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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

८२ गुड़-धेनुके दानकी विधि और उसकी महिमा

* अध्याय ७७ *२८९

सतहत्तरवाँ अध्याय

शर्करासप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
शर्करासप्तमीं वक्ष्ये तद्वत् कल्मषनाशिनीम्।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यं ययानन्तं प्रजायते॥ १ब्रह्मन्! अब मैं उसी प्रकार पापनाशिनी शर्करासप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है।
माधवस्य सिते पक्षे सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>प्रातः स्नात्वा तिलैः शुक्लैः शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ २व्रतनिष्ठ पुरुष वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रातःकाल श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्नान करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दन धारण कर ले।
स्थण्डिले पद्ममालिख्य कुङ्कुमेन सकर्णिकम्।<br>तस्मिन् नमः सवित्रे तु गन्धधूपौ निवेदयेत्॥ ३फिर वेदीपर कुङ्कुमसे कर्णिकासहित कमलका चित्र बनावे। उसपर 'सवित्रे नमः' कहकर गन्ध और धूप निवेदित करे।
स्थापयेदुदकुम्भं च शर्करापात्रसंयुतम्।<br>शुक्लवस्त्रैरलङ्कृत्य शुक्लमाल्यानुलेपनैः।<br>सुवर्णेन समायुक्तं मन्त्रेणानेन पूजयेत्॥ ४फिर उसपर शक्करसे परिपूर्ण पात्रसहित जलपूर्ण कलश स्थापित करे, उसपर स्वर्णमयी मूर्ति रख दे और उसे श्वेत वस्त्रसे सुशोभित करके श्वेत पुष्पमाला और चन्दनद्वारा वक्ष्यमाण-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक पूजन करे।
विश्ववेदमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यसे।<br>त्वमेवामृतसर्वस्वमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ५(वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सूर्यदेव! विश्व और वेद आपके स्वरूप हैं, आप वेदवादी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंके लिये अमृततुल्य फलदायक हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कीजिये।'
पञ्चगव्यं ततः पीत्वा स्वपेत् तत्पार्श्वतः क्षितौ।<br>सौरसूक्तं जपंस्तिष्ठेत् पुराणश्रवणेन वा॥ ६तत्पश्चात् पञ्चगव्य पान कर उसी कलशके पार्श्वभागमें भूमिपर शयन करे। उस समय सूर्यसूक्तका जप* अथवा पुराणका श्रवण करते रहना चाहिये।
अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनैत्यकः।<br>तत् सर्वं वेद विदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ७इस प्रकार दिन-रात बीत जानेपर अष्टमीके दिन प्रातःकाल नित्यकर्मसे निवृत्त होकर पहलेकी तरह वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे।
भोजयेच्छक्तितो विप्राञ्छर्कराघृतपायसैः।<br>भुञ्जीतातैललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः॥ ८पुनः अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको शक्कर, घी और दूधसे बने हुए पदार्थ भोजन करावे और स्वयं भी मौन रहकर तेल और नमकसे रहित पदार्थोंका भोजन करे।
अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम्॥ ९इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सारा कार्य करना चाहिये। एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर शक्करसे पूर्ण कलशसमेत समग्र उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा
सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम्।<br>गृहं च शक्तिमान् दद्यात् समस्तोपस्करान्वितम्॥ १०एक दुधारू गौ दान करनेका विधान है। व्रती यदि धन-सम्पत्तिसे युक्त हो तो उसे समस्त उपकरणोंसे युक्त गृहका भी दान करना चाहिये।
सहस्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा।<br>दशभिर्वाथ निष्केण तदर्धेनापि शक्तितः॥ ११तदनन्तर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल एक हजार अथवा एक सौ अथवा पाँच निष्क (सोलह माशेका एक निष्क होता है जिसे दीनार भी कहते हैं)

* ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वाँ सूक्त सूर्यसूक्त है।

२९० * मत्स्यपुराण *


| सुवर्णाश्वः प्रदातव्यः पूर्ववन्मन्त्रवादनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषं समश्नुते॥ १२<br><br>अमृतं पिबतो वक्त्रात् सूर्यस्यामृतबिन्दवः।<br>निष्येतुर्ये धरण्यां ते शालिमुद्गेक्षवः स्मृताः॥ १३<br><br>शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान्।<br>इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः॥ १४<br><br>शर्करासप्तमी चेयं वाजिमेधफलप्रदा।<br>सर्वदुष्टप्रशमनी पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी॥ १५<br><br>यः कुर्यात् परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात्।<br>कल्पमेकं वसेत् स्वर्गे ततो याति परं पदम्॥ १६<br><br>इदमनघं शृणोति यः स्मरेद् वा<br>परिपठतीह दिवाकरस्य लोके।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनमालयाभिपूज्यः॥ १७ | सोनेका एक घोड़ा बनवाकर पहलेकी ही भाँति मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान करना चाहिये। इसमें कृपणता न करे, यदि करता है तो दोषभागी होना पड़ता है॥ १—१२॥<br><br>अमृत-पान करते समय सूर्यके मुखसे जो अमृतबिन्दु भूतलपर गिर पड़े थे, वे ही शालि (अगहनी धान), मूँग और ईंख नामसे कहे जाते हैं। इनमें ईंखका सारभूत शक्कर अमृततुल्य सुस्वादु है, इसलिये यह तीनोंमें श्रेष्ठ है। इसी कारण यह पुण्यवती शर्करा सूर्यके हव्य एवं कव्य—दोनों हवनीय पदार्थोंमें उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह शर्करासप्तमी अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायिनी, समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाली और पुत्र-पौत्रोंकी प्रवर्धिनी है। जो मानव उत्कृष्ट श्रद्धाके साथ इसका अनुष्ठान करता है, उसे सद्गतिकी प्राप्ति होती है। वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास कर अन्तमें परमपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस निष्पाप व्रतका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। साथ ही जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवगणों एवं देवाङ्गनाओंके समूहसे पूजित होता है॥१३—१७॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शर्कराव्रतं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शर्करासप्तमीव्रत नामक सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७७॥


अठहत्तरवाँ अध्याय

कमलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसप्तमीम्।<br>यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः॥ १<br><br>वसन्तामलसप्तम्यां स्नातः सन् गौरसर्षपैः।<br>तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम्॥ २<br><br>वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गन्धपुष्पैः समर्चयेत्।<br>नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे॥ ३<br><br>दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्॥ ४<br><br>विप्राय दद्यात् सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।<br>शक्त्या च कपिलां दद्यादलङ्कृत्य विधानतः॥ ५ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसकी अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्महस्ताय ते नमः', 'विश्वधारिणे ते नमः', 'दिवाकर तुभ्यं नमः', 'प्रभाकर ते नमोऽस्तु'—इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको |