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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
३१- ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
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- अध्याय २८ *
१११
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७ ॥ |
|---|---|
| स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।<br>अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥ ३६ | |
| वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।<br>अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ १—७ ॥ |
|---|---|
| यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ १ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।<br>स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥ २ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ ३ | |
| यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति।<br>यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४ | |
| यस्तु भावयते धर्मं योऽतिमात्रं तितिक्षति।<br>यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५ | |
| यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।<br>यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥ ६ | |
| ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युश्चेतसः।<br>नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७ |
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१९२ * मत्स्यपुराण *
| देवयान्युवाच | |
|---|---|
| वेदाहं तात बालापि कार्याणां तु गतागतम्।<br>क्रोधे चैवातिवादे वा कार्यस्यापि बलाबले ॥ ८<br><br>शिष्यस्याशिष्यवृत्तं हि न क्षन्तव्यं बुभूषुणा।<br>असत्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९<br><br>पुंसो ये नाभिनन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥ १०<br><br>ये नैनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११<br><br>तन्मे मथ्नाति हृदयमग्निकल्पमिवारणिम्।<br>वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ॥ १२<br><br>न ह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिषु।<br>यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ॥ १३ | देवयानी बोली— पिताजी ! यद्यपि मैं अभी (नादान) बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है; परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये। जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषोंमें ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है। तात ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको ठीक उसी तरह मथ रहा है, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है। इससे बढ़कर महान् दुःखी बात मैं तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती, जो स्वयं श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई (सातिशय) लक्ष्मीकी उपासना करता है (उस दुःखी मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है) ॥ ८—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे ययातिचरितेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययातिचरितविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥
उनतीसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना
| शौनक उवाच | |
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| ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह।<br>वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥ १<br><br>नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव।<br>शनैरावर्त्यमानस्तु मूलान्यपि निकृन्तति ॥ २<br><br>यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पश्यति नप्तृषु।<br>पापमाचरितं कर्म त्रिवर्गमतिवर्तते ॥ ३ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये। वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था। शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'राजन् ! जो (लोकमें) अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे-धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे जड़ काट देता है। यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम न अपने ऊपर दिखायी देता है, न पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर ही तो वह इस त्रिवर्गका अतिक्रमण करके आगेकी पीढ़ियोंपर अवश्य प्रकट होता है। |