मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७० पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२६४ * मत्स्यपुराण *
होतव्याः समिधश्चात्र तथैवार्कपलाशयोः ।
यवकृष्णातिलैर्होमः कर्तव्योऽष्टशतं पुनः ॥ १८
व्याहृतिभिस्तथाऽऽज्येन तथैवाष्टशतं पुनः।
हुत्वा स्नानं च कर्तव्यं मङ्गलं येन धीमता ॥ १९
विप्रेण वेदविदुषा विधिवद् दर्भपाणिना ।
स्थापयित्वा तु चतुरः कुम्भान् कोणेषु शोभनान् ॥ २०
पञ्चमं च पुनर्मध्ये दध्यक्षतविभूषितम् ।
स्थापयेदव्रणं कुम्भं समर्चेनाभिमन्त्रितम् ॥ २१
सौरेण तीर्थतोयेन पूर्णं रत्नसमन्वितम् ।
सर्वान् सर्वौषधैर्युक्तान् पञ्चगव्यसमन्वितान् ।
पञ्चरत्नफलैः पुष्पैर्वासोभिः परिवेष्टयेत् ॥ २२
गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्ध्रदगोकुलात् ।
संशुद्धां मृदानीय सर्वेष्वेव विनिक्षिपेत् ॥ २३
चतुर्ष्वपि च कुम्भेषु रत्नगर्भेषु मध्यमम् ।
गृहीत्वा ब्राह्मणस्तत्र सौरान् मन्त्रानुदीरयेत् ॥ २४
नारीभिः सप्तसंख्याभिर्व्यङ्गाङ्गीभिरत्र च।
पूजिताभिर्यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः ।
सविप्राभिश्च कर्तव्यं मृतवत्साभिषेचनम् ॥ २५
दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवपुत्रा च भामिनी ।
आदित्यश्चन्द्रमाः सार्धं ग्रहनक्षत्रमण्डलैः ॥ २६
सशक्रा लोकपाला वै ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
ते ते चान्ये च देवौघाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥ २७
मित्रः शनिर्वा हुतभुग् ये च बालग्रहाः क्वचित् ।
पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुर्जनकस्य वै ॥ २८
ततः शुक्लाम्बरधरा कुमारपतिसंयुता ।
सप्तकं पूजयेद् भक्त्या स्त्रीणामथ गुरुं पुनः ॥ २९
काञ्चनीं च ततः कुर्यात् ताम्रपात्रोपरिस्थिताम् ।
प्रतिमां धर्मराजस्य गुरवे विनिवेदयेत् ॥ ३०
रूद्रसूक्तकी ऋचाओंका पाठ एवं उनके द्वारा हवन करना
चाहिये। इस व्रतमें हवनके लिये मन्दार और पलाशकी
समिधा होनी चाहिये। पुनः जौं और काले तिलद्वारा एक
सौ आठ बार हवन करनेका विधान है। उसी प्रकार
व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)-
के उच्चारणपूर्वक एक सौ आठ बार घीकी आहुति देनी
चाहिये। इस प्रकार हवन करके बुद्धिमान् व्रती पुनः स्नान
करे; क्योंकि इससे मङ्गलकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर
हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा वेदीके चारों
कोणोंमें चार सुन्दर कलश स्थापित कराये। पुनः उसके
बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही-
अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धिनी सात ऋचाओंसे
अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें
रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सर्वौषधि,
पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे
परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, विमवट,
नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वारसे शुद्ध मिट्टी
लाकर उन सभी कलशोंमें छोड़ दे ॥ १३-२३ ॥
तदनन्तर कार्यकर्ता ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके
मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका
पाठ करे तथा सात ऐसी स्त्रियोंद्वारा, जो किसी अङ्गसे
हीन न हों तथा जिनकी यथाशक्ति पुष्पमाला, वस्त्र और
आभूषणोंद्वारा पूजा की गयी हो, ब्राह्मणके साथ-साथ उस
घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये।
(अभिषेकके समय इस प्रकार कहे-) 'यह बालक
दीर्घायु और यह स्त्री जीवपुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो।
सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित
लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, इनके अतिरिक्त
अन्यान्य जो देव-समूह हैं, वे सभी इस कुमारकी सदा
रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई
बालग्रह हों वे सभी इस बालकको तथा इसके माता-
पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात्
वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके
साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः
गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमाको
ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके गुरुको निवेदित कर दे।
| * अध्याय ६८ * | २६५ |
|---|
| वस्त्रकाञ्चनरत्नौघैर्भक्ष्यैः सघृतपायसैः ।<br>पूजयेद् ब्राह्मणॉस्तद्वद् वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥ ३१<br>भुक्त्वा च गुरुणा चेयमुच्चार्या मन्त्रसन्ततिः ।<br>दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी ॥ ३२<br>यत्किञ्चिदस्य दुरितं तत् क्षिप्तं वडवानले ।<br>ब्रह्मा रुद्रो वसुः स्कन्दो विष्णुः शक्रो हुताशनः ॥ ३३<br>रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदाः सन्तु सर्वदा ।<br>एवमादीनि वाक्यानि वदन्तं पूजयेद् गुरुम् ॥ ३४<br>शक्तितः कपिलां दद्यात् प्रणम्य च विसर्जयेत् ।<br>चरुं च पुत्रसहिता प्रणम्य रविशङ्करौ ॥ ३५<br>हुतशेषं तदाश्नीयादादित्याय नमोऽस्त्विति ।<br>इदमेवाद्भुतोद्वेगदुःस्वप्नेषु प्रशस्यते ॥ ३६ | उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षोंतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था उसे बडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि—ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके विदा कर दे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'—यह कहकर खा जाय। यही व्रत आश्चर्यजनक उद्विग्नता और दुःस्वप्न आदिमें भी प्रशस्त माना गया है॥ २४—३६॥ |
| कर्तुर्जन्मदिनर्क्षं च त्यक्त्वा सम्पूजयेत् सदा ।<br>शान्त्यर्थं शुक्लसप्तम्यामेतत् कुर्वन् न सीदति ॥ ३७<br>सदानेन विधानेन दीर्घायुरभवन्नरः ।<br>संवत्सराणामयुतं शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ३८<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सप्तमीस्नपनं रविः ।<br>कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३९<br>एतत् सर्वं समाख्यातं सप्तमीस्नानमुत्तमम् ।<br>सर्वदुष्टोपशमनं बालानां परमं हितम् ॥ ४०<br>आरोग्यं भास्करादिच्छेद् धनमिच्छेद्धुताशनात् ।<br>ईश्वराज्ज्ञानमन्विच्छेन्मोक्षमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ ४१<br>एतन्महापातकनाशनं स्यात्<br>परं हितं बालविवर्धनं च ।<br>शृणोति यश्चैन्नमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं मुनयो वदन्ति ॥ ४२ | इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल-पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये; क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा इस विधानके अनुसार इस व्रतका अनुष्ठान करता है वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कृतवीर्यने दस हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमीस्नपन-व्रतका विधान बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार मैंने इस सप्तमीस्नपन-व्रतका, जो सर्वश्रेष्ठ, समस्त दोषोंको शान्त करनेवाला और बालकोंके लिये परम हितकारक है, समग्ररूपसे वर्णन कर दिया। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये। यह व्रत बड़े-से-बड़े पापोंका विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको श्रवण करता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा मुनियोंका कथन है॥ ३७—४२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सप्तमीस्नपनव्रतं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सप्तमीस्नपन-व्रत नामक अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६८॥
२६६ * मत्स्यपुराण *
उनहत्तरवाँ अध्याय
