मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२- श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन
| ७६ | * मत्स्यपुराण * |
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| यावदब्दं तु यो दद्यादुदकुम्भं विमत्सरः।<br>प्रेतायान्नसमायुक्तं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २६<br><br>आमश्राद्धं यदा कुर्याद् विधिज्ञः श्राद्धदस्तदा।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ २७<br><br>त्रिभिः सपिण्डीकरणे अशेषत्रितये पिता।<br>यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बन्धनात्॥ २८<br><br>मुक्तोऽपि लेपभागित्वं प्राप्नोति कुशमार्जनात्।<br><br>लेपभाजश्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः।<br>पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ २९ | जो मनुष्य मत्सररहित होकर वर्षपर्यन्त प्रेतके निमित्त अन्न आदि पदार्थोंसे युक्त जलपात्र दान करता रहता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। विधियोंका ज्ञाता श्राद्धकर्ता जब आमश्राद्ध (जिसमें ब्राह्मणोंको भोजन न कराकर कच्चा अन्न दिया जाता है) करे तो विधिपूर्वक अग्निकरण करे और उसी समय पिण्डदान भी करे। जब पिता सपिण्डीकरण श्राद्धमें अपने पिता, पितामह, प्रपितामहके साथ सम्बन्ध प्राप्त कर लेता है, तब वह बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर भी वह कुशके मार्जनसे लेपभागी हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चमसहित तीन पितर लेपभागी और पिता आदि तीन पिण्डभागी हैं। उनमें पिण्डदाता सातवीं संतान है। इस प्रकार सात पीढ़ीतक सपिण्डता मानी जाती है॥ २७—२९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सपिण्डीकरणकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सपिण्डीकरण नामक अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण
| ऋषय ऊचुः<br><br>कथं कव्यानि देयानि हव्यानि च जनैरिह।<br>गच्छन्ति पितृलोकस्थान् प्रापकः कोऽत्र गद्यते॥ १<br><br>यदि मर्त्यो द्विजो भुङ्क्ते हूयते यदि वानले।<br>शुभाशुभात्मकैः प्रेतैर्दत्तं तद् भुज्यते कथम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! मनुष्योंको (पितरोंके निमित्त) हव्य और कव्य किस प्रकार देना चाहिये? इस मृत्युलोकमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्य पितृलोकमें स्थित पितरोंके पास कैसे पहुँच जाते हैं? यहाँ उनको पहुँचानेवाला कौन कहा गया है? यदि मृत्युलोकवासी ब्राह्मण उन्हें खा जाता है अथवा अग्निमें उनकी आहुति दे दी जाती है तो अपने कर्मानुसार शुभ एवं अशुभ योनियोंमें गये हुए प्रेतोंद्वारा उस पदार्थका उपभोग कैसे किया जाता है?॥ १-२॥ |
* अध्याय १९ * ७७
| सूत उवाच | |
|---|---|
| वसून् वदन्ति च पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान्।<br>प्रपितामहांस्तथादित्यानित्येवं वैदिकी श्रुतिः॥ ३<br><br>नाम गोत्रं पितॄणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः।<br>श्राद्धस्य मन्त्राः श्रद्धा च उपयोज्यातिभक्तितः॥ ४<br><br>अग्निष्वात्तादयस्तेषामधिपत्ये व्यवस्थिताः।<br>नामगोत्रकालदेशा भवान्तरगतानपि॥ ५<br><br>प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान्।<br>देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः॥ ६<br><br>तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्वेऽप्यनुगच्छति।<br>दैत्यत्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्॥ ७<br><br>श्राद्धान्नं वायुरूपेण सर्पत्वेऽप्युपतिष्ठति।<br>पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषम्॥ ८<br><br>दनुजत्वे तथा माया प्रेतत्वे रुधिरोदकम्।<br>मनुष्यत्वेऽन्नपानानि नानाभोगरसं भवेत्॥ ९<br><br>रतिशक्तिः स्त्रियः कान्ता भोज्यं भोजनशक्तिता।<br>दानशक्तिः सविभवा रूपमारोग्यमेव च॥ १०<br><br>श्रद्धापुष्पमिदं प्रोक्तं फलं ब्रह्मसमागमः।<br>आयुः पुत्रान् धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ११<br><br>राज्यं चैव प्रयच्छन्ति प्रीताः पितृगणा नृणाम्।