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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७१- ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति

६९४* मत्स्यपुराण *

| ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणान्।<br>अपश्यद्देवकुक्षिस्थान्याजकाञ्छतशो द्विजान्॥ २८<br><br>सद्वृत्तमास्थिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः।<br>चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग्यथोद्दिष्टा मया तव॥ २९ | आश्रमों तथा कुक्षिके भीतर स्थित सैकड़ों याजक ब्राह्मणोंको देखा, जो कहीं यज्ञोंद्वारा यजन कर रहे थे और कहीं यज्ञ समाप्त होनेके पश्चात् उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त थे। जैसा मैंने तुम्हें पहले बतलाया है, उसके अनुसार ब्राह्मण आदि सभी वर्णों तथा चारों आश्रमोंके लोग सम्यक् प्रकारसे सदाचारका पालन करते थे॥ २८—२९॥ |
| एवं वर्षशतं साग्रं मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>चरतः पृथिवीं सर्वां न कुक्ष्यन्तः समीक्षितः॥ ३०<br><br>ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिःसृतः।<br>गुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरैक्षत॥ ३१<br><br>तथैवार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे।<br>अव्यग्रः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते॥ ३२<br><br>स मुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः।<br>बालमादित्यसंकाशं नाशक्नोदभिवीक्षितुम्॥ ३३<br><br>स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ।<br>पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया॥ ३४<br><br>अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः।<br>प्लवंस्तथार्तिमगमद् भयात् संत्रस्तलोचनः॥ ३५<br><br>स तस्मै भगवानाह स्वागतं बालयोगवान्।<br>बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः॥ ३६<br><br>मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि मेऽन्तिकम्।<br>मार्कण्डेयो मुनिस्त्वाह बालं तं श्रमपीडितः॥ ३७ | इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयके सौ वर्षोंसे भी अधिक कालतक समूची पृथ्वीपर भ्रमण करते रहनेपर भी उन्हें उस कुक्षिका अन्त न दीख पड़ा। तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः उस पुरुषके मुखसे बाहर निकल आये। उस समय उन्होंने बरगदकी शाखामें छिपे हुए एक बालकको देखा, जो उसी प्रकारके एकार्णवके जलमें, यद्यपि आकाश नीहारसे आच्छादित था तथा जगत् समस्त प्राणियोंसे शून्य हो गया था, तथापि निश्चिन्तभावसे खेल रहा था। यह देखकर मार्कण्डेय मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उनके मनमें उसे जाननेके लिये कुतूहल उत्पन्न हो गया, किंतु वे सूर्यके समान तेजस्वी उस बालककी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये। तब जलके निकट एकान्त स्थानमें स्थित होकर विचार करते हुए मार्कण्डेयजी देवमायाके प्रभावसे सशङ्कित हो उसे पहले देखा हुआ मानने लगे। परम विस्मित हुए मार्कण्डेय उस अथाह जलमें तैरते हुए कष्टका अनुभव करने लगे तथा भयके कारण उनके नेत्र कातर हो गये। तब बालयोगी भगवान् पुरुषोत्तम मेघ-सदृश गम्भीर स्वरसे मार्कण्डेयसे स्वागतपूर्वक बोले—'वत्स! डरो मत, तुम्हें डरना नहीं चाहिये। यहाँ मेरे निकट आओ।' तदुपरान्त थके-माँदे मार्कण्डेय मुनि उस बालकसे बोले॥ ३०—३७॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br><br>को मां नाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्राख्यं धर्षयन्निव मे वयः॥ ३८<br><br>न ह्येष वः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः।<br>मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भाषते॥ ३९<br><br>कस्तमो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः।<br>मार्कण्डेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति॥ ४० | मार्कण्डेयजीने कहा— यह कौन है, जो मेरी तपस्याका तिरस्कार करता हुआ मेरा नाम लेकर पुकार रहा है? यह एक हजार दिव्य वर्षोंवाली मेरी आयुका भी अपमान-सा कर रहा है। देवताओंमें भी किसीको मेरे प्रति ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है; क्योंकि देवेश्वर ब्रह्मा भी मुझे 'दीर्घायु' कहकर ही पुकारते हैं। जीवनसे हाथ धोनेवाला ऐसा कौन है, जो घोर अज्ञानान्धकारका आश्रय लेकर आज मुझे 'मार्कण्डेय' ऐसा कहकर मृत्युका मुख देखना चाहता है?॥ ३८—४०॥ |
| सूत उवाच<br><br>एवमाभाष्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>तथैव भगवान् भूयो बभाषे मधुसूदनः॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! महामुनि मार्कण्डेय क्रोधवश उस बालकसे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् मधुसूदन पुनः उसी प्रकार बोले॥ ४१॥ |