भीमद्वादशी-व्रतका विधान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>पुरा रथन्तरे कल्पे परिपृष्टो महात्मना।<br>मन्दरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम्॥ १ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! प्राचीन रथन्तरकल्पकी बात है, पिनाकधारी भगवान् शंकर मन्दराचलपर विराजमान थे। उस समय महात्मा ब्रह्माजीने स्वयं ही उनके पास जाकर प्रश्न किया॥ १॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>कथमारोग्यमैश्वर्यमनन्तममरेश्वर ।<br>स्वल्पेन तपसा देव भवेन्मोक्षोऽथवा नृणाम्॥ २<br><br>किंमज्ञातं महादेव त्वत्प्रसादादधोक्षज।<br>स्वल्पकेनाथ तपसा महत्फलमिहोच्यताम्॥ ३ | ब्रह्माजीने पूछा— देवेश्वर! थोड़ी-सी तपस्यासे मनुष्योंको नीरोगता, अनन्त ऐश्वर्य और मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? महादेव! आपके लिये कुछ अज्ञात तो है नहीं, अर्थात् आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये अधोक्षज! आपकी कृपासे थोड़ी-सी तपस्याद्वारा इस लोकमें महान् फलकी प्राप्तिका क्या उपाय है? यह बतलाइये॥ २-३॥ |
| मत्स्य उवाच<br>एवं पृष्टः स विश्वात्मा ब्रह्मणा लोकभावनः।<br>उमापतिरुवाचेदं मनसः प्रीतिकारकम्॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा— ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर जगत्की उत्पत्ति एवं वृद्धि करनेवाले विश्वात्मा उमानाथ शिव मनको प्रिय लगनेवाले वचन बोले॥ ४॥ |
| ईश्वर उवाच<br>अस्माद् रथन्तरात् कल्पात् त्रयोविंशात् पुनर्यदा।<br>वाराहो भविता कल्पस्तस्य मन्वन्तरे शुभे॥ ५<br><br>वैवस्वताख्ये संजाते सप्तमे सप्तलोककृत्।<br>द्वापराख्यं युगं तद्वदष्टाविंशतिमं जगुः॥ ६<br><br>तस्यान्ते स महादेवो वासुदेवो जनार्दनः।<br>भारावतरणार्थाय त्रिधा विष्णुर्भविष्यति॥ ७<br><br>द्वैपायनऋषिस्तद्वद् रौहिणेयोऽथ केशवः।<br>कंसादिदर्पमथनः केशवः क्लेशनाशनः॥ ८<br><br>पुरीं द्वारवतीं नाम साम्प्रतं या कुशस्थली।<br>दिव्यानुभावसंयुक्तामधिवासाय शार्ङ्गिणः।<br>त्वष्टा ममाज्ञया तद्वत् करिष्यति जगत्पतेः॥ ९<br><br>तस्यां कदाचिदासीनः सभायाममितद्युतिः।<br>भार्याभिर्वृष्णिभिश्चैव भूभृद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ १०<br><br>कुरुभिर्देवगन्धर्वैरभितः कैटभार्दनः।<br>प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्मसंवर्धिनीषु च॥ ११ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इस तेईसवें रथन्तरकल्पके पश्चात् जब पुनः वाराहकल्प आयेगा, तब उसके सातवें वैवस्वत नामक मङ्गलमय मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर अट्ठाईसवें द्वापर नामक युगके अन्तमें सातों लोकोंके रचयिता देवाधिदेव जनार्दन भगवान् विष्णु वासुदेवरूपसे पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अपनेको महर्षि द्वैपायन, रोहिणीनन्दन बलराम और केशवरूपसे तीन भागोंमें विभक्त करके अवतीर्ण होंगे। वे कष्टहारी केशव कंस आदि राक्षसोंके मदको चूर्ण करेंगे। शार्ङ्गधनुषधारी उन जगत्पतिके निवासके लिये मेरी आज्ञासे विश्वकर्मा द्वारवती (द्वारका) नामकी पुरीका निर्माण करेंगे, जो समस्त दिव्य भावोंसे युक्त होगी। वह इस समय कुशस्थली नामसे विख्यात है। वहीं कभी जब द्वारकाकी सभामें दानवराज कैटभके संहारक अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नियों, वृष्णिवंशी पुरुषों, प्रचुर दक्षिणा देनेवाले राजाओं, कौरवों और देव-गन्धर्वोंसे घिरे हुए बैठे रहेंगे और धर्मकी वृद्धि करनेवाली पौराणिक कथाएँ होती रहेंगी, |
| * अध्याय ६१ * | २६७ |
|---|
