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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७५- देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति

* अध्याय १७२ * | ७०९

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
चतुर्द्विगुणपीनांसं किरीटच्छन्नमूर्धजम्।<br>बभौ चामीकरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम्॥ २३<br><br>चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्।<br>नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम्॥ २४<br><br>शक्तिचित्रफलोदग्रशङ्खचक्रगदाधरम् ।<br>विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम्॥ २५<br><br>त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम्।<br>सर्वलोकमनःकान्तं सर्वसत्त्वमनोहरम्॥ २६<br><br>नानाविमानविटपं तोयदाम्बुमधुस्रवम्।<br>विद्याहंकारसाराढ्यं महाभूतप्ररोहणम्॥ २७<br><br>विशेषपत्रैर्निचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम्।<br>दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम्॥ २८प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्निके समान उद्भासित हो रहा था, उसके कंधे दुगुने एवं चौगुने मोटे थे, उसके बाल किरीटसे ढके होनेके कारण शोभा पा रहे थे, वह स्वर्ण-सदृश चमकीले आयुधोंसे सुशोभित था, उससे चन्द्रमा और सूर्यकी किरणों-जैसी प्रभा निकल रही थी, वह पर्वत-शिखरकी तरह ऊँचा था, उसके हाथ नन्दक नामक खड्ग और विषैले सर्पों-जैसे बाणोंसे युक्त थे, वह चित्तल मछलीके समान विशाल शक्ति, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए था, क्षमा जिसका मूल था, जो श्रीवृक्षसे सम्पन्न, शार्ङ्गधनुषसे युक्त, देवताओंको उत्तम फल देनेवाला, देवाङ्गणारूपी रुचिर पल्लवोंसे सुशोभित, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण जीवोंसे युक्त होनेके कारण मनोहर, नाना प्रकारके विमानरूपी वृक्षोंसे युक्त और बादलोंके मीठे जलको टपकानेवाला, विद्या और अहंकारके सारसे सम्पन्न तथा महाभूतरूपी वृक्षोंको उगानेवाला था, वह घने पत्तोंसे आच्छादित था, उसपर ग्रह-नक्षत्ररूप पुष्प खिले हुए थे, दैत्योंके लोक उसकी विशाल शाखाके रूपमें थे, ऐसा वह विष्णुशैल मृत्युलोकमें प्रकाशित हो रहा था॥ २०—२८॥
सागराकारनिर्ह्रादं रसातलमहाश्रयम्।<br>मृगेन्द्रपाशैर्विततं पक्षजन्तुनिषेवितम्॥ २९<br><br>शीलार्थचारुगन्धाढ्यं सर्वलोकमहाद्रुमम्।<br>अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहङ्कारफेनिलम्॥ ३०<br><br>महाभूततरङ्गौघं ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम्।<br>विमानगरुतव्यासं तोयदाडम्बराकुलम्॥ ३१<br><br>जन्तुमत्स्यगणाकीर्णं शैलशङ्खकुलैर्युतम्।<br>त्रैगुण्यविषयावर्तं सर्वलोकतिमिङ्गिलम्॥ ३२<br><br>वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशैवलम्।<br>द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्॥ ३३<br><br>वस्वष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम्।<br>संध्यासंख्योर्मिसलिलं सुपर्णानिलसेवितम्॥ ३४<br><br>दैत्यरक्षोगणग्राहं यक्षोरगझषाकुलम्।<br>पितामहमहावीर्यं सर्वस्त्रीरत्नशोभितम्॥ ३५रसातलतक व्याप्त रहनेवाला वह नारायणरूप महासागर सागरकी भाँति शब्द कर रहा था, वह मृगेन्द्ररूपी पाशोंसे व्याप्त, पंखधारी जन्तुओंसे सेवित, शील और अर्थकी सुन्दर गन्धसे युक्त तथा सम्पूर्ण लोकरूपी महान् वृक्षसे सम्पन्न था, नारायणका अव्यक्त स्वरूप उसका अगाध जल था, वह व्यक्त अहंकाररूप फेनसे युक्त था, उसमें महाभूतगण लहरोंके समूह थे, ग्रह और नक्षत्र बुद्बुदकी तरह शोभा पा रहे थे, वह विमानोंके चलनेसे होनेवाले शब्दोंसे व्याप्त था, वह बादलोंके आडम्बरसे सम्पन्न, जलजन्तुओं और मत्स्यसमूहोंसे परिपूर्ण और समुद्रस्थ पर्वतों एवं शङ्खसमूहसे युक्त था। उसमें त्रिगुणयुक्त विषयोंकी भँवरें उठ रही थीं और सारा लोक तिमिंगिल (बहुत बड़ी मछली)-के समान था, वीरगण वृक्षों और लताओंके झुरमुट थे, बड़े-बड़े नाग सेवारके समान थे, बारहों आदित्य महाद्वीप और ग्यारहों रुद्र नगर थे, वह महासागर आठों वसुओंरूप पर्वतसे युक्त और त्रिलोकीरूप जलसे भरा हुआ था, उसके जलमें असंख्य संध्यरूप लहरें उठ रही थीं, वह सुपर्णरूप वायुसे सेवित, दैत्य और राक्षसगणरूप ग्राह तथा यक्ष एवं नागरूप मीनसे व्याप्त था, पितामह ब्रह्मा ही उसमें महान् पराक्रमी व्यक्ति थे,

