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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा
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| ४३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम्।<br>तुषारवर्षं वर्षन्ति वृद्धा ह्यन्नविवृद्धये॥ १९<br>षष्ठः परिवहो नाम वायुस्तेषां परायणः।<br>योऽसौ बिभर्ति भगवान् गङ्गामाकाशगोचराम्॥ २०<br>दिव्यामृतजलां पुण्यां त्रिपथामिति विश्रुताम्।<br>तस्या विस्पन्दितं तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः॥ २१<br>शीकरान् सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः।<br>दक्षिणेन गिरेर्योऽसौ हेमकूट इति स्मृतः॥ २२<br>उदङ् हिमवतः शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे।<br>पुण्ड्रं नाम समाख्यातं नगरं तत्र वै स्मृतम्॥ २३<br>तस्मिन् प्रवर्तते वर्षं तत् तुषारसमुद्भवम्।<br>ततो हिमवतो वायुर्हिमं तत्र समुद्भवम्॥ २४<br>आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चमानो महागिरिम्।<br>हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टिशेषं ततः परम्॥ २५<br>इभास्ये च ततः पश्चादिदं भूतविवृद्धये।<br>वर्षद्वयं समाख्यातं सम्यग् वृष्टिविवृद्धये॥ २६<br>मेघाश्चाप्यायनं चैव सर्वमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>सूर्य एव तु वृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते॥ २७<br>वर्षं घर्मं हिमं रात्रिं संध्ये चैव दिनं तथा।<br>शुभाशुभफलानीह ध्रुवात् सर्वं प्रवर्तते॥ २८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चापः सूर्यो संगृह्य तिष्ठति।<br>सर्वभूतशरीरेषु त्वापो ह्यानुश्रिताश्च याः॥ २९<br>दह्यमानेषु तेष्वेह जङ्गमस्थावरेषु च।<br>धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्क्रमन्तीह सर्वशः॥ ३०<br>तेन चाभ्राणि जायन्ते स्थानमभ्रमयं स्मृतम्।<br>तेजोभिः सर्वलोकेभ्य आदत्ते रश्मिभिर्जलम्॥ ३१<br>समुद्राद् वायुसंयोगाद् वहन्त्यापो गभस्तयः।<br>ततस्त्वृतुवशात्काले परिवर्तन् दिवाकरः॥ ३२<br>नियच्छत्यापो मेघेभ्यः शुक्लाः शुक्लैस्तु रश्मिभिः।<br>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः॥ ३३<br>ततो वर्षति षण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये।<br>वायुभिः स्तनितं चैव विद्युतस्त्वग्निजाः स्मृताः॥ ३४ | है। पर्जन्य मेघ और चारों वृद्ध दिग्गज हेमन्त-ऋतुमें अन्नकी वृद्धिके लिये शीतसे उत्पन्न हुए तुषारकी वर्षा करते हैं। परिवह नामक छठी वायु इनका आश्रय है। यह ऐश्वर्यशाली पवन आकाशगामिनी गङ्गाको, जो दिव्य अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण, पुण्यमयी तथा त्रिपथगा नामसे विख्यात हैं, धारण करता है, गङ्गासे निकले हुए जलको दिग्गज अपने मोटे-मोटे शुण्डोंसे फुहारेके रूपमें छोड़ते हैं। उसे नीहार (कुहासा) कहते हैं। दक्षिण पार्श्वमें जो पर्वत है, वह हेमकूट नामसे प्रसिद्ध है। वह हिमालय पर्वतके उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंमें फैला हुआ है। वहाँ पुण्ड्र नामक एक प्रसिद्ध नगर है। उसी नगरमें वह तुषारसे उत्पन्न हुई वर्षा होती है। तदनन्तर हिमवान् पर्वतसे उद्भूत हुई वायु वहाँ उत्पन्न हुए शीकरों को अपने साथ ले आती है और बड़े वेगसे उस महान् गिरिको सींचती हुई उसका अतिक्रमण करके इभास्य नामक वर्षमें निकल जाती है। तत्पश्चात् प्राणियोंकी वृद्धिके लिये वहाँ शेष वृष्टि होती है। पहले जिन दो वर्षोंका वर्णन किया गया है, उनमें अच्छी तरह वृष्टि होती है। इस प्रकार मैंने मेघों तथा उनसे उत्पन्न हुई सारी वृष्टिका वर्णन कर दिया॥ १५—२६ १/२॥<br><br>सूर्य ही सब प्रकारकी वृष्टियोंके मूल कारण कहे जाते हैं। इस लोकमें वर्षा, धूप, हिम, रात्रि, दिन, दोनों संध्याएँ और शुभ एवं अशुभ कर्मोंके फल ध्रुवसे प्रवर्तित होते हैं। ध्रुवद्वारा अधिष्ठित जलको सूर्य ग्रहण करते हैं। जल सभी प्राणियोंके शरीरोंमें परमाणुरूपसे स्थित है। इसी कारण स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके शरीरोंके जलाये जानेपर उनमेंसे वह जल धुएँके रूपमें बाहर निकलता है। उसी धूमसे बादल बनते हैं, इसलिये धूमको अभ्रमय स्थान कहा जाता है। सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंद्वारा सभी लोक (स्थानों)-से जल ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार वे ही किरणें वायुके संयोगसे समुद्रसे भी जल खींचती हैं। तदनन्तर सूर्य ऋतुओंके अनुसार समय-समयपर जलको परिवर्तित कर अपनी श्वेत किरणोंद्वारा वह शुद्ध जल मेघोंको देते हैं। तब वायुद्वारा प्रेरित हुआ वह मेघस्थित जल वर्षके रूपमें भूतलपर गिरता है। इस प्रकार सूर्य सभी प्राणियोंकी समृद्धिके निमित्त छः महीनेतक वर्षा करते हैं। उस समय वायुके आघातसे मेघ-निर्घोष भी होता है। (बिजली भी चमकती है।) ये बिजलियाँ अग्निसे प्रादुर्भूत बतलायी जाती हैं। |
