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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२०७- उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व

८३२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ दोवाँ अध्याय

गोत्रप्रवरकीर्तनमें महर्षि अगस्त्य, पुलह, पुलस्त्य और क्रतुकी शाखाओंका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अतः परमगस्त्यस्य वक्ष्ये वंशोद्भवान् द्विजान्।<br>अगस्त्यश्चः करम्भश्चः कौसल्याः शकटास्तथा ॥ १<br>सुमेधसो मयोभुवस्तथा गान्धारकायणाः।<br>पौलस्त्याः पौलहाश्चैव क्रतुवंशभवास्तथा ॥ २<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अगस्त्यश्च महेन्द्रश्च ऋषिश्चैव मयोभुवः ॥ ३<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>पौर्णमासाः पारणाश्च त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः ॥ ४<br>अगस्त्यः पौर्णमासश्च पारणश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्याः पौर्णमासास्तु पारणैः ॥ ५<br>एवमुक्तो ऋषीणां तु वंश उत्तमपौरुषः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि किं भवानद्य कथ्यताम् ॥ ६राजन्! इसके बाद अब मैं अगस्त्यके वंशमें उत्पन्न हुए द्विजोंका वर्णन कर रहा हूँ। अगस्त्य, करम्भ, कौसल्य, शकट, सुमेधा, मयोभुव, गान्धारकायण, पौलस्त्य, पौलह तथा क्रतु-वंशोत्पन्न—इनके अगस्त्य, महेन्द्र और महर्षि मयोभुव—ये तीन शुभ प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। पौर्णमास और पारण—इन ऋषियोंके अगस्त्य, पौर्णमास और महातपस्वी पारण—ये तीन प्रवर हैं। पौर्णमासोंका पारणोंके साथ विवाह निषिद्ध है। राजन्! इस प्रकार मैंने ऋषियोंके उत्तम पुरुषोंसे परिपूर्ण वंशका वर्णन कर दिया। इसके बाद अब मैं किसका वर्णन करूँ, यह अब आप बतलाइये॥ १—६॥
मनुरुवाचमनुजीने पूछा—
पुलहस्य पुलस्त्यस्य क्रतोश्चैव महात्मनः।<br>अगस्त्यस्य तथा चैव कथं वंशस्तदुच्यताम् ॥ ७भगवन्! पुलह, पुलस्त्य, महात्मा क्रतु और अगस्त्यका वंश कैसा था, इसे बतलाइये॥ ७॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान् बोले—
क्रतुः खल्वनपत्योऽभूद् राजन् वैवस्वतेऽन्तरे।<br>इध्मवाहं स पुत्रत्वे जग्राह ऋषिसत्तमः ॥ ८<br>अगस्त्यपुत्रं धर्मज्ञमागस्त्याः क्रतवस्ततः।<br>पुलहस्य तथा पुत्रास्त्रयश्च पृथिवीपते ॥ ९<br>तेषां तु जन्म वक्ष्यामि उत्तरत्र यथाविधि।<br>पुलहस्तु प्रजां दृष्ट्वा नातिप्रीतमनाः स्वकाम् ॥ १०<br>अगस्त्यजं दृढास्यं तु पुत्रत्वे वृतवांस्ततः।<br>पौलहाश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः ॥ ११<br>पुलस्त्यान्वयसम्भूतान् दृष्ट्वा रक्षःसमुद्भवान्।<br>अगस्त्यस्य सुतं धीमान् पुत्रत्वे वृतवांस्ततः ॥ १२<br>पौलस्त्याश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः।<br>सगोत्रत्वादिमे सर्वे परस्परमनन्वयाः ॥ १३राजन्! वैवस्वत-मन्वन्तरमें क्रतु जब संतानहीन हो गये, तब उन ऋषिश्रेष्ठने अगस्त्यके धर्मज्ञ पुत्र इध्मवाहको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। तभीसे अगस्त्यवंशी क्रतुवंशी कहलाने लगे। भूपाल! पुलहके तीन पुत्र थे, उनका जन्म-वृत्तान्त मैं आगे विधिपूर्वक वर्णन करूँगा। पुलहका मन अपनी संतानको देखकर प्रसन्न नहीं रहता था, अतः उन्होंने अगस्त्यके पुत्र दृढास्यको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! इसीलिये पुलहवंशी अगस्त्यवंशीके नामसे कहे जाते हैं। पुलस्त्य ऋषि अपनी संततिको राक्षसोंसे उत्पन्न होते देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। तब उन बुद्धिमान्ने अगस्त्यके पुत्रको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! तभीसे पुलस्त्यवंशी भी अगस्त्यवंशी कहलाने लगे। सगोत्र होनेके कारण इन सभीमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध वर्जित है।
  • अध्याय २०३ * । ८३३

