मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७६- चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन
- अध्याय १७४ * | ७१५
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| राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत।<br>विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः॥ १७<br>स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः।<br>उक्षाणमास्थितः संख्ये साक्षादिव शिवः स्वयम्॥ १८<br>पूर्वपक्षः सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणः।<br>वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः॥ १९<br>चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला महाबलाः।<br>स्वासु दिक्षु स्वरक्षन्त तस्य देवबलस्य ते॥ २० | हाथमें गदा धारण किये हुए पुष्पकविमानपर आरूढ हुए दिखायी पड़े। उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए राजराजेश्वर नरवाहन कुबेरकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो युद्धस्थलमें नन्दीश्वरपर बैठे हुए साक्षात् स्वयं शिवजी ही हों। सेनाके पूर्वभागमें इन्द्र, दक्षिणभागमें यमराज, पश्चिमभागमें वरुण और उत्तरभागमें कुबेर— इस प्रकार ये चारों महाबली लोकपाल चारों दिशाओंमें स्थित हुए। वे अपनी-अपनी दिशाओंमें बड़ी सतर्कताके साथ उस देवसेनाकी रक्षा कर रहे थे॥ १७–२०॥ |
| सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनामितगामिना।<br>श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः॥ २१<br>उदयास्तगचक्रेण मेरुपर्वतगामिना।<br>त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्॥ २२<br>सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा।<br>चचार मध्ये लोकानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३<br>सोमः श्वेतहये भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान्।<br>हिमवत्तोयपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत् ॥ २४<br>तमृक्षपूगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम्।<br>शशच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्॥ २५<br>ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसदं प्रभुम्।<br>ओषधीनां सहस्राणां निधानममृतस्य च॥ २६<br>जगतः प्रथमं भागं सौम्यं सत्यमयं रथम्।<br>ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणं स्थितम्॥ २७ | तदुपरान्त सहस्र किरणोंके सम्मिलित तेजसे उद्भासित द्वादशात्मा दिनेश्वर सूर्य अपने अमित वेगशाली रथपर, जिसमें सात घोड़े जुते हुए थे, जो शोभासे प्रकाशित, सूर्यकी किरणोंसे देदीप्यमान, उदयाचल, अस्ताचल और मेरुपर्वतपर भ्रमण करनेवाला तथा स्वर्गद्वाररूप एक चक्रसे सुशोभित था, सवार हो अविनाशी लोकोंको संतप्त करते हुए लोगोंके बीच विचरण करने लगे। शीतरश्मि चन्द्रमा श्वेत घोड़े जुते हुए रथपर सवार हो अपनी जलपूर्ण हिमकी-सी कान्तिसे जगत्को आह्लादित करते हुए सुशोभित हुए। उस समय शीतल किरणोंवाले द्विजेश्वर चन्द्रमाके पीछे नक्षत्रगण चल रहे थे। उनके शरीरमें खरगोशका चिह्न झलक रहा था, वे रात्रिके अन्धकारके विनाशक, सामर्थ्यशाली, आकाशमण्डलमें स्थित ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर, रसीले पदार्थोंको रस प्रदान करनेवाले, सहस्रों प्रकारकी ओषधियों तथा अमृतके निधान, जगत्के प्रथम भागस्वरूप और सौम्य स्वभाववाले हैं, उनका रथ सत्यमय है। इस प्रकार हिमसे प्रहार करनेवाले चन्द्रमाको दानवोंने वहाँ उपस्थित देखा॥ २१–२७॥ |
| यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु।<br>सप्तधातुगतो लोकांस्त्रीन् दधार चचार च॥ २८<br>यमाहुरग्निकर्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम्।<br>सप्तस्वरगतो यश्च नित्यं गीर्भिरुदीर्यते॥ २९<br>यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम्।<br>यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोगिनम्॥ ३० | जो समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है, मनुष्योंके शरीरोंमें पाँच प्रकारसे विभक्त होता है, जिसकी सातों धातुओंमें गति है, जो तीनों लोकोंको धारण करता तथा उनमें विचरण करता है, जिसे अग्निका कर्ता, सबका उत्पत्तिस्थान और ईश्वर कहते हैं, जो नित्य सातों स्वरोंमें विचरण करता हुआ वाणीद्वारा उच्चरित होता है। जिसे पाँचों भूतोंमें उत्तम भूत, शरीररहित, आकाशचारी, शीघ्रगामी और शब्दयोगी अर्थात् शब्दको उत्पन्न करनेवाला कहा जाता है, |
