पुलस्त्यपुत्राः शतशस्तपोयोगसमन्विताः॥ ४<br>महात्मानो महाभागा भक्तानामभयप्रदाः।महर्षि पुलस्त्यके सैकड़ों पुत्र, जो तपस्या और योगसे परिपूर्ण, महान् आत्मबलसे सम्पन्न, महान् भाग्यशाली एवं अपने भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले हैं, वहाँ निवास करते हैं।
एतेषां पीवरी कन्या मानसी दिवि विश्रुता॥ ५<br>योगिनी योगमाता च तपश्चक्रे सुदारुणम्।इन पितरोंकी एक मानसी कन्या थी, जो पीवरी नामसे विख्यात थी। उस योगिनी एवं योगमाता पीवरीने अत्यन्त कठोर तप किया।
प्रसन्नो भगवांस्तस्या वरं वव्रे तु सा हरेः॥ ६<br>योगवन्तं सुरूपं च भर्तारं विजितेन्द्रियम्।<br>देहि देव प्रसन्नस्त्वं पतिं मे वदतां वरम्॥ ७उसकी तपस्यासे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये (और उसके समक्ष प्रकट हुए)। तब पीवरीने श्रीहरिसे यह वरदान माँगा—'देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे योगाभ्यासी, अत्यन्त सौन्दर्यशाली, जितेन्द्रिय, वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं पालन-पोषण करनेवाला पति प्रदान कीजिये।'
उवाच देवो भविता व्यासपुत्रो यदा शुकः।<br>भविता तस्य भार्या त्वं योगाचार्यस्य सुव्रते॥ ८यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'सुव्रते! जब महर्षि व्यासके पुत्र शुक जन्म धारण करेंगे, उस समय तुम उन योगाचार्यकी पत्नी होओगी।
भविष्यति च ते कन्या कृत्वी नाम च योगिनी।<br>पाञ्चालाधिपतेर्देया मानुषस्य त्वया तदा॥ ९उनके संयोगसे तुम्हें एक योगाभ्यासपरायणा कृत्वी नामकी कन्या उत्पन्न होगी। तब तुम उसे मानव-योनिमें उत्पन्न हुए पञ्चाल-नरेश (नीप मतान्तरसे अणुह)-को समर्पित कर देना।
जननी ब्रह्मदत्तस्य योगसिद्धा च गौः स्मृता।<br>कृष्णो गौरः प्रभुः शम्भुर्भविष्यन्ति च ते सुताः॥ १०तुम्हारी वह योगसिद्धा कन्या (कृत्वी) ब्रह्मदत्तकी माता होकर 'गौ' नामसे भी प्रसिद्ध होगी। तदनन्तर कृष्ण, गौर, प्रभु और शम्भु नामक तुम्हारे चार पुत्र होंगे,
* अध्याय १५ *६१

| महात्मानो महाभागा गमिष्यन्ति परं पदम्।<br>तानुत्पाद्य पुनर्योगात् सवरा मोक्षमेष्यसि॥ ११<br>सुमूर्तिमन्तः पितरो वसिष्ठस्य सुताः स्मृताः।<br>नाम्ना तु मानसाः सर्वे सर्वे ते धर्ममूर्तयः॥ १२<br>ज्योतिर्भांसिषु लोकेषु ये वसन्ति दिवः परम्।<br>विराजमानाः क्रीडन्ति यत्र ते श्राद्धदायिनः॥ १३<br>सर्वकामसमृद्धेषु विमानेष्वपि पादजाः।<br>किं पुनः श्राद्धदा विप्रा भक्तिमन्तः क्रियान्विताः॥ १४<br>गौर्नाम कन्या येषां तु मानसी दिवि राजते।<br>शुक्रस्य दयिता पत्नी साध्यानां कीर्तिवर्धिनी॥ १५<br><br>मरीचिगर्भा नाम्ना तु लोका मार्तण्डमण्डले।<br>पितरो यत्र तिष्ठन्ति हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः॥ १६<br>तीर्थश्राद्धप्रदा यान्ति ये च क्षत्रियसत्तमाः।