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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

५२ कर्मयोगकी महत्ता

* अध्याय ५० *२०३

| महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः ।<br>प्रत्यश्रवाः कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहनः ॥ २७<br>पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमी ।<br>बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः ॥ २८<br>कुशाग्रस्यात्मजश्चैव वृषभो नाम वीर्यवान् ।<br>वृषभस्य तु दायादः पुण्यवान् नाम पार्थिवः ॥ २९<br>पुण्यः पुण्यवतश्चैव राजा सत्यधृतिस्ततः ।<br>दायादस्तस्य धनुषस्तस्मात् सर्वश्व जज्ञिवान् ॥ ३०<br>सर्वस्य सम्भवः पुत्रस्तस्माद् राजा बृहद्रथः ।<br>द्वे तस्य शकले जाते जरया संधितश्च सः ॥ ३१<br>जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततः स्मृतः ।<br>जेता सर्वस्य क्षत्रस्य जरासंधो महाबलः ॥ ३२<br>जरासंधस्य पुत्रस्तु सहदेवः प्रतापवान् ।<br>सहदेवात्मजः श्रीमान् सोमवित् स महातपाः ॥ ३३<br>श्रुतश्रवास्तु सोमाद् वै मागधाः परिकीर्तिताः ।<br>जह्नुस्त्वजनयत् पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम् ॥ ३४ | संतानोंको जन्म दिया। इनमें पहला महारथी मगधराज था, जो बृहद्रथ नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद दूसरा प्रत्यश्रवा, तीसरा कुश, चौथा हरिवाहन, पाँचवाँ यजुष् और छठा मत्स्य नामसे प्रसिद्ध हुआ। सातवीं संतान काली नामकी कन्या थी। बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ। कुशाग्रका पुत्र पराक्रमी वृषभ हुआ। वृषभका पुत्र राजा पुण्यवान् था। पुण्यवान्‌से पुण्य और उससे राजा सत्यधृतिका जन्म हुआ। उसका पुत्र धनुष हुआ और उससे सर्वकी उत्पत्ति हुई। सर्वका पुत्र सम्भव हुआ और उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथका पुत्र दो टुकड़ेके रूपमें उत्पन्न हुआ, जिन्हें जरानामकी राक्षसीने जोड़ दिया था। जराद्वारा जोड़ दिये जानेके कारण वह जरासंध नामसे विख्यात हुआ। महाबली जरासंध अपने समयके समस्त क्षत्रियोंका विजेता था। जरासंधका पुत्र प्रतापी सहदेव हुआ। सहदेवका पुत्र लक्ष्मीवान् एवं महातपस्वी सोमवित् हुआ। सोमवित्‌से श्रुतश्रवाकी उत्पत्ति हुई। (मगधपर शासन करनेके कारण) ये सभी नरेश मागध नामसे विख्यात हुए॥ २३—३३ १/२ ॥<br><br>जह्नुने सुरथ नामक भूपालको पुत्ररूपमें जन्म दिया। |
