मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६५ अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
- अध्याय ६२ * | २४९
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बासठवाँ अध्याय
अनन्ततृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| मनुरुवाच<br>सौभाग्यारोग्यफलदं विपक्षक्षयकारकम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं देव तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥ १ | मनुने पूछा— जनार्दनदेव ! जो इस लोकमें सौभाग्य और नीरोगतारूप फल देनेवाला तथा भोग और मोक्षका प्रदाता एवं शत्रुनाशक हो, वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>यदुमायाः पुरा देव उवाच पुरसूदनः।<br>कैलासशिखरासीनो देव्या पृष्टस्तदा किल॥ २<br>कथासु सम्प्रवृत्तासु धर्म्यासु ललितासु च।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन् ! पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए त्रिपुरविनाशक महादेवजीने सुन्दर धार्मिक कथाओंके प्रसङ्गमें उमादेवीद्वारा पूछे जानेपर उनसे जिस व्रतका वर्णन किया था, वही इस समय मैं बतला रहा हूँ, यह भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ २-३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>शृणुष्वावहिता देवि तथैवानन्तपुण्यकृत्।<br>नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम्॥ ४<br>नभस्ये वाथ वैशाखे पौषे मार्गशिरेऽथवा।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां सुस्नातो गौरसर्षपैः॥ ५<br>गोरोचनं सगोमूत्रं मुस्तां गोशकृतं तथा।<br>दधिचन्दनसम्मिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत्।<br>सौभाग्यारोग्यदं यत् स्यात् सदा च ललिताप्रियम्॥ ६<br>प्रतिपक्षं तृतीयासु पुमानापीतवाससी।<br>धारयेदथ रक्तानि नारी चेदथ संयता॥ ७<br>विधवा धातुरक्तानि कुमारी शुक्लवाससी।<br>देवीं तु पञ्चगव्येन ततः क्षीरेण केवलम्।<br>स्त्रापयेन्मधुना तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च॥ ८<br>पूजयेच्छुक्लपुष्पैश्च फलैर्नानाविधैरपि।<br>धान्यलाजाजिलवणैर्गुडक्षीरघृतान्वितैः ॥ ९<br>शुक्लाक्षततिलैर्र्च्चां ललितां यः सदार्चयेत्।<br>आपादाद्यर्चनं कुर्याद् गौर्याः सम्यक् समासतः॥ १० | ईश्वरने कहा— देवि! मैं पुरुषों तथा स्त्रियोंके लिये एक सर्वश्रेष्ठ व्रत बतला रहा हूँ, जो अनन्त पुण्यदायक है। तुम सावधानीपूर्वक उसे सुनो। इस व्रतका व्रती भाद्रपद, वैशाख, पौष अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको पीली सरसोंसे युक्त जलसे भलीभाँति स्नान करे। फिर गोरोचन, गोमूत्र, मुस्ता, गोबर, दही और चन्दनको मिलाकर ललाटमें तिलक लगावे; क्योंकि यह तिलक सौभाग्य और आरोग्यका प्रदायक तथा ललितादेवीको परम प्रिय* है। प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पुरुषको पीला वस्त्र, यदि सधवा स्त्री व्रतनिष्ठ होती है तो उसे लाल वस्त्र, विधवाको गेरू आदि धातुओंसे रँगा हुआ वस्त्र और कुमारी कन्याको श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिये। उस समय देवीकी मूर्तिको पञ्चगव्यसे स्नान करानेके पश्चात् केवल दूधसे नहलाना चाहिये। उसी प्रकार मधु और पुष्प-चन्दनमिश्रित जलसे भी स्नान करावे। फिर श्वेत पुष्प, अनेक प्रकारके फल, धनिया, श्वेत जीरा, नमक, गुड़, दूध और घृतसे देवीकी पूजा करे। श्वेत अक्षत और तिलसे तो ललितादेवीकी सदा पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त संक्षेपसे पूजनका विधान है। |
* सौर, पाद्म सृष्टि, भविष्योत्तरपुराण अ० २६ में यह व्रत सविस्तर निरूपित है। सौभाग्य एवं ललितादेवीके विषयमें ६० वें अध्यायकी टिप्पणी द्रष्टव्य है।