मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४२- राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
| १३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं<br>कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्।<br>दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो<br>ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण॥ १९<br>एतावन्मे विदितं राजसिंह<br>ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः।<br>वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणा-<br>मनुक्रोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र॥ २०<br>अकस्माद् वै क्षीणपुण्यो ययातिः<br>पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः।<br>तानब्रुवं पतमानस्तदाहं<br>सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥ २१<br>तैराख्यातं भवतां यज्ञभूमिं<br>समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि।<br>हविर्गन्धैर्दर्शितां यज्ञभूमिं<br>धूमापाङ्गं परिगृह्य प्रतीताम्॥ २२ | वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला—‘गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ।’ राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी—‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं!’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा—‘देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है?’ तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूप्रप्रान्तका अवलोकन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है॥ १४—२२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३८॥
उन्तालीसवाँ अध्याय
अष्टक और ययातिका संवाद
| अष्टक उवाच<br>यदा वसन् नन्दने कामरूपे<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>किं कारणं कार्तयुगप्रधानं<br>हित्वा तद् वै वसुधामन्वपद्यः॥ १<br>ययातिरुवाच<br>ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो यो यथेह<br>क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि।<br>तथा स्वर्गे क्षीणपुण्यं मनुष्यं<br>त्यजन्ति सद्यः खचरा देवसंघाः॥ २<br>अष्टक उवाच<br>कथं तस्मिन् क्षीणपुण्या भवन्ति<br>सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्।<br>किं विशिष्ठाः कस्य धामोपयान्ति<br>तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥ ३ | अष्टकने पूछा— सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये?॥ १॥<br>ययाति बोले— जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं, उसी प्रकार स्वर्गलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं॥ २॥<br>अष्टकने पूछा— देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट (अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे ज्ञानी जान पड़ते हैं॥ ३॥ |
* अध्याय ३९ * <span style="float: right;">१३९</span>
| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>लालप्यमाना नरदेव सर्वे।<br>ते कङ्कगोमायुपलाशनाथं<br>क्षितौ विवृद्धिं बहुधा प्रयान्ति॥ ४<br>तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र<br>दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म।<br>आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेतद्<br>भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि॥ ५ | **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ॥ ४-५॥ |
| अष्टक उवाच<br>यदा तु तांस्ते वितुदन्ते वयांसि<br>तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>त्वत्तो भौमं नरकमहं शृणोमि॥ ६ | **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग—ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुखसे (प्रथम बार) भौम नरकका (जिसे कभी नहीं सुना था) नाम सुन रहा हूँ॥ ६॥ |
| ययातिरुवाच<br>ऊर्ध्वं देहात् कर्मणो जृम्भमाणाद्<br>व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति।<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्॥ ७<br>षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि<br>तथाशीतिं चैव तु वत्सराणाम्।<br>तान् वै तुदन्ते प्रपतन्तः प्रयातान्<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः॥ ८ | **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं॥ ७-८॥ |
| अष्टक उवाच<br>यदेतांस्ते सम्पतन्तस्तुदन्ति<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>कथंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ९ | **अष्टकने पूछा—**तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और गर्भमें कैसे आते हैं?॥ ९॥ |
| ययातिरुवाच<br>असृग्रेतःपुष्परसानुयुक्त-<br>मन्वेति सद्यः पुरुषेण सृष्टम्।<br>तद्वै तस्या रज आपद्यते च<br>स गर्भभूतः समुपैति तत्र॥ १०<br>वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति<br>अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्।<br>चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्वं<br>एवंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ११ | **ययाति बोले—**अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी असृक् (रक्त) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। (फिर) वह पुष्पके रससे संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वीर्यमें आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है। जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं॥ १०-११॥ |
| १४० | * मत्स्यपुराण * |
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| अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ। गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं॥ १२-१३॥ |
| अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भे<br>उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति।<br>आपद्यमानो नरयोनिमेता-<br>माचक्ष्व मे संशयात् पृच्छतस्त्वम्॥ १२<br>शरीरदेहादिसमुच्छ्रयं च<br>चक्षुः श्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्।<br>एतत् सर्वं तात आचक्ष्व पृष्टः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां मन्यमाना हि सर्वे॥ १३ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले— ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लेता है और वह वहाँ उसपर अधिकार जमाकर क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है तब चेतनाका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है, नासिकासे गन्ध लेता है, जिह्वासे रसका आस्वादन करता है, त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबलसे सम्पन्न प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है॥ १४—१६॥ |
| वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-<br>मृतौ रेतः पुष्परसानुयुक्तम्।<br>स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः<br>क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्॥ १४<br>स जायमानोऽथ गृहीतगात्रः<br>संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः।<br>स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं<br>स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च॥ १५<br>घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च<br>त्वचा स्पर्शं मनसा देवभावम्।<br>इत्यष्टकेहोपचितं हि विद्धि<br>महात्मनः प्राणभृतः शरीरे॥ १६ | |
| अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है?॥ १७॥ |
| यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा<br>निखन्यते वापि निकृष्यते वा।<br>अभावभूतः स विनाशमेत्य<br>केनात्मानं चेतयते पुरस्तात्॥ १७ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले— राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर उसी पुण्य-पापके अनुसार अन्य योनिको प्राप्त होता है। पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनिमें और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। |
| हित्वा सोऽसून सुम्वन्निष्ठितत्वात्<br>पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं च।<br>अन्यां योनिं पुण्यपापानुसारां<br>हित्वा देहं भजते राजसिंह॥ १८<br>पुण्यां योनिं पुण्यकृतो विशन्ति<br>पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति।<br>कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा-<br>न्र मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ १९ | |
* अध्याय ३९ * १४१
| चतुष्पदा द्विपदाः पक्षिणश्च<br>तथाभूता गर्भभूता भवन्ति।<br>आख्यातमेतन्निखिलं हि सर्वं<br>भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह॥ २०॥ | नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैरवाले (चतुष्पाद), दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो?॥ १८–२०॥ |
| अष्टक उवाच<br>किंस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञां<br>मर्त्यः श्रेष्ठां तपसा विद्यया वा।<br>तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-<br>च्छुभॉल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण॥ २१॥ | अष्टकने पूछा— तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थ-रूपसे बताइये॥ २१॥ |
| ययातिरुवाच<br>तपश्च दानं च शमो दमश्च<br>ह्रीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा।<br>स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो<br>द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम्॥ २२॥<br>सर्वाणि चैतानि यथोदितानि<br>तपः प्रधानान्यभिमर्षकेण ।<br>नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः<br>पुंसः सदैवति वदन्ति सन्तः॥ २३॥<br>अधीयानः पण्डितम्मन्यमानो<br>यो विद्यया हन्ति यशः परस्य।<br>तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोका<br>न चास्य तद् ब्रह्मफलं ददाति॥ २४॥<br>चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि<br>भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि।<br>पानाग्निहोत्रमुत मानमौनं<br>मानेनाधीतमुत मानयज्ञः॥ २५॥<br>न मान्यमानो मुदमाददीत<br>न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात्।<br>सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके<br>नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते॥ २६॥<br>इति दद्यादिति यजेदित्यधीयीत मे श्रुतम्।<br>इत्येतान्यभयान्याहुस्तान्यवर्ज्यानि नित्यशः॥ २७॥<br>ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं<br>मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्।<br>तन्निःश्रेयस्तेन संयोगमेत्य<br>परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह॥ २८॥ | ययाति बोले— राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं—तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता। अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ—ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, दूषित भावसे अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो, अपमानित होनेपर संतस न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती। ऐसा दान देना चाहिये, इस प्रकार यजन करना चाहिये, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहना चाहिये—ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं—ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं॥ २२–२८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३९॥