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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१४- अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार
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५० * मत्स्यपुराण *
बारहवाँ अध्याय
इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः।<br>इक्ष्वाकुप्रमुखा जग्मुस्तदा शरवणान्तिकम्॥ १<br><br>ततस्ते ददृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।<br>रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम् ॥ २<br><br>पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः।<br>अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजी तस्य महात्मनः॥ ३<br><br>अगमद् वडवारूपमुत्तमं केन हेतुना।<br>ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्॥ ४<br><br>किमित्येतदभूच्चित्रं वद योगविदां वर।<br>वसिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं दृष्ट्वा तद् ध्यानचक्षुषा॥ ५<br><br>समयः शम्भुदयिताकृतः शरवणे पुरा।<br>यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति॥ ६<br><br>अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद् राज्ञा सहैव तु।<br>पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः॥ ७<br><br>तथैव यत्नः कर्तव्यश्चाराध्यैव पिनाकिनम्।<br>ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः॥ ८<br><br>तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किंतु साम्प्रतम्॥ ९<br><br>इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत् फलं स्यात् तदावयोः।<br>दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्॥ १०<br><br>तथेत्युक्तास्ततस्ते तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः।<br>इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्॥ ११ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (बहुत दिनोंतक राजा इलके राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर) उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्न)-का अन्वेषण करते हुए उसी शरवणके निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभागमें खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ीको देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीनकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। तत्पश्चात् जीनको पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये (और परस्पर कहने लगे—) 'अरे! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इलका चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है! किस कारण यह सुन्दर घोड़ीके रूपमें परिणत हो गया!' तब वे सभी लौटकर अपने कुल-पुरोहित महर्षि वसिष्ठके पास जाकर पूछने लगे—'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई? इसका रहस्य हमें बताइये।' तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टिद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर इक्ष्वाकु आदिसे बोले—'राजपुत्रो! पूर्वकालमें शम्भु-पत्नी उमाने इस शरवणके विषयमें ऐसा समय (शर्त) निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवणमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री-रूपमें परिवर्तित हो जायगा।' इसी कारण राजा इलके साथ-ही-साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्वको प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेरकी भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगोंको पिनाकधारी शंकरकी आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठकी आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वरका स्तवन किया। (उस स्तवनसे प्रसन्न होकर) पार्वती और परमेश्वरने कहा—'राजकुमारो! यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, तथापि इस समय उसके निवारणके लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकुद्वारा किये गये अश्वमेध-यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा-का-सारा हम दोनोंको समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर) हो जायेंगे।' यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'—यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानीको लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकुने अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य-फल पार्वती-परमेश्वरको अर्पित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष हो गये। |
