मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन
४४६ * मत्स्यपुराण *
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| ताराग्रहाणां वक्ष्यामि स्वर्भानोस्तु रथं पुनः।<br>अथ तेजोमयः शुभ्रः सोमपुत्रस्य वै रथः॥ १ | ऋषियो! अब मैं (ग्रहकक्षानुसार बुधादि) ग्रहों, नक्षत्रों और राहुके रथका वर्णन कर रहा हूँ। सोमपुत्र बुधका रथ उज्ज्वल एवं तेजोमय है। उसमें वायुके समान वेगशाली पीले रंगके दस घोड़े जोते जाते हैं। उनके नाम हैं—श्वेत, पिशङ्ग, सारङ्ग, नील, पीत, विलोहित, कृष्ण, हरित, पृषत और पृश्नि। इन्हीं महान् भाग्यशाली, अनुपम एवं वायुसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे वह रथ युक्त है। इसके बाद मङ्गलका रथ सुवर्णनिर्मित बतलाया जाता है। वह रथके सम्पूर्ण आठों अङ्गोंसे संयुक्त है तथा लाल रंगवाले आठ घोड़ोंसे युक्त है। उसपर अग्निसे प्रकट हुआ ध्वज फहराता रहता है। उसपर सवार होकर किशोरावस्थाके मङ्गल कभी सीधी एवं कभी वक्र गतिसे विचरण करते हैं। अङ्गिराके पुत्र देवाचार्य विद्वान् बृहस्पति पीले रंगके तथा वायुके-से वेगशाली आठ दिव्य अश्वोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथपर चलते हैं। वे एक राशिपर एक वर्षतक रहते हैं, इसलिये इस रथके द्वारा स्वाधिष्ठित राशिकी दिशाकी ओर (दोनों गतियों)-से अपने वर्गसहित जाते हैं। शुक्र भी अपने वेगशाली रथपर आरूढ़ होकर भ्रमण करते हैं। उनके रथमें अग्निके समान रंगवाले आठ घोड़े जुते रहते हैं और वह ध्वजाओंसे सुशोभित रहता है। शनैश्चर अपने लोहनिर्मित रथपर सवार होकर चलते हैं। उसमें वायुतुल्य वेगशाली एवं बलवान् घोड़े जुते रहते हैं। राहुका रथ तमोमय है। उसे कवच आदिसे सुसज्जित वायुके समान वेगवाले काले रंगके आठ घोड़े खींचते हैं। सूर्यके भवनमें निवास करनेवाला वह राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पास चला जाता है और अमावास्या आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पाससे सूर्यके निकट लौट आता है। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान शीघ्रगामी आठ घोड़े जोते जाते हैं। उनके शरीरकी कान्ति पुआलके धुँएके सदृश है। वे दुबले-पतले शरीरवाले और बड़े भयंकर हैं। ये सभी वायुरूपी रस्सीसे ध्रुवके साथ सम्बद्ध हैं। इस प्रकार मैंने ग्रहोंके रथोंके साथ-साथ घोड़ोंका वर्णन कर दिया॥ १—१२॥ |
| युक्तो हयैः पिशङ्गैस्तु दशभिर्वातरंहसैः।<br>श्वेतः पिशङ्गः सारङ्गो नीलः पीतो विलोहितः॥ २ | |
| कृष्णश्च हरितश्चैव पृषतः पृश्निरैव च।<br>दशभिस्तु महाभागैरुत्तमैर्वातसम्भवैः॥ ३ | |
| ततो भौमरथश्चापि ह्यष्टाङ्गः काञ्चनः स्मृतः।<br>अष्टभिर्लोहितैरश्वैः सध्वजैरग्निसम्भवैः।<br>सर्प तेऽसौ कुमारो वै ऋजुवक्रानुवक्रगः॥ ४ | |
| अतश्चाङ्गिरसो विद्वान् देवाचार्यो बृहस्पतिः।<br>शोणैरश्वैश्च रौक्मेण स्यन्दनेन विसर्पति॥ ५ | |
| युक्तेनावाजिभिर्दिव्यैरष्टाभिर्वातरंहसैः ।<br>अब्दं वसति यो राशौ सवर्णस्तेन गच्छति॥ ६ | |
| युक्तेनाष्टाभिरश्वैश्च सध्वजैरग्निसंनिभैः।<br>रथेन क्षिप्रवेगेन भार्गवस्तेन गच्छति॥ ७ | |
| ततः शनैश्चरोऽप्यश्वैः सबलैर्वातरंहसैः।<br>कार्ष्णायसं समारुह्य स्यन्दनं यात्यसौ शनिः॥ ८ | |
| स्वर्भानोस्तु यथान्वाश्वाः कृष्णा वै वातरंहसः।<br>रथं तमोमयं तस्य वहन्ति स्म सुदर्शिताः॥ ९ | |
| आदित्यनिलयो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च तमसोऽन्तेषु पर्वसु॥ १० | |
| ततः केतुमतस्त्वश्वा अष्टौ ते वातरंहसः।<br>पलालधूमवर्णाभाः क्षामदेहाः सुदारुणाः॥ ११ | |
| एते वाहा ग्रहाणां वै मया प्रोक्ता रथैः सह।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते निबद्धा वातरश्मिभिः॥ १२ |