७१० मत्स्यपुराण

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रीकीर्तिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् ।<br>कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तिवेगिनम् ॥ ३६वह सभी स्त्री-रत्नों तथा श्री, कीर्ति, कान्ति और लक्ष्मीरूपी नदियोंसे सुशोभित था, उसमें समयानुसार महान् पर्व और प्रलयकी उत्पत्ति होती रहती थी, ऐसा वह योगरूप महान् तटवाला नारायण-महासागर था ॥ २९—३६ १/२ ॥
तं तु योगमहापारं नारायणमहार्णवम् ।<br>दैवाधिदेवं वरदं भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ३७<br><br>अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् ।<br>हर्यश्वरथसंयुक्ते सुपर्णध्वजसेविते ॥ ३८<br><br>ग्रहचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते ।<br>अनन्तरश्मिभियुक्ते विस्तीर्णे मेरुगह्वरे ॥ ३९<br><br>तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ।<br>भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः ॥ ४०<br><br>ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्ये लोकमये रथे ।<br>ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ ४१उस समय दैत्योंसे पराजित हुए देवताओंने आकाशमें उन देवाधिदेव भगवान्‌को, जो भक्तोंके वरदायक, भक्तवत्सल, अनुग्रह करनेवाले, प्रशान्तिकारक, शुभमय और भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, देखा। वे ऐसे लोकमय दिव्य रथपर विराजमान थे, जो इन्द्रके रथके समान था, जिसपर गरुडध्वज फहरा रहा था, जिसमें सभी ग्रह, चन्द्र और सूर्य उपस्थित थे, जो मन्दराचलकी श्रेष्ठ धुरीपर आधारित था, वह असंख्य किरणोंसे युक्त मेरुकी विस्तृत गुफा-जैसा लग रहा था, उसमें तारकाएँ विचित्र पुष्पोंके सदृश तथा ग्रह और नक्षत्र हंसके समान शोभा पा रहे थे। तब इन्द्र आदि वे सभी देवता हाथ जोड़कर जय-जयकार करते हुए उन शरणागतवत्सलकी शरणमें गये ॥ ३७—४१ १/२ ॥
जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ।<br>स तेषां तां गिरं श्रुत्वा विष्णुर्दैवतदैवतम् ॥ ४२<br><br>मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ।<br>आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुरास्थितः ॥ ४३<br><br>उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ।<br>शान्तिं व्रजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः ॥ ४४<br><br>जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ।<br>ते तस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः ॥ ४५<br><br>देवाः प्रीतिं समाजग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम् ।<br>ततस्तमः संहृतं तद्दिनेशश्च बलाहकाः ॥ ४६<br><br>प्रववुश्च शिवा वाता प्रशान्ताश्च दिशो दश ।<br>शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमश्चक्रुः प्रदक्षिणाम् ॥ ४७<br><br>न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशान्ताश्चापि सिन्धवः ।<br>विरजस्काभवन् मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः ॥ ४८<br><br>यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः ।<br>आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ४९इस प्रकार देवताओंकी वह आर्त-वाणी सुनकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने महासमरमें दानवोंका विनाश करनेको सोचा। तब उत्तम शरीर धारण करके आकाशमें स्थित हुए भगवान् विष्णु सभी देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक ऐसी वाणी बोले—'देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुमलोग शान्त हो जाओ, भय मत करो, ऐसा समझो कि मैंने सभी दानवोंको जीत लिया है। अब तुमलोग पुनः त्रिलोकीका राज्य ग्रहण करो।' इस प्रकार उन सत्यसंध भगवान् विष्णुके वचनसे वे देवगण परम संतुष्ट हुए और उन्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई, मानो उत्तम अमृत ही पान करनेको मिल गया हो। तदनन्तर वह निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। बादल विनष्ट हो गये। सुखदायिनी वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ शान्त हो गयीं। ज्योतिर्गणोंकी प्रभा निर्मल हो गयी। तब चन्द्रमा और वे सभी ज्योतिर्गण प्रदक्षिणा करने लगे। ग्रहोंमें परस्पर विग्रहका भाव नष्ट हो गया। सागर प्रशान्त हो गये। मार्ग धूलरहित हो गये। स्वर्गादि तीनों लोकोंमें शान्ति स्थापित हो गयी। नदियाँ यथार्थरूपसे प्रवाहित होने लगीं। समुद्रोंका ज्वार-भाटा शान्त हो गया। मनुष्योंकी अन्तरात्माएँ तथा इन्द्रियाँ
* अध्याय १७३ *७११
महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयत।<br>यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमप च पावकः॥ ५०<br><br>प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः।<br>विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम्॥ ५१शुभकारिणी हो गयीं। महर्षियोंका शोक नष्ट हो गया, वे उच्च स्वरसे वेदोंका अध्ययन करने लगे। यज्ञोंमें अग्निको पके हुए मङ्गलकारक हविकी प्राप्ति होने लगी। इस प्रकार शत्रुके विनाश करनेके विषयमें दत्तप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुकी वाणी सुनकर सभी लोगोंका मन हर्षित हो गया, तब वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न हो गये।