* अध्याय १६७ *६९५

| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा—'वत्स! मैं पुराणप्रसिद्ध हृषीकेश |
| अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः।<br>आयुष्प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥ ४२ | ही तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हूँ। मैंने ही तुम्हें दीर्घायु प्रदान किया है, तुम मेरे निकट क्यों नहीं |
| मां पुत्रकामः प्रथमं पिता तेऽङ्गिरसो मुनिः।<br>पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रं समाश्रितः॥ ४३ | आ रहे हो? तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने पहले पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर तपका आश्रय ले मेरी आराधना |
| ततस्त्वां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम्।<br>उक्तवानहमात्मस्थं महर्षिममितौजसम्॥ ४४ | की थी और उस घोर तपस्याके परिणामस्वरूप तुम्हारे-जैसे अमित ओजस्वी पुत्रका वरदान माँगा था, तब मैंने उन आत्मज्ञानमें लीन एवं अमित पराक्रमी महर्षिको वरदान दिया था। अन्यथा तुम्हारे अतिरिक्त पञ्चभूतात्मक |
| कः समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः।<br>द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगवर्त्मना॥ ४५ | शरीरधारीका पुत्र दूसरा कौन है, जो एकार्णवके जलमें योगमार्गका आश्रय लेकर क्रीडा करते हुए मुझे देखनेका |
| ततः प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः॥ ४६ | साहस कर सकता है? यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये। तब वे लोकपूजित दीर्घायु मुनि मस्तकपर |
| नामगोत्रे ततः प्रोच्य दीर्घायुर्लोकपूजितः।<br>तस्मै भगवते भक्त्या नमस्कारमथाकरोत्॥ ४७ | हाथ जोड़कर नाम और गोत्रका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक उन भगवान्‌को नमस्कार करते हुए बोले॥ ४२-४७॥ |
| मार्कण्डेय उवाच | **मार्कण्डेयजीने कहा—**अनघ! मैं आपकी इस |
| इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ।<br>यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्॥ ४८ | मायाको तत्त्वपूर्वक जानना चाहता हूँ, जो आप बालकका रूप धारण करके इस एकार्णवके जलके मध्यमें स्थित होकर शयन करते हैं। ऐश्वर्यशाली प्रभो! आप लोकमें |
| किं संज्ञश्चैव भगवाँल्लोके विज्ञायसे प्रभो।<br>तर्कये त्वां महात्मानं को ह्यन्यः स्थातुमर्हति॥ ४९ | किस नामसे विख्यात होते हैं? मैं आपको एक महान् आत्मबल-सम्पन्न पुरुष मानता हूँ, अन्यथा दूसरा कौन इस प्रकार स्थित रह सकता है॥ ४८-४९॥ |
| श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! मैं सभी प्राणियोंको |
| अहं नारायणो ब्रह्मन् सर्वभूः सर्वनाशनः।<br>अहं सहस्त्रशीर्षाख्यैः पदैरभिसंज्ञितः॥ ५० | उत्पन्न करनेवाला तथा सबका विनाशक नारायण हूँ। जो सहस्रशीर्ष आदि नामोंसे अभिहित होता है, वह मैं ही |
| आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मखः।<br>अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः॥ ५१ | हूँ। मैं ही आदित्यवर्ण पुरुष और यज्ञमें ब्रह्ममय यज्ञ हूँ। मैं ही हव्यको वहन करनेवाला अग्नि और जल-जन्तुओंका अविनाशी स्वामी हूँ। इन्द्रपदपर स्थित रहनेवाला |
| अहमिन्द्रपदे शक्रो वर्षाणां परिवत्सरः।<br>अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्त एव च॥ ५२ | इन्द्र तथा वर्षोंमें परिवत्सर मैं हूँ। मैं ही योगी, युग नामसे प्रसिद्ध और युगोंका अन्त करनेवाला हूँ। समस्त |
| अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि तु।<br>भुजङ्गानामहं शेषस्तार्क्ष्यो वै सर्वपक्षिणाम्॥ ५३ | प्राणी और सम्पूर्ण देवता मेरे ही स्वरूप हैं। मैं सर्पोंमें शेषनाग और सम्पूर्ण पक्षियोंमें गरुड हूँ। मैं सभी प्राणियोंका |
| कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंज्ञितः।<br>अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम्॥ ५४ | अन्त करनेवाला तथा लोकोंका काल हूँ। चारों आश्रमोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंका धर्म और तप मैं ही हूँ। मैं |
| अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः।<br>यत्तत्सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः॥ ५५ | दिव्य नदी गङ्गा और दुग्धरूपी जलसे भरा हुआ महासागर हूँ। जो परम सत्य है, वह मैं हूँ। मैं ही एकमात्र प्रजापति हूँ। |

