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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
४६- वृष्णि-वंशका वर्णन
पृष्ठ 165स्थायी लिंक
- अध्याय ४४ * १५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतस्मिन्नेव काले तु आपवो जलमास्थितः।<br>दशवर्षसहस्राणि तत्रास्ते स महान् ऋषिः॥ १२<br><br>पूर्णे व्रते महातेजा उदतिष्ठत्तपोधनः।<br>सोऽपश्यदाश्रमं दग्धमर्जुनेन महामुनिः॥ १३ | भ्रष्ट हो गयी। उसी समय महर्षि आपव जो महान् तेजस्वी और तपस्याके धनी थे, दस हजार वर्षोंसे जलके भीतर बैठकर तप कर रहे थे, व्रत पूर्ण होनेपर बाहर निकले तो उन महामुनिने अर्जुनद्वारा अपने आश्रमको जलाया हुआ देखा। तब उन्होंने क्रुद्ध होकर राजर्षि अर्जुनको उक्त शाप दे दिया, जैसा कि मैंने अभी आप लोगोंको बतलाया है॥ ९–१३ १/२॥ |
| क्रोधाच्छाप राजर्षि कीर्तितं वो यथा मया।<br>क्रोष्टोः शृणुत राजर्षेर्वंशमुत्तमपौरुषम्॥ १४<br>यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः। | ऋषियो! (अब) आपलोग राजर्षि क्रोष्टुके उस उत्तम बल-पौरुषसे सम्पन्न वंशका वर्णन सुनिये, जिस वंशमें वृष्णिवंशावतंस भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) अवतीर्ण हुए थे। |
| क्रोष्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महारथः॥ १५ | क्रोष्टुका पुत्र महारथी वृजिनीवान् हुए। |
| वृजिनीवतश्च पुत्रोऽभूत् स्वाहो नाम महाबलः।<br>स्वाहुपुत्रोऽभवद् राजन् रुषङ्गुर्वदतां वरः॥ १६ | वृजिनीवान्के स्वाह (पद्मपुराणमें स्वाति) नामक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन्! वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुषङ्गु स्वाहके पुत्ररूपमें पैदा हुए। |
| स तु प्रसूतिमिच्छन् वै रुषङ्गुः सौम्यमात्मजम्।<br>चित्रश्वित्ररथश्चास्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः॥ १७ | रुषङ्गुने संतानकी इच्छासे सौम्य स्वभाववाले पुत्रकी कामना की। तब उनके सत्कर्मोंसे समन्वित एवं चित्र-विचित्र रथसे युक्त चित्ररथ नामक पुत्र हुआ। |
| अथ चैत्ररथिर्वीरो जज्ञे विपुलदक्षिणः।<br>शशबिन्दुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ १८ | चित्ररथके एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ जो शशबिन्दु नामसे विख्यात था। वह आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। वह यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था। |
| अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्मिन् पुरावभवत्।<br>शशबिन्दोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम्॥ १९ | पूर्वकालमें इस शशबिन्दुके विषयमें वंशानुक्रमणिकारूप यह श्लोक गाया जाता रहा है कि शशबिन्दुके सौ पुत्र हुए। |
| धीमतां चाभिरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्।<br>तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्ना महाबलाः॥ २० | उनमें भी प्रत्येकके सौ-सौ पुत्र हुए। वे सभी प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं तेजसे परिपूर्ण, सौन्दर्यशाली एवं बुद्धिमान् थे। उन पुत्रोंके नामके अग्रभागमें 'पृथु' शब्दसे संयुक्त छः महाबली पुत्र हुए। |
| पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुञ्जयः।<br>पृथुकीर्तिः पृथुमना राजानः शशबिन्दवः॥ २१ | उनके पूरे नाम इस प्रकार हैं—पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुधर्मा, पृथुंजय, पृथुकीर्ति और पृथुमना। ये शशबिन्दुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा थे। |