<br>राज्ञां तु पितरस्ते वै स्वर्गमोक्षफलप्रदाः॥ १७<br>एतेषां मानसी कन्या यशोदा लोकविश्रुता।<br>पत्नी ह्यंशुमतः श्रेष्ठा स्नुषा पञ्चजनस्य च॥ १८<br>जनन्यथ दिलीपस्य भगीरथपितामही।<br>लोकाः कामदुघा नाम कामभोगफलप्रदाः॥ १९<br>सुस्वधा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति सुव्रताः।<br>आज्यपा नाम लोकेषु कर्दमस्य प्रजापतेः॥ २०<br>पुलहाङ्गजदायादा वैश्यास्तान् भावयन्ति च।<br>यत्र श्राद्धकृतः सर्वे पश्यन्ति युगपद्गताः॥ २१<br>मातृभ्रातृपितृस्वसृसखिसम्बन्धिबान्धवान् ।<br>अपि जन्मायुतैर्दृष्टाननुभूतान् सहस्रशः॥ २२<br>एतेषां मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता।<br>या पत्नी नहुषस्यासीद् ययातेर्जननी तथा॥ २३ | जो महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली होंगे और अन्तमें परमपदको प्राप्त करेंगे। उन पुत्रोंको पैदा करनेके पश्चात् तुम पुनः अपने योगबलसे वर प्राप्त करोगी और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लोगी।<sup>१</sup> महर्षि वसिष्ठके पुत्ररूप (सुकाली नामक) पितर, जो सब-के-सब मानस नामसे विख्यात हैं, अत्यन्त सुन्दर स्वरूपवाले तथा धर्मकी मूर्ति हैं। वे सभी स्वर्गलोकसे परे ज्योतिर्भांसी लोकोंमें निवास करते हैं। जहाँ श्राद्धकर्ता शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंमें विराजमान होकर क्रीड़ा करते रहते हैं, वहाँ क्रियानिष्ठ एवं भक्तिमान् श्राद्धदाता ब्राह्मणोंकी तो बात ही क्या है। इन पितरोंकी 'गौ' नामकी मानसी कन्या स्वर्गलोकमें विराजमान है, जो शुक्रकी प्रिय पत्नी और साध्योंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाली है॥ १—१५॥<br><br>इसी प्रकार सूर्यमण्डलमें मरीचिगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य लोक भी हैं, जहाँ अङ्गिराके पुत्र हविष्मान् नामक पितरके रूपमें निवास करते हैं। ये राजाओं (क्षत्रियों)-के पितर हैं, जो स्वर्ग एवं मोक्षरूप फलके प्रदाता हैं। जो श्रेष्ठ क्षत्रिय तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करते हैं, वे इन लोकोंमें जाते हैं। इन पितरोंकी एक यशोदा नामकी लोक-प्रसिद्ध मानसी कन्या थी, जो पञ्चजनकी श्रेष्ठ पुत्रवधू, अंशुमान्‌की पत्नी, (महाराज) दिलीपकी माता और भगीरथकी पितामही थी।<sup>२</sup> अभीष्ट कामनाओं एवं भोगोंका फल प्रदान करनेवाले कामदुघ नामक अन्य पितृलोक भी हैं, जहाँ उत्तम व्रतपरायण सुस्वधा नामवाले पितर निवास करते हैं। वे ही पितर प्रजापति कर्दमके लोकोंमें आज्यप नामसे प्रख्यात हैं। महर्षि पुलहके अङ्गसे उत्पन्न हुए वैश्यगण उनकी भावना (पूजा) करते हैं। श्राद्धकर्ता सभी वैश्यगण इन लोकोंमें पहुँचकर दस हजार जन्मान्तरोंमें देखे और अनुभव किये हुए भी अपने हजारों माता, भाई, पिता, बहन, मित्र, सम्बन्धी और बान्धवोंको एक साथ देखते हैं। इन पितरोंकी मानसी कन्या विरजा नामसे विख्यात थी, जो राजा नहुषकी पत्नी और ययातिकी माता थी। |


