मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६१ अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य
| २३६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| वैराजं पौरुषं सूक्तं सौपर्णं रुद्रसंहिताम्।<br>शैशवं पञ्चनिधनं गायत्रं ज्येष्ठसाम च॥ ३५<br><br>वामदेव्यं बृहत्साम रौरवं च रथन्तरम्।<br>गवां व्रतं च काण्वं च रक्षोघ्नं च यमं तथा।<br>गायेयुः सामगा राजन् पश्चिमं द्वारमाश्रिताः॥ ३६<br><br>आथर्वणश्रोत्तरतः शान्तिकं पौष्टिकं तथा।<br>जपेयुर्मनसा देवमाश्रित्य वरुणं प्रभुम्॥ ३७<br><br>पूर्वेद्युरभितो रात्रावेवं कृत्वाधिवासनम्।<br>गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्दध्रगोकुलात्।<br>मृदमादाय कुम्भेषु प्रक्षिपेच्चत्वरात् तथा॥ ३८<br><br>रोचनां च ससिद्धार्थां गन्धं गुग्गुलमेव च।<br>स्नपनं तस्य कर्तव्यं पञ्चगव्यसमन्वितम्॥ ३९<br><br>प्रत्येकं तु महामन्त्रैरेवं कृत्वा विधानतः।<br>एवं क्षपातिवाह्याथ विधियुक्तेन कर्मणा॥ ४०<br><br>ततः प्रभाते विमले संजातेऽथ शतं गवाम्।<br>ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यमष्टषष्टिश्च वा पुनः।<br>पञ्चाशद् वाथ षट्त्रिंशत् पञ्चविंशतिरप्यथ॥ ४१<br><br>ततः सांवत्सरप्रोक्ते शुभे लग्ने सुशोभने।<br>वेदशब्दैश्च गान्धर्ववार्द्यैश्च विविधैः पुनः॥ ४२<br><br>कनकालङ्कृतां कृत्वा जले गामवतारयेत्।<br>सामगाय च सा देया ब्राह्मणाय विशाम्पते॥ ४३<br><br>पात्रीमादाय सौवर्णीं पञ्चरत्नसमन्विताम्।<br>ततो निक्षिप्य मकरमत्स्यादींश्चैव सर्वशः।<br>धृतां चतुर्विधेर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ ४४<br><br>महानदीजलोपेतां दध्यक्षतसमन्विताम्।<br>उत्तराभिमुखीं धेनुं जलमध्ये तु कारयेत्॥ ४५ | राजन्! पश्चिमद्वारपर रहनेवाले सामवेदी ब्राह्मण वैराजसाम (२। २९। ८०), पुरुषसूक्त (६१३-३१), सुपर्णसूक्त (साम० ३। २। १-३), रुद्रसंहिता, शिशुसूक्त, पञ्चनिधनसूक्त, गायत्रसाम, ज्येष्ठसाम (१। २। २९), वामदेव्यसाम (५। ६। २५), बृहत्साम (१। २२। ३४), रौरवसाम, रथन्तरसाम (१। २२३), गोव्रत, काण्व, सूक्तसाम, रक्षोघ्न (३। १२। ३९) और यमसम्बन्धी सूक्तोंका गान करें। उत्तरद्वारके अथर्ववेदी विद्वान् मन-ही-मन भगवान् वरुणदेवकी शरण ले शान्ति और पुष्टि-सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करें। इस प्रकार पहले दिन मन्त्रोंद्वारा देवताओंकी स्थापना करके हाथी और घोड़ेके पैरोंके नीचेकी, जिसपर रथ चलता हो—ऐसी सड़ककी, बाँबीकी, दो नदियोंके संगमकी, गोशालाकी, साक्षात् गौओंके पैरके नीचेकी तथा चौराहेकी मिट्टी (सप्तमृत्तिका) लेकर कलशोंमें छोड़ दे। उसके बाद सर्वौषधि, गोरोचन, सरसोंके दाने, चन्दन और गूगल भी छोड़े। फिर पञ्चगव्य (दधि, दूध, घी, गोबर और गोमूत्र) मिलाकर उन कलशोंके जलसे यजमानका विधिपूर्वक अभिषेक करे। इस प्रकार प्रत्येक कार्य महामन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिसहित करना चाहिये॥ ३३-३९ १/२ ॥