मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३२- वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
९०४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तुलाशासनमानानां कूटकृन्मानकस्य च।<br>एभिश्च व्यवहर्ता च स दण्ड्यो दममुत्तमम्॥ १९८<br><br>विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्।<br>विकर्णनासिकां व्योष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रमापयेत्॥ १९९<br><br>ग्रामस्य दाहका ये च ये च क्षेत्रस्य वेश्मनः।<br>राजपत्यभिगामी च दग्धव्यास्ते कटाग्निना॥ २००<br><br>ऊनं वाप्यधिकं चापि लिखेद् यो राजशासनम्।<br>पारदारिकचौरं वा मुञ्चतो दण्ड उत्तमः॥ २०१<br><br>अभक्ष्येण द्विजं दूष्य दण्ड्य उत्तमसाहसम्।<br>क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शूद्रमर्धकम्॥ २०२<br><br>मृताङ्गलग्नविक्रेतुर्गुरुं ताडयतस्तथा।<br>राजयानासनारोढुर्दण्ड उत्तमसाहसः॥ २०३<br><br>यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः।<br>तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणं दमम्॥ २०४<br><br>आह्वानकारी मध्यः स्यादनाह्वाने तथाह्वयन्।<br>दण्डिकस्य च यो हस्तादभियुक्तः पलायते॥ २०५<br><br>हीनः पुरुषकारेण तं दण्ड्याद् दाण्डिको धनम्।<br>प्रेष्यापराधात् प्रेष्यस्तु स दण्ड्यश्चार्धमेव च॥ २०६<br><br>दण्डार्थं नियमार्थं च नीयमानेषु बन्धनम्।<br>यदि कश्चित् पलायेत दण्डश्चाष्टगुणो भवेत्॥ २०७<br><br>अनिन्दिते विवादे तु नखरोमावतारणम्।<br>कारयेद् यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति॥ २०८ | तराजू, शासन, मानदण्ड और धर्मकाँटेके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करनेवाले तथा ऐसे व्यक्तिके साथ व्यवहार करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। विष देनेवाली, आग लगानेवाली, पति, गुरुजन एवं अपने बच्चोंकी हत्या करनेवाली स्त्रीको कान, ओष्ठ और नाकसे रहित करके पशुओंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो गाँव, खेत और घरमें आग लगानेवाले तथा राजपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले हैं, उन्हें घास-फूसकी अग्निमें जला देना चाहिये। जो (राजाका अधिकारी) राजाज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा दूसरेकी स्त्रीके साथ अपराध करनेवाले एवं चोरको छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति अभक्ष्य वस्तु खिलाकर ब्राह्मणको दूषित करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार क्षत्रियको विधर्मी करनेवालेको मध्यम, वैश्यको प्रथम तथा शूद्रको अर्धसाहसका दण्ड देना चाहिये। मृतकके शरीरपर लगे हुए आभूषण तथा वस्त्रादिको बेंचनेवाले, गुरुको पीटनेवाले, राजाके वाहन और आसनपर बैठनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति न्यायद्वारा या युद्धमें पराजित होनेपर भी अपनेको 'मैं पराजित नहीं हूँ'-ऐसा मानता है, उसे आता हुआ देखकर राजाको चाहिये कि उसे पुनः जीतकर दुगुने पणका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपराध होनेपर सूचनाद्वारा बुलानेसे नहीं आता है और जो बिना बुलाये ही आकर सम्मुख उपस्थित होता है तथा जो अपराधी दण्ड देनेवालेके हाथसे छुड़ाकर भाग जाता है-ऐसे हीन लोगोंको पौरुषपूर्वक दण्ड देनेवाला न्यायकर्ता आर्थिक दण्ड दे। जो व्यक्ति दूत होनेपर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड देना चाहिये। दण्ड या नियमनके लिये बाँधकर ले जाते समय यदि कोई अपराधी भाग जाता है तो उसे आठगुना दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष सामान्य वाद-विवादमें किसीके नख या बालको काट लेता है, वह मध्यम दण्डका भागी होता है॥ १९८-२०८॥ |
| बन्धनं चाप्यवध्यस्य बलान्मोचयते तु यः।<br>वध्यं विमोचयेद् यस्तु दण्ड्यो द्विगुणभाग् भवेत्॥ २०९<br><br>दुर्द्दृष्टव्यवहाराणां सभ्यानां द्विगुणो दमः।<br>राज्ञा त्रिंशद्गुणो दण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्॥ २१० | जो व्यक्ति बलपूर्वक अवध्य अपराधीके बन्धनोंको खोल देता है तथा जो मृत्यु-दण्डके अपराधीको छोड़ देता है, वह दुगुने दण्डका भागी होता है। राजाके जो सभासद उपस्थित विषयोंमें कुशलतासे मनोयोग नहीं देते, उन्हें दूना दण्ड देना चाहिये। राजा ऐसे अपराधियोंको तीसगुना अधिक दण्ड दे और जलमें फेंकवा दे। |