१. शुकदेवजीका यह वृत्त ठीक इसी प्रकार वायुपुराण ७३। २६-३१; ७०। ८५-८६; पद्मपुराण १। ९। ३०-४०; हरिवंश० १। १८। ५०-५३ आदिमें भी प्राप्त होता है। पर मत्स्यपुराणमें 'कृत्वी'का 'गौ' नाम देखकर शङ्का होती है; क्योंकि १५वें श्लोकमें तुरंत 'गौ'को शुकदेवकी दूसरी पत्नी कहा है। पर शङ्का ठीक नहीं; क्योंकि एक ही नाम कइयोंके होते हैं। पुराणोंमें वायुपुराण अध्याय ९। ३, १४ आदिमें 'यति' राजाकी स्त्री तथा वाल्मीकिरामायण ७। ६०। महाभारत आदिमें पुलस्त्य-पत्नीका भी नाम 'गौ' आता है।
२. यह विवरण वायुपुराण ७२, ब्रह्माण्ड० ३। १०, हरिवंश० १। ६, ब्रह्मपुराण ३४, पद्म० १। ९, लिङ्गपुराण १। ६ में भी है। यहाँ सूर्यवंशी दिलीप प्रथम इष्ट हैं। पुराणानुसार सूर्यवंशमें दो दिलीप हुए हैं। एकके पुत्र थे भगीरथ और दूसरेके रघुवंशप्रसिद्ध रघु हुए हैं।

६२* मत्स्यपुराण *

| एकाष्टकाभवत् पश्चाद् ब्रह्मलोके गता सती।<br>त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु वदाम्यतः॥ २४<br><br>लोकास्तु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थिताः।<br>येषां तु मानसी कन्या नर्मदानामविश्रुता॥ २५<br><br>सोमपा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति शाश्वताः।<br>धर्ममूर्तिधराः सर्वे परतो ब्रह्मणः स्मृताः॥ २६<br><br>उत्पन्नाः स्वधया ते तु ब्रह्मत्वं प्राप्य योगिनः।<br>कृत्वा सृष्ट्यादिकं सर्वं मानसे साम्प्रतं स्थिताः॥ २७<br><br>नर्मदा नाम तेषां तु कन्या तोयवहा सरित्।<br>भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी॥ २८<br><br>तेभ्यः सर्वे तु मनवः प्रजाः सर्गेषु निर्मिताः।<br>ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वन्ति धर्माभावेऽपि सर्वदा॥ २९<br><br>तेभ्य एव पुनः प्राप्तुं प्रसादाद् योगसंततिम्।<br>पितॄणामादिसर्गे तु श्राद्धमेव विनिर्मितम्॥ ३० | बादमें वह पतिपरायणा विरजा ब्रह्मलोकको चली गयी और वहाँ एकाष्टका नामसे प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार मैंने तीन पितृगणोंका वर्णन कर दिया। अब इसके बाद चौथे गणका वर्णन कर रहा हूँ। ब्रह्माण्डके ऊपर मानस नामक लोक विद्यमान हैं, उनमें अविनाशी 'सोमप' नामक पितर निवास करते हैं (ये ब्राह्मणोंके पितर हैं)। उनकी मानसी कन्या नर्मदा-नामसे प्रसिद्ध है। वे सभी पितर धर्मकी-सी मूर्ति धारण करनेवाले तथा ब्रह्मासे भी परे बतलाये गये हैं। स्वधासे उनकी उत्पत्ति हुई है। वे सभी योगाभ्यासी पितर ब्रह्मत्वको प्राप्त करके सृष्टि आदि समस्त कार्योंसे निवृत्त हो इस समय मानस लोकमें विद्यमान हैं। उनकी वह नर्मदा नाम्नी कन्या (भारतके) दक्षिणापथमें आकर जल प्रवाहित करनेवाली नदी हुई है, जो