<br><br>श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार शास्त्रविहित कर्मद्वारा रात्रि व्यतीत करके निर्मल प्रभातका उदय होनेपर व्रती हवनके अन्तमें ब्राह्मणोंको सौ, अड़सठ, पचास, छत्तीस अथवा पचीस गौ दान करे। राजन्! तदनन्तर ज्योतिषीद्वारा बतलाये गये शुद्ध एवं सुन्दर लग्न आनेपर वेदपाठ, संगीत तथा नाना प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनिके साथ एक गौको सुवर्णसे अलंकृत करके तालाबके जलमें उतारे और उसे सामगान करनेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् पञ्चरत्नोंसे युक्त सोनेका पात्र लेकर उसमें पूर्वोक्त मगर और मछली आदिको रखे और उसे किसी बड़ी नदीसे मँगाये हुए जलसे भर दे। फिर उस पात्रको दही-अक्षतसे विभूषितकर वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् चार ब्राह्मण हाथसे पकड़ें और अथर्ववेदके मन्त्रोंसे उसे स्नान कराये, फिर यजमानकी प्रेरणासे उसे उत्तराभिमुख उलटकर तालाबके जलमें डाल दें। इस प्रकार |
- अध्याय ५८ *
२३७
| आथर्वणेन संस्नातां पुनर्मामेत्यथेति च।<br>आपो हि ष्ठेति मन्त्रेण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डपम्॥ ४६ | 'पुनर्मामेति०' तथा 'आपो हि ष्ठा मयो०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा उसे जलमें डालकर पुनः सब लोग यज्ञमण्डपमें आ जायँ और यजमान सदस्योंकी पूजा |
| पूजयित्वा सदस्यांस्तु बलिं दद्यात् समन्ततः।<br>पुनर्दिनानि होतव्यं चत्वारि मुनिसत्तमाः॥ ४७ | कर सब ओर देवताओंके उद्देश्यसे बलि अर्पण करे। इसके बाद लगातार चार दिनोंतक हवन होना चाहिये। |
| चतुर्थीकर्म कर्तव्यं देया तत्रापि शक्तितः।<br>दक्षिणा राजशार्दूल वरुणक्षमापणं ततः॥ ४८ | राजसिंह! चौथे दिन चतुर्थी-कर्म करना उचित है। उसमें भी यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। तदनन्तर वरुणसे क्षमा-प्रार्थना करके यज्ञ-सम्बन्धी जितने पात्र और |
| कृत्वा तु यज्ञपात्राणि यज्ञोपकरणानि च।<br>ऋत्विग्भ्यस्तु समं दत्त्वा मण्डपं विभजेत् पुनः।<br>हेमपात्रीं च शय्यां च स्थापकाय निवेदयेत्॥ ४९ | सामग्री हों, उन्हें ऋत्विजोंमें बराबर बाँट देना चाहिये। फिर मण्डपको भी विभाजित करे। सुवर्णपात्र और शय्या व्रतारम्भ करानेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। इसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, एक सौ आठ, |
| ततः सहस्रं विप्राणामथवाष्टशतं तथा।<br>भोजनीयं यथाशक्ति पञ्चाशद् वाथ विंशतिः।<br>एवमेष पुराणेषु तडागविधिरुच्यते॥ ५० | पचास अथवा बीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। पुराणों (एवं कल्पसूत्रों)-में तालाबकी प्रतिष्ठाके लिये यही विधि बतलायी गयी है। सभी कुआँ, बावली और |
| कूपवापीषु सर्वासु तथा पुष्करिणीषु च।<br>एष एव विधिर्दृष्टः प्रतिष्ठासु तथैव च॥ ५१ | पुष्करिणीके लिये भी यही विधि है। देवताओंकी प्रतिष्ठामें भी ऐसा ही विधान समझना चाहिये। प्रासाद (महल अथवा मन्दिर) और बगीचे आदिके प्रतिष्ठा-कार्यमें केवल (कुछ) मन्त्रोंका ही भेद है। विधि-विधान प्रायः एक-से ही हैं। उपर्युक्त विधिकायदि |