| कथान्ते भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान्।<br>त्वया पृष्टस्य धर्मस्य रहस्यस्यास्य भेदकृत्॥ १२<br><br>भविता स तदा ब्रह्मन् कर्ता चैव वृकोदरः।<br>प्रवर्तकोऽस्य धर्मस्य पाण्डुपुत्रो महाबलः॥ १३<br><br>यस्य तीक्ष्णो वृको नाम जठरे हव्यवाहनः।<br>मया दत्तः स धर्मात्मा तेन चासौ वृकोदरः॥ १४<br><br>मतिमान् दानशीलश्च नागायुतबलो महान्।<br>भविष्यत्यजरः श्रीमान् कंदर्प इव रूपवान्॥ १५<br><br>धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीव्राग्नित्वादुपोषणे।<br>इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः॥ १६<br><br>कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>अशेषयज्ञफलदमशेषाघविनाशनम् ॥ १७<br><br>अशेषदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् ।<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>भविष्यं च भविष्याणां पुराणानां पुरातनम्॥ १८<br><br><center>वासुदेव उवाच</center><br>यद्यष्टमीचतुर्दश्योर्द्वादशीष्वथ भारत।<br>अन्येष्वपि दिनर्क्षेषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम्॥ १९<br><br>ततः पुण्यां तिथिमिमां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>उपोष्य विधिनानेन गच्छ विष्णोः परं पदम्॥ २०<br><br>माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत् तदा।<br>घृतेनाभ्यञ्जनं कृत्वा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २१<br><br>तथैव विष्णुमभ्यर्च्य नमो नारायणाय च।<br>कृष्णाय पादौ सम्पूज्य शिरः सर्वात्मने नमः॥ २२<br><br>वैकुण्ठायेति वै कण्ठमुरः श्रीवत्सधारिणे।<br>शङ्खिने चक्रिणे तद्वद् गदिने वरदाय वै।<br>सर्वं नारायणस्यैवं सम्पूज्या बाहवः क्रमात्॥ २३ | तब कथाकी समाप्तिपर भीमसेन प्रतापी श्रीकृष्णसे वैसा ही प्रश्न करेंगे, जो तुम्हारे द्वारा पूछा गया है और इस धर्मके रहस्यके भेदको प्रकट करनेवाला है। ब्रह्मन्! उस समय पाण्डुपुत्र महाबली भीमसेन इस धर्मके कर्ता एवं प्रवर्तक होंगे। उनके उदरमें मेरे द्वारा दिये गये वृक नामक तीक्ष्ण अग्निका निवास होगा, इसी कारण वे धर्मात्मा 'वृकोदर' नामसे विख्यात होंगे। वे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न, दानशील, दस हजार हाथियोंके सदृश बलशाली, महत्त्वयुक्त, जरारहित, लक्ष्मीवान् और कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली होंगे। भीमसेनके धर्मात्मा होनेपर भी उदरमें तीव्र अग्निके स्थित रहनेके कारण उपवासमें असमर्थ जानकर विश्वात्मा जगद्गुरु भगवान् वासुदेव उन्हें यह व्रत बतलायेंगे; क्योंकि यह सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है। यह समस्त यज्ञोंका फलदाता, सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, अखिल दोषोंका शामक, समस्त देवताओंद्वारा सम्मानित, सम्पूर्ण पवित्र पदार्थोंमें परम पवित्र, निखिल मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गलरूप, भविष्यमें सर्वाधिक भव्य और पुरातनोंमें विशेष पुरातन है॥ ५—१८॥<br><br>भगवान् वासुदेव कहेंगे— भारत! यदि तुम अष्टमी, चतुर्दशी, द्वादशी तिथियोंमें तथा अन्यान्य दिनों और नक्षत्रोंमें उपवास करनेमें असमर्थ हो तो मैं तुम्हें एक पापविनाशिनी तिथिका परिचय देता हूँ। उस दिन निम्नाङ्कित विधिसे उपवास कर तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी दशमी* तिथि आये, उस दिन (व्रतीको चाहिये कि) समस्त शरीरमें घी लगाकर तिलमिश्रित जलसे स्नान करे तथा 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। 'श्रीकृष्णाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी और 'सर्वात्मने नमः' कहकर मस्तककी पूजा करे। 'वैकुण्ठाय नमः' इस मन्त्रसे कण्ठकी और 'श्रीवत्सधारिणे नमः' इससे वक्षःस्थलकी अर्चा करे। फिर 'शङ्खिने नमः', 'चक्रिणे नमः', 'गदिने नमः', वरदाय नमः तथा 'सर्वं नारायणस्य' (सब कुछ नारायणका ही है)—ऐसा कहकर आवाहन आदिके क्रमसे भगवान्की बाहुओंकी पूजा करे॥ १९—२३॥ |
* अन्य पुराणोंमें तथा एकादशीमाहात्म्य आदिमें ज्येष्ठ शुक्ल ११को निर्जला या भीमसेनी एकादशी अथवा द्वादशी कहा गया है।
२६८ * मत्स्यपुराण *