समस्त प्राणियोंको पवित्र कर रही है। इन्हीं पितरोंकी परम्परासे मनुगण (अपने-अपने कार्यकालमें) सृष्टिके प्रारम्भमें प्रजाओंका निर्माण करते हैं। इस रहस्यको जानकर लोग धर्मका अभाव हो जानेपर भी सर्वदा श्राद्ध करते रहते हैं। इन्हीं पितरोंकी कृपासे पुनः इन्हींके द्वारा योग-परम्पराको प्राप्त करनेके लिये सृष्टिके प्रारम्भमें पितरोंके लिये श्राद्धका ही निर्माण किया गया था॥ १६-३०॥ |
| सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम्।<br>दत्तं स्वधा पुरोधाय पितॄन् प्रीणाति सर्वदा॥ ३१<br><br>अग्नीषोममयानां तु कार्यमाप्यायनं बुधैः।<br>अग्न्यभावेऽपि विप्रस्य पाणावपि जलेऽथवा॥ ३२<br><br>अजाकर्णेऽश्वकर्णे वा गोष्ठे वा सलिलान्तिके।<br>पितॄणामम्बरं स्थानं दक्षिणा दिक् प्रशस्यते॥ ३३<br><br>प्राचीनावीतमुदकं तिलाः सव्याङ्गमेव च।<br>दर्भा मांसं च पाठीनं गोक्षीरं मधुरा रसाः॥ ३४<br><br>खड्गलोहामिषमधुकुशश्यामाकशालयः ।<br>यवनीवारमुद्गेक्षुशुक्लपुष्पघृतानि च॥ ३५<br><br>वल्लभानि प्रशस्तानि पितॄणामिह सर्वदा।<br>द्वेष्याणि सम्प्रवक्ष्यामि श्राद्धे वर्ज्यानि यानि तु॥ ३६ | इन सभी पितरोंके निमित्त चाँदीका अथवा चाँदीमिश्रित अन्य धातुका भी पात्र आदि स्वधाका उच्चारण करके (ब्राह्मणको) दान कर दिया जाय तो वह सर्वदा पितरोंको प्रसन्न करता है। विद्वान् (श्राद्धकर्ता)-को चाहिये कि (श्राद्धकालमें प्रथमतः) अग्नि, सोम और यमका तर्पण करके उन्हें तृप्त करे (और पितरोंके उद्देश्यसे दिया गया अन्न आदि अग्निमें छोड़ दे)। अग्निके अभावमें ब्राह्मणके हाथपर, जलमें, अजाकर्णपर, अश्वकर्णपर, गोशालामें अथवा जलके निकट डाल दे। पितरोंका स्थान आकाश बतलाया जाता है। उनके लिये दक्षिण दिशा विशेषरूपसे प्रशस्त मानी गयी है। प्राचीनावीत (अपसव्य) होकर दिया गया जल, तिल, सव्याङ्ग (शरीरका दाहिना भाग), डाभ, फलका गूदा, गो-दुग्ध, मधुर रस, खड्ग, लोह, मधु, कुश, साँवाँ, अगहनीका चावल, यव, तिन्नीका चावल, मूँग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत-ये पदार्थ पितरोंके लिये सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कहे गये हैं। अब जो श्राद्धकार्यमें वर्जित तथा पितरोंके लिये अप्रिय हैं, उन पदार्थोंका वर्णन कर रहा हूँ- |

* अध्याय १६ *६३

| मसूरशणनिष्पावराजमाषकुसुम्भिकाः ।<br>पद्मबिल्वार्कधत्तूरपारिभद्रारटरूषकाः ॥ ३७<br><br>न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा।<br>कोद्रवोदारचणकाः कपित्थं मधुकातसी ॥ ३८<br><br>एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः प्रियमिच्छता।<br>पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम्॥ ३९<br><br>यच्छन्ति पितरः पुष्टिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम्।