एते तवोक्ताः प्रवरा द्विजानां<br>  महानुभावा नृप वंशकाराः।<br>एषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br>  पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ १४॥नरेश! इस प्रकार मैंने ब्राह्मणोंके वंशप्रवर्तक महानुभाव प्रवरोंका वर्णन कर दिया। इन लोगोंके नामोंका कीर्तन करनेसे मानवके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं॥८—१४॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें अगस्त्यवंश-वर्णन नामक दो सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०२॥


दो सौ तीनवाँ अध्याय

प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते शृणु धर्मस्य पार्थिव।<br>दाक्षायणीभ्यः सकलं वंशं दैवतमुत्तमम्॥ १<br>पर्वतादिमहादुर्गशरीराणि नराधिप।<br>अरुन्धत्याः प्रसूतानि धर्माद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २<br>अष्टौ च वसवः पुत्राः सोमपाश्च विभोस्तथा।<br>धरो ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानलानिलौ॥ ३<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>धरस्य पुत्रो द्रविणः कालः पुत्रो ध्रुवस्य तु॥ ४<br>कालस्यावयवानां तु शरीराणि नराधिप।<br>मूर्तिमन्ति च कालाद्धि सम्प्रसूतान्यशेषतः॥ ५<br>सोमस्य भगवान् वर्चः श्रीमांश्चापस्य कीर्त्यते।<br>अनेकजन्मजननः कुमारस्त्वनलस्य तु॥ ६<br>पुरोजवाश्चानिलस्य प्रत्यूषस्य तु देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य त्रिदशानां स वर्धकः॥ ७राजन्! इस वैवस्वत मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर धर्मने दक्षकी कन्याओंके गर्भसे जिस उत्तम देव-वंशका विस्तार किया, उसका वर्णन सुनिये। नरेश्वर! इस वैवस्वत मन्वन्तरमें धर्मके द्वारा अरुन्धतीके गर्भसे पर्वत आदि एवं महादुर्गके समान विशालकाय संतान उत्पन्न हुए तथा उन्हीं सर्वव्यापी धर्मसे आठ सोमपायी पुत्र उत्पन्न हुए, जो वसु कहलाते हैं। उनके नाम हैं—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। धरका पुत्र द्रविण और ध्रुवका पुत्र काल हुआ। नरेश! कालके अवयवोंके जितने मूर्तिमान् शरीर हैं, वे सभी कालसे ही उत्पन्न हुए हैं। सोमके प्रभावशाली पुत्रको वर्च और आपके पुत्रको श्रीमान् कहा जाता है। अनेक जन्म धारण करनेवाला कुमार अनलका पुत्र हुआ। अनिलका पुत्र पुरोजव और प्रत्यूषका पुत्र देवल हुआ। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ जो देवताओंका बढ़ई है॥ १–७॥
समीहितकराः प्रोक्ता नागवीथ्यादयो नव।<br>लम्बापुत्रः स्मृतो घोषो भानोः पुत्राश्च भानवः॥ ८<br>ग्रहर्क्षाणां च सर्वेषामन्येषां चामितौजसाम्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः सर्वे पुत्राः प्रकीर्तिताः॥ ९<br>संकल्पायाश्च संकल्पस्तथा पुत्रः प्रकीर्तितः।<br>मुहूर्ताश्च मुहूर्तायाः साध्याः साध्यासुताः स्मृताः॥ १०नागवीथी आदि नव सन्तति अभीष्टको पूर्ण करनेवाली है। लम्बाका पुत्र घोष और भानुके पुत्र भानव (बारह आदित्य) कहे गये हैं, जो ग्रहों, नक्षत्रों एवं अन्य सभी अमित ओजस्वियोंमें बढ़-चढ़कर हैं। सभी मरुद्गण मरुत्वतीके पुत्र हैं तथा संकल्पाका पुत्र संकल्प कहा जाता है। मुहूर्तके पुत्र मुहूर्त और साध्याके पुत्र साध्यगण

