मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१४८- तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुरसंग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन
| * अध्याय १४६ * | ५४१ |
|---|
| पतितं तत् सरिद्वरां ततस्तु शरकानने।<br>तस्मात्तु स समुद्भूतो गुहो दिनकरप्रभः॥ १०<br><br>स सप्तदिवसो बालो निजघ्ने तारकासुरम्।<br>एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तमूचुर्ऋषिसत्तमाः॥ ११ | और नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गामें जा गिरा। फिर वहाँ वह बहते हुए सरपतके वनमें जा लगा। उसीसे सूर्यके समान तेजस्वी गुह उत्पन्न हुए। उसी सात दिवसीय बालकने तारकासुरका वध किया। ऐसी अद्भुत बात सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषियोंने पुनः सूतजीसे प्रश्न किया॥५—११॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी।<br>विस्तरेण हि नो ब्रूहि याथातथ्येन शृण्वताम्॥ १२<br><br>वज्राङ्गो नाम दैत्येन्द्रः कस्य वंशोद्भवः पुरा।<br>यस्याभूत् तारकः पुत्रः सुरप्रमथनो बली॥ १३<br><br>निर्मितः को वधे चाभूत् तस्य दैत्येश्वरस्य तु।<br>गुहजन्म तु कार्त्स्न्येन अस्माकं ब्रूहि मानद॥ १४ | ऋषियोंने पूछा—सबको मान देनेवाले सूतजी! यह कथा तो अत्यन्त आश्चर्यसे परिपूर्ण, रमणीय और पापनाशिनी है। हमलोग इसे सुनना चाहते हैं, अतः आप हमलोगोंको इसे यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बतलाइये। पूर्वकालमें देवताओंका मान मर्दन करनेवाला महाबली तारक जिसका पुत्र था, वह दैत्यराज वज्राङ्ग किसके वंशमें उत्पन्न हुआ था? उस दैत्यराजके वधके लिये कौन-सा कारण निर्मित हुआ था? यह सब तथा गुहके जन्मकी कथा हमलोगोंको पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १२—१४॥ |
| सूत उवाच<br>मानसो ब्रह्मणः पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः।<br>षष्टिं सोऽजनयत् कन्या वीरिण्यामेव नः श्रुतम्॥ १५<br><br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १६<br><br>द्वे वै बाहुकपुत्राय द्वे वै चाङ्गिरसे तथा।<br>द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुतः प्रभुः॥ १७<br><br>अदितिर्दितिर्दिनुर्विश्वा हारिष्टा सुरसा तथा।<br>सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा॥ १८<br><br>कद्रूर्मुनिश्श्व लोकस्य मातरो गोषु मातरः।<br>तासां सकाशाल्लोकानां जङ्गमस्थावरात्मनाम्॥ १९<br><br>जन्म नानाप्रकाराणां ताभ्योऽन्ये देहिनः स्मृताः।<br>देवेन्द्रोपेन्द्रपूषाद्याः सर्वे तेऽदितिजा मताः॥ २०<br><br>दितेः सकाशाल्लोकास्तु हिरण्यकशिपादयाः।<br>दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः॥ २१ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ब्रह्माके मानस पुत्र प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न की थीं, ऐसा हमने सुना है। उन ब्रह्मपुत्र सामर्थ्यशाली दक्षने उन कन्याओंमेंसे दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बाहुक-पुत्रको, दो अङ्गिराको तथा दो विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दी थीं। अदिति, दिति, दनु, विश्वा, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि—ये तेरह लोकमाताएँ कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन्हींसे पशुओंकी भी उत्पत्ति हुई है। इन्हींसे स्थावर-जङ्गमस्वरूप नाना प्रकारके प्राणियोंका जन्म हुआ है। देवेन्द्र, उपेन्द्र और सूर्य आदि सभी देवता अदितिसे उत्पन्न माने जाते हैं। दितिके गर्भसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण उत्पन्न हुए। दनुके दानव |