<br>देवकार्यादपि पुनः पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ४०<br><br>देवतानां च पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।<br>शीघ्रप्रसादास्त्वक्रोधा निःशस्त्राः स्थिरसौहृदाः ॥ ४१<br><br>शान्तात्मानः शौचपराः सततं प्रियवादिनः।<br>भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ ४२<br><br>हविष्मतामाधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः।<br>एतद् वः सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्तनम्।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं कीर्तनीयं सदा नृभिः ॥ ४३ | मसूर, शण (पेटुआका बीज), सेम, काला उड़द, कुसुमका पुष्प, कमल, बेल या बिल्वपत्र, मदार, धतूरा, पारिभद्र (नीम, देवदारुका पुष्प या पत्ता), अडूसेका फूल तथा भेड़ और बकरीका दूध। इन्हें पितृ-कार्योंमें नहीं देना चाहिये। पितरोंसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छावाले पुरुषको श्राद्धकार्यमें कोदो, उदार (गुलूके वृक्षका पुष्प अथवा पत्ता), चना, कैथ, महुआ और अलसी (तीसी)—इन पदार्थोंका भी उपयोग नहीं करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक (श्राद्धादिद्वारा) पितरोंको प्रसन्न करता है, उसे पितर भी बदलेमें हर्षित कर देते हैं। वे पितृगण प्रसन्न होकर समृद्धि, स्वर्ग, आरोग्य और संतानरूपी फल प्रदान करते हैं। इसलिये देवकार्यसे भी बढ़कर पितृकार्यकी विशेषता मानी जाती है तथा देवताओंसे पूर्व ही पितरोंके तर्पणकी विधि बतलायी गयी है। ये पितर शीघ्र ही कृपा करनेवाले, क्रोधरहित, शस्त्रविहीन, दृढ़ मैत्रीयुक्त, शान्तात्मा पवित्रतापरायण, सदा प्रियवादी, भक्तोंके प्रति अनुरक्त और सुखदायक (गृहस्थोंके) प्रथम देवता हैं। हविष्यान्नका भक्षण करनेवाले इन पितरोंके अधिनायक-पदपर श्राद्धके देवतारूपमें सूर्य अधिष्ठित माने गये हैं। इस प्रकार यह पितृ-वंशका वर्णन मैंने तुम लोगोंको पूर्णरूपसे बतला दिया। यह पुण्य-प्रदाता, परम पवित्र और आयुकी वृद्धि करनेवाला है, मनुष्योंको सदा इसका पठन-पाठन करना चाहिये ॥ ३१—४३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥


सोलहवाँ अध्याय

श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
श्रुत्वैतत् सर्वमखिलं मनुः पप्रच्छ केशवम्।<br>श्राद्धे कालं च विविधं श्राद्धभेदं तथैव च ॥ १<br><br>श्राद्धेषु भोजनीया ये ये च वर्ज्या द्विजातयः।<br>कस्मिन् वासरभागे वा पितृभ्यः श्राद्धमाचरेत् ॥ २ऋषियो! यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मनुने मत्स्यभगवान्‌से पूछा—'मधुसूदन! श्राद्धके लिये कौन-सा काल उत्तम है? श्राद्धके विभिन्न भेद कौन-से हैं? श्राद्धोंमें कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? तथा कैसे ब्राह्मण वर्जित हैं? दिनके किस भागमें पितरोंके लिये श्राद्ध करना उचित है?

