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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
७२ अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
पृष्ठ 281स्थायी लिंक
* अध्याय ६९ * <span style="float: right;">२७१</span>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नातः पुरा मण्डलमेष तद्वत्<br>तेजोमयं वेदशरीरमाप।<br>अस्यां च कल्याणतिथौ विवस्वान्<br>सहस्रधारेण सहस्ररश्मिः॥ ६१<br><br>इदमेव कृतं महेन्द्रमुख्यै-<br>र्वसुभिर्देवसुरारिभिस्तथा तु।<br>फलमस्य न शक्यतेऽभिवक्तुं<br>यदि जिह्वायुतकोटयो मुखे स्युः॥ ६२ | वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। पूर्वकालमें इस कल्याणमयी तिथिको सहस्र किरणधारी सूर्यने हजारों धाराओंसे स्नान किया था, इसी कारण उन्हें उस प्रकारका तेजोमय मण्डल और वेदमय शरीर प्राप्त हुआ है। महेन्द्र आदि देवताओं, वसुओं तथा असुरोंने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया है। यदि एक मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हों तो भी इसके फलका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५९-६२॥ |
| कलिकलुषविदारिणीमनन्ता-<br>मिति कथयिष्यति यादवेन्द्रसूनुः।<br>अपि नरकगतान् पितॄनशेषा-<br>नलमुद्धर्तुमिहैव यः करोति॥ ६३<br><br>य इदमघविदारणं शृणोति<br>भक्त्या परिपठतीह परोपकारहेतोः।<br>तिथिमिह सकलार्थभाङ्नरेन्द्र-<br>स्तव चतुरानन साम्यतामुपैति॥ ६४<br><br>कल्याणिनी नाम पुरा बभूव<br>या द्वादशी माघदिनेषु पूज्या।<br>सा पाण्डुपुत्रेण कृता भविष्य-<br>त्यनन्तपुण्यानघ भीमपूर्वा॥ ६५ | ब्रह्मन्! कलियुगके पापोंको नष्ट करनेवाली एवं अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस कल्याणमयी तिथिकी महिमाका वर्णन यादवराजकुमार भगवान् श्रीकृष्ण अपने श्रीमुखसे करेंगे। जो इसके व्रतका अनुष्ठान करता है, उसके नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंका भी यह उद्धार करनेमें समर्थ है। चतुरानन! जो अत्यन्त भक्तिके साथ इस पापनाशक व्रतकी कथाको सुनता तथा दूसरोंके उपकारके लिये पढ़ता है, वह इस लोकमें जनताका स्वामी और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका भागी हो जाता है तथा परलोकमें आपकी समताको प्राप्त कर लेता है। पूर्वकल्पमें जो माघमासकी द्वादशी परम पूजनीय कल्याणिनी तिथिके नामसे प्रसिद्ध थी, वही पाण्डुनन्दन भीमसेनके व्रत करनेपर अनन्त पुण्यदायिनी 'भीमद्वादशी' के नामसे प्रसिद्ध होगी॥ ६३-६५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भीमद्वादशीव्रतं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भीमद्वादशी-व्रत नामक उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६९॥
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| २७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
सत्तरवाँ अध्याय
पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजीने पूछा— |
|---|---|
| वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषु मया श्रुतः।<br>सदाचारस्य भगवन् धर्मशास्त्रविनिश्चयः।<br>पण्यस्त्रीणां सदाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ १॥ | भगवान्! मैं पुराणोंमें सभी वर्णों और आश्रमोंके सदाचारकी उत्पत्ति तथा धर्मशास्त्रके सिद्धान्तोंको तो सुन चुका, अब मैं पण्यस्त्रियों (मूल्यद्वारा खरीदी जानेवाली स्त्रियों)-के समुचित आचारको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ*॥ १॥ |
| ईश्वर उवाच | भगवान् शंकरने कहा— |