| मन्त्रतस्तु विशेषः स्यात् प्रासादोद्यानभूमिषु।<br>अयं त्वशक्तावर्धेन विधिर्दृष्टः स्वयम्भुवा।<br>अल्पे त्वेकाग्निवत् कृत्वा वित्तशाठ्यादृते नृणाम्॥ ५२ | पूर्णतया पालन करनेकी शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। यह बात ब्रह्माजीने कही है। किंतु इस अल्प विधानमें भी मनुष्यको कृपणताका त्याग कर एकाग्नि ब्राह्मणकी भाँति दान आदि करना चाहिये॥ ४०-५२॥ |
| प्रावृट्काले स्थिते तोये ह्यग्निष्टोमफलं स्मृतम्।<br>शरत्काले स्थितं यत् स्यात्तदुक्तफलदायकम्।<br>वाजपेयातिरात्राभ्यां हेमन्ते शिशिरे स्थितम्॥ ५३ | जिस पोखरेमें केवल वर्षाकालमें ही जल रहता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञके बराबर फल देनेवाला होता है। जिसमें शरत्कालतक जल रहता हो, उसका भी यही फल है। हेमन्त और शिशिरकालतक रहनेवाला जल |
| अश्वमेधसमं प्राह वसन्तसमये स्थितम्।<br>ग्रीष्मेऽपि तत्स्थितं तोयं राजसूयाद् विशिष्यते॥ ५४ | क्रमशः वाजपेय और अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता है। वसन्तकालतक टिकनेवाले जलको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्मकालतक वर्तमान रहता है, वह राजसूय-यज्ञसे भी अधिक फल देनेवाला होता है॥ ५३-५४॥ |
| एतान् महाराज विशेषधर्मान्<br>करोति योऽप्यागमशुद्धबुद्धिः।<br>स याति रुद्रालयमाशु पूतः<br>कल्पाननेकान् दिवि मोदते च॥ ५५ | महाराज! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विशेष धर्मोंका पालन करता है, वह शुद्धचित्त होकर शिवजीके लोकमें जाता है और वहाँ अनेक कल्पोंतक दिव्य आनन्दका अनुभव करता है। |
| २३८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| अनेकलोकान् स महत्तमादीन्<br>भुक्त्वा परार्धद्वयमङ्गनाभिः।<br>सहैव विष्णोः परमं पदं यत्<br>प्राप्नोति तद्योगबलेन भूयः॥ ५६ | वह पुनः परार्ध (ब्रह्माजीकी पिछली आधी आयु)-तक देवाङ्गनाओंके साथ अनेक महत्तम लोकोंका सुख भोगनेके पश्चात् ब्रह्माजीके साथ ही योगबलसे श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तडागविधिर्नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तडागविधि नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५८॥
उनसठवाँ अध्याय
वृक्ष लगानेकी विधि
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| पादपानां विधिं सूत यथावद् विस्तराद् वद।<br>विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्यापनं बुधैः।<br>ये च लोकाः स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व नः॥ १ | सूतजी! अब आप हमें विस्तारके साथ वृक्ष लगानेकी यथार्थ विधि बतलाइये। विद्वानोंको किस विधिसे वृक्ष लगाने चाहिये तथा वृक्षारोपण करनेवालोंके लिये जिन लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, उन्हें भी आप इस समय हमलोगोंको बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
| पादपानां विधिं वक्ष्ये तथैवोद्यानभूमिषु।<br>तडागविधिवत् सर्वमासाद्य जगदीश्वर॥ २ | [यही प्रश्न जब मनुने मत्स्य-भगवान्से किया था तो इसे उनसे मत्स्य (भगवान्)-ने कहा था।] जगदीश्वर! मैं बगीचेमें वृक्षोंके लगानेकी विधि तुम्हें बतलाता हूँ। तड़ागकी प्रतिष्ठाके विषयमें जो विधान बतलाया गया है, उसीके समान सारी विधि समझनी चाहिये। |