<br><br>श्रूयते च पुरा मोक्षं प्राप्ताः कौशिकसूनवः।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैर्गता विष्णोः परं पदम्॥ १२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पितरोंको वसुगण, पितामहोंको रुद्रगण तथा प्रपितामहोंको आदित्यगण कहा जाता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। पितरोंके नाम और गोत्र (उनके निमित्त प्रदान किये गये) हव्य-कव्यको उनके पास पहुँचानेवाले हैं। अतिशय भक्तिपूर्वक उच्चरित श्राद्धके मन्त्र भी कारण हैं एवं श्रद्धाके उपयोग भी हेतु है। अग्निष्वात्त आदि पितरोंके आधिपत्य-पदपर स्थित हैं। उन देव-पितरोंके समक्ष जो खाद्य पदार्थ पितरोंका नाम, गोत्र, काल और देशका उच्चारण करके श्रद्धासे अर्पित किया जाता है, वह पितृगणोंको यदि वे जन्मान्तरमें भी गये हुए हों तो भी उन्हें तृप्त कर देता है। वह उस समय उस योनिके लिये उपयुक्त आहारके रूपमें परिणत हो जाता है। यदि शुभ कर्मोंके प्रभावसे पिता देवयोनिमें उत्पन्न हो गये हैं तो उनके उद्देश्यसे दिया गया अन्न अमृत होकर देवयोनिमें भी उन्हें प्राप्त होता है। वह श्राद्धान्न दैत्ययोनिमें भोगरूपमें और पशुयोनिमें तृणरूपमें बदल जाता है। सर्पयोनिमें वह वायुरूपसे सर्पके निकट पहुँचता है। यक्ष-योनिमें वह पीनेवाला पदार्थ तथा राक्षस्योनिमें मांस हो जाता है। दनुजयोनिमें मायारूपमें, प्रेतयोनिमें रुधिर और जलके रूपमें तथा मानवयोनिमें नाना प्रकारके भोग-रसोंसे युक्त अन्न-पानादिके रूपमें परिवर्तित हो जाता है। रमण करनेकी शक्ति, सुन्दरी स्त्रियाँ, भोजन करनेके पदार्थ, भोजन पचानेकी शक्ति, प्रचुर सम्पत्तिके साथ-साथ दान देनेकी निष्ठा, सुन्दर रूप और स्वास्थ्य—ये सभी श्रद्धारूपी वृक्षके पुष्प बतलाये गये हैं और ब्रह्मप्राप्ति उसका फल है। पितृगण प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, अनेक पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य प्रदान करते हैं। सुना जाता है कि कौशिकके पुत्र पूर्वकालमें (श्राद्धके प्रभावसे व्याध, मृग, चक्रवाक आदि योनियोंमें) पाँच बार जन्म लेनेके पश्चात् मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परमपद वैकुण्ठलोकको चले गये थे॥ ३–१२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे फलानुगमनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें फलानुगमन नामक उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९॥
७८ * मत्स्यपुराण *
बीसवाँ अध्याय
महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| कथं कौशिकदायादाः प्राप्तास्ते योगमुत्तमम्।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्॥ १ | सूतजी! महर्षि कौशिकके* वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योगको प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करनेसे उनके अशुभ कर्मोंका विनाश कैसे हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कुरुक्षेत्रमें कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। (उन पुत्रोंके वृत्तान्त) नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये। |
| कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः।<br>नामतः कर्मतस्तस्य सुतान् सप्त निबोधत॥ २ | उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—ये नाम थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् वे सभी महर्षि गर्गके शिष्य हुए। |
| स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च।<br>वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्॥ ३ | उस समय समस्त लोकोंको भयभीत करनेवाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया। |
| पितर्युपरते तेषामभूद् दुर्भिक्षमुल्बणम्।<br>अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकारी॥ ४ | इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्यकी आज्ञासे उनकी सेवामें लग गये। वहाँ वनमें वे सभी भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो गये। |