६९६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमं पदम्।<br>अहमिज्याक्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः॥ ५६<br>अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।<br>अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश॥ ५७<br>अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः।<br>क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे वडवामुखः॥ ५८मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही वह परमपद हूँ। मैं ही यज्ञकी क्रिया और मैं ही विद्याका अधिपति कहलाता हूँ। मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही पृथ्वी, मैं ही आकाश, मैं ही जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हूँ। मैं ही वर्ष, मैं ही चन्द्रमा, मैं ही बादल तथा मैं ही रवि हूँ। क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं ही समुद्रमें बडवाग्नि हूँ॥ ५०—५८॥
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिबंस्तोयमयं हविः।<br>अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम्॥ ५९<br>अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः।<br>यत्किञ्चित् पश्यसे विप्र यच्छृणोषि च किञ्चन॥ ६०<br>यल्लोके चानुभवसि तत्सर्वं मामनुस्मर।<br>विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृज्यं चाद्यापि पश्य माम्॥ ६१<br>युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत्।<br>तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय॥ ६२<br>शुश्रूषर्मम धर्मांश्च कुक्षौ चर सुखं मम।<br>मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह॥ ६३<br>व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विषम्।<br>अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव तारकः॥ ६४<br>परस्त्रिवर्गादोंकारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ।<br>एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः॥ ६५<br>वक्त्रमाहूतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः।<br>स तस्मिन् सुखमेकान्ते शुश्रूषुर्हसमव्ययम्॥ ६६<br>योऽहमेव विविधतनुं परिश्रितो<br>महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे।<br>शनैश्चरन् प्रभुरपि हंससंज्ञितो-<br>ऽसृजज्जगद्विरहितकालपर्यये॥ ६७मैं ही संवर्तक अग्नि बनकर जलरूप हविका पान करता हूँ। जैसे मैं पुराण-पुरुष हूँ, उसी प्रकार मैं सबके लिये आश्रयदाता भी हूँ। भूत, भविष्य और वर्तमानका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ। विप्रवर! तुम जो कुछ देख रहे हो, जो कुछ सुन रहे हो और लोकमें जिसका अनुभव कर रहे हो, उस सबमें मेरा ही स्मरण करो। मार्कण्डेय! पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और इस समय भी सृष्टिकर्ता मुझे ही समझो। मार्कण्डेय! प्रत्येक युगमें मैं ही सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करता हूँ, अतः तुम इन सबका रहस्य इस प्रकार जानो। यदि तुम मेरे धर्मोंको सुनना चाहते हो तो मेरी कुक्षिमें प्रवेश करके सुखपूर्वक विचरण करो। देवताओं और ऋषियोंके साथ ब्रह्मा मेरे शरीरमें ही विद्यमान हैं। मुझे ही व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) योगवाला तथा असुरोंका शत्रु समझो। मैं ही एक अक्षर तथा तीन अक्षरोंवाला तारक मन्त्र हूँ। त्रिवर्गसे परे तथा त्रिवर्गके अभिप्रायको निर्दिष्ट करनेवाला ओंकार मैं ही हूँ। आदि पुराणेश महाबुद्धिमान् भगवान् इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्होंने शीघ्र ही महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें समेट लिया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय भगवान्‌की कुक्षिमें प्रविष्ट हो गये और उस एकान्त स्थानमें अविनाशी हंसधर्मको सुननेकी इच्छासे सुखपूर्वक विचरण करने लगे। (इतनेमें ही ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ी—) मैं ही वह हूँ, जो चन्द्रमा और सूर्यसे रहित महार्णवके जलमें विविध शरीर धारण कर समर्थ होते हुए भी शनैः-शनैः विचरण करता हूँ और हंस नामसे पुकारा जाता हूँ तथा काल-परिवर्तनके समाप्त होनेपर पुनः जगत्‌की सृष्टि करता हूँ॥ ५९—६७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६७॥