| ऋत्विङ्मण्डपसम्भारमाचार्यं चैव तद्विधम्।<br>पूजयेद् ब्राह्मणांस्तद्वद्धेमवस्त्रानुलेपनैः॥ ३ | इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, सामग्री और आचार्यको पूर्ववत् रखे। उसी प्रकार सुवर्ण, वस्त्र और चन्दनद्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। |
| सर्वौषध्युदकैः सिक्तान् दध्यक्षतविभूषितान्।<br>वृक्षान् माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत्॥ ४ | रोपे गये पौधोंको सर्वौषधिमिश्रित जलसे सींचे। फिर उनके ऊपर दही और अक्षत छोड़े। उसके बाद उन्हें पुष्पमालाओंसे अलंकृत कर वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। |
| सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम्।<br>अञ्जनं चापि दातव्यं तद्धेमशलाकया॥ ५ | सोनेकी सूईसे सबका कर्णवेध करे। उसी प्रकार सोनेकी सलाईसे अञ्जन भी लगाना चाहिये। |
| फलानि सप्त चाष्टौ वा कलधौतानि कारयेत्।<br>प्रत्येकं सर्ववृक्षाणां वेद्यां तान्यधिवासयेत्॥ ६ | सात अथवा आठ सुवर्णके फल बनवावे, फिर इन फलोंके साथ सभी वृक्षोंको वेदीपर स्थापित कर दे। |
| धूपोऽत्र गुग्गुलः श्रेष्ठस्ताम्रापात्रैरधिष्ठितान्।<br>सर्वान् धान्यस्थितान् कृत्वा वस्त्रगन्धानुलेपनैः॥ ७ | वहाँ गुग्गुलका धूप देना श्रेष्ठ माना गया है। वृक्षोंको पृथक्-पृथक् ताम्रपात्रमें रखकर उन्हें सप्तधान्यसे आवृत करे तथा उनके ऊपर वस्त्र और चन्दन चढ़ाये। |
| कुम्भान् सर्वेषु वृक्षेषु स्थापयित्वा नरेश्वर।<br>सहिरण्यानशेषांस्तान् कृत्वा बलिनिवेदनम्॥ ८ | नरेश्वर! फिर प्रत्येक वृक्षके पास कलश-स्थापन करके उन सभी कलशोंमें स्वर्ण-खण्ड डाले, फिर बलि प्रदान करके उनकी पूजा करे। |
| * अध्याय ५९ * | २३९ |
|---|
| यथास्वं लोकपालानामिन्द्रादीनां विशेषतः।<br>वनस्पतेश्च विद्वद्भिर्होमः कार्यो द्विजातिभिः ॥ ९<br>ततः शुक्लाम्बरधरां सौवर्णकृतभूषणाम् ।<br>सकांस्यदोहां सौवर्णशृङ्गाभ्यामतिशालिनीम्।<br>पयस्विनीं वृक्षमध्यादुत्सृजेद् गामुदङ्मुखीम्॥ १०<br>ततोऽभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः।<br>ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैरभितस्तथा।<br>तैरेव कुम्भैः स्नपनं कुर्युर्ब्राह्मण पुङ्गवाः ॥ ११<br>स्नातः शुक्लाम्बरस्तद्वद् यजमानोऽभिपूजयेत् ।<br>गोभिर्विभवतः सर्वानृत्विजस्तान् समाहितः ॥ १२<br>हेमसूत्रैः सकटकैरङ्गुलीयपवित्रकैः ।<br>वासोभिः शयनीयैश्च तथोपस्करपादुकैः।<br>क्षीरेण भोजनं दद्याद् यावद्दिनचतुष्टयम् ॥ १३<br>होमश्च सर्षपैः कार्यो यवैः कृष्णतिलैस्तथा।<br>पलाशसमिधः शस्तास्तृतीयेऽह्नि तथोत्सवः ।<br>दक्षिणा च पुनस्तद्वद् देया तत्रापि शक्तितः ॥ १४<br>यद् यदिष्टतमं किञ्चित् तत्तद् दद्यादमत्सरी।<br>आचार्ये द्विगुणं दद्यात् प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥ १५ | रातमें विद्वान् द्विजातियोंद्वारा इन्द्रादि लोकपालों तथा वनस्पतिके निमित्त वित्तानुसार हवन कराये। तदनन्तर दूध देनेवाली एक गौको लाकर उसे श्वेत वस्त्र ओढ़ाये। उसके मस्तकपर सोनेकी कँलगी लगाये, सींगोंको सोनेसे मँढ़ा दे। उसको दूहनेके लिये काँसेकी दोहनी प्रस्तुत करे। इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न उस गौको उत्तराभिमुख खड़ी करके वृक्षोंके बीचसे छोड़े। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मण बाजों और मङ्गलगीतोंकी ध्वनिके साथ अभिषेकके मन्त्र—तीनों वेदोंकी वरुणसम्बन्धिनी ऋचाएँ पढ़ते हुए उक्त कलशोंके जलसे यजमानका अभिषेक करें। अभिषेकके पश्चात् यज्ञकर्ता पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे और अपनी सामर्थ्यके अनुसार सावधानीपूर्वक गौ, सोनेकी जंजीर, कड़े, अँगूठी, पवित्री, वस्त्र, शय्या शय्योपयोगी सामान तथा चरणपादुका देकर सम्पूर्ण ऋत्विजोंका पूजन करे। इसके बाद चार दिनोंतक उन्हें दूधके साथ भोजन कराये तथा सरसोंके दाने, जौ और काले तिलोंसे होम कराये। होममें पलाश (ढाक) की लकड़ी उत्तम मानी गयी है। वृक्षारोपणके पश्चात् चौथे दिन विशेष उत्सव करे। उसमें भी अपनी शक्तिके अनुसार पुनः उसी प्रकार दक्षिणा दे। जो-जो वस्तु अपनेको अधिक प्रिय हो, ईर्ष्या छोड़कर उस-उसका दान करे। आचार्यको दूनी दक्षिणा दे तथा प्रणाम करके यज्ञकी समाप्ति करे॥२—१५॥ |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्याद् वृक्षोत्सवं बुधः ।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति फलं चानन्त्यमश्नुते ॥ १६<br>यश्चैकमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः ।<br>सोऽपि स्वर्गे वसेद् राजन् यावदिन्द्रायुतत्रयम् ॥ १७<br>भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् द्रुमसंमितान् ।<br>परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १८<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः ।<br>सोऽपि सम्पूजितो देवैर्ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९ | जो विद्वान् उपर्युक्त विधिसे वृक्षारोपणका उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा वह अक्षय फलका भागी होता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्षकी स्थापना करता है, राजन्! वह भी जबतक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वह जितने वृक्षोंका रोपण करता है, अपने पहले और पीछेकी उतनी ही पीढ़ियोंका वह उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्तिसे रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसङ्गको सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओंद्वारा सम्मानित और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है*॥ १६–१९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृक्षोत्सवो नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृक्षोत्सव नामक उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५९ ॥
* वृक्ष मुनियों तथा कवियोंको बहुत प्रिय थे। वृक्ष-उद्यानादि रोपण-प्रतिष्ठाकी सभी विधियाँ पद्म, भविष्य, स्कन्दादि पुराणोंमें बहुत विस्तारसे हैं। अमरसिंह, कालिदासादिने भी इनका खूब वर्णन किया है। मत्स्यपुराणमें वृक्षोंका वर्णन बार-बार मिलेगा।
| २४० | * मत्स्यपुराण * |
|---|
साठवाँ अध्याय