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७२ ॥


एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय

दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्बोले—
ततोऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः।<br>उद्योगं विपुलं चक्रुर्यूद्धाय विजयाय च॥ १<br><br>मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम्।<br>चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकम्पितमहायुगम्॥ २<br><br>किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम्।<br>रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम्॥ ३<br><br>ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपङ्क्तिविराजितम्।<br>दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्॥ ४<br><br>स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम्।<br>गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम्॥ ५<br><br>हैमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम्।<br>सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम्॥ ६<br><br>गजेन्द्राभोगवपुषं क्वचित् केसरिवर्चसम्।<br>युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्बुदनादितम्॥ ७<br><br>दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्।<br>अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्॥ ८रविनन्दन ! तदनन्तर देवताओंके लिये उपयुक्त भगवान् विष्णुके उस अभयदायक वचनको सुनकर दैत्य और दानव युद्ध एवं उसमें विजयप्राप्तिके लिये महान् उद्योग करने लगे। उस समय युद्धाकाङ्क्षी मय एक ऐसे दिव्य रथपर सवार हुआ, जो सोनेका बना हुआ था। वह अविनाशी रथ तीन नल्व* विस्तारवाला अत्यन्त विशाल तथा चार पहियों और परम सुन्दर महान् जुएसे युक्त था। उसमें क्षुद्र घंटिकाओंके रुनझुन शब्द हो रहे थे। वह गैंडेके चमड़ेसे आच्छादित, रत्नों और सुवर्णकी सुन्दर जालियोंसे सुशोभित, भेड़ियों और पङ्क्तिबद्ध पक्षियोंकी पच्चीकारीसे समलंकृत तथा दिव्यास्त्र और तरकससे परिपूर्ण था। उससे मेघकी गड़गड़ाहटके समान शब्द निकल रहा था। वह श्रेष्ठ रथ सुन्दर धुरी और सुदृढ़ मध्यभागसे युक्त, आकाशमण्डल-जैसा विस्तृत तथा गदा और परिघसे परिपूर्ण होनेके कारण मूर्तिमान् सागर-सा लग रहा था। उसके केयूर, वलय और कूबर (युगंधर) सोनेके बने हुए थे तथा उसपर पताकाएँ और ध्वज फहरा रहे थे, जिससे वह सूर्ययुक्त मन्दराचलकी भाँति शोभित हो रहा था। उसका ऊपरी भाग कहीं गजेन्द्र-चर्म तो कहीं सिंह-चर्म-जैसा चमक रहा था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे, वह घने बादलकी तरह शब्द कर रहा था, शत्रुओंके रथको रौंदनेवाला वह दीप्तिशाली रथ आकाशगामी था, उसपर बैठा हुआ मय ऐसा लग रहा था मानो दीप्तिमान् सूर्य सुमेरु पर्वतपर विराजमान हों॥ १—८॥