| दामोदरायेत्युदरं मेढ्रं पञ्चशराय वै।<br>ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे॥ २४<br><br>नमो नीलाय वै जङ्घे पादौ विश्वसृजे नमः।<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै॥ २५<br><br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै धृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः।<br>नमो विहङ्गनाथाय वायुवेगाय पक्षिणे।<br>विषप्रमाथिने नित्यं गरुडं चाभिपूजयेत्॥ २६<br><br>एवं सम्पूज्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्भक्ष्यैर्नानाविधैरपि॥ २७<br><br>गव्येन पयसा सिद्धां कृसरामथ वाग्यतः।<br>सर्पिषा सह भुक्त्वा च गत्वा शतपदं बुधः॥ २८<br><br>न्यग्रोधं दन्तकाष्ठमथवा खादिरं बुधः।<br>गृहीत्वा धावयेद् दन्तानाचान्तः प्रागुदङ्मुखः॥ २९<br><br>ब्रूयात् सायंतनीं कृत्वा संध्यामस्तमिते रवौ।<br>नमो नारायणायेति त्वामहं शरणं गतः॥ ३० | 'इसके बाद 'दामोदराय नमः' कहकर उदरका, 'पञ्चशराय नमः' इस मन्त्रसे जननेन्द्रियका, 'सौभाग्यनाथाय नमः' इससे दोनों जंघोंका, 'भूतधारिणे नमः' से दोनों घुटनोंका, 'नीलाय नमः' इस मन्त्रसे पिंडलियों (घुटनेसे नीचेके भाग)-का और 'विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों चरणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'धृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे। इसके बाद 'विहङ्गनाथाय नमः', 'वायुवेगाय नमः', 'पक्षिणे नमः', 'विषप्रमाथिने नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा सदा गरुडकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके पकवानोंद्वारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा गणेशजीकी भी पूजा करे। फिर गौके दूधकी बनी हुई खीर लेकर घीके साथ मौनपूर्वक भोजन करे। भोजनके अनन्तर विद्वान् पुरुष सौ पग चलकर बरगद अथवा खैरकी दाँतुन ले उसके द्वारा दाँतोंको साफ करे, फिर मुँह धोकर आचमन करे। सूर्यास्त होनेके बाद पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठकर सायंकालीन संध्या करे। उसके अन्तमें यह कहे—'भगवान् श्रीनारायणको नमस्कार है। भगवन्! मैं आपकी शरणमें आया हूँ।' (इस प्रकार प्रार्थना करके रात्रिमें शयन करे।)॥ २४—३०॥ |
| एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य च केशवम्।<br>रात्रिं च सकलां स्थित्वा स्नानं च पयसा तथा॥ ३१<br><br>सर्पिषा चापि दहनं हुत्वा ब्राह्मणपुङ्गवैः।<br>सहैव पुण्डरीकाक्ष द्वादश्यां क्षीरभोजनम्॥ ३२<br><br>करिष्यामि यतात्माहं निर्विघ्नेनास्तु तच्च मे।<br>एवमुक्त्वा स्वपेद् भूमावितिहासकथां पुनः॥ ३३<br><br>श्रुत्वा प्रभाते संजाते नदीं गत्वा विशाम्पते।<br>स्नानं कृत्वा मुदा तद्वत् पाषण्डानभिवर्जयेत्॥ ३४<br><br>उपास्य संध्यां विधिवत् कृत्वा च पितृतर्पणम्।<br>प्रणम्य च हृषीकेशं समलोकैकमीश्वरम्॥ ३५<br><br>गृहस्य पुरतो भक्त्या मण्डपं कारयेद् बुधः।<br>दशहस्तमथाष्टौ वा करान् कुर्याद् विशांपते॥ ३६ | दूसरे दिन एकादशीको निराहार रहकर भगवान् केशवकी पूजा करे और रातभर बैठा रहकर प्रातःकाल दूध या जलसे स्नान करे। फिर अग्निमें घीकी आहुति देकर प्रार्थना करे—'पुण्डरीकाक्ष! मैं जितेन्द्रिय होकर द्वादशीको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ही खीरका भोजन करूँगा। मेरा यह व्रत निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो।' यह कहकर इतिहास-पुराणकी कथा सुननेके पश्चात् भूमिपर शयन करे। राजन्! सबेरा होनेपर जाकर नदीमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करे। पाखण्डियोंके संसर्गसे दूर रहे। विधिपूर्वक संध्योपासन करके पितरोंका तर्पण करे। फिर सातों लोकोंके एकमात्र अधीश्वर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके बुद्धिमान् व्रती घरके सामने भक्तिपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये। राजन्! वह मण्डप दस अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा होना चाहिये। |