| * अध्याय १२७ * | ४४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एते वै भ्राम्यमाणास्ते यथायोगं वहन्ति वै।<br>वायव्याभिरदृश्याभिः प्रबद्धा वातरश्मिभिः॥ १३<br><br>परिभ्रमन्ति तद्बद्धाश्चन्द्रसूर्यग्रहा दिवि।<br>यावत्तमनुपर्यन्ति ध्रुवं वै ज्योतिषां गणः॥ १४<br><br>यथा नद्युदके नौस्तु उदकेन सहोह्यते।<br>तथा देवगृहाणि स्युरुह्यन्ते वातरंहसा।<br>तस्माद्यानि प्रगृह्यन्ते व्योम्नि देवगृहा इति॥ १५<br><br>यावन्त्यश्चैव ताराः स्युस्तावन्तोऽस्य मरीचयः।<br>सर्वा ध्रुवनिबद्धास्ता भ्रमन्त्यो भ्रामयन्ति च॥ १६<br><br>तैलपीडाकरं चक्रं भ्रमद् भ्रामयते यथा।<br>तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातबद्धानि सर्वशः॥ १७<br><br>अलातचक्रवद् यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्मात् प्रवहते तानि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ १८<br><br>एवं ध्रुवे नियुक्तोऽसौ भ्रमते ज्योतिषां गणः।<br>एष तारामयः प्रोक्तः शिशुमारे ध्रुवो दिवि॥ १९ | वायुरूपी अदृश्य रस्सियोंद्वारा बँधे हुए ये सभी अश्व भ्रमण करते हुए नियमानुसार उन रथोंको खींचते हैं। जिस प्रकार ध्रुवसे बँधे हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह गगनमण्डलमें परिभ्रमण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्योतिर्गण ध्रुवके पीछे-पीछे घूमता है। जिस प्रकार नदीके जलमें पड़ी हुई नौका जलके साथ बहती जाती है, उसी तरह देवताओंके गृह भी वायुके वेगसे वहन किये जाते हैं, इसीलिये वे आकाशमण्डलमें देव-गृह नामसे पुकारे जाते हैं। आकाशमण्डलमें जितनी तारकाएँ हैं, उतनी ही ध्रुवकी किरणें भी हैं। ये सभी तारकाएँ ध्रुवसे संलग्न हैं, इसलिये स्वयं घूमती हुई किरणें उन्हें भी घुमाती हैं। जैसे तेल पेरनेवाला चक्र (कोल्हू) स्वयं घूमता है और अपनेसे लगी हुई सभी वस्तुओंको घुमाता है, वैसे ही वायुरूपी रस्सीसे बँधी हुई ज्योतियाँ सब ओर भ्रमण करती हैं। वातचक्रसे प्रेरित होकर घूमती हुई वे ज्योतियाँ अलातचक्र (जलती हुई बनेठी)-की भाँति प्रतीत होती हैं। चूंकि वायु उन ज्योतियोंको वहन करता है, इसलिये वह 'प्रवह' नामसे प्रसिद्ध है। इस प्रकार ध्रुवसे बँधा हुआ यह ज्योतिश्चक्र भ्रमण करता है। इसी प्रकार गगनमण्डलमें स्थित शिशुमारचक्रमें ये ध्रुव तारामय अर्थात् ताराओंसे युक्त कहे जाते हैं। दिनमें जो पाप किया जाता है, वह रात्रिमें उस चक्रको देखनेसे नष्ट हो जाता है॥ १३-१९ १/२॥ |
| यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्ट्वा निशि मुञ्चति।<br>शिशुमारशरीरस्था यावत्यस्तारकास्तु ताः॥ २०<br><br>वर्षाणि दृष्ट्वा जीवेत तावदेवाधिकानि तु।<br>शिशुमाराकृतिं ज्ञात्वा प्रविभागेन सर्वशः॥ २१<br><br>उत्तानपादस्तस्याथ विज्ञेयः सोत्तरा हनुः।<br>यज्ञोऽधरस्तु विज्ञेयो धर्मो मूर्धानमाश्रितः॥ २२<br><br>हृदि नारायणः साध्या अश्विनौ पूर्वपादयोः।<br>वरुणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी॥ २३<br><br>शिश्रे संवत्सरो ज्ञेयो मित्रश्चापानमाश्रितः।<br>पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च मरीचिः कश्यपो ध्रुवः॥ २४ | शिशुमारचक्रके शरीरमें जितनी तारकाएँ स्थित हैं, उनका दर्शन कर तथा सर्वथा शिशुमारकी आकृतिको जानकर मनुष्य उतने ही अधिक वर्षोंतक जीवित रह सकता है। उत्तानपादको उस शिशुमारचक्रका ऊपरी जबड़ा तथा यज्ञको निचला जबड़ा समझना चाहिये। धर्म उसके मस्तकपर स्थित हैं। हृदयमें नारायण और साध्यगणोंको तथा अगले पैरोंमें अश्विनीकुमारोंको जानना चाहिये। वरुण और अर्यमा उसकी पिछली जाँघें हैं। शिश्न (जननेन्द्रिय)-के स्थानपर संवत्सरको समझिये और गुदास्थानपर मित्र स्थित हैं। उसकी पूँछमें अग्नि, महेन्द्र, मरीचि, कश्यप और ध्रुव स्थित हैं। |
| ४४८ | * मत्स्यपुराण * |
