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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मत्स्यमहापुराण

[ सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित ]


गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR

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॥ श्रीहरिः ॥
557

* ॐ श्रीपरमात्मने नमः *

मत्स्यमहापुराण

( सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित )


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७६ चौदहवाँ पुनर्मुद्रण ३,०००
कुल मुद्रण ४६,५००

❖ मूल्य—₹ ३००
(तीन सौ रुपये)

प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
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॥ श्रीहरिः ॥

नम्र निवेदन

अठारह पुराणोंमें मत्स्यपुराण अपना विशिष्ट स्थान रखता है। भगवान् विष्णुके मत्स्यावतारसे सम्बद्ध होनेके कारण यह मत्स्यपुराण कहलाता है। भगवान् मत्स्यके द्वारा राजा वैवस्वत मनु तथा सप्तर्षियोंको जो अत्यन्त दिव्य एवं कल्याणकारी उपदेश दिये गये थे, वे ही मत्स्यपुराणमें संगृहीत हैं। सृष्टिके प्रारम्भमें जब हयग्रीव नामक असुर वेदादि शास्त्रोंको चुराकर पातालमें चला गया, तब भगवान्ने मत्स्यावतार धारणकर वेदोंका उद्धार किया। भगवान् विष्णुके दस अवतारोंमें मत्स्यावतार सर्वप्रथम है।

वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्यादि सभी सम्प्रदायोंमें मत्स्यपुराणकी समानरूपसे मान्यता है। इस पुराणकी श्लोक-संख्या चौदह हजार है, जो २९१ अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। इसमें भगवान्के मत्स्यावतारकी कथा, मनु-मत्स्य-संवाद, सृष्टि-वर्णन, तत्त्व-मीमांसा, मन्वन्तर तथा पितृवंशका विस्तृत वर्णन है। श्राद्धोंके सांगोपाङ्ग निरूपणके साथ चन्द्रवंशी राजाओंका वर्णन भी इस पुराणका पठनीय विषय है। ययाति-चरित्रका वर्णन अत्यन्त रोचक एवं शिक्षाप्रद है, जो भोगमार्गको सर्वथा अनुचित बताकर निवृत्ति एवं त्यागधर्मका आश्रय ग्रहण करनेकी प्रेरणा देता है।

विविध व्रतोंका वर्णन भी इस पुराणकी महती विशेषता है। अनेक व्रतानुष्ठानोंकी विधि, विविध दानोंकी महिमा, शान्तिक एवं पौष्टिक कर्म, नवग्रहोंका स्वरूप एवं तर्पण-विधिका प्रतिपादन सुन्दर कथाओंके माध्यमसे किया गया है। तदनन्तर प्रयाग-महिमा, भूगोल-खगोलका वर्णन, ज्योतिश्चक्र, त्रिपुरासुर-संग्राम, तारकासुर-आख्यान, नृसिंह-चरित्र, काशी तथा नर्मदा-माहात्म्य, ऋषियोंका नाम-गोत्र तथा वंश, सती-सावित्रीकी कथा तथा राजधर्मोंका इसमें सरस चित्रण किया गया है।

पुराणोंकी विषयानुक्रमणिका, भृगु, अंगिरा, अत्रि, विश्वामित्र, वसिष्ठादि गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंके वंश-वर्णन, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुनशास्त्र, अंगस्फुरण, ज्योतिषशास्त्र, रत्नविज्ञान, विभिन्न देवताओंकी प्रतिमाओंके स्वरूप-लक्षण, प्रतिमान-मान तथा निर्माण-विधि, देव-प्रतिष्ठा एवं गृह-निर्माणसम्बन्धी वास्तुविद्या आदि इस पुराणके अन्य उपयोगी विषय हैं। इसमें वर्णित कच-देवयानी-आख्यान, त्रिपुर-वध, पार्वती-परिणय, विभूति द्वादशीव्रत आदिकी कथाएँ अत्यन्त सुन्दर और उपयोगी हैं। इस पुराणके पठन-पाठन एवं श्रवणके माहात्म्यके विषयमें स्वयं मत्स्यभगवान्ने कहा है—यह पुराण परम पवित्र, आयुकी वृद्धि करनेवाला, कीर्तिवर्धक, महापापोंका नाशक तथा शुभकारक है। इस पुराणके एक श्लोकके एक पादको भी जो पढ़ता है, वह पापोंसे मुक्त होकर श्रीमन्नारायणके पदको प्राप्त कर लेता है तथा दिव्य सुखोंका भोग करता है।