| गर्गादेशाद् वने दोग्ध्रीं रक्षन्तस्ते तपोधनाः।<br>खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम्॥ ५ | जब क्षुधा-शान्तिका कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्तीने श्राद्ध-कर्म करनेकी सम्मति दी। |
| इति चिन्तयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः।<br>यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम्॥ ६ | बड़े भाइयोंने ‘अच्छा, ऐसा ही करो’—ऐसी आज्ञा पाकर |
| श्राद्धे नियोज्यमानेयं पापात् त्रास्यति नो ध्रुवम्।<br>एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदाग्रजैः॥ ७ | पितृवर्तीने समाहित-चित्त होकर श्राद्धका उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़ेके क्रमसे दो भाइयोंको देव-कार्यमें, तीनको पितृकार्यमें और एकको अतिथिरूपमें नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया। |
| चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्य च तां पुनः।<br>द्वौ दैवे भ्रातरौ कृत्वा पित्रे त्रीनप्यनुक्रमात्॥ ८ | इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्तीने पितरोंका स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया। |
| तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु।<br>चकार मन्त्रवच्छ्राद्धं स्मरन् पितृपरायणः॥ ९ | कालक्रमानुसार मृत्युके उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोषसे वे सभी दाशपुर (मन्दसौर) नामक नगरमें बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह (श्राद्धकृत्य)-से भावित होनेके कारण उन्हें पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण बना रहा। |
| विना गवां वत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदितः।<br>व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ १० | पूर्वजन्मके कर्मोंके परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियोंके घरमें पैदा तो हुए, |
| एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः।<br>वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः॥ ११ | |
| ततः कालावकृष्टास्ते व्याधा दाशपुरेऽभवन्।<br>जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः॥ १२ | |
| यत् कृतं क्रूरकर्माणिश्राद्धरूपेण तैस्तदा।<br>तेन ते भवने जाता व्याधानां क्रूरकर्मणाम्॥ १३ |
* कौशिक नामके प्राचीन समयमें १०—१२ व्यक्ति हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। पर ये उनसे भिन्न हैं। विश्वामित्रका सम्बन्ध बिहारसे लेकर कन्नौजतक रहा है, पर ये कुरुक्षेत्रवासी हैं। यह कथा पद्मपुराण १।१०, हरिवंश १।२१—२७ आदिमें भी है। और इसका संकेत गरुडपु० १।२१०।२०-२१ आदि बीसों स्थलोंपर है।
* अध्याय २० *
७९
| पितॄणां चैव माहात्म्याज्जाता जातिस्मरास्तु ते।<br>ते तु वैराग्ययोगेन आस्थायानशनं पुनः॥ १४<br>जातिस्मराः सप्त जाता मृगाः कालञ्जरे गिरौ।<br>नीलकण्ठस्य पुरतः पितृभावानुभाविताः ॥ १५<br>तत्रापि ज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्य धर्मतः।<br>लोकैरवेक्ष्यमाणास्ते तीर्थान्तेऽनशनेन तु॥ १६<br>मानसे चक्रवाकास्ते सञ्जाताः सप्त योगिनः।<br>नामतः कर्मतः सर्वाञ्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥ १७<br>सुमनाः कुमुदः शुद्धश्छिद्रदर्शी सुनेत्रकः।<br>सुनेत्रांशुमांश्चैव सप्तैते योगपारगाः ॥ १८<br>योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभ्रमुश्चाल्पचेतनाः।<br>दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम्॥ १९<br>क्रीडन्तं विविधैर्भावैर्महाबलपराक्रमम्।<br>पाञ्चालान्वयसम्भूतं प्रभूतबलवाहनम्॥ २०<br>राज्यकामोऽभवच्चैकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्।<br>पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत् पितृवत्सलः॥ २१<br>अपरौ मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ।<br>मन्त्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन् मर्त्ये द्विजोत्तमाः॥ २२<br>तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते बभूवुर्द्विजोत्तमाः।<br>विभ्राजपुत्रस्त्वेकोऽभूद् ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥ २३<br>मन्त्रिपुत्रौ तथा चोभौ कण्डरीकसुबालकौ।