५४२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पक्षिणो विनतापुत्रा गरुडप्रमुखाः स्मृताः।<br>नागाः कद्रूसुता ज्ञेयाः शेषाश्चान्येऽपि जन्तवः ॥ २२<br><br>त्रैलोक्यनाथं शक्रं तु सर्वामरगणप्रभुम्।<br>हिरण्यकशिपुश्चक्रे जित्वा राज्यं महाबलः ॥ २३<br><br>ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः।<br>निहता विष्णुना संख्ये शेषाश्चेन्द्रेण दानवाः ॥ २४<br><br>ततो निहतपुत्राभूत् दितिर्वरमयाचत।<br>भर्तारं कश्यपं देवं पुत्रमन्यं महाबलम् ॥ २५<br><br>समरे शक्रहन्तारं स तस्या अददात् प्रभुः ॥ २६<br><br>नियमे वर्त हे देवि सहस्रं शुचिमानसा।<br>वर्षाणां लप्स्यसे पुत्रमित्युक्ता सा तथाकरोत् ॥ २७<br><br>वर्तन्त्या नियमे तस्याः सहस्त्राक्षः समाहितः।<br>उपासामाचरत् तस्याः सा चैनमन्वमन्यत ॥ २८<br><br>दशवत्सरशेषस्य सहस्रस्य तदा दितिः।<br>उवाच शक्रं सुप्रीता वरदा तपसि स्थिता ॥ २९ | और गौ आदि पशु सुरभीके संतान हुए। गरुड आदि पक्षी विनताके पुत्र कहे जाते हैं। नागों तथा अन्य रेंगनेवाले जन्तुओंको कद्रूकी संतति समझना चाहिये। कुछ समय बाद हिरण्यकशिपु समस्त देवगणोंके स्वामी त्रिलोकीनाथ इन्द्रको जीतकर राज्य करने लगा। तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये तथा शेष दानवोंका इन्द्रने युद्धस्थलमें सफाया कर दिया। इस प्रकार जब दितिके सभी पुत्र मार डाले गये, तब उसने अपने पतिदेव महर्षि कश्यपसे युद्धमें इन्द्रका वध करनेवाले अन्य महाबली पुत्रकी याचना की। तब सामर्थ्यशाली कश्यपजीने उसे वर प्रदान करते हुए कहा—'देवि! तुम एक हजार वर्षतक पवित्र मनसे नियमका पालन करो तो तुम्हें वैसा पुत्र प्राप्त होगा।' पतिद्वारा ऐसा कही जानेपर वह नियममें तत्पर हो गयी। जिस समय वह नियममें संलग्न थी, उस समय सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उसके निकट आकर सावधानीपूर्वक उसकी सेवा करने लगे। यह देखकर उसने इन्द्रपर विश्वास कर लिया। जब एक सहस्र वर्षकी अवधिमें दस वर्ष शेष रह गये, तब तपस्यामें निरत वरदायिनी दिति परम प्रसन्न होकर इन्द्रसे बोली ॥ १५—२९ ॥ |
| दितिरुवाच<br><br>पुत्रोत्तीर्णव्रतां प्रायो विद्धि मां पाकशासन।<br>भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्धमिमां श्रियम् ॥ ३०<br><br>भुङ्क्ष्व वत्स यथाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम्।<br>इत्युक्त्वा निद्रयाऽऽविष्टा चरणाक्रान्तमूर्धजा ॥ ३१<br><br>स्वयं सुष्वप नियता भाविनोऽर्थस्य गौरवात्।<br>तत्तु रन्ध्रं समासाद्य जठरं पाकशासनः ॥ ३२<br><br>चकार सप्तधा गर्भं कुलिशेन तु देवराट्।<br>एकैकं तु पुनः खण्डं चकार मघवा ततः ॥ ३३ | **दितिने कहा—**पुत्र! अब तुम ऐसा समझो कि मैंने प्रायः अपने व्रतको पूर्ण कर लिया है। पाकशासन! (व्रतकी समाप्तिपर) तुम्हारे एक भाई उत्पन्न होगा। वत्स! उसके साथ तुम इस राजलक्ष्मी तथा निष्कण्टक त्रिलोकीके राज्यका इच्छानुसार उपभोग करना। ऐसा कहकर स्वयं दिति निद्राके वशीभूत हो सो गयी। उस समय भावी कार्यके गौरवके कारण वह अपने नियमसे च्युत हो गयी थी; क्योंकि (सोते समय) उसके खुले हुए बाल चरणोंसे दबे हुए थे। ऐसी त्रुटिपर अवसर पाकर देवराज इन्द्र दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् इन्द्रने क्रुद्ध होकर पुनः प्रत्येक टुकड़ेको काटकर |
| * अध्याय १४६ * | ५४३ |
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| सप्तधा सप्तधा कोपात्प्राबुध्यत ततो दितिः।<br>विबुध्योवाच मा शक्र घातयेथाः प्रजां मम॥ ३४<br><br>तच्छ्रुत्वा निर्गतः शक्रः स्थित्वा प्राञ्जलिरग्रतः।<br>उवाच वाक्यं संत्रस्तो मातुर्वै वदनेरितम्॥ ३५<br><br>शक्र उवाच<br><br>दिवास्वप्नपरा मातः पादाक्रान्तशिरोरुहा।<br>सप्तसप्तभिरेवातस्तव गर्भः कृतो मया॥ ३६<br><br>एकोनपञ्चाशत्कृता भागा वज्रेण ते सुताः।<br>दास्यामि तेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते॥ ३७<br><br>इत्युक्ता सा तदा देवी सैवमस्त्वित्यभाषत।<br>पुनश्च देवी भर्त्तारमुवाचासितलोचना॥ ३८<br><br>पुत्रं प्रजापते देहि शक्रजेतारमूर्जितम्।<br>यो नास्त्रशस्त्रैर्वध्यत्वं गच्छेत् त्रिदिववासिनाम्॥ ३९<br><br>इत्युक्तः स तथोवाच तां पत्नीमतिदुःखिताम्।<br>दशवर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे॥ ४०<br><br>वज्रसारमयैरङ्गैरच्छेद्यैरायसैर्दृढैः।