| सुरथस्य तु दायादो वीरो राजा विदूरथः ।<br>विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इति स्मृतः ॥ ३५<br>सार्वभौमाज्जयत्सेनो रुचिरस्तस्य चात्मजः ।<br>रुचिरस्य सुतो भौमस्त्वरितायुस्ततोऽभवत् ॥ ३६<br>अक्रोधनस्त्वायुसुतस्तस्माद् देवातिथिः स्मृतः ।<br>देवातिथेस्तु दायादो दक्ष एव बभूव ह ॥ ३७<br>भीमसेनस्ततो दक्षाद् दिलीपस्तस्य चात्मजः ।<br>दिलीपस्य प्रतीपस्तु तस्य पुत्रास्त्रयः स्मृताः ॥ ३८<br>देवापिः शांतनुश्चैव बाह्लीकश्चैव ते त्रयः ।<br>बाह्लीकस्य तु दायादाः सप्त बाह्लीश्वरा नृपाः ।<br>देवापिस्तु ह्यपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः ॥ ३९ | सुरथका पुत्र वीरवर राजा विदूरथ हुआ। विदूरथका पुत्र सार्वभौम कहा गया है। सार्वभौमसे जयत्सेन उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र रुचिर हुआ। रुचिरसे भौमका और उससे त्वरितायुका जन्म हुआ। त्वरितायुका पुत्र अक्रोधन और उससे देवातिथिकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। देवातिथिका एकमात्र पुत्र दक्ष ही था। दक्षसे भीमसेनका जन्म हुआ और उसका पुत्र (पुरुवंशी) दिलीप तथा दिलीपका पुत्र प्रतीप हुआ। प्रतीपके तीन पुत्र कहे जाते हैं, ये तीनों देवापि, शांतनु और बाह्लीक हैं। बाह्लीकके सात पुत्र थे, जो सभी राजा थे और बाह्लीक (बल्ख) देशके अधीश्वर थे। देवापिको प्रजाओंने दोषी ठहरा दिया था; इसलिये वह राजपाट छोड़कर मुनि हो गया॥ ३४—३९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>प्रजाभिस्तु किमर्थं वै ह्यपध्यातो जनेश्वरः ।<br>को दोषो राजपुत्रस्य प्रजाभिः समुदाहृतः ॥ ४० | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! प्रजाओंने राजा देवापिको किस कारण दोषी ठहराया था? तथा प्रजाओंने उस राजकुमारका कौन-सा दोष प्रकट किया था ? ॥ ४० ॥ |
| सूत उवाच<br>किलासीद् राजपुत्रस्तु कुष्ठी तं नाभ्यपूजयन् ।<br>भविष्यं कीर्तयिष्यामि शांतनोस्तु निबोधत ॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! राजकुमार देवापि कुष्ठ-रोगी था, इसीलिये प्रजाओंने उसका आदर-सत्कार नहीं किया। अब मैं शांतनुके भविष्यका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये। |

