मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२४- सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| * अध्याय १२२ * | ४२१ |
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| सर्वतः सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेष्टितः ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव क्षीरोदाद् द्विगुणो मतः ॥ ७७ | भरे हुए सागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में क्षीरसागरसे दुगुना माना गया है॥ ६७-७७॥ |
| ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ॥ ७८<br>घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ।<br>चक्रनेमिप्रमाणेण वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥ ७९<br>तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते ।<br>देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः ॥ ८०<br>गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः ।<br>क्रौञ्चात् परः पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८१<br>अन्धकारात् परे चापि देवावृन्नाम पर्वतः ।<br>देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः ॥ ८२<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः ।<br>परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो वर्षपर्वतः ॥ ८३<br>वर्षाणि तस्य वक्ष्यामि नामतस्तु निबोधत ।<br>क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४<br>मनोऽनुगात् परे चोष्णास्तृतीयोऽपि स उच्यते ।<br>उष्णात् परे पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८५<br>अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशस्तथापरः ।<br>मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ॥ ८६<br>सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायः शुचिर्जनः ।<br>श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्षं गताः शुभाः ॥ ८७<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा ।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता ॥ ८८<br>तासां सहस्रशश्चान्या नद्यः पार्श्वसमीपगाः ।<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च बहूदकाः ॥ ८९<br>तेषां निसर्गो देशानामानुपूर्व्येण सर्वशः ।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ९०<br>सर्गो यश्च प्रजानां तु संहारो यश्च तेषु वै । | इसके बाद अब मैं क्रौञ्चद्वीपका यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ। इसका विस्तार कुशद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। चक्केकी भाँति गोलाकार उस क्रौञ्चद्वीपसे घृतसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। श्रेष्ठ ऋषियो! इस क्रौञ्चद्वीपमें देवन नामक पर्वत बतलाया जाता है। देवनके बाद गोविन्द नामक पर्वत है। गोविन्दके बाद क्रौञ्च नामक पहला पर्वत है। क्रौञ्चके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद देवावृत् नामक पर्वत है। देवावृत्के बाद पुण्डरीक नामक विशाल पर्वत है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं। इस द्वीपके वर्ष पर्वतके रूपमें स्थित विष्कम्भ पर्वत परस्पर एक-दूसरेसे दुगुने हैं। अब इस द्वीपके वर्षोंका नाम बतला रहा हूँ, सुनिये। क्रौञ्च पर्वतके प्रदेशका नाम कुशल है। वामन पर्वतका प्रदेश मनोऽनुग कहलाता है। मनोऽनुगके बाद तीसरा उष्ण प्रदेश कहा जाता है। उष्णके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद दूसरा मुनिदेश है। मुनिदेशके बाद दुन्दुभिस्वन नामक देश कहा जाता है। यह द्वीप सिद्धों एवं चारणोंसे व्याप्त है। यहाँके निवासी प्रायः गौर वर्णके एवं परम पवित्र होते हैं। इस द्वीपके प्रत्येक वर्षमें मङ्गलमयी नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं, ऐसा सुना गया है। वहाँ गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात प्रकारकी गङ्गा बतलायी जाती हैं। इनके अगल-बगलमें बहनेवाली अगाध जलसे भरी हुई हजारों अन्य नदियाँ भी हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें आकर मिली हैं। उन पर्वतीय प्रदेशोंकी सर्वथा आनुपूर्वी स्वाभाविकी स्थितिका तथा वहाँकी प्रजाओंकी सृष्टि एवं संहारका विस्तारपूर्वक वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ ७८-९० १/२ ॥ |