६४ * मत्स्यपुराण *


कस्मिन दतं कथं याति श्राद्धं तु मधुसूदन।<br>विधिना केन कर्तव्यं कथं प्रीणाति तत् पितॄन्॥ ३कैसे पात्रको श्राद्धीय वस्तु प्रदान करनी चाहिये? तथा उसका फल पितरोंको कैसे प्राप्त होता है? श्राद्ध किस विधिसे करना उपयुक्त है? तथा वह श्राद्ध किस प्रकार पितरोंको प्रसन्न करता है? (ये सारी बातें मुझे बतलानेकी कृपा करें) ॥ १–३॥
मत्स्य उवाच<br>कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।<br>पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥ ४<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते।<br>नित्यं तावत् प्रवक्ष्यामि अर्घ्यावाहनवर्जितम्॥ ५<br><br>अदैवं तद् विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम्।<br>पार्वणं त्रिविधं प्रोक्तं शृणु तावन्महीपते॥ ६<br><br>पार्वणे ये नियोज्यास्तु ताञ्शृणुष्व नराधिप।<br>पञ्चाग्निः स्नातकश्चैव त्रिसुपर्णः षडङ्गवित्॥ ७<br><br>श्रोत्रियः श्रोत्रियसुतो विधिवाक्यविशारदः।<br>सर्वज्ञो वेदविन्मन्त्री ज्ञातवंशः कुलान्वितः॥ ८<br><br>पुराणवेत्ता धर्मज्ञः स्वाध्यायजपतत्परः।<br>शिवभक्तः पितृपरः सूर्यभक्तोऽथ वैष्णवः॥ ९<br><br>ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान्।<br>भोजयेच्चापि दौहित्रं यत्नतः स्वसुहृद् गुरून्॥ १०<br><br>विट्पतिं मातुलं बन्धुमृत्विगाचार्यसोमपान्।<br>यश्च व्याकुरुते वाक्यं यश्च मीमांसतेऽध्वरम्॥ ११<br><br>सामस्वरविधिज्ञश्च पङ्क्तिपावनपावनः।<br>सामगो ब्रह्मचारी च वेदयुक्तोऽथ ब्रह्मवित्॥ १२<br><br>यत्र ते भुञ्जते श्राद्धे तदेव परमार्थवत्।<br>एते भोज्याः प्रयत्नेन वर्जनीयान् निबोध मे॥ १३मत्स्यभगवान् कहने लगे— राजर्षे! प्रतिदिन पितरोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए अन्न आदिसे या केवल जलसे अथवा दूध या फल-मूलसे भी श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक और काम्यरूपसे तीन प्रकारका बतलाया गया है। इनमें मैं पहले नित्यश्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, जो अर्घ्य और आवाहनसे रहित होता है। इसे 'अदैव' मानना चाहिये। पर्वोंपर सम्पन्न होनेवाले (त्रिपुरुष) श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। महीपते! यह पार्वण श्राद्ध तीन प्रकारका बतलाया जाता है, उन्हें सुनो। नरेश्वर! पार्वण श्राद्धमें जिन्हें नियुक्त करना चाहिये, उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो पञ्चाग्नि विद्याका ज्ञाता अथवा गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका उपासक, स्नातक, त्रिसुपर्ण (ऋग्वेदके एक अंशका अध्येता<sup>१</sup>), वेदके छहों अङ्गोंका ज्ञाता, श्रोत्रिय, श्रोत्रियका पुत्र, धर्मशास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, सर्वज्ञ, वेदवेत्ता, उचित मन्त्रणा करनेवाला, जाने हुए वंशमें उत्पन्न, कुलीन, पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, स्वाध्याय एवं जपमें तत्पर