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| एष तारामयः स्तम्भो नास्तमेति न वोदयम्।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह ॥ २५<br>तन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूता दिवि स्थिताः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम् ॥ २६<br>परियान्ति सुरश्रेष्ठं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि।<br>आग्नीध्रकाश्यपानां तु तेषां स परमो ध्रुवः ॥ २७<br>एक एव भ्रमत्येष मेरोरन्तरमूर्धनि।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय आकर्षंस्तमधोमुखः ॥ २८<br>मेरुमालोकयन्नेव प्रतियाति प्रदक्षिणम् ॥ २९ | ताराओंद्वारा निर्मित यह स्तम्भ नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और तारागणोंके साथ न अस्त होता है न उदय, अपितु ये सभी आकाशमें चक्रकी तरह उसके मुखकी ओर देखते हुए स्थित हैं। ये ध्रुवसे अधिकृत होकर आकाशस्थित मेढ़ीभूत सुरश्रेष्ठ ध्रुवकी ही प्रदक्षिणा करते हैं। उन आग्नीध्र तथा कश्यपके वंशमें ध्रुव ही सर्वश्रेष्ठ हैं। ये ध्रुव अकेले ही मेरुके अन्तर्वर्ती शिखरपर ज्योतिष्चक्रको साथ लेकर उसे खींचते हुए भ्रमण करते हैं। उस समय उनका मुख नीचेकी ओर रहता है। इस प्रकार वे मेरुको प्रकाशित करते हुए उसकी प्रदक्षिणा करते हैं ॥ २०—२९ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ध्रुवप्रशंसा नाम सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें ध्रुव-प्रशंसा नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२७ ॥
एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| ऋषय ऊचुः <br><br> यदेतद् भवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः।<br>कथं देवगृहाणि स्युः कथं ज्योतींषि वर्णय ॥ १<br><br>सूत उवाच<br><br>एतत् सर्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>यथा देवगृहाणि स्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ॥ २<br>अग्रेर्वृष्टौ रजन्यां वै ब्रह्मणाव्यक्तयोनिना।<br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसाऽऽवृतम् ॥ ३<br>चतुर्भूतावशिष्टेऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते।<br>स्वयम्भूर्भगवान्वांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः ॥ ४<br>खद्योतरूपी विचरन्नाविर्भावं व्यचिन्तयत्।<br>ज्ञात्वाग्निं कल्पकालादावपः पृथ्वीं च संश्रिताः ॥ ५<br>स सम्भृत्य प्रकाशार्थं त्रिधा तुल्योऽभवत् पुनः।<br>पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते ॥ ६ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! आपने जो यह सारा विषय पूर्णरूपसे वर्णन किया है, उसे तो हमलोगोंंने सुना, परंतु देव-गृह कैसे होते हैं? (यह जाननेकी विशेष उत्कण्ठा हो रही है।) अतः आप पुनः (पूर्वकथित) ज्योतिष्चक्रका कुछ और विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥<br><br>सूतजी कहते हैं— ऋषियो! अब मैं जिस प्रकार देव-गृह एवं सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके गृह होते हैं तथा जैसी सूर्य और चन्द्रमाकी गति होती है, वह सब बतला रहा हूँ। (ब्रह्माकी) रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल अव्यक्तयोनि ब्रह्माने देखा कि जगत्की कोई वस्तु दीख नहीं रही है। सारा जगत् रात्रिके अन्धकारसे आच्छन्न है। (कहीं प्रकाशका चिह्नमात्र भी अवशेष नहीं है।) ब्रह्माद्वारा अधिष्ठित इस जगत्में केवल चार पदार्थ अवशिष्ट थे, तब लोकोंके तत्त्वार्थको सिद्ध करनेवाले स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा खद्योत (जुगनू)-के रूपमें विचरण करते हुए प्रकाशको आविर्भूत करनेके लिये विचार करने लगे। (उस समय उन्हें स्मरण हुआ कि) कल्पकालके आदिमें अग्नि-तत्त्व जल और पृथ्वीमें सम्मिलित हो गया था। यह जानकर उन्होंने तीनोंको एकत्र कर प्रकाश करनेके लिये तीन भागोंमें विभक्त कर दिया। इस प्रकार इस लोकमें जो पाचक नामक अग्नि है, |
