मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६९ भीमद्वादशी-व्रतका विधान
२५८
* मत्स्यपुराण *
| विप्रेषु दत्त्वा तानेव तथा सक्तून् सुसंस्कृतान्।<br>यथान्नभुङ् महाभाग फलमक्षय्यमश्नुते ॥ ५<br><br>एकामप्युक्तवत् कृत्वा तृतीयां विधिवन्नरः।<br>एतासामपि सर्वासां तृतीयानां फलं भवेत् ॥ ६<br><br>तृतीयायां समभ्यर्च्य सोपवासो जनार्दनम्।<br>राजसूयफलं प्राप्य गतिमग्र्यां च विन्दति ॥ ७ | कहते हैं।* मनुष्यको चाहिये कि इस दिन स्वयं अक्षतयुक्त जलसे स्नान करके भगवान् विष्णुकी मूर्तिपर अक्षत चढ़ावे और अक्षतके साथ ही शुद्ध सत्तू ब्राह्मणोंको दान दे; तत्पश्चात् स्वयं भी उसी अन्नका भोजन करे। महाभाग! ऐसा करनेसे वह अक्षय फलका भागी हो जाता है। उपर्युक्त विधिके अनुसार एक भी तृतीयाका व्रत करनेवाला मनुष्य इन सभी तृतीया-व्रतोंके फलको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस तृतीया तिथिको उपवास करके भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर अन्तमें श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है॥ १—७॥ |
|---|
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽक्षयतृतीयाव्रतं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अक्षयतृतीया-व्रत नामक पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६५॥
छाछठवाँ अध्याय
सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| मनुरुवाच<br>मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन।<br>तथैव जनसौभाग्यं मतिं विद्यासु कौशलम् ॥ १<br>अभेदश्चापि दम्पत्योस्तथा बन्धुजनेन च।<br>आयुश्च विपुलं पुंसां तन्मे कथय माधव ॥ २ | मनुने पूछा—मधुसूदन! किस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको मधुर वाणी, जनतामें उत्कृष्ट सौभाग्य, उत्तम बुद्धि, विद्याओंमें निपुणता, पति-पत्नीमें अभेद, बन्धुजनोंके साथ प्रेम और दीर्घायुकी प्राप्ति हो सकती है? माधव! वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १-२॥ |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>सम्यक् पृष्टं त्वया राजञ्छृणु सारस्वतं व्रतम्।<br>यस्य संकीर्तनादेव तुष्यतीह सरस्वती ॥ ३<br>यो मद्भक्तः पुमान् कुर्यादेतद् व्रतमनुत्तमम्।<br>तद्वासरादौ सम्पूज्य विप्रान्नेतान् समाचरेत् ॥ ४<br>अथवाऽऽदित्यवारेण ग्रहताराबलेन च।<br>पायसं भोजयेद् विप्रान् कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ५<br>शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्तितः।<br>गायत्रीं पूजयेद् भक्त्या शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ६ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! तुमने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया है। अच्छा सुनो! अब मैं उस सारस्वत-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसकी चर्चामात्र करनेसे इस लोकमें सरस्वतीदेवी प्रसन्न हो जाती हैं। जो पुरुष मेरा भक्त हो, उसे पञ्चमीके दिन इस श्रेष्ठ व्रतका अनुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये। आरम्भ-कालमें ब्राह्मणोंके पूजनका विधान है। अथवा रविवारको जब ग्रह और तारा आदि अनुकूल हों, ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित श्वेत वस्त्र दान करे। फिर श्वेत पुष्पमाला और चन्दन आदि उपकरणोंद्वारा भक्तिपूर्वक |
* ध्यान रहे, सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुका पूजन निषिद्ध है—'नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुम्' (पद्म० ६। ९६। २०)। पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजाका विधान है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है। इस व्रतकी विस्तृत विधि भविष्यपुराण एवं 'व्रत-कल्पद्रुम' में है। इसी तिथिको सत्ययुगका प्रारम्भ तथा परशुरामजीका जन्म भी हुआ था।