| ७१६ | * मत्स्यपुराण * |
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| स वायुः सर्वभूतायुरुद्भूतः स्वेन तेजसा।<br>ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान्प्रतिलोमं सतोयदः॥ ३१<br>मरुतो दिव्यगन्धर्वैर्विद्याधरगणैः सह।<br>चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः॥ ३२ | सम्पूर्ण प्राणियोंका आयुस्वरूप वह वायु वहाँ अपने तेजसे प्रकट हुआ। वह बादलोंको साथ लेकर दैत्योंको प्रव्यथित करता हुआ उनकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगा। मरुद्गण दिव्य गन्धर्वों और विद्याधरोंके साथ केंचुलसे छूटे हुए सर्पकी भाँति निर्मल तलवारोंसे क्रीडा करने लगे॥ २८—३२॥ |
| सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रतोयमयं विषम्।<br>शरभूता दिवीन्द्राणां चेरुर्व्यात्तानना दिवि॥ ३३<br>पर्वतैश्च शिलाशृङ्गैः शतशश्चैव पादपैः।<br>उपतस्थुः सुरगणाः प्रहर्तुं दानवं बलम्॥ ३४<br>यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः।<br>युगान्ते कृष्णवर्णाभो विश्वस्य जगतः प्रभुः॥ ३५<br>सर्वयोनिः स मधुहा हव्यभुक् क्रतुसंस्थितः।<br>भूम्यापोव्योमभूतात्मा श्यामः शान्तिकरोऽरिहा॥ ३६<br>अरिघ्नममरादीनां चक्रं गृह्य गदाधरः।<br>अर्कं नगादिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसा॥ ३७<br>सव्येनालम्व्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम्।<br>करेण कालीं वपुषा शत्रुकाालप्रदां गदाम्॥ ३८<br>अन्यैर्भुजैः प्रदीप्ताभैर्भुजगारिध्वजः प्रभुः।<br>दधारायुधजातानि शार्ङ्गादीनि महाबलः॥ ३९ | इसी प्रकार नागाधीश्वरगण आकाशमें मुख फैलाये हुए तीव्र जलमय विषको उगलते हुए आकाशचारियोंके बाणरूप होकर विचरण करने लगे। अन्यान्य देवगण सैकड़ों पर्वतों, शिलाओं, शिखरों और वृक्षोंसे दानवसेनापर प्रहार करनेके लिये उपस्थित हुए। तत्पश्चात् जो इन्द्रियोंके अधीश्वर, पद्मनाभ, तीन पगसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले, प्रलयकालमें कृष्ण वर्णकी आभासे युक्त, सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सबके उत्पत्तिस्थान, मधु नामक दैत्यके वधकर्ता, यज्ञमें स्थित होकर हव्यके भोक्ता, पृथ्वीजलआकाशस्वरूप, श्याम वर्णवाले, शान्तिकर्ता और शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं, उन भगवान् गदाधरने देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले अपने सुदर्शन चक्रको, जो अपने उत्तम तेजसे उदयाचलसे उदय होते हुए सूर्यके समान चमक रहा था, हाथमें ऊपर उठा लिया। फिर उन्होंने बायें हाथसे अपनी विशाल गदाका आलम्बन लिया, जो समस्त असुरोंकी विनाशिनी, काले रंगवाली और शत्रुओंको कालके गालमें डालनेवाली थी। महाबली गरुडध्वज भगवान्ने अपनी अन्य देदीप्यमान भुजाओंसे शार्ङ्गधनुष आदि अन्यान्य आयुधोंको धारण किया॥ ३३—३९॥ |
| स कश्यपस्यात्मभुवं द्विजं भुजभोजनम्।<br>पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम्॥ ४०<br>भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम्।<br>अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छितम्॥ ४१<br>देवासुरविमर्देषु बहुशो दृढविक्रमम्।<br>महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम्॥ ४२<br>शिखिनं बलिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम्।<br>विचित्रपत्रवसनं धातुमन्तमिवाचलम्॥ ४३<br>स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा।<br>भोगिभोगावसिक्तेन मणिरत्नेन भास्वता॥ ४४ | तदनन्तर जो कश्यपके पुत्र, सर्पभक्षी, वायुसे भी अधिक वेगशाली, आकाशको क्षुब्ध कर देनेवाले, आकाशचारी, मुखमें दबाये हुए सर्पसे सुशोभित, अमृत-मन्थनसे मुक्त हुए मन्दराचलके समान ऊँचे, अनेकों बार घटित हुए देवासुर-संग्राममें सुदृढ़ पराक्रम दिखानेवाले, अमृतके लिये इन्द्रके द्वारा वज्रके प्रहारसे किये गये चिह्नसे युक्त, शिखाधारी, महाबली, तपाये हुए स्वर्णनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित, विचित्र पंखरूपी वस्त्रवाले और धातुयुक्त पर्वतके समान शोभायमान थे, उनका वक्षःस्थल लम्बा और चौड़ा था, जो चन्द्रमाके समान उद्भासित हो रहा था, उसपर नागोंके फणोंमें लगी हुई मणियाँ चमक रही थीं, |