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्य निबोधत ॥ ९१<br>शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् ।<br>परिवार्य समुद्रं तु घृतमण्डोदकं स्थितः ॥ ९२ | इसके बाद मैं शाल्मलद्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। शाल्मलद्वीप क्रौञ्चद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। यह घृतमण्डोदसागरको घेरकर स्थित है। इसमें पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी क्षमाशील एवं तेजस्वी होते |
| ४२२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।<br>कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते॥ ९३ | हैं तथा दीर्घायुका उपभोग कर मृत्युको प्राप्त होते हैं। वहाँ अकालकी कोई सम्भावना ही नहीं है। वहाँ पहले |
| प्रथमः सूर्यसङ्काशः सुमना नाम पर्वतः।<br>पीतस्तु मध्यमश्चासीत् ततः कुम्भमयो गिरिः॥ ९४ | पर्वतका नाम सुमना है, जो सूर्यके समान चमकीला होनेके कारण पीले रंगका है। उसके बाद दूसरा कुम्भमय नामक पर्वत है। उसका दूसरा नाम सर्वसुख |
| नाम्ना सर्वसुखो नाम दिव्यौषधिसमन्वितः।<br>तृतीयश्चैव सौवर्णो भृङ्गपत्रनिभो गिरिः॥ ९५ | है। वह दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न है। तीसरा स्वर्णसम्पन्न एवं भ्रमरके पंखके समान रंगवाला रोहित नामक विशाल पर्वत है। यह पर्वतश्रेष्ठ दिव्य है। सुमना |
| सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिवरो हि सः।<br>सुमनाः कुशलो देशः सुखोदर्कः सुखोदयः॥ ९६ | पर्वतका देश कुशल एवं दूसरे सर्वसुख पर्वतका देश सुखोदय है, जो सभी सुखोंको उत्पन्न करनेवाला है। तीसरे रोहित पर्वतका प्रदेश रोहिण नामसे विख्यात है। |
| रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ९७ | वहाँ अनेकों प्रकारके रत्नोंकी खानें हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं और वे ही |
| प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम्।<br>न तत्र मेघा वर्षन्ति शीतोष्णं च न तद्विधम्॥ ९८ | प्रसन्नतापूर्वक वहाँकी प्रजाओंके लिये कार्यका विधान करते हैं। वहाँ न तो मेघ वर्षा करते हैं, न शीत एवं उष्णकी ही अधिकता रहती है। इन तीनों द्वीपोंमें |
| वर्णाश्रमाणां वार्ता वा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते।<br>न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्यासूया भयं तथा॥ ९९ | वर्णाश्रमकी चर्चा चलती रहती है। अर्थात् यहाँ वर्णाश्रमका पूर्णरूपसे प्रचार है। यहाँ न ग्रहगण हैं, न चन्द्रमा हैं और न यहाँके निवासियोंमें ईर्ष्या, असूया और भय ही |
| उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च।<br>भोजनं षड्रसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम्॥ १०० | देखा जाता है। यहाँ पर्वतोंसे झरते हुए जल ही अन्नके उत्पादक हैं। वहाँके निवासियोंके लिये षट्-रसयुक्त भोजन स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। उनमें न तो ऊँच- |
| अधमोत्तमं न तेष्वस्ति न लोभो न परिग्रहः।<br>आरोग्यबलवन्तश्च एकान्तसुखिनो नराः॥ १०१ | नीचका भाव है, न लोभ है और न परिग्रह (दान लेनेकी प्रवृत्ति) ही है। वे नीरोग एवं बलवान् होते हैं तथा एकान्त सुखका उपभोग करते हैं। वे लोग तीस हजार वर्षतककी |
| त्रिंशद्वर्षसहस्राणि मानसीं सिद्धिमास्थिताः।<br>सुखमायुश्च रूपं च धर्मैश्वर्यं तथैव च॥ १०२ | मानसी सिद्धिको प्राप्त होकर सुख, दीर्घायु, सुन्दर रूप, धर्म और ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जीवन-यापन करते हैं। कुश, क्रौञ्च और शाल्मल—इन तीनों द्वीपोंमें |
| शाल्मलान्तेषु विज्ञेयं द्वीपेषु त्रिषु सर्वतः।<br>व्याख्यातः शाल्मलानां द्वीपानां तु विधिः शुभः॥ १०३ | यही स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार मैं इन तीनों द्वीपोंकी शुभमयी विधिका विवरण बतला चुका। इस |
| * अध्याय १२३ * | ४२३ |