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* अध्याय १२ * ५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मासमेकं पुमान् वीरः स्त्री च मासम्भूत् पुनः ।<br>बुधस्य भवने तिष्ठन्त्रिली गर्भधरोऽभवत् ॥ १२ ॥<br>अजीजनत् पुत्रमेकमनेकगुणसंयुतम् ।<br>बुधश्रोत्पाद्य तं पुत्रं स्वर्लोकमगमत् ततः ॥ १३ ॥ | वहाँ वे वीरवर एक मास पुरुषरूपमें रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुधके भवनमें स्त्रीरूपसे रहते समय इलने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भसे अनेक गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको उत्पन्नकर बुध भूलोकसे पुनः स्वर्गलोकको चले गये॥ १—१३ ॥ |
| इलस्य नाम्ना तद् वर्षमिलावृतमभूत्तदा ।<br>सोमार्कवंशयोरादाविलोऽभून्मनुनन्दनः ॥ १४ ॥<br>एवं पुरूरवाः पुंसोरभवद् वंशवर्धनः ।<br>इक्ष्वाकुरर्कवंशस्य तथैवोक्तस्तपोधनाः ॥ १५ ॥<br>इलः किम्पुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते ।<br>पुनः पुत्रत्रयमभूत् सुद्युम्नस्यापराजितम् ॥ १६ ॥<br>उत्कलो वै गयस्तद्वद्धरिताश्वश्च वीर्यवान् ।<br>उत्कलस्योत्कला नाम गयस्य तु गया मता ॥ १७ ॥<br>हरिताश्वस्य दिक्पूर्वा विश्रुता कुरुभिः सह ।<br>प्रतिष्ठानेऽभिषिच्याथ स पुरूरवसं सुतम् ॥ १८ ॥<br>जगामेलावृतं भोक्तुं वर्षं दिव्यफलाशनम् ।<br>इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान् ॥ १९ ॥<br>नरिष्यन्तस्य पुत्रोऽभूच्छुचो नाम महाबलः ।<br>नाभागस्याम्बरीषस्तु धृष्टस्य च सुतत्रयम् ॥ २० ॥<br>धृष्टकेतुश्चित्रनाथो रणधृष्टश्च वीर्यवान् ।<br>आनर्त्तो नाम शर्यातेः सुकन्या चैव दारिका ॥ २१ ॥<br>आनर्त्तस्याभवत् पुत्रो रोचमानः प्रतापवान् ।<br>आनर्त्तो नाम देशोऽभून्नगरी च कुशस्थली ॥ २२ ॥<br>रोचमानस्य पुत्रोऽभूद् रेवो रैवत एव च ।<br>ककुद्मी चापरं नाम ज्येष्ठः पुत्रशतस्य च ॥ २३ ॥<br>रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्य विश्रुता ।<br>करूषस्य तु कारूषा बहवः प्रथिता भुवि ॥ २४ ॥<br>पृषध्रो गोवधाच्छूद्रो गुरुशापादजायत । | तभीसे इलके नामपर उस वर्षका नाम इलावृत पड़ गया। इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंशके आदिमें सर्वप्रथम मनु-नन्दन इल ही राजा हुए थे। तपोधन ऋषियो! जैसे इलकी पुरुषावस्थामें उत्पन्न हुए राजा पुरूरवा चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, वैसे ही महाराज इक्ष्वाकु सूर्य-वंशके विस्तारक कहे गये हैं। किम्पुरुषयोनिमें रहते समय इल सुद्युम्न नामसे कहे जाते थे। उन सुद्युम्नके पुनः उत्कल, गय और पराक्रमी हरिताश्व नामक तीन अपराजेय पुत्र उत्पन्न हुए थे। इलने (अपने इन चारों पुत्रोंमेंसे) उत्कलको उत्कल (उड़िसा), गयको गयाप्रदेश और हरिताश्वको कुरुप्रदेशकी सीमावर्तिनी पूर्व दिशाका प्रदेश (राज्य) समर्पित किया। तत्पश्चात् अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरूरवाका प्रतिष्ठानपुरमें अभिषेक करके वे स्वयं दिव्य फलाहारका उपभोग करनेके लिये इलावृतवर्षमें चले गये। (सुद्युम्नके बाद) मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु मध्यदेशके अधिकारी हुए। (मनुके अन्य पुत्रोंमें) नरिष्यन्तके शुच नामक महाबली पुत्र हुआ। नाभागके अम्बरीष और धृष्टके धृष्टकेतु, चित्रनाथ और रणधृष्ट नामक तीन पराक्रमी पुत्र हुए। शर्यातिके आनर्त नामक एक पुत्र तथा सुकन्या नाम्नी एक पुत्री हुई। आनर्तके रोचमान नामका एक प्रतापी पुत्र हुआ। आनर्तद्वारा शासित देशका नाम आनर्त (गुजरात) पड़ा और कुशस्थली (द्वारका) नगरी उसकी राजधानी हुई। रोचमानका पुत्र रेव हुआ, जो रैवत और ककुद्मी नामसे भी पुकारा जाता था। वह रोचमानके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ था। उसके रेवती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो बलरामजीकी भार्यारूपसे विख्यात है। करूषके बहुत-से पुत्र थे, जो भूतलपर कारूष नामसे विख्यात हुए। पृषध्र गौकी हत्या कर देनेके कारण गुरुके शापसे शूद्र हो गया॥ १४—२४ १/२ ॥ |