<br>ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्तः सन् पुरोहितविपश्चिता॥ २४<br>पाञ्चालराजो विक्रान्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>योगिवत् सर्वजन्तूनां रुतवेत्ताभवत् तदा॥ २५<br>तस्य राज्ञोऽभवद् भार्या देवलस्यात्मजा शुभा।<br>संनतिर्नाम विख्याता कपिला याभवत् पुरा॥ २६<br>पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद् ब्रह्मवादिनी।<br>तया चकार सहितः स राज्यं राजनन्दनः॥ २७<br>कदाचिदुद्यानगतस्तया सह स पार्थिवः।<br>ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम्॥ २८<br>पिपीलिकामनुनयन् परितः कीटकामुकः।<br>पञ्चबाणाभितप्ताङ्गः सगद्गदमुवाच ह॥ २९ | परंतु पितरोंके ही माहात्म्यसे वे सभी जातिस्मर (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञाता) बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्मके फलसे वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन सभीने अनशन करके अपने-अपने उस शरीरका त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वतपर भगवान् नीलकण्ठके समक्ष मृग-योनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरोंके स्नेहसे अनुभावित होनेके कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनिमें भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन लोगोंने तीर्थ-स्थानमें अनशन करके लोगोंके देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनोंने मानसरोवरमें चक्रवाककी योनिमें जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आपलोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभीका वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनिमें उनके नाम हैं—सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योगके पारदर्शी थे। इनमेंसे अल्पबुद्धिवाले तीन तो योगसे भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यानमें स्त्रियोंके साथ अनेकविध हाव-भावोंसे क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजाको देखकर उन जलपक्षियोंमेंसे एकको, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्तिकी आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनोंने राजाके दो मन्त्रियोंको प्रचुर सेना और वाहनोंसे युक्त देखकर इस मृत्युलोकमें मन्त्रि-पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए। उन तीनोंमेंसे पहला राजा विभ्राजके* पुत्ररूपमें ब्रह्मदत्त नामसे विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नामसे मन्त्रीके पुत्र हुए। (राजा विभ्राजकी मृत्युके उपरान्त) विद्वान् पुरोहितने ब्रह्मदत्तको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रोंमें प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओंकी बोलीका ज्ञाता था। देवलकी सुन्दरी कन्या, जो संनति नामसे विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्तकी पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नीके साथ रहकर राजकुमार ब्रह्मदत्त राज्य-भार सँभालने लगा ॥ २—२७॥<br><br>एक बार राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनतिके साथ भ्रमण करनेके लिये उद्यानमें गया। वहाँ उसने काम-कलहसे व्याकुल एक कीट-दम्पति (चींटा-चींटी)-को देखा। वह कीट, जिसका शरीर कामदेवके बाणोंसे संतप्त हो उठा था, चारों ओरसे चींटीसे अनुनय-विनय करता हुआ गद्गद वाणीमें बोला— |
* इसका कहीं अणुह तथा कहीं नीप नाम भी आया है।
८० * मत्स्यपुराण *
