संग्रह पर लौटें


मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१०९- अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन
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३६२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ते रुद्रसंश्रिताः।<br>निर्दहन्ति जगत् सर्वं वटमूलं न दह्यते ॥ १२<br>नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत्।<br>स्थीयते तत्र वै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः॥ १३<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>सदा सेवन्ति तत् तीर्थं गङ्गायमुनसङ्गमम् ॥ १४<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागं संस्तुवंश्च यत्।<br>यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ १५<br>लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः।<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः॥ १६<br>अङ्गिराः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे।<br>तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्च खेचराश्च ये ॥ १७<br>सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरःसरः ॥ १८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्। | प्रलयकालमें जब बारह सूर्य रुद्रके आश्रयमें स्थित होकर अपने प्रखर तेजसे तपने लगते हैं, उस समय वे सारे जगत्को तो जलाकर भस्म कर देते हैं, परंतु अक्षयवटको वे भी नहीं जला पाते। प्रलयकालमें जब सूर्य, चन्द्रमा और चौदहों भुवन नष्ट हो जाते हैं तथा सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, उस समय भी भगवान् विष्णु प्रयागमें यज्ञााराधनमें तत्पर होकर स्थित रहते हैं। देवता, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि गङ्गा-यमुनाके संगमभूत तीर्थका सदा सेवन करते हैं। अतः राजेन्द्र! जहाँ प्रयागकी स्तुति करते हुए ब्रह्मा आदि देवगण; ऋषि, सिद्ध, चारण, लोकपाल, साध्यगण, लोकसम्मत पितर; सनत्कुमार आदि परमर्षि; अङ्गिरा आदि महर्षि तथा अन्य ब्रह्मर्षि, नाग, एवं गरुड़ आदि पक्षी, सिद्ध, आकाशचारी जीव, सागर, नदियाँ, पर्वत, सर्प, विद्याधर तथा ब्रह्मासहित भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, उस प्रयागकी यात्रा अवश्य करनी चाहिये। राजसिंह! यह गङ्गा-यमुनाके अन्तरालका प्रयाग-क्षेत्र पृथ्वीका जघनस्थल कहा गया है॥ ११-१८ १/२ ॥ |
| प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १९<br>श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ २०<br>तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे शंसितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ २१<br>न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमनं प्रति ॥ २२<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापराः।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन ॥ २३<br>या गतिर्योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे ॥ २४<br>न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिंस्तत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः ॥ २५<br>एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा ॥ २६ | भारत! यह प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है। इससे बढ़कर पुण्यप्रद तीर्थ तीनों लोकोंमें दूसरा नहीं है। इस प्रयागतीर्थका नाम सुननेसे, इसके नामोंका संकीर्तन करनेसे अथवा इसकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है। जो व्रतनिष्ठ मनुष्य उस संगममें स्नान करता है, उसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंके समान फलकी प्राप्ति होती है। तात! इसलिये न तो किसी वेद-वचनसे, न लोगोंके आग्रहपूर्ण कथनसे ही तुम्हें प्रयाग-मरणके प्रति निश्चित की हुई अपनी बुद्धिमें किसी प्रकारका उलट-फेर करना चाहिये। कुरुनन्दन! इस भूतलपर जो दस हजार बड़े तीर्थ हैं तथा इनके अतिरिक्त जो तीन करोड़ अन्य तीर्थ हैं, उन सबका प्रयागमें ही निवास है। गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण छोड़नेवालेको वही गति प्राप्त होती है, जो गति योगनिष्ठ एवं सत्यपरायण विद्वान्को मिलती है। युधिष्ठिर! जिन लोगोंने प्रयागकी यात्रा नहीं की, वे तो मानो तीनों लोकोंमें ठग लिये गये और उनका जीवन इस लोकमें नहींके समान है। इस प्रकार परमपदस्वरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शन करके मनुष्य उसी प्रकार समस्त पापोंसे छूट जाता है, जैसे (ग्रहणकालके बाद) राहुग्रस्त चन्द्रमा ॥ १९-२६॥ |
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| * अध्याय १०६ * | ३६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुना दक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७ | कम्बल और अश्वतर नामवाले दोनों नाग यमुनाके दक्षिण तटपर निवास करते हैं, अतः वहाँ स्नान और जलपान कर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। |
| तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य विश्रुतम्।<br>नरस्तारयते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान्॥ २८ | प्रयागक्षेत्रमें स्थित महादेवजीके सुप्रसिद्ध स्थानकी यात्रा करके मनुष्य अपनी दस आगेकी और दस पीछेकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २९ | जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है और वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है। |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रिषु लोकेषु भारत।<br>कूपं चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ ३० | भारत! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात समुद्रकूप और प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) है। |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | वहाँ यदि मनुष्य तीन राततक क्रोधको वशमें कर ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करता है तो उसका आत्मा समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है और उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानाद् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ३२ | भारत! भागीरथीके पूर्वतटपर प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-से उत्तर दिशामें 'हंसप्रपतन' नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। |
| अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३३ | वहाँ स्नानमात्र कर लेनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह यात्री सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। |
| उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ३४ | इसी प्रकार जो मनुष्य पुण्यप्रद उर्वशीरमण तथा विशाल हंसपाण्डुर नामक तीर्थोंमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो! |
| षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>सेव्यते पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप॥ ३५ | नरेश्वर! वह स्वर्गलोकमें छाछठ हजार वर्षोंतक पितरोंके साथ सेवित होता है |
| उर्वशीं तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम।<br>पूज्यते सततं पुत्र ऋषिगन्धर्वकिन्नरैः॥ ३६ | और नरोत्तम! स्वर्गलोकमें वह सदा उर्वशीको देखता रहता है। पुत्र! साथ ही युधिष्ठिर ऋषि, गन्धर्व और किन्नर निरन्तर उसकी पूजा करते हैं। |
| ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>उर्वशीसदृशीनां तु कन्यानां लभते शतम्॥ ३७ | तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेपर जब वह स्वर्गसे च्युत होता है, तब दस हजार गाँवोंका उपभोग करनेवाला भूपाल होता है। |
| मध्ये नारीसहस्राणां बहूनां च पतिर्भवेत्।<br>दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः॥ ३८ | वह अनेकों सहस्र नारियोंके बीच रहता हुआ उनका पति होता है। उससे उर्वशी-सरीखी सौन्दर्यशालिनी सौ कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। |
| काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तोऽसौ प्रतिबुध्यते।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ३९ | वह करधनी और नूपुरके झंकार-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है॥ २७-३९॥ |
| शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः।<br>एककालं तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्॥ ४० | जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें एक मासतक श्वेत वस्त्र धारण करके जितेन्द्रिय होकर नित्य नियमपूर्वक रहते हुए एक ही समय भोजन करता है, वह (जन्मान्तरमें) राजा होता है, |