<br>वज्राङ्गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले॥ ४१<br><br>सा तु लब्धवरा देवी जगाम तपसे वनम्।<br>दशवर्षसहस्राणि सा तपो घोरमाचरत्॥ ४२<br><br>तपसोऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम्।<br>पुत्रमप्रतिकर्माणमजेयं वज्रदुश्छिदम्॥ ४३<br><br>स जातमात्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः।<br>उवाच मातरं भक्त्या मातः किं करवाण्यहम्॥ ४४<br><br>तमुवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपं च सा।<br>बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक॥ ४५<br><br>तेषां त्वं प्रतिकर्तुं वै गच्छ शक्रवधाय च।<br>बाढमित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं बली॥ ४६ | सात-सात भागोंमें विभक्त कर दिया। इतनेमें ही दितिकी निद्रा भंग हो गयी। तब वह सचेत होकर बोली—'अरे इन्द्र! मेरी संततिका विनाश मत कर।' यह सुनकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और अपनी उस विमाताके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर डरते-डरते मन्द स्वरमें यह वचन बोले—॥ ३०—३५॥<br><br>**इन्द्रने कहा—**माँ! आप दिनमें सो रही थीं और आपके बाल पैरोंके नीचे दबे हुए थे, इस नियम-व्युतिके कारण मैंने आपके गर्भको सात भागोंमें, पुनः प्रत्येकको सात भागोंमें विभक्त कर दिया है। इस प्रकार मैंने आपके पुत्रोंको उनचास भागोंमें बाँट दिया है। अब मैं उन्हें देवताओंद्वारा पूजित स्वर्गलोकमें स्थान प्रदान करूँगा। तब ऐसा उत्तर पानेपर देवी दितिने कहा—'अच्छा, ऐसा ही हो।' तदनन्तर कजरारे नेत्रोंवाली दिति देवीने पुनः अपने पति महर्षि कश्यपसे याचना की—'प्रजापते! मुझे एक ऐसा ऊर्जस्वी पुत्र प्रदान कीजिये, जो इन्द्रको पराजित करनेमें समर्थ हो तथा स्वर्गवासी देवगण अपने शस्त्रास्त्रोंसे जिसका वध न कर सकें।' इस प्रकार कहे जानेपर महर्षि कश्यप अपनी उस अत्यन्त दुखिया पत्नीसे बोले—'पुत्रवत्सले! दस हजार वर्षतक तपस्या करनेके उपरान्त तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी। तुम्हारे गर्भसे वज्राङ्ग नामका पुत्र उत्पन्न होगा। उसके अङ्ग वज्रके सार-तत्त्वके समान सुदृढ़ और लौहनिर्मित शस्त्रास्त्रोंद्वारा अच्छेद्य होंगे।' इस प्रकार वरदान पाकर दिति देवी तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयीं। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षोतक घोर तप किया। तपस्या समाप्त होनेपर ऐश्वर्यवती दितिने एक ऐसे पुत्रको उत्पन्न किया, जो दुर्जय, अद्भुतकर्मा और अजेय था तथा जिसके अङ्ग वज्रद्वारा अच्छेद्य थे। वह जन्म लेते ही समस्त शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् हो गया। उसने भक्तिपूर्वक अपनी माता दितिसे कहा—'माँ! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' तब हर्षित हुई दितिने उस दैत्यराजसे कहा—'बेटा! इन्द्रने मेरे बहुत-से पुत्रोंको मार डाला है, अतः उनका बदला लेनेके लिये तुम जाओ और इन्द्रका वध करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा मातासे कहकर महाबली वज्राङ्ग स्वर्गलोकमें जा पहुँचा। |
५४४ * मत्स्यपुराण *
| बद्ध्वा ततः सहस्राक्षं पाशेनामोघवर्चसा।<br>मातुरन्तिकमागच्छद्व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा॥ ४७<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपाः।<br>आगतौ तत्र यत्रास्तां मातापुत्रावभीतवौ॥ ४८ | वहाँ उसने अपने अमोघवर्चस्वी पाशसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको बाँधकर माताके निकट लाकर उसी प्रकार खड़ा कर दिया, जैसे व्याघ्र छोटे-से मृगको पकड़ लेता है। इसी बीच ब्रह्मा और महातपस्वी महर्षि कश्यप—ये दोनों वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वे दोनों माता-पुत्र निर्भय हुए स्थित थे॥ ३६–४८॥ |
