मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८१ विशोकद्वादशी-व्रतकी विधि
| २८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते॥ १८<br>सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता।<br>सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी ॥ १९<br>इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम्।<br>शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २० | जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा—कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १८—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीव्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीव्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
विशोकसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>विशोकसप्तमीं तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव।<br>यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते॥ १<br>माघे कृष्णातिलैः स्नात्वा षष्ठ्यां वै शुक्लपक्षतः।<br>कृताहारः कृसरया दन्तधावनपूर्वकम्।<br>उपवासव्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेन्निशि॥ २<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममर्कायेति च पूजयेत्।<br>करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च॥ ३<br>यथा विशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च॥ ४<br>एवं सम्पूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्।<br>सुप्त्वा सम्प्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः॥ ५<br>सम्पूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम्।<br>तद्वस्त्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ६ | ईश्वरने कहा—मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे स्नान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वनिर्मित कमलको स्थापित कर 'अर्काय नमः'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्वारा सूर्यकी पूजा करे और ऐसा कहे—'आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुड़पूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। |
| * अध्याय ७६ * | २८७ |
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| अतैललवणं भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः।<br>ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ७<br>अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः।<br>कृत्वा यावत् पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी ॥ ८<br>व्रतान्ते कलशं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>शय्यां सोपस्करां दद्यात् कपिलां च पयस्विनीम् ॥ ९<br>अनेन विधिना यस्तु वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>विशोकसप्तमीं कुर्यात् स याति परमां गतिम् ॥ १०<br>यावज्जन्मसहस्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत्।<br>तावन्न शोकमभ्येति रोगदौर्गत्यवर्जितः ॥ ११<br>यं यं प्रार्थयते कामं तं तमाप्नोति पुष्कलम्।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ १२<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि विशोकाख्यां च सप्तमीम्।<br>सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःखी जायते क्वचित् ॥ १३ | स्वयं सप्तमीको तेल और नमकसहित अन्नका भोजन करके मौन धारण कर ले। वैभवकी इच्छा रखनेवाले व्रतीको उस दिन पुराणोंकी कथाएँ सुननी चाहिये। इस विधिसे दोनों पक्षोंमें सारा कार्य तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः माघमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी न आ जाय॥१—८॥<br>व्रतके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसमेत कलश, समस्त उपकरणोंसहित शय्या और दुधारू कपिला गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य कृपणता छोड़कर उपर्युक्त विधिके अनुसार विशोकसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है तथा करोड़ों जन्मतक उसे शोककी प्राप्ति नहीं होती। वह रोग और दुर्गतिसे रहित हो जाता है तथा जिस-जिस मनोरथकी प्रार्थना करता है, उसे-उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त करता है। जो व्रती निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस विशोकसप्तमीव्रतकी कथा या विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी इस लोकमें कभी दुःखी नहीं होता और अन्तमें इन्द्रलोकको प्राप्त होता है॥९—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकसप्तमीव्रतं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकसप्तमीव्रत नामक पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥
छियत्तरवाँ अध्याय
फलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>अन्यामपि प्रवक्ष्यामि नाम्ना तु फलसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरः पापाद् विमुक्तः स्वर्गभाग् भवेत् ॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>तामुपोष्याथ कमलं कारयित्वा तु काञ्चनम् ॥ २<br>शर्करासंयुक्तं दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>रविं काञ्चनकं कृत्वा पलस्यैकस्य धर्मवित्।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां भानुर्मे प्रीयतामिति ॥ ३<br>भक्त्या तु विप्रान् सम्पूज्य चाष्टम्यां क्षीरभोजनम्।<br>दत्त्वा कुर्यात् फलयुतं यावत् स्यात् कृष्णसप्तमी ॥ ४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं फलसप्तमी नामक एक अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो स्वर्गभागी हो जाता है। व्रतनिष्ठ मनुष्यको चाहिये कि वह मार्गशीर्ष नामक शुभ मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको सोनेका एक कमल बनवाये और उस दिन उपवास कर उसे शक्करसमेत कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इसी प्रकार धर्मवेत्ता व्रती एक पल सोनेकी सूर्यकी मूर्ति बनवाकर उसे सायंकालके समय 'भगवान् सूर्य मुझपर प्रसन्न हों'—यों कहकर ब्राह्मणको दान करे। फिर अष्टमीके दिन ब्राह्मणोंको फलसहित दूधसे बने हुए अन्नका भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। ऐसा तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः |
| २८८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तामप्युपोष्य विधिवदनेनैव क्रमेण तु।<br>तद्वद्धेमफलं दत्त्वा सुवर्णकमलान्वितम्॥ ५<br><br>शर्करापात्रसंयुक्तं वस्त्रमाल्यसमन्वितम्।<br>संवत्सरं च तेनैव विधिनाभयसप्तमीम्॥ ६<br><br>उपोष्य दत्त्वा क्रमशः सूर्यमन्त्रमुदीरयेत्।<br>भानुरर्को रविर्ब्रह्मा सूर्यः शक्रो हरिः शिवः।<br>श्रीमान् विभावसुस्त्वष्टा वरुणः प्रीयतामिति॥ ७<br><br>प्रतिमासं च सप्तम्यामेकैकं नाम कीर्तयेत्।<br>प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत् कुर्वन् समाचरेत्॥ ८<br><br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूजयेद् वस्त्रभूषणैः।<br>शर्कराकलशं दद्याद्धेमपद्मदलान्वितम्॥ ९<br><br>यथा न विफलाः कामास्त्वद्भक्तानां सदा रवे।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु मे सप्तजन्मसु॥ १०<br><br>इमामसन्तफलदां यः कुर्यात् फलसप्तमीम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते॥ ११<br><br>सुरापानादिकं किञ्चिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>तत् सर्वं नाशमायाति यः कुर्यात् फलसप्तमीम्॥ १२<br><br>कुर्वाणः सप्तमीं चेमां सततं रोगवर्जितः।<br>भूतान् भव्यांश्च पुरुषांस्तारयेदेकविंशतिम्।<br>यः शृणोति पठेद् वापि सोऽपि कल्याणभाग् भवेत्॥ १३ | कृष्णपक्षकी सप्तमी न आ जाय। उस दिन भी उसी क्रमसे विधिपूर्वक उपवास करके स्वर्णमय कमलके साथ स्वर्णनिर्मित फलका दान करना चाहिये। उसके साथ शक्करसे भरा हुआ पात्र, वस्त्र और पुष्पमाला भी होना आवश्यक है। इस प्रकार एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी सप्तमीके दिन उपवास और दान कर क्रमशः सूर्य-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा और वरुण—ये मुझपर प्रसन्न हों। मार्गशीर्षसे प्रारम्भ कर प्रत्येक मासकी सप्तमी तिथिको उपर्युक्त नामोंमें क्रमशः एक-एकका कीर्तन करना चाहिये। प्रत्येक पक्षमें फलदान करनेका भी विधान है। इस प्रकार सारा कार्य करते हुए व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १-८॥<br><br>व्रतकी समाप्तिपर वस्त्र और आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे और स्वर्णमय कमलसहित शक्करसे भरा हुआ कलश दान करे। उस समय ऐसा कहे—'सूर्यदेव! जिस प्रकार आपके भक्तोंकी कामनाएँ कभी विफल नहीं होतीं, उसी प्रकार मुझे भी सात जन्मोंतक अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहे।' जो मनुष्य इस अनन्त फलदायिनी फलसप्तमीका व्रत करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यद्वारा इस लोकमें अथवा परलोकमें मद्यपान आदि जो कुछ भी दुष्कर्म किया गया है, वह सारा-का-सारा विनष्ट हो जाता है। इस फलसप्तमीव्रतका* निरन्तर अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यके पास रोग नहीं फटकते और वह अपनी भूत एवं भविष्यकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। जो इस व्रत-विधानको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भी कल्याणभागी हो जाता है॥ ९-१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे फलसप्तमीव्रतं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें फलसप्तमीव्रत नामक छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥
* 'व्रतकल्पद्रुम' में इसके अतिरिक्त दो और भिन्न फलसप्तमियाँ निर्दिष्ट हुई हैं।