ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1669, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहमें बचाओ. हम सत्यरूप यज्ञ द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. रक्षा और कल्याण के लिए तुम हमारी
पुकार सुनो. (११)
अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः.
आरे देवा द्वेषो अस्मद्युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये.. (१२)
हे देवो! हमारे रोगों और देवों का आह्वान न करने वाली दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम
लोभमय बुद्धि को हमसे अलग करो. तुम दुष्ट की पापमय बुद्धि हमसे दूर करो. तुम शत्रुओं
को हमसे दूर कर दो. तुम हमें विशेष सुख और कल्याण प्रदान करो. (१२)
अरिष्टः स मर्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि.
यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये.. (१३)
हे अदितिपुत्र देवो! जिन्हें तुम शोभन-मार्गों से ले जाते हो एवं सभी पापों से दूर करके
कल्याण प्रदान करते हो, वे सब लोग सभी अनिष्टों से सुरक्षित रहकर वृद्धि प्राप्त करते हैं एवं
धर्मकार्यों के पश्चात् संतान की उन्नति पाते हैं. (१३)
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने.
प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये.. (१४)
हे देवो! अन्नलाभ के लिए तुम जिसकी रक्षा करते हो, हे मरुतो! युद्ध में संचित धन पाने
के लिए तुम जिस रथ की रक्षा करते हो, हे इंद्र! उसी प्रातःकाल युद्ध में जाने वाले, सेवन
करने योग्य एवं ध्वस्त न होने वाले रथ पर हम कल्याण के लिए चढ़ें. (१४)
स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति.
स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन.. (१५)
हे मरुतो! शोभन-पथ वाले देश एवं मरुस्थल दोनों में हमारा कल्याण हो. जल एवं
आयुधों से युक्त युद्ध में हमारा कल्याण करो. पुत्रों को उत्पन्न करने वाली नारियों में हमारा
कल्याण हो. तुम धनलाभ के लिए हमारा कल्याण करो. (१५)
स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति.
सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा.. (१६)
जो धरती मार्ग पर चलने के लिए कल्याणकारिणी है, सर्वोत्तम धनसंपन्न एवं यज्ञ की
उत्तर वेदी पर प्राप्त होने वाली है, वह घर एवं वन दोनों में हमारी रक्षा करे. देवों द्वारा सुरक्षित
वह धरती हमारे लिए सुखपूर्वक रहने योग्य हो. (१६)
एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्धो विश्व आदित्या अदिते मनीषी.
ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७)
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