मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७९ मन्दारसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७३ * | २८३ |
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| त्वं चापि राजन् कुरु सर्वमेतद्<br>यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति ॥ ४४ | इसलिये आप भी इन सारे विधानोंके साथ इस व्रतका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि वेदवेत्तालोग इसका फल अक्षय बतलाते हैं ॥ ४४ ॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! तब अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्मोंको करनेवाले युधिष्ठिरने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा'—कहकर महर्षि पिप्पलादकी विधिवत् पूजा की और उनके वचनोंका पालन किया। जो मनुष्य अनन्यचित्तसे इस व्रत-विधानका श्रवण करता है, भगवान् उसकी सिद्धिका भी विधान करते हैं ॥ ४५ ॥ |
| तथेति सम्पूज्य स पिप्पलादं<br>वाक्यं चकाराद्भुतवीर्यकर्मा।<br>शृणोति यश्चैनमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते ॥ ४५ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽङ्गारकव्रतं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गारकव्रत नामक बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि
| पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— |
|---|---|
| अथातः शृणु भूपाल प्रतिशुक्रं प्रशान्तये।<br>यात्रारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विह ॥ १ | भूपाल! अब मैं विपरीत शुक्रकी* शान्तिके लिये विधान बतला रहा हूँ, सुनिये। इस लोकमें शुक्रके उदयकालमें यात्राके आरम्भ अथवा समाप्तिके अवसरपर शुक्रकी एक चाँदीकी मूर्ति बनवाये, उसे श्वेत मुक्ताफल (मोती)-के साथ श्वेत चावलसे परिपूर्ण सुवर्ण, चाँदी अथवा काँसेके पात्रके ऊपर स्थापित करके श्वेत पुष्प और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर इस वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण कर वह सारा सामान सामवेदके ज्ञाता (सस्वर गान करनेवाले) ब्राह्मणको निवेदित कर दे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर! आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन! आपको प्रणाम है। कवे! मैं आपको अभिवादन करता हूँ। आप मेरी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करें।' भारत! जो मनुष्य शुक्रके विपरीत रहनेपर यात्रा आदि कार्योंमें इस प्रकार विधान करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें |
| राजते वाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथवा पुनः।<br>शुक्लपुष्पाम्बरयुते सिततण्डुलपूरिते ॥ २ | |
| विधाय रजतं शुक्रं शुचिमुक्ताफलान्वितम्।<br>मन्त्रेणानेन तत् सर्वं सामगाय निवेदयेत् ॥ ३ | |
| नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते भृगुनन्दन।<br>कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ४ | |
| एवमस्योदये कुर्वन् यात्रादिषु च भारत।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ ५ |
* ज्योतिषप्रकाश, रत्नमाला, गर्गसंहिता आदिमें शुक्रके सामने यात्रा अत्यन्त हानिकर कही गयी है। ज्योतिर्निबन्ध आदिमें प्रतिकूल शुक्र-शान्तिके लिये कई श्रेष्ठ स्तोत्र तथा 'रेवतीसे कृतिका'-तकमें उन्हें अन्धा बतलाकर यात्रा-विधान निर्दिष्ट है। वहाँ 'मत्स्यपुराण' के ही नामसे—'चतुःशालं चतुर्द्वारम्' आदि श्लोकको उद्धृत कर चार दरवाजेके मकानोंमें शुक्रदोष नहीं माना गया है। सम्भवतः वे श्लोक पहले मत्स्यपुराणमें यहाँ प्राप्त थे। ज्योतिर्निबन्धकी विषयवस्तु इससे बहुधा मिलती है। वहाँ १०वें श्लोकमें इसी प्रकार अर्घ्यदानकी बात आयी है।
२८४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यावच्छुक्रस्य न कृता पूजा संमाल्यकैः शुभैः।<br>वटकैः पूरिकाभिश्च गोधूमैश्चणकैरपि।<br>तावदन्नं न चाश्नीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये ॥ ६<br><br>तद्वद् वाचस्पतेः पूजां प्रवक्ष्यामि युधिष्ठिर।<br>सुवर्णपात्रे सौवर्णममरेशपुरोहितम् ॥ ७<br><br>पीतपुष्पाम्बरयुतं कृत्वा स्नात्वाथ सर्षपैः।<br>पलाशाश्वत्थयोगेन पञ्चगव्यजलेन च॥ ८<br><br>पीताङ्गरागवसनो घृतहोमं तु कारयेत्।<br>प्रणम्य च गवा सार्धं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ९<br><br>नमस्तेऽङ्गिरसां नाथ वाक्पते च बृहस्पते।<br>क्रूरग्रहैः पीडितानाममृताय नमो नमः॥ १०<br><br>संक्रान्तावस्य कौन्तेय यात्रास्वभ्युदयेषु च।<br>कुर्वन् बृहस्पतेः पूजां सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ११ | विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। शुक्रकी वह पूजा जबतक माङ्गलिक पुष्पमाला, बड़ा, पूरी, गेहूँ और चनाद्वारा सम्पन्न न कर ली जाय, तबतक धर्म, अर्थ और कामकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिये भोजन नहीं करना चाहिये॥ १—६॥<br><br>युधिष्ठिर ! इसी प्रकार मैं बृहस्पतिकी भी पूजा-विधि बतला रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि वह सरसों, पलाश, पीपल और पञ्चगव्यसे युक्त जलसे स्नान करे, पीला वस्त्र पहनकर शरीरमें पीला अङ्गराग, चन्दन आदिका अनुलेप करे और ब्राह्मणद्वारा घीका हवन करावे। तत्पश्चात् मूर्तिको प्रणाम करके गौसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'वाणीके अधीश्वर ! आप अङ्गिरा-वंशियोंके स्वामी हैं। बृहस्पते ! क्रूर ग्रहोंसे पीड़ित प्राणियोंके लिये आप अमृततुल्य फलदाता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' कुन्तीनन्दन ! सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, यात्राओंमें तथा अन्यान्य आभ्युदयिक कार्योंके अवसरपर बृहस्पतिकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ७—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे गुरुशुक्रपूजाविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुक्र-गुरु-पूजाविधि नामक तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
कल्याणसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक।<br>किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम् ॥ १<br><br>ईश्वर उवाच<br>सौरं धर्मं प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम्।<br>विशोकसप्तमीं तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम् ॥ २<br><br>शर्करासप्तमीं पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्।<br>मन्दारसप्तमीं तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ॥ ३ | **ब्रह्माने पूछा—**भगवन् ! आप तो भवसागररूपी संसारसे उद्धार करनेवाले हैं, अतः कोई ऐसा व्रत बताइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो ॥ १ ॥<br><br>**ईश्वरने कहा—**ब्रह्मन् ! अब मैं सूर्यसे सम्बन्धित धर्म (व्रत)-का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है। |