रहनेवाला, शिवभक्त, पितृपरायण, सूर्यभक्त, वैष्णव, ब्राह्मणभक्त, योगवेत्ता, शान्त, आत्माको वशीभूत कर लेनेवाला एवं शीलवान् हो (ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करना चाहिये)। (अब इस पुनीत श्राद्धमें जिन्हें भोजन कराना चाहिये, उनके विषयमें बतला रहा हूँ, सुनो।) पुत्रीका पुत्र (नाती), अपना मित्र, गुरु (अथवा गुरुजन), कुलपति (आचार्य), मामा, भाई-बन्धु, ऋत्विक्, आचार्य (विद्यागुरु) और सोमपायी—इन्हें प्रयत्नपूर्वक बुलाकर श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। साथ ही जो विधि-वाक्योंके व्याख्याता, यज्ञके मीमांसक, सामवेदके स्वर और (उसके उच्चारणकी) विधिके ज्ञाता, पङ्क्तिपावनोंमें<sup>२</sup> भी परम पवित्र, सामवेदके पारगामी विद्वान्, ब्रह्मचारी, वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हैं—ये सभी श्राद्धमें चेष्टापूर्वक भोजन कराने योग्य हैं। ऐसे ब्राह्मण जिस श्राद्धमें भोजन करते हैं, वही श्राद्ध परमार्थसम्पन्न माना जाता है। अब जो ब्राह्मण श्राद्धमें वर्जित हैं, उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनो।

१. ऋग्वेद १०।११४ की ३–५ ऋचाएँ 'त्रिसुपर्ण' संज्ञक हैं। उसके विशेषज्ञको भी 'त्रिसुपर्ण' कहा जाता है। वहाँ वही इष्ट है।
२. विद्या, तप आदिसे विशिष्ट ब्राह्मण, जिससे श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी पङ्क्ति पवित्र हो जाती है।

* अध्याय १६ *६५
मूल श्लोकहिन्दी-अनुवाद
पतितोऽभिशस्तः क्लीबः पिशुनव्यङ्गरोगिणः।<br>कुनखी श्यावदन्तश्च कुण्डगोलाश्र्वपालकाः॥ १४<br><br>परिवित्तिर्नियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मत्तदारुणाः।<br>बैडालो बकवृत्तिश्च दम्भी देवलकादयः॥ १५<br><br>कृतघ्नान् नास्तिकांस्तद्वन्म्लेच्छदेशनिवासिनः।<br>त्रिशङ्कुर्बर्बरद्राववीतद्रविडकोङ्कणान् ॥ १६<br><br>वर्जयेल्लिङ्गिनः सर्वाञ्श्राद्धकाले विशेषतः।<br>पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १७<br><br>निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।<br>वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥ १८पतित (जो अपने वर्णाश्रम-धर्मसे च्युत हो गया हो), अभिशस्त (कलङ्कित, बदनाम), नपुंसक, चुगलखोर, विकृत अङ्गोंवाला, रोगी, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंसे युक्त, कुण्ड (सधवाका जारज पुत्र), गोलक (विधवाका जारज पुत्र), कुत्तोंका पालक, परिवित्ति*, नौकर अथवा जिसका मन किसी अन्य श्राद्धमें लगा हो, पागल, उन्मादी, क्रूर, बिडाल एवं बगुलेकी तरह चोरीसे जीविकोपार्जन करनेवाला, दम्भी तथा मन्दिरमें देव-पूजा करके वेतनभोगी (पुजारी)—ये सभी श्राद्धभोजमें निषिद्ध माने गये हैं। इसी प्रकार कृतघ्न (किये हुए उपकारको न माननेवाला), नास्तिक (परलोकपर विश्वास न करनेवाला), त्रिशङ्कु (कीकटसे दक्षिण और महानदीसे उत्तरका भाग), बर्बर (भारतकी पश्चिम सीमापरका प्रदेश), द्राव, वीत, द्रविड और कोंकण आदि देशोंके निवासी तथा संन्यासी—इन सभीका विशेषरूपसे श्राद्धकार्यमें परित्याग कर