* अध्याय ६६ * । २५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथा न देवि भगवान् ब्रह्मलोके पितामहः।<br>त्वां परित्यज्य संतिष्ठेत् तथा भव वरप्रदा॥ ७<br>वेदाः शास्त्राणि सर्वाणि गीतनृत्यादिकं च यत्।<br>न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः॥ ८<br>लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा मतिः।<br>एताभिः पाहि अष्टाभिस्तनुभिर्मां सरस्वति॥ ९<br>एवं सम्पूज्य गायत्रीं वीणाक्षमालधारिणीम्।<br>शुक्लपुष्पाक्षतैर्भक्त्या सकमण्डलुपुस्तकाम्।<br>मौनव्रतेन भुञ्जीत सायं प्रातस्तु धर्मवित्॥ १०<br>पञ्चम्यां प्रतिपक्षं च पूजयेद् ब्रह्मवासिनीम्।<br>तथैव तण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>क्षीरं दद्याद्धिरण्यं च गायत्री प्रीयतामिति॥ ११<br>संध्यायां च तथा मौनमेतत् कुर्वन् समाचरेत्।<br>नान्तरा भोजनं कुर्याद् यावन्मासास्त्रयोदश॥ १२<br>समाप्ते तु व्रते कुर्याद् भोजनं शुक्लतण्डुलैः।<br>पूर्वं सवस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्राय भोजनम्॥ १३<br>देव्या वितानं घण्टां च सितनेत्रे पयस्विनीम्।<br>चन्दनं वस्त्रयुग्मं च दद्याच्च शिखरं पुनः॥ १४<br>तथोपदेष्टारमपि भक्त्या सम्पूजयेद् गुरुम्।<br>वित्तशाठ्येन रहितो वस्त्रमाल्यानुलेपनैः॥ १५ | गायत्रीदेवीकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! जैसे ब्रह्मलोकमें भगवान् पितामह आपको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं रुकते, उसी प्रकारका वर मुझे भी प्रदान करें। देवि! जैसे वेद, सम्पूर्ण शास्त्र तथा गीत-नृत्य आदि जितनी कलाएँ हैं, वे सभी आपके बिना नहीं रह सकतीं, उसी प्रकारकी सिद्धियाँ मुझे भी प्राप्त हों। सरस्वति! आप अपनी लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा और मति—इन आठ मूर्तियोंद्वारा मेरी रक्षा करें।' इस प्रकार धर्मज्ञ पुरुष वीणा, रुद्राक्ष-माला, कमण्डलु और पुस्तक धारण करनेवाली गायत्रीकी श्वेत पुष्प, अक्षत आदिसे भक्तिपूर्वक पूजा कर प्रातः एवं सायंकाल मौन धारण करके भोजन करे तथा प्रत्येक पक्षकी पञ्चमी तिथिको ब्रह्मवासिनी (वेद-विद्याकी अधिष्ठात्री)-का पूजन कर घृतपूर्ण पात्रसहित एक सेर चावल, दूध और सुवर्णका दान करे और कहे—'गायत्रीदेवी मुझपर प्रसन्न हों।' यह कर्म सायंकालमें मौन धारण करके करना चाहिये। तेरह महीनेतक प्रातः और सायंकालके बीच भोजन न करनेका विधान है। व्रत समाप्त हो जानेपर पहले ब्राह्मणको दो वस्त्रोंसहित भोजन-पदार्थका दान करके तत्पश्चात् स्वयं श्वेत चावलोंका भोजन करे। पुनः देवीके निमित्त वितान (चाँदोवा या चाँदनी), घण्टा, दो श्वेत (चाँदीके बने हुए) नेत्र, दुधारू गौ, चन्दन, दो वस्त्र और सिरका कोई आभूषण दान करना चाहिये। तदनन्तर उपदेश करनेवाले अर्थात् कर्म करानेवाले गुरुका भी कृपणतारहित होकर वस्त्र, पुष्पमाला, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करे॥ ३—१५॥ |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् सारस्वतं व्रतम्।<br>विद्यावानर्थसंयुक्तो रक्तकण्ठश्च जायते॥ १६<br>सरस्वत्याः प्रसादेन ब्रह्मलोके महीयते।<br>नारी वा कुरुते या तु सापि तत्फलगामिनी।<br>ब्रह्मलोके वसेद् राजन् यावत् कल्पायुतत्रयम्॥ १७<br>सारस्वतं व्रतं यस्तु शृणुयादपि यः पठेत्।<br>विद्याधरपुरे सोऽपि वसेत् कल्पायुतत्रयम्॥ १८ | जो मनुष्य इस (उपर्युक्त) विधिके अनुसार सारस्वतव्रतका अनुष्ठान करता है, वह विद्या-सम्पन्न, धनवान् और मधुरभाषी हो जाता है; साथ ही सरस्वतीकी कृपासे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा राजन्! यदि कोई स्त्री इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है और तीस कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करती है। जो मनुष्य इस सारस्वत-व्रतका पाठ अथवा श्रवण करता है वह भी विद्याधर-लोकमें तीस कल्पोंतक निवास करता है॥ १६-१८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सारस्वतव्रतं नाम षट्षष्ठितमोऽध्यायः॥ ६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सारस्वत-व्रत नामक छाछठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६६॥
| २६० | * मत्स्यपुराण * |
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सड़सठवाँ अध्याय
सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>चन्द्रादित्योपरागे तु यत् स्नानमभिधीयते।<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित्॥ १ | **मनुने पूछा—**द्रव्य और मन्त्रोंकी विधियोंके ज्ञाता (पूर्ण वेदविद्) भगवन्! सूर्य एवं चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर स्नानकी जैसी विधि बतलायी गयी है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>यस्य राशिं समासाद्य भवेद् ग्रहणसम्प्लवः।<br>तस्य स्नानं प्रवक्ष्यामि मन्त्रौषधविधानतः॥ २<br>चन्द्रोपरागं सम्प्राप्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>सम्पूज्य चतुरो विप्रान् शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ ३<br>पूर्वमेवोपरागस्य समासाद्यौषधादिकम्।<br>स्थापयेच्चतुरः कुम्भानव्रणान् सागरानिति॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा—(राजन्!) जिस पुरुषकी राशिपर ग्रहणका प्लावन (लगना) होता है, उसके लिये मन्त्र और औषधके विधानपूर्वक स्नान बतला रहा हूँ। ऐसे मनुष्यको चाहिये कि चन्द्र-ग्रहणके अवसरपर चार ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर श्वेत पुष्प और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। ग्रहणके पूर्व ही औषध आदिको एकत्र कर ले। फिर छिद्ररहित चार कलशोंकी, उनमें समुद्रकी भावना करके स्थापना करे। फिर उनमें |
| गजाश्वरथ्यावल्मीकसंगमाद्दहदगोकुलात् ।<br>राजद्वारप्रदेशाच्च मृदानीय चाक्षिपेत्॥ ५ | सप्तमृत्तिका—हाथीसार, घुड़शाल, वल्मीक (बल्मोट-दियाँड़), नदीके संगम, सरोवर, गोशाला और राजद्वारसे मिट्टी लाकर डाल दे। |
| पञ्चगव्यं च कुम्भेषु शुद्धमुक्ताफलानि च।<br>रोचनां पद्मशङ्खौ च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ ६<br>स्फटिकं चन्दनं श्वेतं तीर्थवारि ससर्षपम्।<br>राजदन्तं सकुमुदं तथैवोशीरगुग्गुलम्।<br>एतत् सर्वं विनिक्षिप्य कुम्भेष्वावाहयेत् सुरान्॥ ७ | तत्पश्चात् उन कलशोंमें पञ्चगव्य, शुद्ध मुक्ताफल, गोरोचन, कमल, शङ्ख, पञ्चरत्न, स्फटिक, श्वेत चन्दन, तीर्थ-जल, सरसों, राजदन्त (एक ओषधिविशेष), कुमुद (कोइयाँ), खस, गुग्गुल—यह सब डालकर उन कलशोंपर देवताओंका आवाहन करे। (आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—) |
| सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ ८ | ‘यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदियाँ, नद और जलप्रद तीर्थ यहाँ पधारें।’ |
| योऽसौ वज्रधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः।<br>सहस्रनयनश्चेन्द्रो ग्रहपीडां व्यपोहतु॥ ९ | (इसके बाद प्रार्थना करे—) ‘जो देवताओंके स्वामी माने गये हैं तथा जिनके एक हजार नेत्र हैं, वे वज्रधारी इन्द्रदेव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें। |