| * अध्याय २२८ * | ९०५ |
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| अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद् विपुले चाल्पमेव च।<br>ऊनाधिकं तु तं दण्डं सभ्यो दद्यात् स्वकाद् गृहात्॥ २११<br>यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य रक्षणे।<br>अधर्मो नृपतेर्दृष्ट एतयोरुभयोरपि॥ २१२<br>ब्राह्मणं नैव हन्यात्तु सर्वपापेष्ववस्थितम्।<br>प्रवासयेत् स्वकाद् राष्ट्रात् समग्रधनसंयुतम्॥ २१३<br>न जातु ब्राह्मणं वध्यात् पातकं त्वधिकं भवेत्।<br>यस्मात् तस्मात् प्रयत्नेन ब्रह्महत्यां विवर्जयेत्॥ २१४<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगच्छति॥ २१५<br>ज्ञात्वापराधं पुरुषस्य राजा<br>कालं तथा चानुमतं द्विजानाम्।<br>दण्ड्येषु दण्डं परिकल्पयेत्तु<br>यो यस्य युक्तः स समीक्ष्य कुर्यात्॥ २१६ | थोड़ेसे अपराधमें अधिक दण्ड देनेवाले तथा भीषण अपराधमें अल्प दण्ड देनेवाले नायककर्ताको जितना कम या अधिक दण्ड हो, उसे अपने घरसे पूर्ण करना या अपराधीको लौटाना चाहिये। अवध्य अपराधीका वध करनेमें जितना पाप लगता है उतना ही पाप वध्यको छोड़ देनेमें लगता है। राजाको इन दोनों दशाओंमें समानरूपसे पापभागी होना पड़ता है। सभी प्रकारके पापोंमें अपराधी पाये गये ब्राह्मणको मृत्युदण्ड नहीं देना चाहिये, उसे सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ अपने राष्ट्रसे निर्वासित कर देना चाहिये। कभी भूलकर भी ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये; क्योंकि इससे अधिक पाप होता है। इसलिये राजाको ब्रह्महत्यासे बचना चाहिये। अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीयको दण्ड न देनेसे राजा महान् अयशका भागी बनता है और मरनेपर नरकगामी होता है। इसलिये राजा मनुष्यके अपराधको भलीभाँति जानकर तथा यथासमय ब्राह्मणोंकी अनुमति लेकर दण्डनीयोंके प्रति दण्डकी कल्पना करे और जो जिस प्रकारके दण्डका पात्र हो, उसकी भलीभाँति समीक्षा कर उसे उसी प्रकारका समुचित दण्ड दे॥ २०९—२१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रणयनं नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-कीर्तन-प्रसङ्गमें दण्डनीति नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२७॥
दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
अद्भुत शान्तिका *वर्णन
| मनुरुवाच<br>दिव्यान्तरिक्षभौमेषु या शान्तिरभिधीयते।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि महोत्पातेषु केशव॥ १ | मनुने पूछा—केशव! दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथ्वीसम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उपद्रवोंके होनेपर जिस शान्तिका विधान किया जाता है, उसे मैं श्रवण करना चाहता हूँ॥ १॥ |
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| मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि त्रिविधामद्भुतादिषु।<br>विशेषेण तु भौमेषु शान्तिः कार्या तथा भवेत्॥ २<br>अभया चान्तरिक्षेषु सौम्या दिव्येषु पार्थिव।<br>विजिगीषुः परं राजन् भूतिकामस्तु यो भवेत्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! अब मैं उत्पातोंके समय की जानेवाली तीनों प्रकारकी शान्तियाँ बतला रहा हूँ। उनमें विशेषरूपसे पृथ्वी-सम्बन्धी महोत्पातोंके अवसरपर शान्ति करनी चाहिये। राजन्! अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंके लिये अभया तथा दिव्य उत्पातोंके लिये सौम्या शान्ति करनी चाहिये। राजन्! जो विजयाभिलाषी तथा ऐश्वर्यकामी |
* इन अद्भुतोंका वर्णन तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान पञ्चम आथर्वण शान्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें है।