| शंसन्ति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम्।<br>अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत्॥ २२ | पुराणोंके ज्ञाता विद्वान्लोग इनमें सबसे ज्येष्ठ पृथुश्रवाकी विशेष प्रशंसा करते हैं। उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पृथुश्रवाका पुत्र सुयज्ञ हुआ। |
| उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षेत् पृथिवीमिमाम्।<br>आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः॥ २३ | सुयज्ञका पुत्र उशना हुआ, जो सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा था। उसने इस पृथ्वीकी रक्षा करते हुए सौ अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। |
| तितिक्षुरभवत् पुत्र औशनः शत्रुतापनः।<br>मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षीणामनुत्तमः॥ २४ | उशनाका पुत्र तितिक्षु हुआ जो शत्रुओंको संतप्त कर देनेवाला था। राजर्षियोंमें सर्वश्रेष्ठ मरुत्त तितिक्षुके पुत्र हुए। |
| आसीन्मरुत्ततनयो वीरः कम्बलबर्हिषः।<br>पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः॥ २५ | मरुत्तका पुत्र वीरवर कम्बलबर्हिष था। कम्बलबर्हिषका पुत्र विद्वान् रुक्मकवच हुआ। |
| निहत्य रुक्मकवचः परान् कवचधारिणः।<br>धन्विनो विविधैर्बाणैरवाप्य पृथिवीमिमाम्॥ २६ | रुक्मकवचने अपने अनेकों प्रकारके बाणोंके प्रहारसे धनुर्धारी एवं कवचसे सुसज्जित शत्रुओंको मारकर इस पृथ्वीको प्राप्त किया था। |
१. भागवत ९। २३। ३१ तथा विष्णुपुराण ४। १२। २ में 'रुशङ्गु' एवं पद्म० १। १३। ४ में 'कुशङ्क' पाठ है।
२. अन्यत्र शिमेयु, रुचक या शितपु पाठ भी मिलता है।
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१५६ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अश्वमेधे ददौ राजा ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्।<br>यज्ञे तु रुक्मकवचः कदाचित् परवीरहा॥ २७ | शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राजा रुक्मकवचने एक बार बड़े (भारी) अश्वमेध-यज्ञमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा प्रदान की थी॥ १४—२७॥ |
| जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्या धनुर्भृतः।<br>रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः॥ २८<br>परिघं च हरिं चैव विदेहेऽस्थापयत् पिता।<br>रुक्मेषुरभवद् राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयः॥ २९<br>तेभ्यः प्रत्राजितो राज्याज्ज्यामघस्तु तदाश्रमे।<br>प्रशान्तश्चाश्रमस्थश्च ब्राह्मणेनावबोधितः॥ ३०<br>जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी।<br>नर्मदां नृप एकाकी केवलं वृत्तिकामतः॥ ३१<br>ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा भुक्तमन्यैरूपाविशत्।<br>ज्यामघस्याभवद् भार्या शैव्या परिणता सती॥ ३२<br>अपुत्रो न्यवसद् राजा भार्यामन्यां न विन्दति।<br>तस्यासीद् विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः॥ ३३<br>भार्यामुवाच संत्रासात् स्नुषेयं ते शुचिस्मिते।<br>एकमुक्ताब्रवीदेनं कस्य चेयं स्नुषेति च॥ ३४ | इन (राजा रुक्मकवच)-के रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरिनामक पाँच पुत्र हुए, जो महान् पराक्रमी एवं श्रेष्ठ धनुर्धर थे। पिता रुक्मकवचने इनमेंसे परिघ और हरि—इन दोनोंको विदेह देशके राज-पदपर नियुक्त कर दिया। रुक्मेषु प्रधान राजा हुआ और पृथुरुक्म उसका आश्रित बन गया। उन लोगोंने ज्यामघको राज्यसे निकाल दिया। वहाँ एकत्र ब्राह्मणद्वारा समझाये-बुझाये जानेपर वह प्रशान्त-चित्त होकर वानप्रस्थीरूपसे आश्रमोंमें स्थिररूपसे रहने लगा। कुछ दिनोंके पश्चात् वह (एक ब्राह्मणकी शिक्षासे) ध्वजायुक्त रथपर सवार हो हाथमें धनुष धारणकर दूसरे देशकी ओर चल पड़ा। वह केवल जीविकोपार्जनकी कामनासे अकेले ही नर्मदा तटपर जा पहुँचा। वहाँ दूसरोंद्वारा उपभुक्त ऋक्षवान् गिरि (सतपुरा पर्वत-श्रेणी)-पर जाकर निश्चितरूपसे निवास करने लगा। ज्यामघकी सती-साध्वी पत्नी शैव्या* प्रौढ़ा हो गयी थी। (उसके गर्भसे) कोई पुत्र न उत्पन्न हुआ। इस प्रकार यद्यपि राजा ज्यामघ पुत्रहीन अवस्थामें ही जीवन यापन कर रहे थे, तथापि उन्होंने दूसरी पत्नी नहीं स्वीकार की। एक बार किसी युद्धमें राजा ज्यामघकी विजय हुई। वहाँ उन्हें (विवाहार्थ) एक कन्या प्राप्त हुई। (पर) उसे लाकर पत्नीको देते हुए राजाने उससे भयपूर्वक कहा—'शुचिस्मिते! यह (मेरी स्त्री नहीं,) तुम्हारी स्नुषा (पुत्रवधू) है।' इस प्रकार कहे जानेपर उसने राजासे पूछा—'यह किसकी स्नुषा है?'॥ २८—३४॥ |
| राजोवाच<br>यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति।<br>तस्मात् सा तपसोग्रेण कन्यायाः सम्प्रसूत ॥ ३५<br>पुत्रं विदर्भं सुभगा चैत्रा परिणता सती।<br>राजपुत्र्यां च विद्वान् स स्नुषायां क्रथकैशिकौ।<br>लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम्॥ ३६<br>तस्यां विदर्भोज्जनयच्छूरान् रणविशारदान्।<br>लोमपादान्मनुः पुत्रो ज्ञातितस्तस्य तु चात्मजः॥ ३७<br>कैशिकस्य चिदिः पुत्रो तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः।<br>क्रथो विदर्भपुत्रस्तु कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्॥ ३८<br>कुन्तेर्धृष्टः सुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान्।<br>धृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निर्वृतिः परवीरहा॥ ३९ | तब राजाने कहा—(प्रिये) तुम्हारे गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसीकी यह पत्नी होगी। (यह आश्चर्य देख-सुनकर वह कन्या तप करने लगी।) तत्पश्चात् उस कन्याकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप वृद्धा प्रायः बूढ़ी होनेपर भी शैव्याने (गर्भ धारण किया और) विदर्भ नामक एक पुत्रको जन्म दिया। उस विद्वान् विदर्भने स्नुषाभूता उस राजकुमारीके गर्भसे क्रथ, कैशिक तथा तीसरे परम धर्मात्मा लोमपाद नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया। ये सभी पुत्र शूरवीर एवं युद्धकुशल थे। इनमें लोमपादसे मनु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ तथा मनुका पुत्र ज्ञाति हुआ। कैशिकका पुत्र चिदि हुआ, उससे उत्पन्न हुए नरेश चैद्य नामसे प्रख्यात हुए। विदर्भ-पुत्र क्रथके कुन्ति नामक पुत्र पैदा हुआ। कुन्तिसे धृष्ट नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो परम प्रतापी एवं रणविशारद था। धृष्टका पुत्र निर्वृति हुआ जो धर्मात्मा एवं शत्रु- |
* प्रायः अठारह पुराणों तथा उपपुराणोंमें एवं भागवतादिकी टीकाओंमें 'ज्यामघ'की पत्नी शैव्या ही कही गयी है। कुछ मत्स्यपुराणकी प्रतियोंमें 'चैत्रा' नाम भी आया है, परंतु यह अनुकृतिमें भ्रान्तिका ही परिणाम है।