| मुखं यः सर्वदेवानां सप्तार्चिरमितद्युतिः।<br>चन्द्रोपरागसम्भूतामग्निः पीडां व्यपोहतु॥ १० | जो समस्त देवताओंके मुखस्वरूप, सात ज्वालाओंसे युक्त और अतुल कान्तिवाले हैं, वे अग्निदेव चन्द्र-ग्रहणसे उत्पन्न हुई मेरी पीडाका विनाश करें। |
| यः कर्मसाक्षी भूतानां धर्मो महिषवाहनः।<br>यमश्चन्द्रोपरागोत्थां मम पीडां व्यपोहतु॥ ११ | जो समस्त प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं तथा महिष जिनका वाहन है, वे धर्मस्वरूप यम चन्द्र-ग्रहणसे उद्भूत हुई मेरी पीडाको मिटायें। |
| २६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>सूर्यग्रहे सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कीर्तयेत्॥ २३<br>अधिकाः पद्मरागाः स्युः कपिलां च सुशोभनाम्।<br>प्रयच्छेच्च निशाम्पत्ये चन्द्रसूर्योपरागयोः॥ २४<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रलोके महीयते॥ २५ | पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहणस्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २२—२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे चन्द्रादित्योपरागस्नानविधिर्नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें चन्द्रादित्योपरागस्नान-विधि नामक सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६७॥
अड़सठवाँ अध्याय
सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| <center>नारद उवाच</center><br>किमुद्वेगाद्भुते कृत्यमलक्ष्मीः केन हन्यते।<br>मृतवत्साभिषेकादिकार्येषु च किमिष्यते॥ १ | **नारदजीने पूछा—**प्रभो! किसी आकस्मिक एवं वेगशाली कष्टके प्राप्त होनेपर उसकी निवृत्तिके लिये तथा अद्भुत शान्तिके* लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये? किस व्रतके अनुष्ठानसे दरिद्रताका विनाश किया जा सकता है तथा जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं, उस मृतवत्सा स्त्रीके स्नान आदि कार्योंमें उसकी शान्तिके लिये किस व्रतका विधान है?॥ १॥ |
| <center>श्रीभगवानुवाच</center><br>पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिंस्तपोधन।<br>रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च॥ २<br><br>तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम्।<br>सप्तमीस्नपनं नाम जनपीडाविनाशनम्॥ ३<br><br>बालानां मरणं यत्र क्षीरपाणां प्रदृश्यते।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च यौवने चापि वर्तताम्॥ ४<br><br>शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम्।<br>एतदेवाद्वभुतोद्वेगचित्तभ्रमविनाशनम् ॥ ५ | **श्रीभगवान्ने कहा—**तपोधन! पूर्वजन्ममें किये हुए पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं सदा कल्याणकारी सप्तमीस्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीडाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु देखी जाती है वहाँ उसकी शान्तिके लिये मैं इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यही समस्त अद्भुत नामक उत्पातों, उद्वेगों और चित्तभ्रमका भी विनाशक है॥ २—५॥ |
* सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्डव २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट ७२ में अद्भुत शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।
* अध्याय ६८ *
२६३
