मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०- महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा
| ७० | * मत्स्यपुराण * |
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| गन्धपुष्पैश्च सम्पूज्य विश्वेदेवं प्रति न्यसेत्।<br>विश्वेदेवास इत्याभ्यामावाह्य विकिरेद् यवान्॥ १६ | फिर गन्ध, पुष्प आदिसे पूजा करके उन्हें विश्वेदेवोंके उद्देश्यसे (उनके निकट) रख दे। फिर 'विश्वेदेवास०' (शु० यजु० ७। ३४) इत्यादि दो मन्त्रोंद्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके (वेदीपर) जौ बिखेर दे। तत्पश्चात् गन्ध-पुष्प आदिसे अलंकृत करके 'या दिव्या आपः०' (तै० सं०) इस मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। इस प्रकार उनकी पूजा करके और उनसे निवृत्त होकर पितृ-कार्य आरम्भ करे॥ ६–१७॥ |
| गन्धपुष्पैरलङ्कृत्य या दिव्येत्यर्घ्यमुत्सृजेत्।<br>अभ्यर्च्य ताभ्यामुत्सृष्टिं पितृकार्यं समारभेत्॥ १७ | |
| दर्भासनं तु दत्त्वादौ त्रीणि पात्राणि पूरयेत्।<br>सपवित्राणि कृत्वादौ शन्नो देवीत्यपः क्षिपेत्॥ १८ | (पितृ-श्राद्धमें) पहले कुशोंका आसन प्रदान करके तीन अर्घ्यपात्रोंको तैयार करना चाहिये। उनमें प्रथमतः कुशनिर्मित पवित्रक डालकर 'शं नो' देवी०' (शु० यजु० ३६। १२)—' इस मन्त्रसे उन्हें जलसे भर दे, पुनः 'तिलोऽसि०'— इस मन्त्रसे उनमें तिल डालकर उन्हें (अमन्त्रक ही) गन्ध, पुष्प आदिसे पूरा कर दे। पितरोंके निमित्त प्रयुक्त किये गये ये पात्र काष्ठके या वृक्षके पत्तेके या जल एवं सागरसे उत्पन्न हुए पत्तेके अथवा सुवर्णमय या रजतमय होने चाहिये। (यदि चाँदीका पात्र देनेकी सामर्थ्य न हो तो) चाँदीके विषयमें कथनोपकथन, दर्शन अथवा दानसे ही कार्य सम्पन्न हो सकता है। पितरोंके निमित्त यदि चाँदीके बने हुए या चाँदीसे मढ़े हुए पात्रोंद्वारा श्रद्धापूर्वक जलमात्र भी प्रदान कर दिया जाय तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। इसी प्रकार पितरोंके लिये अर्घ्य, पिण्ड और भोजनके पात्र भी चाँदीके ही प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि चाँदी शिवजीके नेत्रसे उद्भूत हुई है, इसलिये यह पितरोंको परम प्रिय है; किन्तु देवकार्यमें इसे अशुभ माना गया है, इसलिये देवकार्यमें चाँदीको दूर रखना चाहिये। इस प्रकार यथाशक्ति पात्रोंकी व्यवस्था करके मत्सररहित हो कुश हाथमें लेकर 'या दिव्या०' (तै० स०)—इस मन्त्रद्वारा अपने पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए (उन अर्घ्यपात्रोंको) रख दे। (फिर ब्राह्मणोंकी ओर देखकर यों कहे कि) 'मैं अपने पितरोंका आवाहन करूँगा।' इसके उत्तरमें ब्राह्मणलोग कहें—'करो'। ऐसा कहे जानेपर 'उशन्तस्वा०'—एवं 'आयान्तु नः०'—इन दोनों ऋचाओं द्वारा पितरोंका आवाहन करे। तत्पश्चात् 'या दिव्या०'— इस मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करके गन्ध, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करे। फिर