| तस्मिन्नेव युगे ब्रह्मन् सहस्राणि तु षोडश।<br>वासुदेवस्य नारीणां भविष्यन्त्यम्बुजोद्भव॥ २ | कमलोद्भव ब्रह्मन्! उसी द्वापरयुगमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सोलह सहस्र पत्नियाँ होंगी। |
| ताभिर्वसन्तसमये कोकिलालिकुलाकुले।<br>पुष्पितोपवने फुल्लकह्लारसरस्तटे॥ ३ | एक बार वसन्त-ऋतुमें वे सभी नारियाँ खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित वनमें उत्फुल्ल कमल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एक सरोवरके तटपर जायँगी। उस समय कोकिल कूज रहे होंगे, भ्रमर-समूह अपनी गुंजार चतुर्दिक् बिखेर रहे होंगे तथा शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन बह रहा होगा। इसी समय वे निश्चिन्त रूपसे एकत्र होकर जलपान आदि कार्योंमें लीन होंगी। |
| निर्भरं सह पत्नीभिः प्रसक्ताभिरलङ्कृतः।<br>रमयिष्यति विश्वात्मा कृष्णो यदुकुलोद्वहः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् मालतीकृतशेखरः॥ ४ | उस समय यदुकुलके उद्धारक विश्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके साथ वहाँ भ्रमण करेंगे। |
| गच्छन् समीपमार्गेण साम्बः परपुरञ्जयः।<br>साक्षात् कन्दर्परूपेण सर्वाभरणभूषितः॥ ५ | उसी समय शत्रु-नगरीको जीतनेवाले, अलंकारोंसे सुशोभित श्रीमान् साम्ब, जिनके नेत्र मृगनेत्रसरीखे होंगे, जिनका मस्तक मालतीकी मालासे सुशोभित होगा, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा रूपसे साक्षात् कामदेवके समान होंगे, उस सरोवरके समीपवर्ती मार्गसे जा निकलेंगे। |
| अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलाषमवेक्षितः।<br>प्रवृद्धो मन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि॥ ६ | उन्हें देखकर वे सभी (स्त्रियाँ) रागभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगेंगी। |
| तदावेक्ष्य जगन्नाथः सर्वतो ध्यानचक्षुषा।<br>शापं वक्ष्यति ताः सर्वा वो हरिष्यन्ति दस्यवः।<br>मत्परोक्षं यतः कामलौल्यादीदृग्विधं कृतम्॥ ७ | तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण ध्यान-दृष्टिसे सारा वृत्तान्त जानकर उन्हें शाप दे देंगे—'चूँकि तुमलोगोंने मुझसे विश्वासघात किया; कामलोलुपतावश ऐसा जघन्य कार्य किया है, इसलिये चोर तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे।' |
| ततः प्रसादितो देव इदं वक्ष्यति शार्ङ्गभृत्।<br>ताभिः शापाभितप्ताभिर्भगवान् भूतभावनः॥ ८ | तत्पश्चात् शापसे संतप्त हुई उन स्त्रियोंद्वारा प्रसन्न किये जानेपर |
| उत्तारभूतं दाशत्वं समुद्राद् ब्राह्मणप्रियः।<br>उपदेक्ष्यत्यनन्तात्मा भाविकल्याणकारकम्॥ ९ | भगवान् श्रीकृष्ण जो अनन्तात्मा, ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा प्राणियोंको भवसागरसे पार करनेवाले कर्णधार हैं, उन्हें भविष्यमें |
* इस अध्यायमें कृपालु भगवान्द्वारा—'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९। ३२)-के भाव, पापयोनिकी व्याख्या तथा उनके कल्याणकी पद्धति निर्दिष्ट हुई हैं। यह अध्याय पद्म० खं० २३। ७४—१४६ तथा भविष्य० ४। १२०। १—७३ तकमें तो ज्यों-का-त्यों आता ही है।
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| * अध्याय ७० * | २७३ |
|---|---|
| भवतीनामृषिर्दाल्भ्यो यद् व्रतं कथयिष्यति।<br>तदेवोत्तारणायालं दासीत्वेऽपि भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा ताः परिष्वज्य गतो द्वारवतीश्वरः॥ १०<br>ततः कालेन महता भारावतरणे कृते।<br>निवृत्ते मौसले तद्वत् केशवे दिवमागते॥ ११<br>शून्ये यदुकुले सर्वैःशूरैरपि जितेऽर्जुने।<br>हृतासु कृष्णपत्नीषु दाशभोग्यासु चाम्बुधौ॥ १२<br>तिष्ठन्तीषु च दौर्गत्यसंतप्तासु चतुर्मुख।<br>आगमिष्यति योगात्मा दाल्भ्यो नाम महातपाः॥ १३<br>तास्तमर्घ्येण सम्पूज्य प्रणिपत्य पुनः पुनः।<br>लालप्यमाना बहुशो बाष्पपर्याकुलेक्षणाः॥ १४<br>स्मरन्त्यो विपुलान् भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनम्।<br>भर्तारं जगतामीशमनन्तमपराजितम्॥ १५<br>दिव्यभावां तां च पुरीं नानारत्नगृहाणि च।<br>द्वारकावासिनः सर्वान् देवरूपान् कुमारकान्।<br>प्रश्नमेवं करिष्यन्ति मुनेरभिमुखं स्थिताः॥ १६ | इस प्रकार कल्याणकारी मार्गका उपदेश करेंगे—'महर्षि दाल्भ्य तुमलोगोंको जो व्रत बतलायेंगे, वही दासीत्वावस्थामें भी तुमलोगोंका उद्धार करनेमें समर्थ होगा।' यों कहकर द्वारकाधीश वहाँसे चले जायेंगे। चतुर्मुख! इसके बहुत दिन बाद जब श्रीभगवान्द्वारा पृथ्वीका भार दूर करने, मौसलयुद्ध समाप्त होने—मूसलद्वारा यदुवंशियोंके विनाश होने, भगवान् श्रीकृष्णके वैकुण्ठ पधार जाने तथा यदुकुलके वीरोंसे शून्य हो जानेपर दस्युगण अर्जुनको पराजितकर श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लेंगे और उन्हें अपनी पत्नी बना लेंगे, तब अपनी दुर्गतिसे दुःखी हुई वे सभी समुद्रमें निवास करेंगी। उसी समय महान् तपस्वी योगात्मा महर्षि दाल्भ्य वहाँ आयेंगे। तब वे ऋषिकी अर्घ्यद्वारा पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणिपात करेंगी और आँखोंमें आँसू भरकर अनेकों प्रकारसे विलाप करेंगी। उस समय उनको प्रचुर भोगोंका, दिव्य पुष्पमाला और अनुलेपका, अनन्त एवं अपराजित जगदीश्वर पतिका, दिव्य भावोंसे संयुक्त द्वारकापुरीका, नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित गृहोंका, द्वारकावासियोंका और देवरूपी सभी कुमारोंका स्मरण हो रहा होगा। तब वे मुनिके समक्ष खड़ी होकर इस प्रकार प्रश्न करेंगी॥ २—१६॥ |
| स्त्रिय ऊचुः<br>दस्युभिर्भगवन् सर्वाः परिभुक्ता वयं बलात्।<br>स्वधर्माच्च्यवनेऽस्माकमस्मिंस्त्वं शरणं भव॥ १७<br>आदिष्टोऽसि पुरा ब्रह्मन् केशवेन च धीमता।<br>कस्मादीशेन संयोगं प्राप्य वेश्यात्वमागताः॥ १८<br>वेश्यानामपि यो धर्मस्तं नो ब्रूहि तपोधन।<br>कथयिष्यत्यतस्तासां स दाल्भ्यश्चैकितायनः॥ १९ | स्त्रियाँ कहेंगी— भगवन्! डाकुओंने बलपूर्वक (हमलोगोंका अपहरण करके) अपने वशीभूत कर लिया है। इस प्रकार हम सभी अपने धर्मसे च्युत हो गयी हैं। अब इस विषयमें आप हमलोगोंके आश्रयदाता बनें। ब्रह्मन्! इसके लिये बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पहले ही आपको आदेश दे दिया है। पता नहीं, किस घोर पाप-कर्मके कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णका संयोग पाकर भी हमलोग कुधर्ममें आ पड़ी हैं। इसलिये तपोधन! पण्यस्त्रियोंके लिये भी जो धर्म कहे गये हैं, उन्हें हमें बताइये। उनके द्वारा यों पूछे जानेपर चेकितायन महर्षिके पुत्र दाल्भ्य उन्हें सारा वृत्तान्त बतलायेंगे॥ १७—१९॥ |
| दाल्भ्य उवाच<br>जलक्रीडाविहारेषु पुरा सरसि मानसे।<br>भवतीनां च सर्वासां नारदोऽभ्याशमागतः॥ २० | दाल्भ्य कहते हैं— नारियो! पूर्वकालमें तुमलोग अप्सराएँ थीं और सब-की-सब अग्निकी कन्याएँ थीं। एक बार जब तुमलोग मानस-सरोवरमें जलक्रीड़ाद्वारा मनोरंजन कर रही थीं, उसी समय तुमलोगोके निकट नारदजी आ पहुँचे। |
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| २७४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|---|