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| परिमण्डलस्तु द्वीपस्य चक्रवत् परिवेष्टितः ।<br>सुरोदेन समुद्रेण द्विगुणेन समन्वितः ॥ १०४ ॥ | शाल्मलद्वीपका मण्डल (घेरा) दुगुने परिमाणवाले सुरोदसागरसे चारों ओर चक्रकी भाँति गोलाकार घिरा हुआ है॥९१-१०४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे द्वीपवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णन-प्रसङ्गमें द्वीप-वर्णन नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
गोमेदकद्वीप* और पुष्करद्वीपका वर्णन
| सूत उवाच | |
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| गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः ।<br>सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः ॥ १ | सूतजी कहते हैं—तपोधन ऋषियो! अब मैं छठे गोमेदक द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ। गोमेदक द्वीपसे सुरोदकसागर घिरा हुआ है। इसका विस्तार शाल्मलद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। उस द्वीपमें उच्च शिखरोंवाले दो पर्वत हैं—ऐसा जानना चाहिये। उनमें पहलेका नाम सुमना है। यह पर्वत अञ्जनके समान काले रंगसे सुशोभित है। दूसरा पर्वत कुमुद नामवाला है, जो सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय, शोभाशाली और वृक्षादिकी समृद्धियोंसे युक्त है। यह गोमेदक द्वीप छठे सुरोदसागरकी अपेक्षा दुगुने परिमाणवाले इक्षुरसोदसागरसे घिरा हुआ है। इसमें धातकी और कुमुद नामक दो अत्यन्त विस्तृत प्रदेश हैं, जो ‘हव्यपुत्र’ नामसे विख्यात हैं। सुमना पर्वतका जो प्रथम वर्ष है, उसीको धातकीखण्ड कहते हैं। यही धातकी नामक प्रथम पर्वतका प्रथम वर्ष कहलाता है। गोमेद नामसे जो वर्ष कहा गया है, उसीको सर्वसुख भी कहते हैं। इसके बाद दूसरे कुमुदपर्वतका प्रदेश भी कुमुद नामसे विख्यात है। ये दोनों पर्वत अन्य सभी पर्वतोंसे ऊँचे हैं। इस गोमेदक द्वीपके पूर्वभागमें सुमना नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक फैला हुआ है। इसी प्रकार इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें कुमुद नामक पर्वत स्थित है। इन पर्वतोंके चरण-प्रान्तोंसे वह देश दो भागोंमें विभक्त हो गया है। इस द्वीपका दक्षिणार्ध भाग धातकीखण्ड कहलाता है |
| शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ।<br>तस्मिन् द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ ॥ २ | |
| प्रथमः सुमना नाम भात्यञ्जनमयो गिरिः ।<br>द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः ॥ ३ | |
| शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः ।<br>समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः ॥ ४ | |
| षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च ।<br>धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ ॥ ५ | |
| सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते ।<br>धातकिनः स्मृतं तद् वै प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ ६ | |
| गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् ।<br>कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७ | |
| एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ ।<br>पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८ | |
| प्राक्पश्चिमायतः पादैरासमुद्रादिति स्थितः ।<br>पश्चार्धं कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै ॥ ९ | |
| एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधा कृतः ।<br>दक्षिणार्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते ॥ १० |
* इस द्वीपका वर्णन प्रायः अन्य पुराणोंमें नहीं है। पर सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय ३। २५ आदिमें इसका वर्णन है। अन्य पुराणमें गोमेद प्लक्षद्वीपमें एक मर्यादा पर्वतमात्र है।
| ४२४ | * मत्स्यपुराण * |
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| कुमुदं तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम्।<br>एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ॥ ११ | तथा इसके उत्तरार्ध भागमें कुमुद नामक दूसरा श्रेष्ठ वर्ष है। गोमेदक द्वीपके ये दोनों प्रदेश अत्यन्त विस्तृत माने जाते हैं॥१-११॥ |
| इतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम्।<br>समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद् द्विगुणं हि सः॥ १२<br>आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः।<br>पुष्करेण वृतः श्रीमांश्चित्रसानुर्महागिरिः॥ १३<br>कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः।<br>द्वीपस्यैव तु पूर्वार्धे चित्रसानुः स्थितो महान्॥ १४<br>परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः सप्तविंशतिः।<br>ऊर्ध्वं स वै चतुर्विंशद् योजनानां महाचलः॥ १५<br>द्वीपार्धस्य परिक्षिसः पश्चिमे मानसो गिरिः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु पूर्वचन्द्र इवोदितः॥ १६<br>योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्धस्य रक्षिता॥ १७<br>पूर्वार्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः।<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः॥ १८<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव गोमेदाद् द्विगुणेन तु।<br>त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः॥ १९<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत् स्वाभाविकं स्मृतम्।<br>आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः॥ २० | इसके बाद अब मैं सातवें सर्वोत्तम द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, जो पुष्करों (कमलों)-से व्याप्त होनेके कारण पुष्कर नामसे प्रसिद्ध है। यह परिमाणमें गोमेदकद्वीपसे दुगुना है और इक्षुरसोदक-सागरको घेरकर स्थित है। पुष्करद्वीपमें चित्रसानु (विचित्र शिखरोंवाला) नामक शोभाशाली महान् पर्वत है। यह अनेकों चित्र-विचित्र मणिमय शिखरों तथा शिलासमूहोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत चित्रसानु द्वीपके पूर्वार्ध भागमें स्थित है। यह महान् गिरि सत्ताईस योजन विस्तृत और चौबीस योजन ऊँचा है। इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें समुद्रतटपर मानस नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्व दिशामें निकले हुए चन्द्रमाके समान शोभायमान है। यह साढ़े पचास हजार योजन ऊँचा है। मानस पर्वतके पूर्वार्धमें स्थित रहते हुए भी इसका पुत्र महावीत नामक पर्वत द्वीपके पश्चिमार्ध भागकी रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्रदेश दो भागोंमें विभक्त कहा जाता है। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले महासागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में गोमेदक द्वीपसे दुगुना है। इस द्वीपके अन्तःस्थित प्रदेशोंके मानव तीस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। उनमें वृद्धावस्थाका प्रवेश नहीं होता। वे स्वाभाविक रूपसे युवावस्था, नीरोगता, अत्यधिक सुख और मानसी सिद्धिसे युक्त होते हैं॥१२-२०॥ |
| सुखमायुश्च रूपं च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः।<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्यरूपतः॥ २१<br>न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा।<br>न लोभो न च दम्भो वा न च द्वेषः परिग्रहः॥ २२<br>सत्यानृते न तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च।<br>वर्णाश्रमाणां वार्ता च पाशुपाल्यं वणिक् कृषिः॥ २३<br>त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च।<br>न तत्र वर्षं नद्यो वा शीतोष्णं न च विद्यते॥ २४<br>उद्भिदान्युदकानि स्युर्गिरिप्रस्रवणानि च।<br>तुल्योत्तरकुरुणां तु कालस्तत्र तु सर्वदा॥ २५ | तीनों द्वीपोंमें सर्वत्र सुख, दीर्घायु और सुन्दर रूपकी सुलभता रहती है। उनमें ऊँच-नीचका भाव नहीं होता। पराक्रम और रूपकी दृष्टिसे वे एकतुल्य होते हैं। उनमें न कोई वध करनेयोग्य होता है और न मारनेवाला ही पाया जाता है। उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, लोभ, दम्भ, द्वेष और संग्रहका नामतक नहीं है। उनमें सत्य-असत्य एवं धर्म-अधर्मका विवाद, वर्णाश्रमकी चर्चा, पशुपालन, व्यवसाय, खेती, त्रयीविद्या, दण्डनीति (शत्रुओं या अपराधियोंको दण्ड देकर वशमें करनेकी नीति), नौकरी और परस्पर दण्ड-विधान भी नहीं पाया जाता। वहाँ न तो वर्षा होती है, न नदियाँ ही हैं तथा सर्दी-गरमी भी नहीं पड़ती। पर्वतोंसे टपकते हुए जल ही अन्न और जलका काम पूरा करते हैं। वहाँ सर्वदा उत्तरकुरु देशके सदृश समय |
| * अध्याय १२३ * | ४२५ |