कल्याणके विशेषाङ्करूपमें लेटरप्रेससे पूर्व प्रकाशित यह महत्त्वपूर्ण पुराण बहुत समयसे अनुपलब्ध था। विषयकी उपयोगिता एवं बहुमूल्य पौराणिक साहित्यको जन-सामान्यको उपलब्ध करानेकी दृष्टि एवं पाठकोंके आग्रहको ध्यानमें रखकर 'मत्स्यमहापुराण' सानुवादके इस नवीन संस्करणको ऑफसेटकी सुन्दर छपाई, आकर्षक साज-सज्जा एवं मजबूत जिल्द आदि विशेषताओंसे युक्त करके पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आशा है, पाठकगण गीताप्रेससे प्रकाशित अन्य पुराणोंकी भाँति इस पुराणकी महत्त्वपूर्ण सामग्रीके पठन-पाठनके द्वारा अपने आत्मकल्याणका मार्ग प्रशस्त करेंगे।

<div style="text-align: right;">—प्रकाशक</div>

विषय-सूची

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१-मङ्गलाचरण, शौनक आदि मुनियोंका सूतजीसे पुराणविषयक प्रश्न, सूतद्वारा मत्स्यपुराणका वर्णनारम्भ, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपसे सूर्यनन्दन मनुको मोहित करना, तत्पश्चात् उन्हें आगामी प्रलयकालकी सूचना देना१३उत्पत्ति३३
२-मनुका मत्स्यभगवान्‌से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्‌का उत्तर देना१६८-प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक३७
९-मन्वन्तरोंके चौदह देवताओं और सप्तर्षियोंका विवरण३९
१०-महाराज पृथुका चरित्र और पृथ्वी-दोहनका वृत्तान्त४२
११-सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त४५
१२-इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन५०
१३-पितृ-वंश-वर्णन तथा सतीके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें देवीके एक सौ आठ नामोंका विवरण५४
३-मनुका मत्स्यभगवान्‌से ब्रह्माके चतुर्मुख होने तथा लोकोंकी सृष्टि करनेके विषयमें प्रश्न एवं मत्स्यभगवान्‌द्वारा उत्तररूपमें ब्रह्मासे वेद, सरस्वती, पाँचवें मुख और मनु आदिकी उत्पत्तिका कथन१९१४-अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार५८
१५-पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन६०
१६-श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण६३
४-पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए— एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्‌का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन२३१७-साधारण एवं आभ्युदयिक श्राद्धकी विधिका विवरण६८
१८-एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि७४
५-दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्वारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव२७१९-श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण७६
६-कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन३०२०-महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा७८
७-मरुतोंकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें दितिकी तपस्या, मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन, कश्यपद्वारा दितिको वरदान, गर्भिणी स्त्रियोंके लिये नियम तथा मरुतोंकी२१-ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन८०
२२-श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन८४

[ ५ ]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
२३-चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूययज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना९०
२४-ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त९४
२५-कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना९९
२६-देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना१०५
२७-देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप१०८
२८-शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष१११
२९-शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको सन्तुष्ट करना११२
३०-सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह११५
३१-ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म११९
३२-देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना१२१
३३-ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना१२५
३४-राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना१२८
३५-वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति१३०
३६-इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना१३२
३७-ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना१३४
३८-ययाति और अष्टकका संवाद१३५
३९-अष्टक और ययातिका संवाद१३८
४०-ययाति और अष्टकका आश्रमधर्म-सम्बन्धी संवाद१४२
४१-अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना१४४
४२-राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना१४६
४३-ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा१५०
४४-कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन१५४
४५-वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तक-मणिकी कथा१६०
४६-वृष्णि-वंशका वर्णन१६३
४७-श्रीकृष्ण-चरित्रका वर्णन, दैत्योंका

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
—इतिहास तथा देवासुर-संग्रामके प्रसङ्गमें विभिन्न अवान्तर कथाएँ१६५—उसका माहात्म्य२५५
४८तुर्वसु और द्रुह्यके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग१८८६५अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२५७
४९पूरु-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास१९५६६सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२५८
५०पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास२०१६७सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य२६०
५१अग्नि-वंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन२०७६८सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२६२
५२कर्मयोगकी महत्ता२११६९भीमद्वादशी-व्रतका विधान२६६
५३पुराणोंकी नामावलि और उनका संक्षिप्त परिचय२१४७०पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२७२
५४नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२२१७१अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२७७
५५आदित्यशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२२५७२अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२७९
५६श्रीकृष्णमाष्टमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२२८७३शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि२८३
५७रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२३०७४कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२८४
५८तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिका विधान२३३७५विशोकसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२८६
५९वृक्ष लगानेकी विधि२३८७६फलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२८७
६०सौभाग्यशयन-व्रत तथा जगद्धात्री सतीकी आराधना२४०७७शर्करासप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२८९
६१अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य२४४७८कमलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२९०
६२अनन्ततृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२४९७९मन्दारसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२९१
६३रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२५२८०शुभसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य२९३
६४आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रतकी विधि और—८१विशोकद्वादशी-व्रतकी विधि२९४
———८२गुड़-धेनुके दानकी विधि और उसकी महिमा२९७
———८३पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य२९९
———८४लवणाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०४

[ ७ ]