पिण्डदानसे पूर्व उस जलको हाथमें लेकर उसे पितृ-पात्रमें रखकर वेदीके अग्रभागमें उलटकर रख दे और 'पितृभ्यः स्थानमसि'—यह पितरोंके लिये स्थान है'—ऐसा कहकर उसे जलसे सींच दे। इस कार्यमें भी पूर्ववत् सावधानीपूर्वक अग्निकार्य सम्पन्न करे। तदुपरान्त हाथमें कुश लिये हुए प्रशान्तचित्तसे गुणकारी दाल, शाक आदिसे युक्त विविध प्रकारके खाद्य पदार्थोंको अपने दोनों |
| तिलोऽसीति तिलान् कुर्याद् गन्धपुष्पादिकं पुनः।<br>पात्रं वनस्पतिमयं तथा पर्णमयं पुनः॥ १९ | |
| जलजं वाथ कुर्वीत तथा सागरसम्भवम्।<br>सौवर्णं रजतं वापि पितॄणां पात्रमुच्यते॥ २० | |
| रजतस्य कथा वापि दर्शनं दानमेव वा।<br>रजतैर्भाजनैरेषामथवा रजतान्वितैः॥ २१ | |
| वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते।<br>तथार्घ्यपिण्डभोज्यादौ पितॄणां रजतं मतम्॥ २२ | |
| शिवनेत्रोद्भवं यस्मात् तस्मात् पितृवल्लभम्।<br>अमङ्गलं तद् यत्नेन देवकार्येषु वर्जयेत्॥ २३ | |
| एवं पात्राणि सङ्कल्प्य यथालाभं विमत्सरः।<br>या दिव्येति पितॄर्नाम गोत्रैर्दर्भकरो न्यसेत्॥ २४ | |
| पितॄनावाहयिष्यामि कुर्वित्युक्तस्तु तैः पुनः।<br>उशन्तस्त्वा तथायान्तु ऋग्भ्यामावाहयेत् पितॄन्॥ २५ | |
| या दिव्येत्यर्घ्यमुत्सृज्य दद्याद् गन्धादिकांस्ततः।<br>हस्तात् तदुदकं पूर्वं दत्त्वा संस्रवमादितः॥ २६ | |
| पितृपात्रे निधायाथ न्युब्जमुत्तरतो न्यसेत्।<br>पितृभ्यः स्थानमसीति निधाय परिषेषयेत्॥ २७ | |
| तत्रापि पूर्ववत् कुर्यादग्निकार्यं विमत्सरः।<br>उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामाहृत्य परिवेशयेत्॥ २८ | |
| प्रशान्तचित्तः सततं दर्भपाणिरशेषतः।<br>गुणाढ्यैः सूपशाकैस्तु नानाभक्ष्यैर्विशेषतः॥ २९ | |
| * अध्याय १७ * | ७१ |
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| अन्नं तु सदधिक्षीरं गोघृतं शर्करान्वितम्।<br>मांसं प्रीणाति वै सर्वान् पितृन्नित्याह केशवः॥ ३०<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै॥ ३१<br>षण्मासं छागमांसेन तृप्यन्ति पितरस्तथा।<br>सप्त पार्षतमांसेन तथाष्टावैणजेन तु॥ ३२<br>दश मासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः।<br>शशकूर्मजमांसेन मासानेकादशैव तु॥ ३३<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।<br>रौरवेण च तृप्यन्ति मासान् पञ्चदशैव तु॥ ३४<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।<br>कालशाकेन चानन्ता खड्गमांसेन चैव हि॥ ३५<br>यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्।<br>दत्तमक्षयमित्याहुः पितरः पूर्वदेवताः॥ ३६<br>स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्यं पुराणान्यखिलानि च।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां सूक्तानि विविधानि च॥ ३७<br>इन्द्राग्निसोमसूक्तानि पावनानि स्वशक्तितः।<br>बृहद्रथन्तरं तद्वज्ज्येष्ठसाम सरौहिणम्॥ ३८<br>तथैव शान्तिकाध्यायं मधुब्राह्मणमेव च।<br>मण्डलं ब्राह्मणं तद्वत् प्रीतिकारि तु यत् पुनः॥ ३९<br>विप्राणामात्मनश्चैव तत् सर्वं समुदीरयेत्।<br>भुक्तवत्सु ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप॥ ४०<br>सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संन्नीयाप्लाव्य वारिणा।<br>समुत्सृजेद् भुक्तवतामग्रतो विकिरेद् भुवि॥ ४१<br>अग्निदग्धास्तु ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।<br>भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु प्रयान्तु परमां गतिम्॥ ४२<br>येषां न माता न पिता न बन्धु-<br>र्न गोत्रशुद्धिर्न तथान्नमस्ति।<br>तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्<br>प्रयान्तु लोकेषु सुखाय तद्वत्॥ ४३<br>असंस्कृतप्रमीतानां त्यक्तानां कुलयोषिताम्।<br>उच्छिष्टभागधेयः स्याद् दर्भे विकिरयोश्च यः॥ ४४<br>तृप्ता ज्ञात्वोदकं दद्यात् सकृद् विप्रकरे तथा।<br>उपलिप्ते महीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा॥ ४५ | हाथोंसे लाकर 'पूर्णरूपसे परिवेषण करे (परोसे)। पदार्थोंमें दही, दूध और शक्करमिश्रित अन्न तथा गोघृत, गोदुग्ध और खीर आदि जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। पितरलोग गृहस्थोंके प्रथम देवता हैं, इसलिये श्राद्धके अवसरपर पितृसम्बन्धी सूक्तोंका स्वाध्याय (पाठ), सम्पूर्ण पुराण, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके विभिन्न प्रकारके सूक्त, इन्द्र, अग्नि और सोमके पवित्र सूक्त, बृहद्रथन्तर, रौहिणसहित ज्येष्ठ साम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण और मण्डलब्राह्मण आदि तथा इसी प्रकारके अन्यान्य प्रीतिवर्धक सूक्तों या स्तोत्रोंका स्वयं अथवा ब्राह्मणोंद्वारा पाठ करना-करवाना चाहिये॥ १८—३९ ½ ॥<br><br>राजन्! उन ब्राह्मणोंके भोजन कर चुकनेपर उनके भोजनके संनिकट ही सभी वर्णोंके लिये नियत किये हुए अन्न आदि पदार्थोंको लाकर उन्हें जलसे परिपूर्ण कर भोजन करनेवालोंके समक्ष ही यह कहते हुए पृथ्वीपर बिखेर दे—'मेरे कुलमें (मृत्युके पश्चात्) जिन जीवोंका अग्नि-संस्कार हुआ हो अथवा जिनका अग्नि-संस्कार नहीं भी हुआ हो, वे सभी पृथ्वीपर बिखेरे हुए इस अन्नसे तृप्त हों और परम गतिको प्राप्त हों। जिनकी न माता है, न जिनके पिता या भाई-बन्धु हैं, न तो जिनकी गोत्र-शुद्धि हुई है तथा जिनके पास अन्न भी नहीं है, उनकी तृप्तिके निमित्त मैंने भूतलपर यह अन्न छींट दिया है, अतः वे भी (मेरे पितरोंकी भाँति) सुखभोगके लिये उत्तम लोकोंमें जायें। इसी प्रकार जो कुलवधुएँ बिना संस्कृत हुए ही मृत्युको प्राप्त हो गयी हैं अथवा जिनका परिवारवालोंने परित्याग कर दिया है, उनके लिये कुश-मूलमें लगा हुआ तथा विकिराका बचा हुआ उच्छिष्ट भाग ही हिस्सा है।' तदनन्तर ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर एक बार उनके हाथोंपर जल डाल दे। फिर गोबर, गोमूत्र और जलसे लिपी हुई भूमिपर |