| भविष्यति च वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन।<br>वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः ॥ ६<br>भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा।<br>कृतं नाम युगं तत्र हैहयान्वयवर्धनः।<br>भविता नृपतिर्वीरः कृतवीर्यः प्रतापवान् ॥ ७<br>स सप्तद्वीपमखिलं पालयिष्यति भूत लम्।<br>यावद्वर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद ॥ ८<br>जातमात्रं च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा।<br>च्यवनस्य तु शापेन विनाशमुपयास्यति ॥ ९<br>सहस्रबाहुश्च यदा भविता तस्य वै सुतः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भूतो नृपलक्षणैः ॥ १०<br>कृतवीर्यस्तदाऽऽराध्य सहस्रांशुं दिवाकरम्।<br>उपवासैर्व्रतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तैश्च नारद।<br>पुत्रस्य जीवनायालभेतत् स्नानमवाप्स्यति ॥ ११<br>कृतवीर्येण वै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः।<br>अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मषनाशनम् ॥ १२ | तपोधन! जब वाराह-कल्प आयेगा, उसमें भी जब श्रेष्ठ वैवस्वत मनुका कार्यकाल होगा, उसमें जब पचीसवाँ कृतयुग आयेगा तब कृतवीर्य नामका एक प्रतापी एवं शूरवीर नरेश उत्पन्न होगा जो हैहयवंशकी वृद्धि करनेवाला होगा। नारद! वह सतहत्तर हजार वर्षोंतक सातों द्वीपोंकी समस्त पृथ्वीका पालन करेगा। उसके सौ पुत्र होंगे, परंतु महर्षि च्यवनके शापसे वे सभी जन्मते ही नष्ट हो जायँगे। नारद! जब उसके सहस्र भुजाधारी, मृग-नेत्र-सरीखे नेत्रोंवाला, शोभाशाली एवं सम्पूर्ण राज-लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा तब राजा कृतवीर्य अपने उस पुत्रके दीर्घ जीवनकी प्राप्तिके निमित्त उपवास, व्रत तथा दिव्य वेद-सूक्तोंद्वारा सहस्रकिरणधारी सूर्यकी आराधना करके इस विशेष स्नान (स्नपनव्रत)-को प्राप्त करेगा। उस समय कृतवीर्यद्वारा पूछे जानेपर भगवान् सूर्य अखिल दोषोंके शामक एवं पापनाशक इस व्रतको बतलायेंगे ॥ ६–१२ ॥ |
सूर्य उवाच
| अलं क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप।<br>भविष्यति चिरंजीवी किंतु कल्मषनाशनम् ॥ १३<br>सप्तमीस्नपनं वक्ष्ये सर्वलोकहिताय वै।<br>जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद।<br>अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्वं प्रशस्यते ॥ १४<br>ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>बालस्य जन्मनक्षत्रं वर्जयेत् तां तिथिं बुधः।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च कृत्यं स्यादितरेषु च ॥ १५<br>गोमयेनानुलिप्तायां भूमावेकाग्निवत् तदा।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैश्चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निर्वपेत् सूर्यरुद्राभ्यां तन्मन्त्राभ्यां विधानतः ॥ १६<br>कीर्तयेत् सूर्यदैवत्यं समाचिं च घृताहुतीः।<br>जुहुयाद् रुद्रसूक्तेन तद्वद् रुद्राय नारद ॥ १७ | **भगवान् सूर्य कहेंगे—**नरेश्वर! अब तुम अधिक कष्ट मत सहन करो, तुम्हारा पुत्र चिरंजीवी होगा, किंतु सम्पूर्ण लोकोंके हितके हेतु मैं जिस पापनाशक सप्तमीस्नपन-व्रतका वर्णन करूँगा, उसका अनुष्ठान तुम्हें भी करना चाहिये। नारद! मृतवत्सा स्त्रीके नवजात शिशुके लिये सातवें महीनेमें अथवा शुक्लपक्षकी किसी भी सप्तमी तिथिको यह सारा कार्य प्रशस्त माना गया है। यदि उस तिथिको बालकका जन्म-नक्षत्र पड़ता हो तो बुद्धिमान् कर्ताको उस तिथिका त्याग कर देना चाहिये। उसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये भी किये जानेवाले कार्यमें इसका विचार करना आवश्यक है। व्रतारम्भमें व्रती ग्रहबल एवं ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर एकाग्निक उपासककी भाँति गो-दुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान पकाये, फिर सूर्य और रुद्रको पृथक्-पृथक् उनके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक वह हव्यान प्रदान करे। उस समय सूर्यसूक्तकी सात ऋचाओंका पाठ करे और अग्निमें घीकी सात आहुतियोंसे हवन करे। नारद! रुद्रके लिये भी उसी प्रकार |