मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५० पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास
* अध्याय ४८ * । १९३
| भविष्यन्ति कुमारास्तु पञ्च देवसुतोपमाः।<br>तेजस्विनः सुवृत्ताश्च यज्वानो धार्मिकाश्च ते॥ ७६<br><br>सूत उवाच<br>तदंशस्तु सुदेष्णाया ज्येष्ठः पुत्रो व्यजायत।<br>अङ्गस्तथा कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुहास्तथैव च॥ ७७<br>वङ्गराजस्तु पञ्चैते बलेः पुत्राश्च क्षेत्रजाः।<br>यस्यैते दीर्घतमसा बलेर्दत्ताः सुतास्तथा॥ ७८<br>प्रतिष्ठामागतानां हि ब्राह्मण्यं कार्यंस्ततः।<br>ततो मानुषयोन्यां स जनयामास वै प्रजाः॥ ७९<br>ततस्तं दीर्घतमसं सुरभिर्वाक्यमब्रवीत्।<br>विचार्य यस्माद् गोधर्मं प्रमाणं ते कृतं विभो॥ ८०<br>भक्त्या चानन्ययास्मासु तेन प्रीतास्मि तेऽनघ।<br>तस्मात् तुभ्यं तमो दीर्घमाघ्रायापनुदामि वै॥ ८१<br>बार्हस्पत्यस्तथैवैष पाप्मा वै तिष्ठति त्वयि।<br>जरां मृत्युं तमश्चैव आघ्रायापनुदामि ते॥ ८२<br>सद्यः स घ्रातमात्रस्तु अभितो मुनिसत्तमः।<br>आयुष्मांश्च वपुष्मांश्च चक्षुष्मांश्च ततोऽभवत्॥ ८३<br>गोऽभ्याहते तमसि वै गौतमस्तु ततोऽभवत्।<br>कक्षीवांस्तु ततो गत्वा सह पित्रा गिरिव्रजम्॥ ८४<br>दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पितुर्वै स ह्युपविष्टश्चिरं तपः।<br>ततः कालेन महता तपसा भावितस्तु सः॥ ८५<br>विधूय मातृजं कायं ब्राह्मणं प्राप्तवान् प्रभुः।<br>ततोऽब्रवीत् पिता तं वै पुत्रवानस्म्यहं त्वया॥ ८६<br>सत्पुत्रेण तु धर्मज्ञ कृतार्थोऽहं यशस्विना।<br>मुक्त्वाऽऽत्मानं ततोऽसौ वै प्राप्तवान् ब्रह्मणः क्षयम्॥ ८७<br>ब्राह्मण्यं प्राप्य काक्षीवान् सहस्रमसृजत् सुतान्।<br>कौष्माण्डा गौतमाश्चैव स्मृताः काक्षीवतः सुताः॥ ८८<br>इत्येष दीर्घतमसो बलेर्वैरोचनस्य च।<br>समागमो वः कथितः सन्ततिश्चोभयोस्तथा॥ ८९<br>बलिस्तानभिनन्द्याह पञ्च पुत्रानकल्मषान्।<br>कृतार्थः सोऽपि धर्मात्मा योगमायावृतः स्वयम्॥ ९०<br>अदृश्यः सर्वभूतानां कालापेक्षः स वै प्रभुः।<br>तत्राङ्गस्य तु दायादो राजासीद् दधिवाहनः॥ ९१<br>दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथः स्मृतः।<br>आसीद् दिविरथापत्यं विद्वान् धर्मरथो नृपः॥ ९२ | दशरथका पुत्र महायशस्वी शूरवीर चतुरङ्ग हुआ।<br><br>चतुरङ्गका पुत्र पृथुलाक्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ। अपने कुलकी वृद्धि करनेवाला यह पृथुलाक्ष महर्षि ऋष्यशृङ्गकी कृपासे पैदा हुआ था। पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ। चम्पकी राजधानीका नाम चम्पा (भागलपुर) था, जो पहले मालिनी नामसे प्रसिद्ध थी। पूर्णभद्रकी कृपासे चम्पका पुत्र हर्यङ्ग हुआ। इस राजाके यज्ञमें महर्षि विभाण्डकने मन्त्रोंद्वारा एक ऐसे हस्तीको भूतलपर अवतीर्ण किया था जो शत्रुओंको विमुख कर देनेवाला एवं उत्तम वाहन था। हर्यङ्गका पुत्र भद्ररथ पैदा हुआ। भद्ररथका पुत्र राजा बृहत्कर्मा हुआ। उसका पुत्र बृहद्भानु हुआ। उससे महात्मवान्का जन्म हुआ। राजेन्द्र बृहद्भानुने एक अन्य पुत्रको भी उत्पन्न किया था जिसका नाम जयद्रथ था। उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथसे विश्वविजयी जनमेजय पैदा हुआ था। उसका पुत्र अङ्ग था और उससे राजा कर्णकी उत्पत्ति हुई थी। कर्णका वृषसेन और उसका पुत्र पृथुसेन हुआ। द्विजवरो! ये सभी राजा अङ्गके वंशमें उत्पन्न हुए थे, मैंने इनका आनुपूर्वी विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। अब आप लोग पूरुके वंशका वर्णन सुनिये॥ ९०—१०३॥ |