| न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्।<br>मध्यक्षामातिजघना बृहद्वक्षोऽभिगामिनी ॥ ३०<br><br>सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारुहासिनी।<br>सुलक्ष्यनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला ॥ ३१<br><br>भोक्ष्यसे मयि भुङ्क्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि।<br>प्रोषिते सति दीना त्वं क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला ॥ ३२<br><br>किमर्थं वद कल्याणि सरोषवदना स्थिता।<br>सा तमाह सकोपा तु किमालपसि मां शठ ॥ ३३<br><br>त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय विनेष्यता।<br>प्रदत्तं समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्याः समन्मथ ॥ ३४<br><br>पिपीलिक उवाच<br>त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि।<br>तदेकमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ ३५<br><br>नैतदेवं करिष्यामि पुनः क्वापीह सुव्रते।<br>स्पृशामि पादौ सत्येन प्रसीद प्रणतस्य मे ॥ ३६<br><br>सूत उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत् ततः।<br>आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका ॥ ३७<br><br>ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषं तं ज्ञात्वा विस्मयमागमत्।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञत्वात् प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ३८ | 'प्रिये! इस जगत्में तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री कहीं कोई भी नहीं है। तुम्हारा कटिप्रदेश पतला और जंघे मोटे हैं, तुम स्तनोंके भारी भारसे विनम्र होकर चलनेवाली, स्वर्णके समान गौरवर्णा, सुन्दर कमरवाली, मृदुभाषिणी, मनोहर हास्यसे युक्त, भलीभाँति लक्ष्यको भेदन करनेवाले नेत्रों और जीभसे समन्वित तथा गुड़ और शक्करकी प्रेमी हो। तुम मेरे भोजन कर लेनेके पश्चात् भोजन करती हो तथा मेरे स्नान कर लेनेपर स्नान करती हो। इसी प्रकार मेरे परदेश चले जानेपर तुम दीन हो जाती हो और क्रुद्ध होनेपर भयभीत हो उठती हो। कल्याणि! बतलाओ तो सही, तुम किस कारण क्रोधसे मुँह फुलाये बैठी हो।' तब क्रोधसे भरी हुई चींटी उस कीटसे बोली—'शठ! तुम क्या मुझसे व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? अरे धूर्त! अभी कल ही तुमने मेरा परित्याग करके लड्डूका चूर्ण ले जाकर दूसरी चींटीको नहीं दिया है?'॥ २८—३४॥<br><br>चींटा बोला—वरवर्णिनि! तुम्हारे सदृश रूप-रंगवाली होनेके कारण मैंने भूलसे दूसरी चींटीको लड्डू दे दिया है, अतः भामिनि! तुम मेरे इस एक अपराधको क्षमा कर दो। सुव्रते! मैं पुनः कभी भी इस प्रकारका कार्य नहीं करूँगा। मैं सत्यकी दुहाई देकर तुम्हारे चरण छूता हूँ, तुम मुझ विनीतपर प्रसन्न हो जाओ॥ ३५-३६॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उस चींटेका कथन सुनकर वह चींटी प्रसन्न हो गयी। इधर, चक्रपाणि भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता होनेके कारण ब्रह्मदत्त भी उस सारे वृत्तान्तको जानकर विस्मयविमुग्ध हो गये॥ ३७-३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पके श्राद्धमाहात्म्यमें पिपीलिकावहास नामक बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं सत्त्वरुतज्ञोऽभूद् ब्रह्मदत्तो धरातले।<br>तच्चाभवत् कस्य कुले चक्रवाकचतुष्टयम् ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>तस्मिन्नेव पुरे जातास्ते च चक्राह्वयास्तदा।<br>वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मराः पुरा ॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! ब्रह्मदत्त इस भूतलपर जन्म लेकर समस्त प्राणियोंकी बोलीके ज्ञाता कैसे हो गये? तथा वे चारों चक्रवाक किसके कुलमें उत्पन्न हुए?॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! वे चारों चक्रवाक उसी ब्रह्मदत्तके नगरमें एक वृद्ध ब्राह्मणके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें भी वे ब्राह्मण पूर्ववत् जातिस्मर बने रहे। |
* अध्याय २१ * ८१
| धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्याचण्डस्तपोत्सुकः।<br>नामतः कर्मतश्चैते सुदरिद्रस्य ते सुताः॥ ३<br>तपसे बुद्धिरभवत् तदा तेषां द्विजन्मनाम्।<br>यास्यामः परमां सिद्धिमित्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः॥ ४<br>ततस्तद्वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः।<br>उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः॥ ५<br>अधर्म एष इति वः पिता तानभ्यवारयत्।<br>वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनः॥ ६<br>को नु धर्मोऽत्र भविता मत्त्यागाद् गतिरेव वा।