* अध्याय १६८ * ६९७


एक सौ अड़सठवाँ अध्याय

पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
आपवः स विभुर्भूत्वा चारयामास वै तपः।<br>छादयित्वाऽऽत्मनो देहं यादसां कुलसम्भवम्॥ १राजन्! तदनन्तर वे सर्वव्यापी नारायण जल-जन्तुओंके कुलमें उत्पन्न अपने शरीरको छिपाकर जलमें निवास करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। कुछ समयके पश्चात् उन महाबली
ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने।<br>महतां पञ्चभूतानां विश्वो विश्वमचिन्तयत्॥ २महात्माने जगत्की सृष्टि करनेका विचार किया। तब उन विश्वात्माने पञ्चमहाभूतोंकी समष्टिरूप विश्वका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय महासागर वायुरहित
तस्य चिन्तयमानस्य निर्वाते संस्थितेऽर्णवे।<br>निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे॥ ३होनेके कारण शान्त था। आकाशका विनाश हो गया था, सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त था, उसके गह्वरमें सूक्ष्म जगत् विद्यमान था, उस समय जलके मध्यमें स्थित
ईषत् संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिलाश्रयः।<br>अनन्तरोर्मिभिः सूक्ष्ममथ छिद्रमभूत् पुरा॥ ४नारायणने उस एकार्णवको थोड़ा संक्षुब्ध कर दिया। तदनन्तर उससे उठी हुई लहरोंसे सर्वप्रथम सूक्ष्म छिद्र प्रकट हुआ। छिद्रसे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ।
शब्दं प्रति तदोद्भूतो मारुतश्छिद्रसम्भवः।<br>स लब्ध्वान्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः॥ ५उस छिद्राकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई। वह दुर्धर्ष पवन अवसर पाकर वृद्धिको प्राप्त हुआ। तब वेगपूर्वक बढ़ते हुए उस बलवान् पवनने महासागरको विक्षुब्ध कर दिया।
विवर्धता बलवता वेगाद् विक्षोभितोऽर्णवः।<br>तस्यार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नम्भसि मन्थिते।<br>कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरो महान्॥ ६उस क्षुब्ध हुए महासागरके जलके मथित होनेपर महान् प्रभावशाली कृष्णवर्त्मा वैश्वानर (अग्नि) प्रकट हुए। तब उस अग्निने अधिकांश जलको सोख लिया। समुद्र-
ततः स शोषयामास पावकः सलिलं बहु।<br>क्षयाज्जलनिधेश्चिद्रमभवद्विस्तृतं नभः॥ ७जलके संकुचित हो जानेसे वह छिद्र विस्तृत आकाशके रूपमें परिणत हो गया। इस प्रकार अपने तेजसे उत्पन्न
आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः।<br>आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः॥ ८हुए एवं अमृत-रसके समान स्वादिष्ट पुण्यमय जल, छिद्रसे उत्पन्न हुए आकाश, आकाशसे प्रकट हुए पवन
आभ्यां सङ्घर्षणोद्भूतं पावकं वायुसम्भवम्।<br>दृष्ट्वा प्रीतो महादेवो महाभूतविभावनः॥ ९तथा आकाश और पवनके संघर्षसे उद्भूत हुए वायुजनित अग्निको देखकर महाभूतोंको उत्पन्न करनेवाले वे महान् देव प्रसन्न हो गये। तब विविध रूप धारण करनेवाले
दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणो जन्मसहितं बहुरूपो व्यचिन्तयत्॥ १०भगवान् उन महाभूतोंको उपस्थित देखकर लोककी सृष्टिके लिये ब्रह्माके जन्मसहित अन्यान्य उत्तम साधनोंके विषयमें विशेषरूपसे विचार करने लगे॥ १—१०॥
चतुर्युगाभिसंख्याते सहस्रयुगपर्यये।<br>बहुजन्मविशुद्धात्मा ब्रह्मणोह निरुच्यते॥ ११इस प्रकार चारों युगोंकी संख्यासे युक्त एक हजार युग बीत जानेपर बारम्बार जन्म लेनेपर भी जिसका आत्मा विशुद्ध होता है, उसे ब्रह्मा कहा जाता है।
यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।<br>ज्ञानं दृष्टं तु विश्वार्थे योगिनां याति मुख्यताम्॥ १२योगवेत्ता भगवान् भूतलपर जिसे तपस्यासे पवित्र आत्मावाले महर्षियोंके ज्ञान और योगियोंकी मुख्यतासे युक्त देखते