| * अध्याय १७५ * | ७१७ |
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| पक्षाभ्यां चारुपत्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।<br>युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम् ॥ ४५<br>नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६<br>अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे विभुः ।<br>सुवर्णस्वर्णवपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७<br>तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च समाहिताः ।<br>गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च जनार्दनम् ॥ ४८<br>तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरःसरम् ।<br>द्विजराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९<br>चन्द्रप्रभाभिर्विपुलं युद्धाय समवर्तत ।<br>स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति बृहस्पतिरभाषत ।<br>स्वस्त्यस्तु दानवानीके उशना वाक्यमाददे ॥ ५० ॥ | वे अपने दोनों सुन्दर पंखोंसे आकाशको उसी प्रकार लीलापूर्वक आच्छादित किये हुए थे, जैसे युगान्तके समय दो इन्द्रधनुषोंसे युक्त बादल आकाशको ढक लेते हैं। वे नीली, लाल और पीली पताकाओंसे सुशोभित थे, जो केतु (पताका)-के वेषमें छिपे हुए, विशालकाय और अरुणके छोटे भाई थे, उन सुन्दर वर्णवाले, सुनहले शरीरसे सुशोभित पक्षिश्रेष्ठ गरुडपर आरूढ़ होकर श्रीमान् भगवान् विष्णु समरभूमिमें उपस्थित हुए। फिर तो देवगणों तथा मुनियोंने सावधान-चित्तसे उनका अनुगमन किया और परमोत्कृष्ट मन्त्रोंसे युक्त वाणियोंद्वारा उन जनार्दनका स्तवन किया। इस प्रकार देवताओंकी वह विशाल सेना जब कुबेरसे युक्त, यमराजसे समन्वित, चन्द्रमासे सुरक्षित, इन्द्रसे सुशोभित और चन्द्रमाकी प्रभासे समलंकृत हो युद्धके लिये आगे बढ़ी, तब बृहस्पतिने कहा—'देवताओंका मङ्गल हो।' इसी प्रकार दानव-सेनामें भी शुक्राचार्यने 'दानवोंका कल्याण हो' ऐसा वचन उच्चारण किया॥ ४०—५०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १७४ ॥
एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच<br>ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा ।<br>सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १<br>दानवा देवतैः सार्धं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>समीयुर्युध्यमाना वै पर्वता इव पर्वतैः ॥ २<br>तत्सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं बभौ ।<br>धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च ॥ ३<br>ततो रथैर्विप्रयुक्तैर्वारणैश्च प्रचोदितैः ।<br>उत्पतद्भिश्च गगनमसिहस्तैः समंततः ॥ ४<br>क्षिप्यमाणैश्च मुसलैः सम्पतद्भिश्च सायकैः ।<br>चापैर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः ॥ ५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**रविनन्दन! तदनन्तर परस्पर विजयकी अभिलाषावाले देवताओं और दानवोंकी उन दोनों सेनाओंमें घमासान युद्ध होने लगा। नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे लैस हुए दानवगण देवताओंके साथ युद्ध करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। उस समय वे ऐसा प्रतीत हो रहे थे मानो पर्वत पर्वतोंके साथ भिड़ गये हों। देवताओं और असुरोंके बीच छिड़ा हुआ वह युद्ध धर्म, अधर्म, दर्प और विनयसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त अद्भुत लग रहा था। उस समय रथोंको पृथक्-पृथक् आगे बढ़ाया जा रहा था, हाथियोंको उत्तेजित किया जा रहा था, चारों ओर सैनिक हाथमें तलवार लिये हुए आकाशमें उछल रहे थे, मुसल फेंके जा रहे थे, बाणोंकी वर्षा हो रही थी, धनुषोंका टंकार हो रहा था, मुद्गर |
७१८ * मत्स्यपुराण *
| तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।<br>जगत्संत्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६<br><br>हस्तमुक्तैश्च परिघैर्विप्रयुक्तैश्च पर्वतैः।<br>दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७<br><br>ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जयकाङ्क्षिभिः।<br>विषण्णवदना देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८<br><br>तैस्त्रिशूलप्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।<br>भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९<br><br>वेष्टिताः शरजालैश्च निर्यत्नाश्चासुरैः कृताः।<br>प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०<br><br>अस्तंगतमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृतिः।<br>बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम्॥ ११<br><br>दैत्यचापच्युतान् घोरंश्छित्त्वा वज्रेण ताञ्शरान्।<br>शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः॥ १२<br><br>स दैत्यप्रमुखान् हत्वा तद्दानवबलं महत्।<br>तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत्॥ १३<br><br>तेऽन्योऽन्यं नावबुध्यन्त देवानां वाहनानि च।<br>घोरेण तमसाविष्टाः पुरुहूतस्य तेजसा॥ १४<br><br>मायापाशैर्विमुक्तास्तु यत्नवन्तः सुरोत्तमाः।<br>वपूंषि दैत्यसिंहानां तमोभूतान्यपातयन्॥ १५<br><br>अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसा।<br>पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाद्रयः॥ १६<br><br>तद् घनीभूतदैत्येन्द्रमन्धकार इवार्णवे।<br>दानवं देवकदनं तमोभूतमिवाभवत्॥ १७<br><br>तदा सृजन् महामायां मयस्तां तामसीं दहन्।<br>युगान्तोद्योतजननीं सृष्टामौर्वेण वह्निना॥ १८<br><br>सा ददाह ततः सर्वान् मायाः मयविकल्पिताः।<br>दैत्याश्चादित्यवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे॥ १९ | गिराये जा रहे थे, इस प्रकार देवों और दानवोंसे व्याप्त हुए उस युद्धने भयंकर रूप धारण कर लिया है। वह युगान्तकालिक संवर्तक अग्निकी तरह जगत्को भयभीत करने लगा। दानवगण समरभूमिमें पृथक्-पृथक् हाथोंसे फेंके गये परिघों और पर्वतोंसे इन्द्र आदि देवताओंपर प्रहार करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें विजयाभिलाषी बलवान् दानवोंद्वारा मारे जाते हुए उन देवताओंका मुख सूख गया और वे बड़ी कष्टपूर्ण स्थितिमें पड़ गये। दानवोंने उन्हें शूलोंसे बींध डाला, परिघोंकी चोटसे उनके मस्तक विदीर्ण तथा वक्षःस्थल चूर-चूर हो गये और उनके घावोंसे अविरल रक्त प्रवाहित होने लगा। असुरोंने देवताओंको बाणसमूहोंसे परिवेष्टित करके प्रयत्नहीन कर दिया। वे दानवी मायामें प्रविष्ट होकर किसी प्रकारकी भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। देवताओंकी वह सेना प्राणरहितकी तरह विनष्ट हुई-सी दीख रही थी। असुरोंने उसे आयुध और प्रयत्नसे रहित कर दिया था॥ १-११॥<br><br>तदनन्तर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र वज्रद्वारा दैत्योंके धनुषोंसे छूटे हुए भयंकर बाणोंको छिन्न-भिन्न करके दैत्योंकी भीषण सेनामें प्रविष्ट हुए। उन्होंने प्रधान-प्रधान दैत्योंका वध करके दानवोंकी उस विशाल सेनाको तामस अस्त्रसमूहके प्रयोगसे अन्धकारमय बना दिया। इस प्रकार इन्द्रके पराक्रमसे घोर अन्धकारसे घिरे हुए वे दानव परस्पर एक-दूसरेको तथा देवताओंके वाहनोंको भी नहीं पहचान पाते थे। इधर दानवी मायाके पाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवगण प्रयत्न करके दैत्येन्द्रोंके अन्धकारमय शरीरोंको काटकर गिराने लगे। उस नील कान्तिवाले अन्धकारसे घिरे हुए वे दानवगण मूच्छित होकर धराशायी होते हुए ऐसे लग रहे थे मानो कटे हुए पंखवाले पर्वत हों। दैत्येन्द्रोंकी वह सेना समुद्रमें अन्धकारकी तरह एकत्र हो गयी और देवताओंद्वारा मारे जाते हुए दानव अन्धकारमय-से हो गये। यह देखकर मयदानवने इन्द्रकी उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए अपनी महान् राक्षसी मायाका सृजन किया। वह और्व नामक अग्निसे उत्पन्न हुई और प्रलयकालीन (भयंकर) प्रकाशको प्रकट कर रही थी। मयद्वारा रची गयी उस मायाने सम्पूर्ण देवताओंको जलाना आरम्भ किया। इधर सूर्यके समान तेजस्वी शरीरवाले दैत्यगण युद्धस्थलमें तुरंत उठ खड़े |