| * अध्याय १२८ * | ४४९ |
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| यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निश्च स स्मृतः।<br>वैद्युतो जाठरः सौम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः॥ ७<br>तेजोभिश्चाप्यते कश्चित् कश्चिदेवाप्यनिन्धनः।<br>काष्ठेन्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः॥ ८<br>अर्चिष्मान्पचनोऽग्निस्तु निष्प्रभः सौम्यलक्षणः।<br>यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते॥ ९<br>प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे।<br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते॥ १० | उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं। जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है। उदरमें स्थित अग्नि विद्युत्से उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं। इस वैद्युताग्निका इन्धन जल है। कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है। काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मन्थ्य है। यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्वालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्निका प्रकाश अधिक होता है॥ २-१०॥ |
| उदिते तु पुनः सूर्ये ऊष्माग्नेस्तु समाविशत्।<br>पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् संतपते दिवा॥ ११<br>प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्नेये तु तेजसी।<br>परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥ १२<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यस्मिंस्तु दक्षिणे।<br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्ये रात्रिराविशते ह्यपः॥ १३<br>तस्मात् ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।<br>अस्तं गते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यपः॥ १४<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुराः।<br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे॥ १५<br>उदयास्तमये चात्र ह्यहोरात्रं विशत्यपः।<br>यश्चासौ तपते सूर्यः सोऽपः पिबति रश्मिभिः॥ १६<br>सहस्त्रपादस्त्वेषोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु सः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्त्रेण समन्ततः॥ १७<br>अपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च।<br>तस्य रश्मिसहस्त्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्रवः॥ १८ | पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निकी ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज—इन सबके परस्पर अनुप्रवेश करनेके कारण दिन-रातकी पूर्ति होती है। पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है। पुनः सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है। इसी कारण जल रातमें उज्ज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमशः जलमें प्रवेश करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं। सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाड़ियोंसे नदी, समुद्र, ह्रद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा और गरमीका प्रादुर्भाव होता है॥ ११-१८॥ |
| तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः। | उन सहस्रों किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाड़ियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें |
* प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका स्वरूपनिरूपण हुआ है।