२०४* मत्स्यपुराण *

| शांतनुस्त्वभवद् राजा विद्वान् स वै महाभिषक्।<br>इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषम्॥ ४२<br>यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं रोगिणमेव च।<br>पुनर्युवा स भवति तस्मात् तं शांतनुं विदुः॥ ४३<br>तत् तस्य शांतनुत्वं हि प्रजाभिरिह कीर्त्यते।<br>ततोऽवृणुत भार्यार्थं शांतनुर्जाह्नवीं नृपः॥ ४४<br>तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद् विभुः।<br>काली विचित्रवीर्यं तु दाशेयी जनयत् सुतम्॥ ४५<br>शांतनोर्दयितं पुत्रं शान्तात्मानमकल्मषम्।<br>कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके॥ ४६<br>धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत्।<br>धृतराष्ट्रस्तु गान्धार्यां पुत्रानजनयच्छतम्॥ ४७<br>तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वक्षत्रस्य वै प्रभुः।<br>माद्री कुन्ती तथा चैव पाण्डोर्भार्ये बभूवतुः॥ ४८<br>देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थेऽभिजज्ञिरे।<br>धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः॥ ४९<br>इन्द्राद् धनञ्जयश्चैव इन्द्रतुल्यपराक्रमः।<br>नकुलं सहदेवं च माद्र्यश्विभ्यामजीजनत्॥ ५०<br>पञ्चैते पाण्डवेभ्यस्तु द्रौपद्यां जज्ञिरे सुताः।<br>द्रौपद्यजनयच्छ्रेष्ठं प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरात्॥ ५१<br>श्रुतसेनं भीमसेनाच्छ्रुतकीर्तिं धनञ्जयात्।<br>चतुर्थं श्रुतकर्मार्णं सहदेवादजायत॥ ५२<br>नकुलाच्च शतानीकं द्रौपदेयाः प्रकीर्तिताः।<br>तेभ्योऽपरे पाण्डवेयाः षडेवान्ये महारथाः॥ ५३<br>हैडम्बो भीमसेनात् तु पुत्रो जज्ञे घटोत्कचः।<br>काशी बलधराद् भीमाज्जज्ञे वै सर्वगं सुतम्॥ ५४<br>सुहोत्रं तनयं माद्री सहदेवादसूत।<br>करेणुमत्यां चैद्यायां निरमित्रस्तु नाकुलिः॥ ५५ | (देवापिके वन चले जानेपर) शांतनु राजा हुए। ये विद्वान् तो थे ही, साथ ही महान् वैद्य भी थे। इनकी महावैद्यताके प्रति लोग एक श्लोक कहा करते हैं, जिसका आशय यह है कि 'महाराज शांतनु जिस-जिस रोगी अथवा वृद्धको अपने हाथोंसे स्पर्श कर लेते थे, वह पुनः नौजवान हो जाता था। इसी कारण लोग उन्हें शांतनु कहते थे।' उस समय प्रजागण उनके इस शांतनुत्व (रोगी और वृद्धको युवा बना देनेवाले) गुणका ही वर्णन करते थे। तदनन्तर प्रभावशाली राजा शांतनुने जह्नु-नन्दिनी गङ्गाको अपनी पत्नीके रूपमें वरण किया और उनके गर्भसे देवव्रत (भीष्म) नामक कुमारको पैदा किया। दाश-कन्या काली सत्यवतीने शांतनुके संयोगसे विचित्रवीर्य नामक पुत्रको जन्म दिया, जो पिताके लिये परम प्रिय, शान्तात्मा और निष्पाप था। महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यासने विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें धृतराष्ट्र और पाण्डुको तथा (दासीसे) विदुरको उत्पन्न किया था। धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया, उनमें दुर्योधन सबसे श्रेष्ठ था और वह सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशका स्वामी था। इसी प्रकार पाण्डुकी कुन्ती और माद्री नामकी दो पत्नियाँ हुईं। इन्हीं दोनोंके गर्भसे महाराज पाण्डुकी वंश-वृद्धिके लिये देवताओंद्वारा प्रदान किये गये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुन्तीने धर्मके संयोगसे युधिष्ठिरको, वायुके संयोगसे वृकोदर (भीमसेन)-को और इन्द्रके संयोगसे इन्द्रसरीखे पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-को जन्म दिया। इसी प्रकार माद्रीने अश्विनीकुमारोंके संयोगसे नकुल और सहदेवको पैदा किया॥ ४१-५०॥<br><br>इन पाँचों पाण्डवोंके संयोगसे द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें द्रौपदीने युधिष्ठिरके संयोगसे ज्येष्ठ पुत्र प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनके संयोगसे श्रुतसेनको और अर्जुनके संयोगसे श्रुतकीर्तिको जन्म दिया था। चौथा पुत्र श्रुतकर्मार् सहदेवसे और शतानीक नकुलसे उत्पन्न किया था। ये पाँचों द्रौपदेय अर्थात् द्रौपदीके पुत्र कहलाये। इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके छः अन्य महारथी पुत्र भी थे। (उनका विवरण इस प्रकार है—) भीमसेनके संयोगसे हिडिम्बा नामकी राक्षसीके गर्भसे घटोत्कच नामक पुत्रका जन्म हुआ था। उनकी दूसरी पत्नी काशीने बलवान् भीमसेनके संयोगसे सर्वग नामक पुत्रको जन्म दिया था। मद्रराज-कुमारी सहदेव-पत्नीने सहदेवके संयोगसे सुहोत्र नामक पुत्रको पैदा किया था। नकुल-पुत्र निरमित्र चेदिराज-कुमारी करेणुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। |