६९८ * मत्स्यपुराण *


तं योगवन्तं विज्ञाय सम्पूर्णैश्वर्यमुत्तमम्।<br>पदे ब्रह्माणि विश्वेशं न्ययोजयत योगवित्॥ १३<br><br>ततस्तस्मिन् महातोये महीशो हरिरच्युतः।<br>स्वयं क्रीडंश्च विधिवन्मोदते सर्वलोककृत्॥ १४<br><br>पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा।<br>सहस्रपर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥ १५<br><br>हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभ-<br>मुपस्थितं शरदमलार्कतेजसम्।<br>विराजते कमलमुदारवर्चसं<br>ममात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १६ ॥हैं, उसे योगसम्पन्न सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्योंसे युक्त और विश्वके शासनकी क्षमतासे पूर्ण जानकर ब्रह्माके पदपर नियुक्त कर देते हैं। तत्पश्चात् जो सम्पूर्ण लोकोंके रचयिता, पृथ्वीके स्वामी और अपनी महिमासे कभी भी च्युत होनेवाले नहीं हैं, वे श्रीहरि उस महार्णवके जलमें स्वयं विधिपूर्वक क्रीडा करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। उस समय वे अपनी नाभिसे एक कमल उत्पन्न करते हैं। उस स्वर्णमय कमलमें एक हजार पत्ते होते हैं। वह परागरहित और सूर्यके समान कान्तिमान् होता है। उस समय अग्निकी जलती हुई शिखाओंकी उज्ज्वल कान्तिके समान देदीप्यमान, शरत्कालीन निर्मल सूर्यके सदृश तेजस्वी, भगवान्‌की रोमावलि-सरीखे परम दर्शनीय तथा उत्तम कान्तिमान् उस प्रकट हुए कमलकी विशेष शोभा होती है॥११—१६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पद्मोद्भवो नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥१६८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसंगमें पद्मोद्भव नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१६८॥


एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय

नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन

मत्स्य उवाच<br>अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद् भूरितेजसम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्॥ १<br>यस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते।<br>सर्वतेजोगुणमयं पार्थिवैर्लक्षणैर्वृतम्॥ २<br>तच्च पद्मं पुराणज्ञाः पृथिवीरूपमुत्तमम्।<br>नारायणसमुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ ३<br>या पद्मा सा रसा देवी पृथिवी परिचक्ष्यते।<br>ये पद्मसारगुरवस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः॥ ४<br>हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च।<br>कैलासं मुञ्जवन्तं च तथान्यं गन्धमादनम्॥ ५<br>पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च।<br>उदयं पिञ्जरं चैव विन्ध्यवन्तं च पर्वतम्॥ ६<br>एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम्।<br>आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः॥ ७मत्स्यभगवान्ने कहा—राजर्षे ! तदनन्तर नारायणने अनेकों योजन विस्तारवाले उस स्वर्णमय कमलमें सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाले ब्रह्माको उत्पन्न किया। वे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम तेजस्वी, सब ओर मुखवाले, सभी तेजोमय गुणोंसे युक्त और राजलक्षणोंसे सुशोभित थे। पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण उस कमलको नारायणसे उत्पन्न हुआ उत्तम पृथ्वीरूप बतलाते हैं। जो पद्मा है, वही रसा नामसे विख्यात पृथ्वीदेवी कही जाती है और जो कमलके सार-तत्त्वसे युक्त होनेके कारण भारी अंश हैं, उन्हें दिव्य पर्वत कहा जाता है। इस प्रकार जो हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान् तथा दूसरा गन्धमादन, पुण्यमय त्रिशिखर, रमणीय मन्दर, उदयाचल, पिञ्जर तथा विन्ध्यवान् पर्वत हैं—ये सभी देवगणों, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके निवासस्थान तथा समस्त कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले हैं।