सौभाग्यशयन-व्रत तथा जगद्धात्री सतीकी आराधना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>तथैवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम्।<br>सौभाग्यशयनं नाम यत् पुराणविदो विदुः॥ १ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा व्रत बतलाता हूँ, जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। उसका नाम है—'सौभाग्यशयन'। इसे पुराणोंके विद्वान् ही जानते हैं। |
| पुरा दग्धेषु लोकेषु भूर्भुवःस्वर्महादिषु।<br>सौभाग्यं सर्वभूतानामेकस्थमभवत् तदा।<br>वैकुण्ठं स्वर्गमासाद्य विष्णोर्वक्षःस्थलस्थितम्॥ २ | पूर्वकालमें जब भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक दग्ध हो गये, तब समस्त प्राणियोंका सौभाग्य एकत्रित हो गया। वह वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान् श्रीविष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। |
| ततः कालेन महता पुनः सर्गविधौ नृप।<br>अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरुषान्विते॥ ३ | तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब पुनः सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति और पुरुषसे युक्त सम्पूर्ण लोकोंके अहंकारसे आवृत हो जानेपर श्रीब्रह्माजी तथा भगवान् श्रीविष्णुमें स्पर्धा जाग्रत् हुई। |
| स्पर्धायां च प्रवृत्तायां कमलासनकृष्णयोः।<br>पिङ्गाकारा* समुद्भूता वह्नेर्ज्वालातिभीषणा।<br>तयाभितप्तस्य हरेर्वक्षसस्तद् विनिःसृतम्॥ ४ | उस समय एक पीले रंगकी (अथवा शिवलिङ्गके आकारकी) अत्यन्त भयंकर अग्निज्वाला प्रकट हुई। उससे भगवान्का वक्षःस्थल तप उठा, जिससे वह सौभाग्यपुञ्ज वहाँसे गलित हो गया। |
| वक्षःस्थलं समाश्रित्य विष्णौ सौभाग्यमास्थितम्।<br>रसं रूपं न तद् यावत् प्राप्नोति वसुधातले॥ ५ | श्रीविष्णुके वक्षःस्थलका आश्रय लेकर स्थित वह सौभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर गिरने भी न पाया था कि |
| उत्क्षिप्तमन्तरिक्षे तद् ब्रह्मपुत्रेण धीमता।<br>दक्षेण पीतमात्रं तद् रूपलावण्यकारकम्॥ ६ | ब्रह्माजीके बुद्धिमान् पुत्र दक्षने उसे आकाशमें ही रोककर पी लिया। दक्षके पीते ही वह अद्भुत रूप और लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध हुआ। |
| बलं तेजो महज्जातं दक्षस्य परमेष्ठिनः।<br>शेषं यदपतद् भूमावष्टधा तद् व्यजायत॥ ७ | ब्रह्म-पुत्र दक्षका बल और तेज बढ़ गया। उनके पीनेसे बचा हुआ जो अंश पृथ्वीपर गिर पड़ा, वह आठ भागोंमें बँट गया। |
| ततस्त्वोषधयो जाताः सप्त सौभाग्यदायिकाः।<br>इक्षवो रसराजश्च निष्पावा राजधान्यकम्॥ ८ | उनमेंसे सात भागोंसे सात सौभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—ईंख, रसराज (पारा), निष्पाव (सेम), राजधान्य (शालि या अगहनी), |
| विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुङ्कुमं तथा।<br>लवणं चाष्टमं तद्वत् सौभाग्याष्टकमुच्यते॥ ९ | गोक्षीर (क्षीरजीरक), कुसुम्भ (कुसुम नामक) पुष्प, कुङ्कुम (केसर) तथा आठवाँ पदार्थ नमक है। इन आठोंको सौभाग्याष्टक कहते हैं॥ १—९॥ |
* कहीं-कहीं लिङ्गाकारा पाठ है; जिसका शिव, स्कन्द आदि पुराणोंकी तथा शिवरात्रि-व्रत कथाके लिङ्गोद्भव-वृत्तान्तसे तात्पर्य माना जाना चाहिये।