<br>ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तव तात वदस्व तत्॥ ७<br>वित्तमेतत् पुरो राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम्।<br>धनं ग्रामसहस्राणि प्रभाते पठतस्तव॥ ८<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च।<br>कालंजरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ ९<br>इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः।<br>वृद्धोऽपि राजभवनं जगामात्मार्थसिद्धये॥ १० | (उस समय उनके) धृतिमान्, तत्त्वदर्शी, विद्याचण्ड और तपोत्सुक—ये चार नाम थे। वे कर्मानुसार एक अत्यन्त सुदरिद्र (उस ब्राह्मणका नाम भी सुदरिद्र था) ब्राह्मणके पुत्र थे। बचपनमें ही इन ब्राह्मणोंकी बुद्धि तपस्याकी ओर प्रवृत्त हो गयी। तब ये द्विजश्रेष्ठ पितासे प्रार्थना करते हुए बोले—'पिताजी! हमलोग तपस्या करके परम सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।' उनके इस कथनको सुनकर महातपस्वी सुदरिद्र दीन वाणीमें बोले—'पुत्रो! यह कैसी बात कह रहे हो? मुझ दरिद्र बूढ़े पिताको छोड़कर तुमलोग वनवासी होना चाहते हो, भला मेरा परित्याग कर देनेसे तुमलोगोंको कौन-सा धर्म प्राप्त होगा तथा तुम्हारी क्या गति होगी? यह तो महान् अधर्म है।' ऐसा कहकर पिताने उन्हें मना कर दिया। यह सुनकर उन पुत्रोंने कहा—'तात! हमलोगोंने आपके जीविकोपार्जनका प्रबन्ध कर लिया है। इसके अतिरिक्त आपको और क्या चाहिये, सो बतलाइये। यदि आप प्रातःकाल राजा ब्रह्मदत्तके समक्ष जाकर (आगे बताये जानेवाले श्लोकका) पाठ कीजियेगा तो वे आपको प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं सहस्रों ग्राम प्रदान करेंगे। (उस श्लोकका अर्थ यों है—)'जो कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग और मानसरोवरमें सात चक्रवाक थे, वे सिद्ध (होकर) यहाँ निवास करते हैं।' पितासे ऐसा कहकर वे सभी तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इधर वृद्ध सुदरिद्र भी अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये राजभवनकी ओर चल पड़े॥ २—१०॥ |
| अणुहो नाम वैभ्राजः पाञ्चालाधिपतिः पुरा।<br>पुत्रार्थी देवदेवेशं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ ११<br>आराधयामास विभुं तीव्रव्रतपरायणः।<br>ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य जनार्दनः॥ १२<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते हृदयेनेप्सितं नृप।<br>एवमुक्तस्तु देवेन वव्रे स वरमुत्तमम्॥ १३<br>पुत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम्।<br>पारगं सर्वशास्त्राणां धार्मिकं योगिनां परम्॥ १४<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम्।<br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः॥ १५<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः स तस्य पुत्रोऽभूद् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्॥ १६ | (अब ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति-कथा बतलाते हैं—) पूर्वकालमें पञ्चाल देशके एक अणुह नामक नरेश हो गये हैं, जो विभ्राट्के पुत्र थे। वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर व्रतमें तत्पर होकर सामर्थ्यशाली एवं सर्वव्यापक देवदेवेश्वर नारायण श्रीहरिकी आराधना करने लगे। तत्पश्चात् अधिक काल व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दन उनकी आराधनासे प्रसन्न हुए (और उनके समक्ष प्रकट होकर बोले—) 'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोऽभिलषित वरदान माँग लो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर राजाने उत्तम वरकी याचना करते हुए कहा—'देवेश! मुझे ऐसा पुत्र प्रदान कीजिये, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, धार्मिक, श्रेष्ठ योगी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता और योगाभ्यासी हो। भगवन्! मुझे ऐसा ही औरस पुत्र दीजिये।' यह सुनकर विश्वात्मा परमेश्वर राजासे 'ऐसा ही हो'—यों कहकर समस्त देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर समयानुसार वही प्रतापी ब्रह्मदत्त उस राजा अणुहका पुत्र हुआ, जो आगे |