| १९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| स हि धर्मरथः श्रीमांस्तेन विष्णुपदे गिरौ।<br>सोमः शुक्रेण वै राज्ञा सह पीतो महात्मना॥ ९३<br>अथ धर्मरथस्याभूत् पुत्रश्चित्ररथः किल।<br>तस्य सत्यरथः पुत्रस्तस्माद् दशरथः किल॥ ९४<br>लोमपाद इति ख्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत्।<br>अथ दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः॥ ९५<br>ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जज्ञे स्वकुलवर्धनः।<br>चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः॥ ९६<br>पृथुलाक्षसुतश्चापि चम्पनामा बभूव ह।<br>चम्पस्य तु पुरी चम्पा पूर्वं या मालिनी भवत्॥ ९७<br>पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत्।<br>यज्ञे विभाण्डकाच्चास्य वारणः शत्रुवारणः॥ ९८<br>अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम्।<br>हर्यङ्गस्य तु दायादो जातो भद्ररथः किल॥ ९९<br>अथ भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा जनेश्वरः।<br>बृहद्भानुः सुतस्तस्य तस्माज्जज्ञे महात्मवान्॥ १००<br>बृहन्मनास्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम्।<br>नाम्ना जयद्रथं नाम तस्माद् बृहद्रथो नृपः॥ १०१<br>आसीद् बृहद्रथाच्चैव विश्वजिज्जनमेजयः।<br>दायादस्तस्य चाङ्गो वै तस्मात् कर्णोऽभवन्नृपः॥ १०२<br>कर्णस्य वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः।<br>एतेऽङ्गस्यात्मजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया।<br>विस्तरेणानुपूर्व्याच्च पुरोस्तु शृणुत द्विजाः॥ १०३ | |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं सूतात्मजः कर्णः कथमङ्गस्य चात्मजः।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुमत्यन्तकुशलो ह्यसि॥ १०४ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! कर्ण कैसे अधिरथ सूतके पुत्र थे, पुनः किस प्रकार अङ्गके पुत्र कहलाये? इस रहस्यको सुननेकी हम लोगोंकी उत्कट इच्छा है, इसका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप कथा कहनेमें परम प्रवीण हैं॥ १०४॥ |
| सूत उवाच<br>बृहद्भानुसुतो जज्ञे राजा नाम्ना बृहन्मनाः।<br>तस्य पत्नीद्वयं ह्यासीच्छैब्यस्य तनये ह्युभे।<br>यशोदेवी च सत्या च तयोर्वंशं च मे शृणु॥ १०५<br>जयद्रथं तु राजानं यशोदेवी व्यजीजनत्।<br>सा बृहन्मनसः सत्या विजयं नाम विश्रुतम्॥ १०६<br>विजयस्य बृहत्पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः।<br>बृहद्रथस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महामनाः॥ १०७<br>सत्यकर्मणोऽधिरथः सूतश्चाधिरथः स्मृतः।<br>यः कर्णं प्रतिजग्राह तेन कर्णस्तु सूतजः।<br>तच्चेदं सर्वमाख्यातं कर्णं प्रति यथोदितम्॥ १०८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! बृहद्भानुका पुत्र बृहन्मना नामका राजा हुआ। उसके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों शैब्यकी कन्याएँ थीं। उनका नाम यशोदेवी और सत्या था। अब मुझसे उन दोनोंका वंश-वर्णन सुनिये। बृहन्मनाके संयोगसे यशोदेवीने राजा जयद्रथको और सत्याने विश्वविख्यात विजयको जन्म दिया था। विजयका पुत्र बृहत्पुत्र और उसका पुत्र बृहद्रथ हुआ। बृहद्रथका पुत्र महामना सत्यकर्मा हुआ। सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ हुआ। यही अधिरथ सूत नामसे भी विख्यात था, जिसने (गङ्गामें बहते हुए) कर्णको पकड़ा था। इसी कारण कर्ण सूत-पुत्र कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्णके प्रति जो किंवदन्ती फैली है, उसे पूर्णतया मैंने आप लोगोंसे कह दिया॥ १०५—१०८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४८॥
* अध्याय ४९ * । १९५
उनचासवाँ अध्याय
पूरू-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास
| सूत उवाच<br><br>पूरोः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः ।<br>प्राचीत्वतः सुतस्तस्य यः प्राचीमकरोद् दिशम् ॥ १<br><br>प्राचीत्वतस्य तनयो मनस्युश्च तथाभवत् ।<br>राजा वी ( पी ) तायुधो नाम मनस्योरभवत् सुतः ॥ २<br><br>दायादस्तस्य चाप्यासीद् धुन्धुर्नाम महीपतिः ।<br>धुन्धोर्बहुविधः पुत्रः संयातिस्तस्य चात्मजः ॥ ३<br><br>संयातेस्तु रहंवर्चा भद्राश्वस्तस्य चात्मजः ।<br>भद्राश्वस्य घृतायां तु दशाप्सरसि सूनवः ॥ ४<br><br>औचेयुश्च हृषेयुश्च कक्षेयुश्च सुनेयुकः ।<br>धृतेयुश्च विनेयुश्च स्थलेयुश्चैव सत्तमः ॥ ५<br><br>धर्मेयुः संनतेयुश्च पुण्येयुश्चेति ते दश ।<br>औचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा ॥ ६<br><br>तस्यां स जनयामास रन्तिनारं महीपतिम् ।<br>रन्तिनारो मनस्विन्यां पुत्राञ्जज्ञे पराञ्शुभान् ॥ ७<br><br>अमूर्तरयसं वीरं त्रिवनं चैव धार्मिकम् ।<br>गौरी कन्या तृतीया च मान्धातर्जननी शुभा ॥ ८<br><br>इलिना तु यमस्यासीत् कन्या साजनयत् सुतम् ।<br>त्रिवनाद् दयितं पुत्रमैलिनं ब्रह्मवादिनम् ॥ ९<br><br>उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात् ।<br>ऋष्यन्तमथ दुष्यन्तं प्रवीरमनघं तथा ॥ १०<br><br>चक्रवर्ती ततो जज्ञे दुष्यन्तात् समितिक्षयः ।<br>शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना च भारताः ॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! (ययातिके सबसे छोटे पुत्र) पूरुका पुत्र महातेजस्वी राजा जनमेजय (प्रथम) था। उसका पुत्र प्राचीत्वत (प्राचीनवंत) हुआ, जिसने प्राची (पूर्व) दिशा बसायी। प्राचीत्वतका पुत्र मनस्यु* हुआ। मनस्युका पुत्र राजा वीतायुध (अभय) हुआ। उसका पुत्र धुन्धु नामका राजा हुआ। धुन्धुका पुत्र बहुविध (बहुविद्य, अन्यत्र बहुगव) और उसका पुत्र संयाति हुआ। संयातिका पुत्र रहंवर्चा और उसका पुत्र भद्राश्व (रौद्राश्व) हुआ। भद्राश्वके घृता (घृताची, अन्यत्र मिश्रकेशी) नामकी अप्सराके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न हुए। उन दसोंके नाम हैं—औचेयु (अधिकांश पुराणोंमें ऋचेयु), हृषेयु, कक्षेयु, सुनेयु, धृतेयु, विनेयु, श्रेष्ठ स्थलेयु, धर्मेयु, संनतेयु और पुण्येयु। औचेयु (ऋचेयु)-की पत्नीका नाम ज्वलना था। वह नागराज तक्षककी कन्या थी। उसके गर्भसे उन्होंने भूपाल रन्तिनार (यह प्रायः सर्वत्र मतिनार, पर भागवतमें रन्तिभार है)-को जन्म दिया। रन्तिनारने