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* अध्याय १२५ * <span style="float: right;">४३९</span>
| मेहनाच्च मिहेर्धार्तोर्मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च।<br>न भ्रश्यन्ते ततो ह्यापस्तस्मादब्भ्रस्य वै स्थितिः।<br>स्रष्टासौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः॥ ३५<br><br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः।<br>ग्रहात्रिवृत्त्या सूर्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम्॥ ३६<br><br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठितम्।<br>अतः सूर्यरथस्यापि सन्निवेशं प्रचक्षते।<br>स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणाभिना॥ ३७ | 'मिह सेचने' अर्थात् 'मिह' धातु सेचन अथवा मेहनके अर्थमें प्रयुक्त होती है, इसलिये 'मिह'—धातुसे मेघ शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'अपो विभ्रति' या 'न भ्रश्यन्ते आपो यस्मात्' जिससे जल नहीं गिरते, उसे अब्भ्र या अभ्र कहते हैं। इस तरह ध्रुवद्वारा अधिकृत सूर्य वृष्टिसर्गकी सृष्टि करते हैं। पुनः ध्रुवद्वारा नियुक्त वायु उस वृष्टिका संहार करती है। नक्षत्रमण्डल सूर्यमण्डलसे निवृत्त होकर विचरण करता है और जब विचरण समाप्त हो जाता है, तब ध्रुवद्वारा अधिष्ठित सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है॥ २७—३६ १/२॥ |
| हिरण्मयेनाणुना वै अष्टचक्रैकनेमिना।<br>चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा॥ ३८<br><br>शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।<br>द्विगुणश्च रथो पस्थादीषादण्डः प्रमाणतः॥ ३९<br><br>स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो ह्यर्थवशेन तु।<br>असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पवनगैर्हयैः॥ ४०<br><br>छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यथाचक्रं समास्थितैः।<br>वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः॥ ४१<br><br>तेनासौ चरति व्योम्नि भास्वाननुदिनं दिवि।<br>अथाङ्गानि तु सूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य च।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम्॥ ४२<br><br>अहर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकचक्रस्य वै स्मृतः।<br>अराः संवत्सरास्तस्य नेम्यः षडृतवः स्मृताः॥ ४३<br><br>रात्रिर्रवरूथो घर्मश्च ध्वज ऊर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>अक्षकोट्योर्युगान्यस्य आर्तवाहाः कलाः स्मृताः॥ ४४<br><br>तस्य काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै।<br>निमेषश्चानुकर्षोऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता॥ ४५<br><br>युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थकामावुभौ स्मृतौ।<br>सप्ताश्वरूपपाश्छन्दांसि वहन्ते वायुरांहसा॥ ४६ | इसके बाद अब सूर्यके रथकी रचना बतलायी जाती है। उसमें एक पहिया, पाँच अरे (अरगजे) और तीन नाभियाँ हैं। उस चक्रकी नेमि (घेरे)-में स्वर्णमयी आठ छोटी-छोटी पुट्ठियाँ लगी हैं। ऐसे उद्दीप्त एवं शीघ्रगामी रथपर बैठकर सूर्य विचरण करते हैं। उस रथकी लम्बाई एक लाख योजन बतलायी जाती है। उसका ईषादण्ड (हरसा) रथके उपस्थ (मध्यभाग)-से प्रमाणमें दुगुना है। ब्रह्माने किसी मुख्य प्रयोजनवश उस रथका निर्माण किया था। उसका असङ्ग (वह रस्सी, जिससे घोड़े रथमें बँधे रहते हैं) दिव्य एवं स्वर्णमय है। उसमें पवनके समान शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। चक्रके अनुकूल चलनेवाले छन्द ही उन घोड़ोंके रूपमें उपस्थित होते हैं। वह रथ वरुणके रथके लक्षणोंसे मिलता-जुलता-सा है। उसी रथसे सूर्य प्रतिदिन गगन-मण्डलमें विचरते हैं। सूर्यके अङ्गों तथा रथके अवयवोंकी समतामें क्रमशः कल्पना की गयी है। दिनको सूर्यके एक पहियेवाले रथकी नाभि कहा जाता है। वर्ष उसके अरे और छहों ऋतुएँ उसकी नेमि कहलाती हैं। रात्रि उसका वरूथ (कवच, बख्तर) और धूप ऊपर फहरानेवाला ध्वज है। चारों युग इसके धुरेके दोनों छोर हैं और कलाएँ आर्तवाह कही गयी हैं। काष्ठा उसकी नासिका तथा क्षण उसके दाँतोंकी पङ्क्तियाँ हैं। निमेषको इसका अनुकर्ष (रथका तला) और कलाको ईषा (हरसा) कहते हैं। उनके जुएके दोनों छोर अर्थ और काम कहलाते हैं॥ ३७—४५ १/२॥ |
| गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप्तथैव च।<br>पङ्क्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव तु सप्तमः॥ ४७ | गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती और उष्णिक्—ये सातों छन्द सातों घोड़ोंके रूपमें हैं, जो वायु-वेगसे रथको वहन करते हैं। |