* एक फलाँगका एक प्राचीन माप।

७१२ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Meaning
तारमुक्तक्रोशविस्तारं सर्वं हेममयं रथम्।<br>शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>कार्ष्णायसमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकूबरम्।<br>तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्॥ १०<br>लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम्।<br>आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः॥ ११<br>प्रासैः पाशैश्च विततैस्संयुक्तश्च कण्टकैः।<br>शोभितं त्रासयानैश्च तोमरैश्च परश्वधैः॥ १२<br>उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम्।<br>युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्॥ १३<br>विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः।<br>प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः॥ १४<br>युक्तं रथसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः।<br>स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः॥ १५<br>व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत्।<br>वाराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः॥ १६<br>खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम्।<br>स्फुरद्दन्तोष्ठनयनं संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत॥ १७इसी प्रकार जो अत्यन्त ऊँचा और दूरतक शब्द करनेवाला था, जिसके सभी अङ्ग स्वर्णमय थे, जो आकारमें पर्वतके समान और नीलाञ्जनकी राशि-सा दीख रहा था, काले लोहेका बना हुआ था, जिसके लोहेके हरसेमें कूबर बँधा हुआ था, जिसमें कहीं-कहीं अंधकारको फाड़कर किरणें चमक रही थीं, जो बादलकी तरह गर्जना कर रहा था, लोहेकी विशाल जाली और झरोखोंसे सुशोभित था, लोहनिर्मित परिघ, क्षेपणीय (ढेलवाँस) और मुद्गरोंसे परिपूर्ण था, भाला, पाश, बड़े-बड़े शङ्कु, कण्टक, भयदायक तोमर और कुठारोंसे सुशोभित था, शत्रुओंसे युद्ध करनेके लिये उद्यत दूसरे मन्दराचलकी भाँति दीख रहा था तथा जिसमें एक हजार गधे जुते हुए थे, ऐसे उत्तम दिव्य रथपर तारकासुर सवार हुआ। क्रोधसे भरा हुआ विरोचन हाथमें गदा लिये हुए उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हुआ। वह देदीप्यमान शिखरवाले पर्वतके समान लग रहा था। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले दानवश्रेष्ठ हयग्रीवने एक हजार रथके साथ अपने रथको आगे बढ़ाया। वाराह नामक दानव अपने एक हजार किष्कु* लम्बे विशाल धनुषका टंकार करते हुए सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ, जो वृक्षोंसहित पर्वत-सा दीख रहा था। खर नामक दैत्य अभिमानवश नेत्रोंसे रोषजनित जल गिराता हुआ संग्रामके लिये उद्यत हुआ, उस समय उसके दाँत, होंठ और नेत्र फड़क रहे थे॥ ९-१७॥
त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः।<br>व्यूहितुं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्॥ १८<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः।<br>श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखे स्थितः॥ १९<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधः।<br>युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः॥ २०<br>किशोरस्त्वभिसंहर्षात्किशोर इति चोदितः।<br>सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम्॥ २१<br>अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः।<br>लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः॥ २२<br>दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्।<br>स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनोष्ठेक्षणायुधः॥ २३इसी प्रकार पराक्रमी दानवराज त्वष्टा, जिसमें आठ हाथी जुते हुए थे, ऐसे भयंकर रथपर बैठकर दानवसेनाको व्यूहबद्ध करनेका प्रयत्न करने लगा। विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, जो श्वेत पर्वतके समान विशालकाय और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित था, युद्धके लिये सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ। बलिक पुत्र अरिष्ट, जो महान् बलसम्पन्न और पर्वतको कँपा देनेवाला था तथा पर्वत-शिलाएँ जिसकी आयुधभूता थीं, युद्धकी कामनासे सेनाके सम्मुख खड़ा हुआ। किशोर नामक दैत्य प्रेरित किये गये सिंह-किशोरकी तरह अत्यन्त हर्षके साथ दैत्य-सेनाके मध्यभागमें उपस्थित हुआ, जो उदयकालीन सूर्य-सा प्रतीत हो रहा था। नवीन मेघकी-सी कान्तिवाला लम्ब नामक दानव, जो लम्बे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था, दैत्यसेनामें पहुँचकर कुहासेसे घिरे हुए सूर्यकी तरह शोभा पा रहा था। महान् ग्रह राहु, जो मुख, दाँत, होंठ और नेत्रोंसे युद्ध करनेवाला