| हुताशनसुताः सर्वा भवन्त्योऽप्सरसः पुरा।<br>अप्रणम्यावलेपेन परिपृष्टः स योगवित्।<br>कथं नारायणोऽस्माकं भर्ता स्यादित्युपादिश॥ २१<br><br>तस्माद् वरप्रदानं वः शापश्चायमभूत् पुरा।<br>शय्याद्वयप्रदानेन मधुमाधवमासयोः॥ २२<br><br>सुवर्णोपस्करोत्सर्गाद् द्वादश्यां शुक्लपक्षतः।<br>भर्ता नारायणो नूनं भविष्यत्यन्यजन्मनि॥ २३<br><br>यदकृत्वा प्रणामं मे रूपसौभाग्यमत्सरात्।<br>परिपृष्टोऽस्मि तेनाशु वियोगो वो भविष्यति।<br>चौरैरपहताः सर्वा वेश्यात्वं समवाप्स्यथ॥ २४<br><br>एवं नारदशापेन केशवस्य च धीमतः।<br>वेश्यात्वमागताः सर्वा भवन्त्यः काममोहिताः।<br>इदानीमपि यद् वक्ष्ये तच्छृणुध्वं वराङ्गनाः॥ २५<br><br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु शतशः सुरैः।<br>दानवासुरदैत्येषु राक्षसेषु ततस्ततः॥ २६<br><br>तेषां व्रातसहस्राणि शतान्यपि च योषिताम्।<br>परिणीतानि यानि स्युर्बलाद् भुक्तानि यानि वै।<br>तानि सर्वाणि देवेशः प्रोवाच वदतां वरः॥ २७<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>वेश्याधर्मेण वर्तध्वमधुना नृपमन्दिरे।<br>भक्तिमत्यो वरारोहास्तथा देवकुलेषु च॥ २८<br><br>राजानः स्वामिनस्तुल्याः सुता वापि च तत्समाः।<br>भविष्यति च सौभाग्यं सर्वासामपि शक्तितः॥ २९<br><br>यः कश्चिच्छुल्कमादाय गृहमेष्यति वः सदा।<br>निधनेनोपचार्यो वः स तदान्यत्र दाम्भिकात्॥ ३०<br><br>देवतानां पितॄणां च पुण्याहे समुपस्थिते।<br>गोभूहिरण्यधान्यानि प्रदेयानि स्वशक्तितः।<br>ब्राह्मणानां वरारोहाः कार्याणि वचनानि च॥ ३१<br><br>यच्चाप्यन्यद् व्रतं सम्यगुपदेक्ष्याम्यहं ततः।<br>अविचारेण सर्वाभिरनुष्ठेयं च तत् पुनः॥ ३२<br><br>संसारोत्तारणायालमेतद् वेदविदो विदुः। | उस समय तुमलोग गर्ववश उन्हें प्रणाम न कर उन योगवेत्तासे इस प्रकार प्रश्न कर बैठीं—'देवर्षे! भगवान् नारायण किस प्रकार हमलोगोंके पति हो सकते हैं, इसका उपाय बतलाइये।' उस समय तुमलोगोंको नारदजीसे वरदान और शाप दोनों प्राप्त हुए थे। (उन्होंने कहा था—) 'यदि तुमलोग चैत्र और वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन स्वर्णनिर्मित उपकरणोंसहित दो शय्याएँ प्रदान करोगी तो निश्चय ही दूसरे जन्ममें भगवान् नारायण तुमलोगोंके पति होंगे। साथ ही सुन्दरता और सौभाग्यके अभिमानवश जो तुमलोगोंनें मुझे बिना प्रणाम किये ही मुझसे प्रश्न किया है, इस कारण तुमलोगोंका उनसे शीघ्र ही वियोग भी हो जायगा तथा डाकू तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे और तुम सभी कुधर्मको प्राप्त हो जाओगी।' इस प्रकार नारदजी एवं बुद्धिमान् भगवान् केशवके शापसे तुम सभी कामसे मोहित होकर कुधर्मको प्राप्त हो गयी हो। सुन्दरियो! इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भी तुमलोग ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें घटित हुए सैकड़ों देवासुर-संग्रामोंमें देवताओंने समय-समयपर बहुत-से दानवो, असुरों, दैत्यों और राक्षसोंको मार डाला था, उनकी जो सैकड़ों-हजारों यूथ-की-यूथ पत्नियाँ थीं, जिन्हें अन्य राक्षसोंने बलपूर्वक (इसी प्रकार) ब्याह लिया था, उन सबसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने कहा॥ २०—२७॥<br><br>**इन्द्र बोले—**भक्तिमती सुन्दरियो! तुमलोगोंको दाम्भिकोंसे सदा दूर रहना चाहिये। तुमलोगोंको देवताओं एवं पितरोंके पुण्य-पर्व आनेपर अपनी शक्तिके अनुसार गौ, पृथ्वी, स्वर्ण और अन्न आदिका दान करना तथा ब्राह्मणोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त मैं तुमलोगोंको जिस दूसरे व्रतका उपदेश दे रहा हूँ, उसका भी बिना आगा-पीछा सोचे तुम सभीको अनुष्ठान करना चाहिये। यह व्रत तुमलोगोंका संसारसे उद्धार करनेमें समर्थ है। इसे वेदवेत्तालोग ही जानते हैं॥ २८—३३ ½ ॥ |