अपनी पत्नी मनस्विनीके गर्भसे कई सुन्दर पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें वीरवर अमूर्तरय और धर्मात्मा त्रिवन प्रधान थे। उसकी तीसरी संतति गौरी नामकी सुन्दरी कन्या थी, जो मान्धाताकी जननी हुई। इलिना यमराजकी कन्या थी। उसने त्रिवनसे ब्रह्मवादमें श्रेष्ठ पराक्रमी ऐलिन (ऐलिक, त्रंसु या जंसु) नामक प्रिय पुत्र उत्पन्न किया। इलिना-नन्दन ऐलिन (जंसु)-के संयोगसे उपदानवीने ऋष्यन्त, दुष्यन्त, प्रवीर तथा अनघ नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। इनमें द्वितीय पुत्र राजा दुष्यन्तके संयोगसे शकुन्तलाके गर्भसे भरतका जन्म हुआ, जो आगे चलकर संग्राम-विजयी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। उसीके नामपर उसके वंशधर 'भारत' नामसे कहे जाने लगे॥ १-११॥ |
* महाभारत १।९४।१ तथा अन्य वायु, विष्णु, ब्रह्माण्डादि पुराणोंमें प्राचीनवंत या प्राचीनवंशका पुत्र प्रवीर और उसका पुत्र मनस्यु कहा गया है। इसमें आगे भी जहाँ-तहाँ कुछ पुरुष छोड़ दिये गये हैं जो पढ़ते समय स्पष्ट ज्ञात हो जाता है।
| १९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| दौष्यन्तिं प्रति राजानं वागूचे चाशरीरिणी।<br>माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ॥ १२<br>भरस्व पुत्रं दुष्मन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।<br>रेतोधां नयते पुत्रः परेतं यमसादनात्।<br>त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३<br>भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु पुरा किल।<br>पुत्राणां मातृकात् कोपात् सुमहान् संक्षयः कृतः ॥ १४<br>ततो मरुद्भिरानीय पुत्रः स तु बृहस्पतेः।<br>संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्भरतस्य तु ॥ १५<br><br>ऋषय ऊचुः<br>भरतस्य भरद्वाजः पुत्रार्थं मारुतैः कथम्।<br>संक्रामितो महातेजास्तन्नो ब्रूहि यथातथम् ॥ १६<br><br>सूत उवाच<br>पत्न्यामापन्नसत्त्वायामुशिजः स स्थितो भुवि।<br>भ्रातृभार्यां स दृष्ट्वा तु बृहस्पतिरुवाच ह ॥ १७<br>उपतिष्ठ स्वलंकृत्य मैथुनाय च मां शुभे।<br>एवमुक्ताब्रवीदेनं स्वयमेव बृहस्पतिम् ॥ १८<br>गर्भः परिणतश्चायं ब्रह्म व्याहरते गिरा।<br>अमोघरेतास्त्वं चापि धर्मं चैवं विगर्हितम् ॥ १९<br>एवमुक्तोऽब्रवीदेनां स्वयमेव बृहस्पतिः।<br>नोपदेष्टव्यो विनयस्त्वया मे वरवर्णिनि ॥ २०<br>धर्षमाणः प्रसह्यैनां मैथुनायोपचक्रमे।<br>ततो बृहस्पतिं गर्भो धर्षमाणमुवाच ह ॥ २१<br>संनिविष्टो ह्यहं पूर्वमिह नाम बृहस्पते।<br>अमोघरेताश्च भवान् नावकाश इह द्वयोः ॥ २२<br>एवमुक्तः स गर्भेण कुपितः प्रत्युवाच ह।<br>यस्मात् त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति।<br>अभिषेधसि तस्मात् त्वं तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ॥ २३<br>ततः कामं संनिवर्त्य तस्यानन्दाद् बृहस्पतेः।<br>तद्रेतस्त्वपतद् भूमौ निवृत्तं शिशुकोऽभवत् ॥ २४<br>सद्योजांत कुमारं तु दृष्ट्वा तं ममताब्रवीत्।<br>गमिष्यामि गृहं स्वं वै भरस्वैनं बृहस्पते ॥ २५<br>एवमुक्त्वा गता सा तु गतायां सोऽपि तं त्यजत्। | इसी दुष्मन्त-पुत्र भरतके विषयमें आकाशवाणीने राजा दुष्मन्तसे कहा था—‘दुष्मन्त! माताका गर्भाशय तो एक चमड़ेके थैलेके समान है, उसमें गर्भाधान करनेके कारण पुत्र पिताका ही होता है; अतः जो जिससे पैदा होता है, वह उसका आत्मस्वरूप ही होता है। इसलिये तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो और शकुन्तलाका अपमान मत करो। पुत्र अपने मरे हुए पिताको यमपुरीके कष्टोंसे छुटकारा दिलाता है। इस गर्भका आधान करनेवाले तुम्हीं हो, शकुन्तलाने यह बिलकुल सच बात कही है।' पूर्वकालमें भरतके सभी पुत्रोंका विनाश हो गया था। माताके कोपके कारण उनके पुत्रोंका यह महान् संहार हुआ था। यह देखकर मरुद्गणोंने बृहस्पतिके पुत्र भरद्वाजको लाकर भरतके हाथोंमें समर्पित किया था। बृहस्पति अपने इस पुत्रको वनमें छोड़कर चले गये थे॥ १२-२५ १/२ ॥ |
| * अध्याय ४९ * | १९७ |
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| मातापितृभ्यां त्यक्तं तु दृष्ट्वा तं मरुतः शिशुम्।<br>जगृहुस्तं भरद्वाजं मरुतः कृपया स्थिताः॥ २६<br>तस्मिन् काले तु भरतो बहुभिर्ऋतुभिर्विभुः।<br>पुत्रनैमित्तिकैर्यज्ञैरयजत् पुत्रलिप्सया॥ २७<br>यदा स यजमानस्तु पुत्रं नासादयत् प्रभुः।<br>ततः क्रतुं मरुत्सोमं पुत्रार्थे समुपाहरत्॥ २८<br>तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तुष्टुवुः।<br>उपनिन्युर्भरद्वाजं पुत्रार्थं भरताय वै॥ २९<br>दायादोऽङ्गिरसः सूनौरौरसस्तु बृहस्पतेः।<br>संक्रामितो भरद्वाजा मरुद्भिर्भरतं प्रति॥ ३०<br>भरतस्तु भरद्वाजं पुत्रं प्राप्य विभुर्ब्रवीत्।<br>आदावात्महिताय त्वं कृतार्थोऽहं त्वया विभो॥ ३१<br>पूर्वं तु वितथे तस्मिन् कृते वै पुत्रजन्मनि।<br>ततस्तु वितथो नाम भरद्वाजो नृपोऽभवत्॥ ३२<br>तस्मादपि भरद्वाजाद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया भुवि।<br>द्व्यामुष्यायणकौलीनाः स्मृतास्ते द्विविधेन च॥ ३३ | इस प्रकार माता-पिताद्वारा त्यागे गये उस शिशुको देखकर मरुद्गणोंका हृदय दयार्द्र हो गया, तब उन्होंने उस भरद्वाज नामक शिशुको उठा लिया। उसी समय राजा भरत पुत्र-प्राप्तिकी अभिलाषासे अनेकों ऋतुकालके अवसरोंपर पुत्रनिमित्तक यज्ञोंका अनुष्ठान करते आ रहे थे, परंतु जब उन सामर्थ्यशाली नरेशको उन यज्ञोंके करनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने पुत्र-प्राप्तिके निमित्त 'मरुत्स्तोम' नामक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। राजा भरतके उस मरुत्स्तोम यज्ञसे सभी मरुद्गण प्रसन्न हो गये। तब वे उस भरद्वाज नामक शिशुको साथ लेकर भरतको पुत्ररूपमें प्रदान करनेके लिये उस यज्ञमें उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने अङ्गिरा-पुत्र बृहस्पतिके औरस पुत्र भरद्वाजको भरतके हाथोंमें समर्पित कर दिया। तब राजा भरत भरद्वाजको पुत्ररूपमें पाकर इस प्रकार बोले—'विभो! पहले तो आप (इस शिशुको लेकर) आत्महितकी ही बात सोच रहे थे, परंतु अब इसे पाकर मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ।' पुत्र-जन्मके हेतु किये गये पहलेके सभी यज्ञ वितथ (निष्फल) हो गये थे, इसलिये वह भरद्वाज राजा वितथके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस भरद्वाजसे भी भूतलपर ब्राह्मण और क्षत्रिय—दोनों प्रकारके पुत्र उत्पन्न हुए, जो द्व्यामुष्यायण और कौलीन नामसे विख्यात हुए॥ २६—३३॥ |