देना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके एक या दो दिन पहले ही श्राद्धकर्ता विनीतभावसे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे; क्योंकि पितृलोग आकर उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके निकट उपस्थित होते हैं। वे वायुरूप होकर उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलते हैं तथा उनके बैठ जानेपर पितर भी उन्हींके समीप बैठ जाते हैं॥ १४-१८॥
दक्षिणं जानुमालभ्य त्वं मया तु निमन्त्रितः।<br>एवं निमन्त्र्य नियमं श्रावयेत् पितृबान्धवान्॥ १९<br><br>अक्रोधनैः शौचपरैः सततं ब्रह्मचारिभिः।<br>भवितव्यं भवद्भिश्च मया च श्राद्धकारिणा॥ २०<br><br>पितृयज्ञं विनिर्वर्त्य तर्पणाख्यं तु योऽग्निमान्।<br>पिण्डान्वाहार्यकं कुर्याच्छ्राद्धमिन्दुक्षये सदा॥ २१<br><br>गोमयेनोपलिप्ते तु दक्षिणप्रवणे स्थले।<br>श्राद्धं समाचरेद् भक्त्या गोष्ठे वा जलसंनिधौ॥ २२<br><br>अग्निमान् निर्वपेत् पित्र्यं चरुं च सममुष्टिभिः।<br>पितृभ्यो निर्वपामीति सर्वं दक्षिणतो न्यसेत्॥ २३<br><br>अभिघार्य ततः कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः।<br>तेऽपि तस्यायताः कार्याश्चतुरङ्गुलविस्तृताः॥ २४<br><br>दर्वीत्रयं तु कुर्वीत खादिरं रजतान्वितम्।<br>रत्निमात्रं परिश्लक्ष्णं हस्ताकाराग्रमुत्तमम्॥ २५उस समय श्राद्धकर्ता ब्राह्मणके दाहिने घुटनेको स्पर्शकर (उससे) इस प्रकार प्रार्थना करे—‘मैं आपको निमन्त्रित कर रहा हूँ।’ इस प्रकार निमन्त्रण देकर अपने पिताके भाई-बन्धुओंको श्राद्ध-नियम बतलाते हुए यों कहे—‘(मैं अमुक दिन पितृ-श्राद्ध करूँगा, अतः उस दिन) आपलोगोंको निरन्तर क्रोधरहित, शौचाचारपरायण तथा ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित रहना चाहिये। मुझ श्राद्धकर्ताद्वारा भी इन नियमोंका पालन किया जायगा।’ इस प्रकार पितृ-यज्ञसे निवृत्त होकर तर्पण-कर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ताको ‘पिण्डान्वाहार्यक’ नामक श्राद्ध सदा अमावास्या तिथिमें करना चाहिये। गोशालामें या किसी जलाशयके निकट दक्षिण दिशाकी ओर ढालू स्थानको गोबरसे लीपकर वहीं भक्तिपूर्वक श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ता पितरोंके निमित्त बनी हुई चरुको समसंख्यक (२, ४, ६) मुष्टियोंद्वारा ‘मैं पितरोंको चरु प्रदान कर रहा हूँ’—यों कहकर पितरोंको चरु प्रदान करे और शेष सबको अपनी दाहिनी ओर रख ले। तत्पश्चात् अग्निमें घीकी धारा छोड़कर चरुको तीन भागोंमें विभक्त करके आगेकी ओर रखे। उन भागोंको भी चार अङ्गुलके विस्तारका लम्बा बना देना चाहिये। पुनः तीन दर्वी (करछुलें, जिनसे हवनीय पदार्थ अग्निमें छोड़े जाते हैं) रखनी चाहिये, जो खैर या चाँदीमिश्रित अन्य धातुकी बनी हों, जिनका परिमाण मुट्ठी बँधे हुए हाथके बराबर हो, जो अत्यन्त चिकनी, उत्तम एवं हथेलीकी-सी बनी हुई सुडौल हों।

* बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए जो छोटा भाई अपना विवाह कर लेता है, उसे 'परिवित्ति' कहा जाता है।