* बीस अंगुल या मतान्तरसे एक हाथका प्राचीन माप।

* अध्याय १७४ * ७१३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः।<br>अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे॥ २४<br><br>सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षेषु चापरे।<br>केचित्खरोष्ट्रयातारः केचिच्छ्वापदवाहनाः॥ २५<br><br>पत्तिनस्त्वपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः।<br>एकपादार्धपादाश्च ननृत्युर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ २६<br><br>आस्फोटयन्तो बहवः क्ष्वेडन्तश्च तथापरे।<br>हृष्टशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>ते गदापरिघैरुग्रैः शिलामुसलपाणयः।<br>बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः॥ २८<br><br>पाशैः प्रासैश्च परिघैस्तोमेराङ्कुशपट्टिशैः।<br>चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः॥ २९<br><br>गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायसैः।<br>चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम्॥ ३०<br><br>एतद्दानवसैन्यं तत् सर्वं युद्धमदोत्कटम्।<br>देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम्॥ ३१<br><br>तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं<br>वाय्वग्निशैलाम्बुदतोयकल्पम्।<br>बलं रणौघाभ्युदयेऽभ्युदीर्णं<br>युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३२था, हँसते हुए दैत्योंके आगे खड़ा हुआ। इस प्रकार अन्यान्य दानव भी क्रमशः सेनासहित कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थित हुए। उनमें कुछ लोग घोड़ोंपर सवार थे तो कुछ लोग गजराजोंके कंधोंपर बैठे थे। दूसरे कुछ लोग सिंह, व्याघ्र, वराह और रीछोंपर सवार थे। कुछ गधे और ऊँटोंपर चढ़कर चल रहे थे तो किन्हींके वाहन चीते थे॥ १८—२५॥<br><br>दूसरे भीषण दैत्य, जिनमें कुछके मुख टेढ़े थे, किन्हींके एक पैर तथा किन्हींके आधा पैर ही था, युद्धकी अभिलाषासे पैदल ही नाचते हुए चल रहे थे। उन दानवश्रेष्ठोंमें कुछ ताल ठोंक रहे थे, बहुतेरे उछल-कूद रहे थे और कुछ हर्षित होकर सिंहनाद कर रहे थे। इस प्रकार वे दानवगण हाथोंमें भयंकर गदा, परिघ, शिला और मुसल धारण करके अपनी परिघाकार भुजाओंसे देवताओंको धमका रहे थे। उस समय श्रेष्ठ दैत्यगण पाश, भाला, परिघ, तोमर (लकड़ीका बना गोलाकार अस्त्र), अङ्कुश, पट्टिश, शतघ्नी (तोप), शतधार, मुद्गर, गण्डशैल, शैल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ और चक्रोंसे क्रीडा करते हुए दैत्यसेनाको आनन्दित करने लगे। इस प्रकार दानवोंकी वह सारी सेना युद्धके मदसे उन्मत्त हो देवताओंके सम्मुख खड़ी हुई, जो उमड़े हुए मेघोंकी सेना-सी प्रतीत हो रही थी। दानवोंकी वह अद्भुत एवं प्रचण्ड सेना, जो हजारों प्रधान दैत्योंसे भरी हुई तथा वायु, अग्नि, पर्वत और मेघके समान भीषण दीख रही थी, युद्धकी तैयारीके समय युद्धकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी शोभा पा रही थी॥ २६—३२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामय-संग्राममें एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७३॥


एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय

देवताओंका युद्धार्थ अभियान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br><br>श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तारो रविनन्दन।<br>सुराणामपि सैन्यस्य विस्तारं वैष्णवं शृणु॥ १<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ।<br>सबलाः सानुगाश्चैव सन्नह्यान्त यथाक्रमम्॥ २मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! तुम दैत्योंकी सेनाका विस्तार तो सुन ही चुके, अब देवताओंकी—विशेषकर विष्णुकी सेनाका विस्तार श्रवण करो। उस समय आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—इन सभीने क्रमशः अपनी-अपनी सेना और अनुयायियोंसहित कवच धारण कर लिया।