| ततो जाते हि वितथे भरतश्च दिवं ययौ।<br>भरद्वाजो दिवं यातो ह्यभिषिच्य सुतं ऋषिः॥ ३४ | तदनन्तर वितथके पुत्ररूपमें प्राप्त हो जानेपर राजा भरत (उसे राज्याभिषिक्त करके) स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि भरद्वाज भी यथासमय अपने पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोक सिधारे। |
| दायादो वितथस्यासीद् भुमन्युर्महायशाः।<br>महाभूतोपमाः पुत्राश्चत्वारो भुवमन्यवः॥ ३५ | महायशस्वी भुवमन्यु वितथका पुत्र था। भुवमन्युके बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और वीर्यशाली गर्ग नामक चार पुत्र थे, जो वायु आदि चार महातत्त्वोंके समान थे। |
| बृहत्क्षत्रो महावीर्यो नरो गर्गश्च वीर्यवान्।<br>नरस्य संकृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशाः॥ ३६ | नरका पुत्र संकृति हुआ। संकृतिके दो पुत्र महायशस्वी गुरुधी और रन्तिदेव हुए। वे दोनों सत्कृतिके गर्भसे उत्पन्न हुए बतलाये जाते हैं। |
| गुरुधी रन्तिदेवश्च सत्कृत्यां तावुभौ स्मृतौ।<br>गर्गस्य चैव दायादः शिबिर्विद्वानजायत॥ ३७ | गर्गके पुत्ररूपमें विद्वान् शिवि उत्पन्न हुआ। उसके वंशधर जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विज थे, शैव्य और गर्गके नामसे विख्यात हुए। |
| स्मृताः शैव्यास्ततो गर्गाः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>आहार्यतनयश्चैव धीमानासीदुरुक्षवः॥ ३८ | शिविके आहार्यतनय और बुद्धिमान् उरुक्षव नामक दो पुत्र थे। |
| तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे पुत्रकत्रयम्।<br>त्र्यरुणं पुष्करिं चैव कविं चैव महायशाः॥ ३९ | उरुक्षवकी पत्नी विशालाने त्र्यरुण, पुष्करि और महायशस्वी कवि—इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया। |
| १९८ | * मत्स्यपुराण * |
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| उरुक्षवाः स्मृता ह्येते सर्वे ब्राह्मणतां गताः।<br>काव्यानां तु वरा ह्येते त्रयः प्रोक्ता महर्षयः॥ ४०<br>गर्गाः संकृतयः काव्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>सम्भूताङ्गिरसो दक्षा बृहत्क्षत्रस्य च क्षितिः॥ ४१<br>बृहत्क्षत्रस्य दायादो हस्तिनामा बभूव ह।<br>तेनेदं निर्मितं पूर्वं पुरं तु गजसाह्वयम्॥ ४२<br>हस्तिनश्चैव दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च॥ ४३<br>अजमीढस्य पत्न्यस्तु तिस्रः कुरुकुलोद्भवाः।<br>नीलिनी धूमिनी चैव केशिनी चैव विश्रुताः॥ ४४<br>स तासु जनयामास पुत्रान् वै देववर्चसः।<br>तपसोऽन्ते महातेजा जाता वृद्धस्य धार्मिकाः॥ ४५<br>भारद्वाजप्रसादेन विस्तरं तेषु मे शृणु।<br>अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत् किल॥ ४६<br>मेधातिथिः सुतस्तस्य तस्मात् काण्वायना द्विजाः।<br>अजमीढस्य भूमिन्यां जज्ञे बृहदनुर्नृपः॥ ४७<br>बृहदनोर्बृहन्तोऽथ बृहन्तस्य बृहन्मनाः।<br>बृहन्मनःसुतश्चापि बृहद्धनुरिति श्रुतः॥ ४८<br>बृहद्धनोर्बृहदिषुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः।<br>अश्वजित् तनयस्तस्य सेनजित् तस्य चात्मजः॥ ४९<br>अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>रुचिराश्वश्च काव्यश्च राजा दृढरथस्तथा॥ ५०<br>वत्सश्चावर्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः।<br>रुचिराश्वस्य दायादः पृथुसेनो महायशाः॥ ५१<br>पृथुसेनस्य पौरस्तु पौरात्रीपोऽथ जज्ञिवान्।<br>नीपस्यैकशतं त्वासीत् पुत्राणाममितौजसाम्॥ ५२<br>नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते।<br>तेषां वंशकरः श्रीमान्नीपानां कीर्तिवर्धनः॥ ५३<br>काव्याच्च समरो नाम सदेष्टसमरोऽभवत्।<br>समरस्य पारसम्पारौ सदश्व इति ते त्रयः॥ ५४<br>पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता वै विश्रुता भुवि।<br>पारपुत्रः पृथुर्जातः पृथोस्तु सुकृतोऽभवत्॥ ५५ | ये सभी उरुक्षव कहलाते हैं और अन्तमें ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये थे। काव्यके वंशधरों ( भार्गव गोत्र-प्रवरों)-में ये तीनों महर्षि कहे गये हैं। इस प्रकार गर्ग, संकृति और कविके वंशमें उत्पन्न हुए लोग क्षत्रियांशसे युक्त ब्राह्मण थे। अङ्गिरागोत्रीय बृहत्क्षत्रने भी इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीका शासन किया था। बृहत्क्षत्रका हस्ति नामक पुत्र हुआ। उसीने पूर्वकालमें इस हस्तिनापुर नामक नगरको बसाया था। हस्तीके अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामक तीन परम कीर्तिशाली पुत्र हुए। अजमीढकी तीन पत्नियाँ थीं, जो कुरुकुलमें उत्पन्न हुई थीं। वे नीलिनी, धूमिनी और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं। अजमीढने उनके गर्भसे अनेकों पुत्रोंको पैदा किया था, जो सभी देवताओंके समान वर्चस्वी, महान् तेजस्वी और धर्मात्मा थे। वे अपने वृद्ध पिताकी तपस्याके अन्तमें महर्षि भारद्वाजकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। उनका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त मुझसे सुनिये॥ ३४-४५ १/२ ॥<br>अजमीढके केशिनीके गर्भसे कण्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मेधातिथि हुआ। उससे काण्वायन ब्राह्मणोंकी* उत्पत्ति हुई। भूमिनी (धूमिनी)-के गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें राजा बृहदनुका जन्म हुआ। बृहदनुका पुत्र बृहन्त, बृहन्तका पुत्र बृहन्मना और बृहन्मनाका पुत्र बृहद्धनु नामसे विख्यात हुआ। बृहद्धनुका पुत्र बृहदिषु और उसका पुत्र जयद्रथ हुआ। उसका पुत्र अश्वजित् और उसका पुत्र सेनजित् हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काव्य, राजा दृढरथ और राजा वत्सावर्तक—ये चार लोकविख्यात पुत्र हुए। इनमें वत्सावर्तकके वंशधर परिवत्सक नामसे कहे जाते हैं। रुचिराश्वका पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुआ। पृथुसेनसे पौरका और पौरसे नीपका जन्म हुआ। नीपके अमित तेजस्वी पुत्रोंकी संख्या एक सौ थी। वे सभी राजा थे और नीप नामसे ही विख्यात थे। काव्यसे समर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो उन नीपवंशियोंका वंशप्रवर्तक, लक्ष्मीसे युक्त और कीर्तिवर्धक था। वह समरके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था। समरके पार, सम्पार और सदश्व—ये तीन पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न तथा भूतलपर विख्यात थे। पारका पुत्र पृथु हुआ और पृथुसे सुकृतकी उत्पत्ति हुई। |
* विशेष द्रष्टव्य—ऋग्वेदसंहिता— ८। ५५। ४, ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, भागवत १२। १। ४९ तथा पुनः मत्स्यपुराण १९१। २६।