| दृष्ट्वा तु तमुवाचेदं ब्रह्मा कश्यप एव च।<br>मुञ्चैनं पुत्र देवेन्द्रं किमनेन प्रयोजनम्॥ ४९<br>अपमानो वधः प्रोक्तः पुत्र सम्भावितस्य च।<br>अस्मद्वाक्येन यो मुक्तो विद्धि तं मृतमेव च॥ ५०<br>परस्य गौरवन्मुक्तः शत्रूणां भारमावहेत्।<br>जीवन्नेव मृतो वत्स दिवसे दिवसे स तु॥ ५१<br>महतां वशमायाते वैरं नैवास्ति वैरिणि।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वज्राङ्गः प्रणतो वाक्यमब्रवीत्॥ ५२<br>न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता मया।<br>त्वं सुरासुरनाथो वै मम च प्रपितामहः॥ ५३<br>करिष्ये त्वद्वचो देव एष मुक्तः शतक्रतुः।<br>तपसे मे रतिर्देव निर्विघ्नं चैव मे भवेत्॥ ५४<br>त्वत्प्रसादेन भगवन्नित्युक्त्वा विरराम सः।<br>तस्मिंस्तूष्णीं स्थिते दैत्ये प्रोवाचेदं पितामहः॥ ५५ | वहाँ (इन्द्रको बँधा हुआ) देखकर ब्रह्मा और कश्यपने उस वज्राङ्गसे इस प्रकार कहा—'पुत्र! इन देवराजको छोड़ दे। इनको बाँधने अथवा मारनेसे तेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा? बेटा! सम्मानित पुरुषका अपमान ही उसकी मृत्युसे बढ़कर बतलाया गया है। हमलोगोंके कहनेसे जो बन्धनमुक्त हो रहा है, उसे तू मरा हुआ ही जान। वत्स! दूसरेके गौरवसे मुक्त हुआ मनुष्य शत्रुओंका भारवाही अर्थात् आभारी हो जाता है। उसे दिन-प्रतिदिन जीते हुए मृतक-तुल्य ही समझना चाहिये। शत्रुके वशमें आ जानेपर महान् पुरुषोंका शत्रुके प्रति वैरभाव नहीं रह जाता।' यह सुनकर वज्राङ्ग विनम्र होकर कहने लगा—'देव! इन्द्रको बाँधनेसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह तो मैंने माताकी आज्ञाका पालन किया है। आप तो देवताओं और असुरोंके स्वामी तथा मेरे प्रपितामह हैं, अतः मैं अवश्य आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। यह लीजिये, इन्द्र बन्धन-मुक्त हो गये। देव! मेरे मनमें तपस्या करनेके लिये बड़ी लालसा है। भगवन्! वह आपकी कृपासे निर्विघ्न पूरा हो जाय।' ऐसा कहकर वह चुप हो गया। तब उस दैत्यको चुपचाप सामने स्थित देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले—॥ ४९–५५॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— |
| तपस्त्वं क्रूरमापन्नो ह्यस्मच्छासनसंस्थितः।<br>अनया चित्तशुद्ध्या ते पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ ५६ | बेटा! (तूने) जो मेरी आज्ञाका पालन किया है, यही मानो तूने घोर तप कर लिया। इस चित्तशुद्धिसे तुझे अपने जन्मका फल प्राप्त हो गया। ऐसा |
| इत्युक्त्वा पद्मजः कन्यां ससर्जायतलोचनाम्।<br>तामस्मै प्रददौ देवः पत्न्यर्थं पद्मसंभवः॥ ५७<br>वराङ्गीति च नामास्याः कृत्वा यातः पितामहः।<br>वज्राङ्गोऽपि तया सार्धं जगाम तपसे वनम्॥ ५८ | कहकर पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने एक विशाल नेत्रोंवाली कन्याकी सृष्टि की और उसे वज्राङ्गको पत्नीरूपमें प्रदान कर दिया। पुनः उस कन्याका वराङ्गी नाम रखकर ब्रह्मा वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् वज्राङ्ग भी अपनी पत्नी वराङ्गीके साथ तपस्या करनेके लिये वनमें |
- अध्याय १४६ *
५४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऊर्ध्वबाहुः स दैत्येन्द्रोऽचरद्वब्दसहस्रकम्।<br>कालं कमलपत्राक्षः शुद्धबुद्धिर्महातपाः॥ ५९<br><br>तावच्चावाङ्मुखः कालं तावत्पञ्चाग्निमध्यगः।<br>निराहारो घोरतपास्तपोराशिरजायत॥ ६०<br><br>ततः सोऽन्तर्जले चक्रे कालं वर्षसहस्रकम्।<br>जलान्तरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाव्रता॥ ६१<br><br>तस्यैव तीरे सरसस्तप्स्यन्ती मौनमास्थिता।<br>निराहारा तपो घोरं प्रविवेश महाद्युतिः॥ ६२<br><br>तस्यां तपसि वर्तन्यामिन्द्रश्चक्रे विभीषिकाम्।<br>भूत्वा तु मर्कटस्तत्र तदाश्रमपदं महान्॥ ६३<br><br>चक्रे विलोलं निःशेषं तुम्बीघटकरण्डकम्।<br>ततस्तु मेषरूपेण कम्पं तस्याकरोन्महान्॥ ६४<br><br>ततो भुजङ्गरूपेण बध्वा च चरणद्वयम्।<br>अपाकर्षत् ततो दूरं भ्रमंस्तस्या महीमिमाम्॥ ६५<br><br>तपोबलाढ्या सा तस्य न वध्यत्वं जगाम ह।<br>ततो गोमायुरूपेण तस्यादूषयदाश्रमम्॥ ६६<br><br>ततस्तु मेघरूपेण तस्याः क्लेदयदाश्रमम्।<br>भीषिकाभिरनेकाभिस्तां क्लिश्नन् पाकशासनः॥ ६७<br><br>विरराम यदा नैवं वज्राङ्गमहिषी तदा।<br>शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापं दातुं व्यवस्थिता॥ ६८<br><br>स शापाभिमुखां दृष्ट्वा शैलः पुरुषविग्रहः।<br>उवाच तां वरारोहां वराङ्गीं भीरुचेतनः॥ ६९<br><br>नाहं वराङ्गने दुष्टः सेव्योऽहं सर्वदेहिनाम्।<br>विभ्रमं तु करोत्येष रुषितः पाकशासनः॥ ७० | चला गया। वहाँ महातपस्वी दैत्यराज वज्राङ्ग, जिसके नेत्र कमलदलके समान थे तथा जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी, एक हजार वर्षतक दोनों हाथ ऊपर उठाकर तपस्या करता रहा। पुनः उसने एक हजार वर्षतक नीचे मुख किये हुए तथा एक हजार वर्षतक पञ्चाग्निके बीचमें बैठकर घोर तपस्या की। उस समय उसने भोजनका परित्याग कर दिया था। इस प्रकार वह तपस्याकी राशि-जैसा हो गया था। तत्पश्चात् उसने एक हजार वर्षतक जलके भीतर बैठकर तप किया। जिस समय वह जलके भीतर प्रविष्ट होकर तप कर रहा था, उसी समय उसकी अत्यन्त सुन्दरी एवं महाव्रतपरायणा पत्नी वराङ्गी भी उसी सरोवरके तटपर मौन धारणकर तपस्या करती हुई घोर तपमें संलग्न हो गयी। उस समय वह निराहार ही रहती थी। उसके तपस्या करते समय (उसे तपसे डिगानेके निमित्त) इन्द्र तरह-तरहकी विभीषिकाएँ उत्पन्न करने लगे॥ ५६—६२ १/२ ॥<br><br>वे बन्दरका विशाल रूप धारणकर उसके आश्रमपर पहुँचे और वहाँकि सम्पूर्ण तुंबी, घट और पिटारी आदिको तितर-बितर कर दिया। फिर मेषरूपसे उसे भलीभाँति कँपाया। तत्पश्चात् सर्पका रूप बनाकर उसके दोनों चरणोंको अपने शरीरसे बाँधकर इस पृथ्वीपर घूमते हुए उसे दूरतक घसीटते रहे, किंतु वराङ्गी तपोबलसे सम्पन्न थीं, अतः इन्द्रद्वारा मारी न जा सकीं। तब इन्द्रने शृगालका रूप धारणकर उसके आश्रमको दूषित कर दिया। फिर उन्होंने बादल बनकर उसके आश्रमको भिगो दिया। इस प्रकार इन्द्र अनेकों प्रकारकी विभीषिकाओंको दिखाकर उसे कष्ट पहुँचाते रहे। जब इन्द्र इस प्रकारके कुकर्मसे विरत नहीं हुए, तब वज्राङ्गकी पटरानी वराङ्गी इसे पर्वतकी दुष्टता मानकर उसे शाप देनेके लिये उद्यत हो गयी। इस प्रकार उसे शाप देनेके लिये उद्यत देखकर पर्वतका हृदय भयभीत हो गया। तब उसने पुरुषका शरीर धारणकर उस सुन्दरी वराङ्गीसे कहा—'वराङ्गने ! मैं दुष्ट नहीं हूँ। मैं तो सभी देहधारियोंके लिये सेवनीय हूँ। यह सब उपद्रव तो ये क्रुद्ध हुए इन्द्र कर रहे हैं।' इसी बीच (जलके भीतर बैठकर तपस्या करते हुए वज्राङ्गका) |
| ५४६ | * मत्स्यपुराण * |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| एतस्मिन्नन्तरे जातः कालो वर्षसहस्रिकः।<br>तस्मिन् गते तु भगवान् काले कमलसम्भवः।<br>तुष्टः प्रोवाच वज्राङ्गं तमागम्य जलाशयम्॥ ७१ | एक हजार वर्ष पूरा हो गया। उस समयके पूर्ण हो जानेपर पद्मसम्भव भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न होकर उस जलाशयके तटपर आये और वज्राङ्गसे बोले॥ ६३—७१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br><br>ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन।<br>एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसां निधिः।<br>उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम्॥ ७२ | **ब्रह्माने कहा—**दितिनन्दन! उठो। मैं तुम्हें तुम्हारी सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ दे रहा हूँ। ऐसा कहे जानेपर तपोनिधि दैत्यराज वज्राङ्ग उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे इस प्रकार कहा॥ ७२॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br><br>आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाश्रयाः।<br>तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्॥ ७३<br>एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम्।<br>वज्राङ्गोऽपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः॥ ७४<br>आहारमिच्छन्भार्यां स्वां न ददर्शाश्रमे स्वके।<br>क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह॥ ७५<br>आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन् व्यलोकयत्।<br>रुदतीं तां प्रियां दीनां तनुप्रच्छादिताननाम्।<br>तां विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन्॥ ७६ | **वज्राङ्गने कहा—**देव! मेरे शरीरमें आसुर भावका संचार मत हो, मुझे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हो। तपस्यामें ही मेरी रति हो और मेरा यह शरीर वर्तमान रहे। 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने निवासस्थानको चले गये। वज्राङ्ग भी तपस्याके समाप्त हो जानेपर संयम-नियमसे निवृत्त हुआ। उस समय उसे भोजनकी इच्छा जाग्रत् हुई, परंतु उसे अपने आश्रममें अपनी पत्नी न दीख पड़ी। तब भूखसे पीड़ित हुआ वज्राङ्ग फल-मूल लानेके लिये उस पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ उसने अपनी प्रिय पत्नीको देखा, जो थोड़ा मुख ढके हुए दीनभावसे रुदन कर रही थी। उसे देखकर दैत्यराज वज्राङ्ग उसे सान्त्वना देते हुए बोला॥ ७३—७६॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br><br>केन तेऽपकृतं भीरु यमलोकं यियासुना।<br>कं वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि भामिनि॥ ७७ | **वज्राङ्गने कहा—**भीरु! यमलोकको जानेके लिये उद्यत किस व्यक्तिने तुम्हारा अपकार किया है? अथवा मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? भामिनि! तुम मुझे शीघ्र बतलाओ॥ ७७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें एक सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४६॥
| * अध्याय १४७ * | ५४७ |
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एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक
| Sanskrit Shloka | Hindi Commentary |
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| वराङ्गयुवाच<br>त्रासितास्म्यपविद्धास्मि ताडिता पीडितापि च।<br>रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः॥ १<br>दुःखपारमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता।<br>पुत्रं मे तारकं देहि दुःखशोकमहार्णवात्॥ २<br>एवमुक्तः स दैत्येन्द्रः कोपव्याकुललोचनः।<br>शक्तोऽपि देवराजस्य प्रतिकर्तुं महासुरः॥ ३<br>तपः कर्तुं पुनर्देत्यो व्यवस्यत महाबलः।<br>ज्ञात्वा तु तस्य संकल्पं ब्रह्मा क्रूरतरं पुनः॥ ४<br>आजगाम तदा तत्र यत्रासौ दितिनन्दनः।<br>उवाच तस्मै भगवान् प्रभुर्मधुरया गिरा॥ ५ | वराङ्गी बोली—'पतिदेव! क्रूर स्वभाववाले देवराज इन्द्रने मुझे एक अनाथ विधवाकी तरह बहुत प्रकारसे डराया है, अपमानित किया है, ताडना दी है और कष्ट पहुँचाया है। इसलिये दुःखका अन्त न देखकर मैं अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत हूँ। अतः मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये, जो मेरा इस दुःख एवं शोकरूप महासागरसे उद्धार करनेमें समर्थ हो। पत्नीद्वारा ऐसा कहे जानेपर दैत्यराज वज्राङ्गका हृदय क्रोधसे व्याकुल हो गया। यद्यपि महासुर वज्राङ्ग देवराज इन्द्रसे बदला चुकानेमें समर्थ था, तथापि उस महाबली दैत्यने पुनः तप करनेका ही निश्चय किया। तब सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा उसके उस क्रूरतर विचारको जानकर फिर जहाँ यह दिति-पुत्र वज्राङ्ग स्थित था वहाँ आ पहुँचे और उससे मधुर वाणीमें बोले— ॥ १–५ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किमर्थं पुत्र भूयस्त्वं नियमं क्रूरमिच्छसि।<br>आहाराभिमुखो दैत्य तन्मो ब्रूहि महाव्रत॥ ६<br>यावदब्दसहस्रेण निराहारस्य यत्फलम्।<br>क्षणेनैकेन तल्लभ्यं त्यक्त्वाऽऽहारमुपस्थितम्॥ ७<br>त्यागो ह्यप्राप्तकामानां कामेभ्यो न तथा गुरुः।<br>यथा प्राप्तं परित्यज्य कामं कमललोचन॥ ८<br>श्रुत्वैतद् ब्रह्मणो वाक्यं दैत्यः प्राञ्जलिरब्रवीत्।<br>चिन्तयंस्तपसा युक्तो हृदि ब्रह्ममुखेरितम्॥ ९ | **ब्रह्माजीने कहा—**बेटा! तुम तो तपसे निवृत्त हो भोजन करने जा रहे थे, फिर तुम पुनः कठोर नियममें किस कारणसे तत्पर होना चाहते हो ? महाव्रतधारी दैत्यराज ! वह कारण मुझे बतलाओ। कमललोचन ! एक हजार वर्षतक निराहार रहनेका जो फल होता है, वह सामने उपस्थित आहारका त्याग कर देनेसे क्षणमात्रमें ही प्राप्त हो जाता है; क्योंकि अप्राप्त मनोरथवालोंका त्याग उतना महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता, जितना प्राप्त कामनावालेका त्याग वरिष्ठ होता है। ब्रह्माकी ऐसी बात सुनकर तपस्वी दैत्यराज वज्राङ्ग उस ब्रह्मवाणीका हृदयमें विचार करते हुए हाथ जोड़कर बोला ॥ ६–९ ॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br>उत्थितेन मया दृष्टा समाधानात् त्वदाज्ञया।<br>महिषी भीषिता दीना रुदती शाखिनस्तले॥ १०<br>सा मयोक्ता तु तन्वङ्गी दूयमानेन चेतसा।<br>किमेवं वर्तसे भीरु वद त्वं किं चिकीर्षसि॥ ११<br>इत्युक्ता सा मया देव प्रोवाच स्खलिताक्षरम्।<br>वाक्यं वाचस्पते भीता तन्वङ्गी हेतुसंहितम्॥ १२ | **वज्राङ्गने कहा—**भगवन् ! आपकी आज्ञासे समाधिसे विरत होनेपर मैंने देखा कि मेरी पटरानी वराङ्गी एक वृक्षके नीचे बैठी हुई दीनभावसे भयभीत होकर रो रही है। यह देखकर मेरा मन दुःखी हो गया। तब मैंने उस सुन्दरीसे पूछा—'भीरु! तुम क्यों ऐसी दशामें पड़ गयी हो ? मुझे बतलाओ तो सही, तुम क्या करना चाहती हो ?' वाणीके अधीश्वर देव ! मेरे ऐसा पूछनेपर भयभीत हुई सुन्दरी वराङ्गीने लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कारण बतलाते हुए कहा |
५४८ * मत्स्यपुराण *
| त्रासितास्म्यपविद्धास्मि कर्षिता पीडितास्मि च।<br>रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः॥ १३<br>दुःखस्यान्तमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता।<br>पुत्रं मे तारकं देहि ह्यस्माद् दुःखमहार्णवात्॥ १४<br>एवमुक्तस्तु संक्षुब्धस्तस्याः पुत्रार्थमुद्यतः।<br>तपो घोरं करिष्यामि जयाय त्रिदिवौकसाम्॥ १५<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवः पद्मगर्भोद्भवस्तदा।<br>उवाच दैत्यराजानं प्रसन्नश्चतुराननः॥ १६ | है कि—'नाथ! देवराज इन्द्रने निर्दय होकर मुझे अनाथ नारीकी तरह अनेक प्रकारसे डराया, अपमानित किया, घसीटा है और कष्ट पहुँचाया है। दुःखका अन्त न देखकर मैं प्राण-त्याग करनेको उद्यत हो गयी हूँ। इसलिये मुझे इस दुःखरूपी महासागरसे उद्धार करनेवाला पुत्र प्रदान कीजिये।' उसके ऐसा कहनेपर मेरा मन संक्षुब्ध हो उठा है। इसलिये मैं उसे पुत्र प्रदान करनेके लिये उद्यत हो देवताओंपर विजय पानेके लिये घोर तप करूँगा। उसकी यह बात सुनकर पद्मसम्भव चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उस दैत्यराजसे बोले॥ १०—१६॥ |
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| ब्रह्मोवाच<br>अलं ते तपसा वत्स मा क्लेशे दुस्तरे विश।<br>पुत्रस्ते तारको नाम भविष्यति महाबलः॥ १७ | ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारी तपस्या पूरी हो चुकी है। अब तुम उस दुस्तर क्लेशपूर्ण कार्यमें मत प्रविष्ट होओ। तुम्हें तारक नामका ऐसा महाबली पुत्र प्राप्त होगा, |
| देवसीमन्तिनीनां तु धम्मिल्लस्य विमोक्षणः।<br>इत्युक्तो दैत्यनाथस्तु प्रणिपत्य पितामहम्॥ १८ | जो देवाङ्गनाओंके केशकलापको खोल देनेवाला होगा (अर्थात् उन्हें विधवाकी स्थितिमें ला देगा)। ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दैत्यराज |
| आगत्यानन्दयामास महिषीं हर्षिताननः।<br>तौ दम्पती कृतार्थौ तु जग्मतुः स्वाश्रमं मुदा॥ १९ | वज्राङ्गका मुख हर्षसे खिल उठा। तब वह ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणिपात करके अपनी पटरानी वराङ्गीके पास आया और उसने (पुत्र-प्राप्तिके वरदानकी बात बतलाकर) उसे आनन्दित किया। तत्पश्चात् दोनों पति-पत्नी कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। |
| वज्राङ्गेनाहितं गर्भं वराङ्गी वरवर्णिनी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं च दधारोदर एव हि॥ २० | समयानुसार वज्राङ्गद्वारा स्थापित किये गये गर्भको सुन्दरी वराङ्गी पूरे एक हजार वर्षोंतक अपने उदरमें ही धारण किये रही। |