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| सर्वतः सुखकालोऽसौ जराक्लेशविवर्जितः ।<br>सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च ॥ २६<br><br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु समं समभिरावृताः ।<br>द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत्समस्तु वै ॥ २७<br><br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम् ।<br>अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः ॥ २८<br><br>ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः ।<br>ऋषिरित्येष गमने वर्ष त्वेतेन तेषु वै ॥ २९<br><br>उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा ।<br>प्रक्षीयमाणे बहुले क्षीयतेऽस्तमिते च वै ॥ ३०<br><br>आपूर्यमाणो ह्युदधिरात्मनैवाभिपूर्थ्यते ।<br>ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्यपां क्षयः ॥ ३१<br><br>उदयात् पयसां योगात् पुष्णन्त्यापो यथा स्वयम् ।<br>तथा स तु समुद्रोऽपि वर्धते शशिनोदये ॥ ३२<br><br>अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयेऽस्तमये चेन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ३३<br><br>क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा ।<br>दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च ॥ ३४<br><br>अपां वृद्धिः क्षयो दृष्टः समुद्राणां तु पर्वसु ।<br>द्विरापत्त्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः ॥ ३५<br><br>निगीर्णत्वाच्च गिरयो पर्वबन्धाच्च पर्वताः ।<br>शाकद्वीपे तु वै शाकः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३६<br><br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु ।<br>क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते ॥ ३७<br><br>शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः ।<br>गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३८<br><br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः ।<br>पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्तसम्भवः ॥ ३९ | बना रहता है। वहाँ सब लोग सर्वत्र वृद्धावस्थाके कष्टसे रहित सुखमय समय व्यतीत करते हैं। यही स्थिति धातकीखण्ड तथा महावीत—दोनों प्रदेशोंमें पायी जाती है। इस प्रकार सातों द्वीप पृथक्-पृथक् सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। जो समुद्र जिस द्वीपके बाद पड़ता है, वह परिमाणमें उसी द्वीपके बराबर माना गया है। इस प्रकार द्वीपों और समुद्रोंकी परस्पर वृद्धि समझनी चाहिये। जलकी सम्यक् प्रकारसे वृद्धि होनेके कारण इस जलराशिको समुद्र कहते हैं। ‘ऋषि’ धातुका अर्थ गमन है, इसीसे ‘वर्ष’ शब्द बनता है। उन वर्षोंमें चार प्रकारकी प्रजाएँ सुखपूर्वक निवास करती हैं। पूर्व दिशामें चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र सर्वदा जलसे पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसमें ज्वार आ जाता है और वही चन्द्रमा जब अस्त हो जाते हैं तब समुद्रका बढ़ा हुआ जल अत्यन्त क्षीण हो जाता है अर्थात् भाटा हो जाता है। जलकी वृद्धिके समय समुद्र अपनी मर्यादाके भीतर ही बढ़ता है और क्षीण होते समय मर्यादाके अंदर ही उसके जलका क्षय होता है ॥ २१—३१ ॥<br><br>जिस प्रकार चन्द्रमाके उदय होनेपर चन्द्र-किरणोंका जलके साथ संयोग होनेसे जल अपने-आप उछलने लगता है, उसी प्रकार समुद्र भी बढ़ने लगता है। यद्यपि शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें चन्द्रमाके उदय और अस्त-कालमें जल बढ़ता और घटता है, तथापि समुद्रकी मर्यादामें न्यूनता या अधिकता नहीं दीख पड़ती। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षयके अवसरपर समुद्रका भी उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। पानीका यह चढ़ाव-उतार एक सौ पंद्रह अङ्गुलतक बतलाया जाता है। पर्वके अवसरोंपर समुद्रोंके जलोंका यह ज्वारभाटा स्पष्ट दीखनेमें आता है। दो ओर जलसे घिरा होनेके कारण समुद्रस्थ प्रदेशको द्वीप कहते हैं और जलको धारण करनेके कारण समुद्रको उदधि कहा जाता है। (सभी वस्तुओंको) आत्मसात् कर लेनेके कारण ‘गिरि’ और (पृथ्वीके) संधिस्थानको बाँधनेके कारण ‘पर्वत’ नाम पड़ा है। शाकद्वीपमें शाक नामक पर्वत है, इसी कारण उसे शाकद्वीप कहते हैं। कुशद्वीपमें जनपदके मध्यभागमें विशाल कुशस्तम्ब (कुशका गुल्म) है (इसीलिये वह कुशद्वीप कहा जाता है)। क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, अतः उसीके नामपर वह क्रौञ्चद्वीप कहलाता है। शाल्मलद्वीपमें सेमलका महान् वृक्ष है, उसकी वहाँके लोग पूजा करते हैं। (इसीसे उसे शाल्मलद्वीप कहा जाता है।) गोमेदकद्वीपमें गोमेद नामका पर्वत है, अतः उसीके नामपर द्वीपको गोमेदक नामसे पुकारते हैं। पुष्करद्वीपमें कमलके समान बरगदका वृक्ष है, इसी कारण उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। वह वटवृक्ष अव्यक्त ब्रह्माके अंशसे समुद्भूत हुआ है, इसीलिये प्रधान-प्रधान |
| ४२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्धं प्रजापतिः।<br>तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः॥ ४०<br><br>स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः।<br>जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च॥ ४१ | देवगण उसकी पूजा करते हैं। उस द्वीपमें साध्यगणोंके साथ प्रजापति ब्रह्मा निवास करते हैं। वहाँ महर्षियोंके साथ तैंतीस देवता उपासना करते हैं। वहाँ श्रेष्ठ महर्षियों एवं देवताओंद्वारा देवाधिदेव ब्रह्माकी पूजा की जाती है। जम्बूद्वीपसे अनेकों प्रकारके रत्न (अन्यान्य द्वीपोंमें) प्रवर्तित होते हैं॥ ३२—४१॥ |
| द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशैस्तु वै।<br>आर्जवाद् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च॥ ४२<br><br>आरोग्यायुष्प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः।<br>द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च॥ ४३<br><br>गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः।<br>भोजनं चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्॥ ४४ | उपर्युक्त उन सभी द्वीपों और वर्षोंमें क्रमशः प्रजाओंकी सरलता, ब्रह्मचर्य, सत्यवादिता, इन्द्रियनिग्रह, नीरोगता और आयुका प्रमाण एक-दूसरेसे दुगुना बढ़ता जाता है। वे सभी स्वाभाविक ही पण्डित होते हैं, अतः उनके द्वारा स्वयं प्रजाओंकी रक्षा होती रहती है। वहाँ भोजन अनायास ही स्वयं उपस्थित हो जाता है, जो छहों रसोंसे युक्त और महान् बलदायक होता है। उसे ही वहाँके निवासी खाते हैं। |
| षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः।<br>परेण पुष्करस्याथ आवृत्त्यावस्थितो महान्॥ ४५<br><br>स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्ताद्वेष्टयन्।<br>स्वादूदकस्य परितः शैलस्तु परिमण्डलः॥ ४६<br><br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते।<br>आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम्॥ ४७ | पुष्करद्वीपके बाद स्वादिष्ट जलसे परिपूर्ण महासागर उस द्वीपको चारों ओरसे घेरकर अवस्थित है। उस स्वादिष्ट जलवाले सागरके चारों ओर एक मण्डलाकार पर्वत है, जो प्रकाश और अन्धकारसे युक्त है। उसीको 'लोकालोक' नामसे पुकारा जाता है। उसका अगला भाग प्रकाशयुक्त तथा पिछला भाग अन्धकारसे आच्छादित रहता है। |
| लोकविस्तारमात्रं तु पृथिव्यर्थं तु बाह्यतः।<br>प्रतिच्छन्नं समन्तात् तु उदकेनावृतं महत्॥ ४८<br><br>भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्। | उसका विस्तार लोकोंके विस्तारके बराबर है, किंतु वह बाहरसे पृथ्वीके अर्धभाग-जितना दीख पड़ता है। वह महान् पर्वत चारों ओर जल-राशिसे आच्छन्न एवं घिरा हुआ है। पृथ्वीसे दसगुना जल चारों ओरसे पृथ्वीकी रक्षा करता है। |
| अद्भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्यपः॥ ४९<br><br>अग्नेर्दशगुणो वायुर्धारयञ्ज्योतिरास्थितः।<br>तिर्यक् च मण्डलो वायुर्भूतान्यावेष्ट्य धारयन्॥ ५० | जलसे दसगुनी अग्नि सब ओरसे जलको धारण करती है। अग्निसे दसगुनी वायु तेजको धारण करके स्थित है। वह वायुमण्डल तिरछा होकर समस्त प्राणियोंमें प्रविष्ट हो सबको धारण किये हुए है। |
| दशाधिकं तथाऽऽकाशं वायोर्भूतान्यधारयत्।<br>भूतानि धारयन् व्योम तस्माद् दशगुणस्तु वै॥ ५१ | वायुसे दसगुना आकाश भूतोंको धारण किये हुए है। |
| भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत्।<br>महत्तत्त्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्यते॥ ५२ | उस आकाशसे दसगुना भूतादि अर्थात् तामस अहंकार है। उस भूतादिसे दसगुना महद्भूत (महत्तत्त्व) है और वह महत्तत्त्व अनन्त अव्यक्तद्वारा धारण किया जाता है। |
| आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम्।<br>पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्॥ ५३ | इन विकृतिशील तत्त्वोंके विकार आधाराधेयभावसे कल्पित हैं। ये पृथ्वी आदि विकार परस्पर विभक्त हैं, |
- अध्याय १२३ * | ४२७
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| परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्॥ ५४ | परस्पर एक-दूसरेसे अधिक तथा एक-दूसरेमें घुसे हुए भी हैं। इसी प्रकार ये परस्पर उत्पन्न होते हैं और परस्पर एक-दूसरेको धारण भी करते हैं*॥ ४२—५४॥ |
| यस्मात् प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात् ते स्थिरतां गताः।<br>आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्॥ ५५<br><br>पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।<br>भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यालोकः सर्वतः स्मृतः॥ ५६<br><br>तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।<br>पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च॥ ५७<br><br>भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।<br>तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः॥ ५८<br><br>कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च।<br>यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते॥ ५९<br><br>जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।<br>प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते॥ ६०<br><br>तस्मात् परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै।<br>ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः॥ ६१<br><br>इत्येवं संनिवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया॥ ६२<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः॥ ६३<br><br>एतावत् संनिवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।<br>एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव॥ ६४ | चूँकि ये सभी परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट-से हैं, इसीलिये स्थिरताको प्राप्त हुए हैं। पहले इनमें कोई विशेषता नहीं थी, परंतु एक-दूसरेमें प्रविष्ट हो जानेसे ये विशिष्ट हो गये हैं। पृथ्वीसे लेकर वायुतकके सभी तत्त्व परस्पर विभक्त हैं। इन तत्त्वोंसे परे सारा जगत् निर्जन है। (अन्य सभी तत्त्व) प्रकाशमान आकाशमें सर्वत्र व्याप्त हैं। जिस प्रकार छोटे-छोटे पात्र बड़े पात्रके अन्तर्गत समा जाते हैं और परस्पर समाश्रयण होनेके कारण एक-दूसरेसे छोटे होते जाते हैं, उसी प्रकार ये सारे भेद प्रकाशमान आकाशके अन्तर्गत विलीन हो जाते हैं। ये तत्त्व परस्पर एक-दूसरेसे अधिक परिमाणवाले बनाये गये हैं। जबतक ये तत्त्व वर्तमान रहते हैं, तभीतक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्में इन्हीं तत्त्वोंके अन्तर्गत प्राणियोंकी व्यवस्थिति होती है। इन तत्त्वोंका प्रत्याख्यान कर देनेपर किसी प्रकार कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसीलिये वे परिमित (पृथ्वीसे वायुतक) तत्त्व कार्यात्मक कहे जाते हैं तथा महत्तत्त्व आदि भेद कारणात्मक हैं। इस प्रकार विभागपूर्वक पृथ्वीसे आच्छादित मण्डल, सातों द्वीपों और सातों समुद्रोंका यथार्थरूपसे गणनासहित विस्तार एवं मण्डल तथा परिमाणमें एकदेशी प्रधान तत्त्वका इसे विश्वरूप जानना चाहिये। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यक् प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिये॥ ५५—६४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सप्तद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२३॥
* यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबोंका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित—
'यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः॥'
इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है।