७१४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक्।<br>ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम्॥ ३<br><br>मध्ये चास्य रथः सर्वपक्षिप्रवररंहसः।<br>सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः॥ ४<br><br>देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः।<br>दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः॥ ५<br><br>वज्रविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्युदिन्द्रायुधोदितैः।<br>युक्तो बलाहकगणैः पर्वतैरिव कामगैः॥ ६<br><br>यमारूढः स भगवान् पर्यति सकलं जगत्।<br>हविर्धानेषु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः॥ ७<br><br>स्वर्गे शक़्रानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु।<br>सुन्दर्यः परिनृत्यन्ति शतशोऽप्सरसां गणाः॥ ८<br><br>केतुना नागराजेन राजमानो यथा रविः।<br>युक्तो हयसहस्रेण मनोमारुतरंहसा॥ ९<br><br>स स्यन्दनवरो भाति गुप्तो मातलिना तदा।<br>कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा॥ १०सहस्र नेत्रधारी लोकपाल इन्द्र जो समस्त देवताओंके नायक हैं, सर्वप्रथम सुरगजेन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हुए। सेनाके मध्यभागमें इन्द्रका वह रथ भी खड़ा किया गया, जो समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुडके समान वेगशाली था। उसमें सुन्दर पहिये लगे हुए थे तथा वह स्वर्ण और वज्रसे विभूषित था। सहस्रोंकी संख्यामें देवताओं, गन्धर्वों और यक्षोंके समूह उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। दीप्तिशाली सदस्य और महर्षि उसकी स्तुति कर रहे थे तथा वह वज्रकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्द करनेवाले, बिजली और इन्द्रधनुषसे सुशोभित तथा स्वेच्छाचारी पर्वतकी तरह दीखनेवाले मेघसमूहोंसे घिरा हुआ था। उसपर सवार होकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र समस्त जगत्में भ्रमण करते हैं, यज्ञोंमें स्थित ब्राह्मणलोग यज्ञके प्रारम्भमें उसकी प्रशंसा करते हैं, स्वर्गलोकमें उसपर बैठकर इन्द्रके प्रस्थित होनेपर उनके पीछे देवताओंकी तुरहियाँ बजने लगती हैं और सैकड़ों सुन्दरी अप्सराएँ संगठित होकर नृत्य करती हैं। वह रथ शेषनागसे अङ्कित ध्वजसे युक्त होकर सूर्यकी भाँति शोभा पाता है तथा उसमें मन और वायुके समान वेगशाली एक हजार घोड़े जोते जाते हैं। उस समय मातलिद्वारा सुरक्षित वह श्रेष्ठ रथ उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जैसे सूर्यके तेजसे पूर्णतया घिरा हुआ सुमेरुपर्वत हो॥ १-१०॥
यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तश्च मुद्गरम्।<br>तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन्॥ ११इसी प्रकार कालसहित यमराज भी दण्ड और मुद्गरको हाथमें लेकर अपने सिंहनादसे दैत्योंको भयभीत करते हुए देवसेनामें खड़े हुए।
चतुर्भिः सागरैर्युक्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः।<br>शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत् तोयमयं वपुः॥ १२<br><br>कालपाशान् समाविध्यन् हयैः शशिकरोपमैः।<br>वाय्वीरितैर्जलाकारैः कुर्वँल्लीलाः सहस्रशः॥ १३<br><br>पाण्डुरोद्भूतवसनः प्रवालरुचिराङ्गदः।<br>मणिश्यामोत्तमवपुर्हरिभारार्पितो वरः॥ १४<br><br>वरुणः पाशधृङ्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्।<br>युद्धवेलामभिलषन् भिन्नवेल इवार्णवः॥ १५पाशधारी वरुण जलमय शरीर धारणकर देवसेनाके मध्यभागमें स्थित हुए। उनके साथ चारों सागर तथा जीभ लपलपाते हुए नाग भी थे, वे शङ्ख और मुक्ताजटित केयूर धारण किये हुए थे, हाथमें कालपाश लिये हुए थे, वायुके समान वेगशाली, चन्द्र-किरणोंके-से उज्ज्वल तथा जलाकार घोड़ोंसे युक्त रथपर सवार थे। वे हजारों प्रकारकी लीलाएँ कर रहे थे, पीले वस्त्र और प्रवालजटित अङ्गदसे विभूषित थे, उनकी शरीरकान्ति नीलमणिकी-सी सुन्दर थी, उन श्रेष्ठ देवपर इन्द्रने अपना भार सौंप रखा था। वे तटको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले सागरकी तरह युद्ध-वेलाकी बाट जोह रहे थे।
यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि।<br>युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः॥ १६तत्पश्चात् निधियोंके अधिपति एवं विमानद्वारा युद्ध करनेवाले सामर्थ्यशाली राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर यक्षों, राक्षसों और गुह्यकोंकी सेना तथा शङ्ख और पद्मके साथ