| ततो वर्षसहस्रान्ते वराङ्गी सुषुवे सुतम्।<br>जायमाने तु दैत्येन्द्रे तस्मिँल्लोकभयङ्करे॥ २१ | एक हजार वर्ष पूरा होनेपर वराङ्गीने पुत्र उत्पन्न किया। उस लोकभयंकर दैत्येन्द्रके जन्म लेते ही |
| चचाल सकला पृथ्वी समुद्राश्च चकम्मिरे।<br>चेलुर्महीधराः सर्वे ववुर्वाताश्च भीषणाः॥ २२ | सारी पृथ्वी डगमगा उठी अर्थात् भूकम्प आ गया, समुद्रोंमें ज्वार-भाटा उठने लगा, सभी पर्वत विचलित हो उठे, भयानक झंझावात बहने लगा। |
| जेपुर्जप्यं मुनिवरा नेदुर्व्यालमृगा अपि।<br>चन्द्रसूर्यौ जहुः कान्तिं सनीहारा दिशोऽभवन्॥ २३ | श्रेष्ठ मुनिगण शान्त्यर्थ जप करने लगे, सर्प तथा वन्य पशु आदि भी उच्च स्वरसे शब्द करने लगे, चन्द्रमा और सूर्यकी कान्ति फीकी पड़ गयी तथा दिशाओंमें कुहासा छा गया। |
| जाते महासुरे तस्मिन् सर्वे चापि महासुराः।<br>आजग्मुर्हर्षितास्तत्र तथा चासुरयोषितः॥ २४ | द्विजवरो! उस महासुरके जन्म लेनेपर सभी प्रधान असुर हर्षसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे। |
* अध्याय १४८ * ५४९
| जगृहर्षसमाविष्टा ननृतुश्चासुराङ्गनाः।<br>ततो महोत्सवो जातो दानवानां द्विजोत्तमाः॥ २५<br>विषण्णमनसो देवाः समहेन्द्रास्तदाभवन्।<br>वराङ्गी स्वसुतं दृष्ट्वा हर्षेणापूरिता तदा॥ २६<br>बहु मेने न देवेन्द्रविजयं तु तदैव सा।<br>जातमात्रस्तु दैत्येन्द्रस्तारकश्चण्डविक्रमः॥ २७<br>अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैः कुजम्भमहिषादिभिः।<br>सर्वासुरमहाराज्ये पृथिवीतुलनक्षमैः॥ २८<br>स तु प्राप्य महाराज्यं तारको मुनिसत्तमाः।<br>उवाच दानवश्रेष्ठान् युक्तियुक्तमिदं वचः॥ २९ | उनके साथ राक्षसियाँ भी थीं। हर्षसे फूली हुई उन असुराङ्गनाओंमें कुछ तो नाचने लगीं और कुछ गाने लगीं। इस प्रकार वहाँ दानवोंका महोत्सव प्रारम्भ हो गया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवताओंका मन खिन्न हो गया। उधर वराङ्गी अपने पुत्रका मुख देखकर हर्षसे भर गयी। उसी समय वह देवराज इन्द्रकी विजयको तुच्छ मानने लगी। प्रचण्ड पराक्रमी दैत्यराज तारक जन्म लेते ही पृथ्वीको भी उठा लेनेमें समर्थ कुजम्भ और महिष आदि सभी प्रधान असुरोंद्वारा सम्पूर्ण असुरोंके सम्राट्पदपर अभिषिक्त कर दिया गया। मुनिवरो! तब उस महान् राज्यका अधिकार पाकर तारक उन दानवश्रेष्ठोंसे ऐसा युक्तिसंगत वचन बोला— ॥ १७—२९ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने तारकोत्पत्तिर्नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकासुरोपाख्यानमें तारकोत्पत्ति नामक एक सौ संतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४७॥
एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुर-संग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन
| तारक उवाच<br>शृणुध्वमसुराः सर्वे वाक्यं मम महाबलाः।<br>श्रेयसे क्रियतां बुद्धिः सर्वैः कृत्यस्य संविधौ॥ १ | **तारकने कहा—**महाबली असुरो! आपलोग ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनें। आप सभी लोगोंको इस कार्यकी तैयारीमें सर्वप्रथम अपने कल्याणके लिये विचार कर लेना चाहिये। |
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| वंशक्षयकरा देवाः सर्वेषामेव दानवाः।<br>अस्माकं जातिधर्मो वै विरूढं वैरमक्षयम्॥ २ | दानववृन्द! देवतालोग हम सभीके कुलका (सदा) संहार करते रहते हैं, इस कारण उनके साथ विरोध करना हमलोगोंका जातिगत धर्म है और उनके साथ हमारा (सदा) अक्षय वैर बँधा रहता है। |
| वयमद्य गमिष्यामः सुराणां निग्रहाय तु।<br>स्वबाहुबलमाश्रित्य सर्व एवमसंशयः॥ ३ | हम सभी लोग अपने बाहुबलका आश्रय लेकर आज ही उन देवताओंका दमन करनेके लिये चलेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है, |
| किंतु नातपसा युक्तो मन्येऽहं सुरसंगमम्।<br>अहमादौ करिष्यामि तपो घोरं दितेः सुताः॥ ४ | किंतु दिति-नन्दनो! तपोबलसे सम्पन्न हुए बिना मैं देवताओंके साथ लोहा लेना उचित नहीं समझता, अतः मैं पहले घोर तपस्या करूँगा, तत्पश्चात् हमलोग |