८३४ * मत्स्यपुराण *


| मनो मनुश्च प्राणश्च नरोषा नोच वीर्यवान्।<br>चित्तहार्योऽयनश्चैव हंसो नारायणस्तथा॥ ११<br>विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः।<br>विश्वायाश्च तथा पुत्रा विश्वेदेवाः प्रकीर्तिताः॥ १२<br>क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालकामो मुनिस्तथा।<br>कुरजो मनुजो वीजो रोचमानश्च ते दश॥ १३<br>एतावदुक्तस्तव धर्मवंशः संक्षेपतः पार्थिववंशमुख्य।<br>व्यासेन वक्तुं न हि शक्यमस्ति राजन् विना वर्षशतैरनेकैः॥ १४ | कहे गये हैं। मन, मनु, प्राण, नरोषा, नोच, वीर्यवान्, चित्तहार्य, अयन, हंस, नारायण, विभु और प्रभु—ये बारह साध्य कहे गये हैं। विश्वाके पुत्र विश्वेदेव कहे जाते हैं। क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, कालकाम, मुनि, कुरज, मनुज, बीज और रोचमान—ये दस विश्वेदेव हैं। राजवंशश्रेष्ठ! मैंने आपसे यहाँतक धर्मके वंशका संक्षेपसे वर्णन कर दिया। राजन्! अनेक सैकड़ों वर्षोंके बिना इसका विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८—१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे धर्मवंशवर्णने धर्मप्रवरानुकीर्तनं नाम त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके धर्मवंशवर्णनमें धर्म-प्रवरानुकीर्तन नामक दो सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०३॥


दो सौ चारवाँ अध्याय

श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
एतद्वंशभवा विप्राः श्राद्धे भोज्याः प्रयत्नतः।<br>पितॄणां वल्लभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर॥ १नरेश्वर! इन धर्मके वंशमें उत्पन्न हुए विप्रोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये; क्योंकि इन ब्राह्मणोंके सम्बन्धसे किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अतिशय प्रिय है।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्याः प्रकीर्तिताः।<br>गाथाः पार्थिवशार्दूल कामयद्भिः पुरे स्वके॥ २राजसिंह! इसके बाद अब मैं उस गाथाका वर्णन कर रहा हूँ जिसका अपने पुरमें स्थित कामना करनेवाले पितरोंने कथन किया था।
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्याज्जलाञ्जलिम्।<br>नदीषु बहुतोयासु शीतलासु विशेषतः॥ ३क्या हमलोगोंके वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो अधिक एवं शीतल जलवाली नदियोंमें जाकर हमलोगोंको जलाञ्जलि देगा?
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः श्राद्धं नित्यमाचरेत्।<br>पयोमूलफलैर्भक्ष्यैस्तिलतोयेन वा पुनः॥ ४क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो दूध, मूल, फल और खाद्य सामग्रियोंसे या तिलसहित जलसे नित्य श्राद्ध करेगा?
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्यात्त्रयोदशीम्।<br>पायसं मधुसर्पिर्भ्यां वर्षासु च मघासु च॥ ५क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो वर्षा-ऋतुके मघानक्षत्रकी त्रयोदशी तिथिको मधु और घीसे मिश्रित दूधमें पका हुआ खाद्य पदार्थ हमें समर्पित करेगा?
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सकृत्।<br>श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः॥ ६क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो कालशाकसे श्राद्ध करेगा?
कालशाकं महाशाकं मधु मुन्यन्नमेव च।<br>विषाणवर्जा ये खड्गा आसूर्यं तदशीमहि॥ ७कालशाक, महाशाक, मधु और मुनिजनोंके अनुकूल अन्नोंको हमलोग सूर्यास्तसे पूर्व ही ग्रहण करते हैं।
गयायां दर्शने राहोः खड्गमांसेन योगिनाम्।<br>भोजयेत् कः कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च॥ ८हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कौन व्यक्ति सूर्यग्रहणके अवसरपर अर्थात् राहुके दर्शनकालतक गयातीर्थमें एवं गजच्छायायोगमें योगियोंको फलके गूदेका भोजन करायेगा?