अध्याय विषयपृष्ठ-संख्याअध्याय विषयपृष्ठ-संख्या
८५- गुडपर्वतके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०५१०५- प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व३५९
८६- सुवर्णाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०६१०६- प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन३६१
८७- तिलशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०७१०७- प्रयाग-स्थित विविध तीर्थोंका वर्णन३६५
८८- कार्पासाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०७१०८- प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व३६७
८९- घृताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०८१०९- अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन३७०
९०- रत्नाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३०९११०- जगत्के समस्त पवित्र तीर्थोंका प्रयागमें निवास३७२
९१- रजताचलिके दानकी विधि और उसका माहात्म्य३१०१११- प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके निवासका वर्णन३७४
९२- शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचल-दानका महत्त्व३११११२- भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन३७५
९३- शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रहशान्तिकी विधिका वर्णन३१५११३- भूगोलका विस्तृत वर्णन३७७
९४- नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन३२८११४- भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षका वर्णन३८३
९५- माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य३२९११५- राजा पुरूरवाके पूर्वजन्मका वृत्तान्त३९०
९६- सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य३३२११६- ऐरावती नदीका वर्णन३९१
९७- आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य३३४११७- हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन३९४
९८- संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि३३७११८- हिमालयकी अनोखी शोभा तथा अत्रि-आश्रमका वर्णन३९६
९९- विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य३३८११९- आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवाका प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या४०१
१००- विभूतिद्वादशीके प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त३४०१२०- राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीड़ा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति४०५
१०१- साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य३४४१२१- कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण४०९
१०२- स्नान और तर्पणकी विधि३५११२२- शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन४१५
१०३- युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम३५४१२३- गोमेदकद्वीप और पुष्करद्वीपका वर्णन <br> मत्स्यावतार-कथा-प्रसङ्ग४२३ <br> ४२८
१०४- प्रयाग-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन३५७१२४- सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन४२९

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अध्याय विषयपृष्ठ-संख्याअध्याय विषयपृष्ठ-संख्या
१२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन४३६बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन४९७
१२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति४४०१४०- देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय५०१
१२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा४४६१४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण५०८
१२८- देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन४४८१४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन५१५
१२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन४५४१४३- यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिको वर्णन५२०
१३०- दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना४५८१४४- द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन५२४
१३१- त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार४६०१४५- युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन५३२
१३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना४६५१४६- वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान५४०
१३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान४६८१४७- ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक५४७
१३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी४७३१४८- तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुरसंग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन५४९
१३५- शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्धविमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश४७६१४९- देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ५५८
१३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश४८३१५०- देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित
१३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश४८८
१३८- देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध४९१
१३९- दानवराज मयका दानवोंको समझा-

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
छोड़ देना........ ५६०वीरकद्वारा रोका जाना........ ६५६
१५१-भगवान् विष्णुपर दानवोंका सामूहिक आक्रमण, भगवान् विष्णुका अद्भुत युद्ध-कौशल और उनके द्वारा दानवसेनापति ग्रसनकी मृत्यु........ ५७८१५८-वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शङ्करका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति........ ६५८
१५२-भगवान् विष्णुका मथन आदि दैत्योंके साथ भीषण संग्राम और अन्तमें घायल होकर युद्धसे पलायन........ ५८११५९-स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति........ ६६२
१५३-भगवान् विष्णु और इन्द्रका परस्पर उत्साहवर्धक वार्तालाप, देवताओंद्वारा पुनः सैन्य-संगठन, इन्द्रका असुरोंके साथ भीषण युद्ध, गजासुर और जम्भासुरकी मृत्यु, तारकासुरका घोर संग्राम और उसके द्वारा भगवान् विष्णुसहित देवताओंका बंदी बनाया जाना........ ५८४१६०-तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध........ ६६६
१५४-तारकके आदेशसे देवताओंकी बन्धन-मुक्ति, देवताओंका ब्रह्माके पास जाना और अपनी विपत्तिगाथा सुनाना, ब्रह्माद्वारा तारक-वधके उपायका वर्णन, रात्रिदेवीका प्रसङ्ग, उनका पार्वतीरूपमें जन्म, काम-दहन और रतिकी प्रार्थना, पार्वतीकी तपस्या, शिव-पार्वती-विवाह तथा पार्वतीका वीरकको पुत्ररूपमें स्वीकार करना........ ६०११६१-हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश........ ६६८
१५५-भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान........ ६५०१६२-प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध........ ६७५
१५६-कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आदि दैत्यका पार्वती-रूपमें शङ्करके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप........ ६५२१६३-नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति........ ६७८
१५७-पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और१६४-पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्‌का उत्तर........ ६८५
१६५-चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन........ ६८८
१६६-महाप्रलयका वर्णन........ ६९०
१६७-भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद.... ६९२
१६८-पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति........ ६९७
१६९-नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन........ ६९८
१७०-मधु-कैटभकी उत्पत्ति, उनका ब्रह्माके