* अध्याय ५० *
२०५

| सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत।<br>यौधेयं देवकी चैव पुत्रं जज्ञे युधिष्ठिरात्॥ ५६<br>अभिमन्योः परीक्षित् तु पुत्रः परपुरञ्जयः।<br>जनमेजयः परीक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः॥ ५७ | पृथा-पुत्र अर्जुनके संयोगसे सुभद्राके गर्भसे महारथी अभिमन्यु पैदा हुआ था। युधिष्ठिर-पत्नी देवकीने युधिष्ठिरके संयोगसे यौधेय नामक पुत्रको जन्म दिया था। अभिमन्युके पुत्र शत्रुओंकी नगरीको जीतनेवाले परीक्षित् हुए। परीक्षित्के पुत्र परम धर्मात्मा जनमेजय (तृतीय) हुए॥ ५१—५७॥ |
| ब्रह्माणं कल्पयामास स वै वाजसनेयकम्।<br>स वैशम्पायनेनैव शप्तः किल महर्षिणा॥ ५८<br>न स्थास्यतीह दुर्बुद्धे तवैतद् वचनं भुवि।<br>यावत् स्थास्यसि त्वं लोके तावदेव प्रपत्स्यति॥ ५९<br>क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः।<br>अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्॥ ६०<br>ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः।<br>उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततः प्रभृति सर्वशः॥ ६१<br>क्षत्रस्य याजिनः केचिच्छापात् तस्य महात्मनः।<br>पौर्णमासेन हविषा इष्ट्वा तस्मिन् प्रजापतिम्।<br>स वैशम्पायनेनैव प्रविशन् वारितस्ततः॥ ६२<br>परीक्षितः सुतोऽसौ वै पौरवो जनमेजयः।<br>द्विरश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः॥ ६३<br>प्रवर्तयित्वा तं सर्वमृषिं वाजसनेयकम्।<br>विवादे ब्राह्मणैः सार्धमभिशप्तो वनं ययौ॥ ६४<br>जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माज्जज्ञे स वीर्यवान्।<br>जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्येऽभिषिक्तवान्॥ ६५<br>अथाश्वमेधेन ततः शतानीकस्य वीर्यवान्।<br>जज्ञेऽधिसीमकृष्णाख्यः साम्प्रतं यो महायशाः॥ ६६<br>तस्मिञ्शासति राष्ट्रं तु युष्माभिरिदमाहृतम्।<br>दुरापं दीर्घसत्रं वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे।<br>वर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमाः॥ ६७ | जनमेजयने अपने यज्ञमें वाजसनेय (शुक्लयजुर्वेदके आचार्य) ऋषिको ब्रह्माके पदपर नियुक्त किया। यह देखकर वैशम्पायन (कृष्णयजुर्वेदके आचार्य)-ने उन्हें शाप देते हुए कहा—‘दुर्बुद्धे! तुम्हारा यह (नवीन) वचन अर्थात् (संहिता-ग्रन्थ) भूतलपर स्थायी नहीं हो सकेगा। जबतक तुम लोकमें जीवित रहोगे, तभीतक यह भी ठहर सकेगा।' तभीसे क्षत्रियजातिकी विजय जानकर बहुत-से लोग चारों ओरसे (शुक्लयजुर्वेदके प्रवर्धक) राजा जनमेजयके पास आकर रहने लगे। परंतु महात्मा वैशम्पायनके शापके कारण उस यज्ञमें बहुत-से यज्ञानुष्ठान करनेवाले क्षत्रिय तथा कुछ याजक भी नष्ट हो गये। तब उस यज्ञमें जब जनमेजय पौर्णमास हविद्वारा ब्रह्माका यजन कर यज्ञशालामें प्रवेश करनेके लिये प्रयत्नशील हुए, उसी समय महर्षि वैशम्पायनने उन्हें भीतर जानेसे रोक दिया। तदनन्तर परीक्षित्पुत्र पूरुवंशी जनमेजयने दो अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उनमें उन्होंने अपने द्वारा प्रवर्तित महावाजसनेय (शौक्लयजुष) विधिको ही प्रयोग किया। वह सारा कार्य वाजसनेय ऋषिकी अध्यक्षतामें ही सम्पन्न हो रहा था। उसी समय ब्राह्मणोंके साथ विवाद हो जानेपर ब्राह्मणोंने उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे वनमें चले गये।* उन जनमेजयसे पराक्रमी शतानीकका जन्म हुआ। जनमेजयने (वन-गमन करते समय) अपने पुत्र शतानीकको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया था। शतानीकद्वारा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किये जानेपर उसके फलस्वरूप शतानीकके एक महायशस्वी एवं पराक्रमी अधिसीमकृष्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इस (पुराणप्रवचनके) समय सिंहासनासीन है। द्विजवरो! उसीके राज्यशासन करते समय आपलोगोंने अभी-अभी पुष्करक्षेत्रमें तीन वर्षोंतक तथा कुरुक्षेत्रमें दृषद्वतीके तटपर दो वर्षोंतक इस दुर्लभ दीर्घ सत्रका अनुष्ठान सम्पन्न किया है॥ ५८—६७॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>भविष्यं श्रोतुमिच्छामः प्रजानां लोमहर्षणे।<br>पुरा किल यदेतद् वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया॥ ६८ | **ऋषियोंने पूछा—**लोमहर्षणके पुत्र सूतजी! पूर्वकालमें जो बातें बीत चुकी हैं, उनका वर्णन तो आपने कर दिया। अब हमलोग प्रजाओंके भविष्यके विषयमें सुनना चाहते हैं। |


* द्रष्टव्य-हरिवंशपु०, भविष्यपु०, अ० ५ ।