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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
२०१- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन
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- अध्याय १९६ *
| ८२१ | |
|---|---|
| अङ्गिरा दमवाहश्च तथा चैवाप्युरुक्षयः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २९ | प्रवर बतलाये गये हैं—अङ्गिरा, दमवाह्य तथा उरुक्षय। इन गोत्रवालोंमें परस्पर विवाह नहीं होता॥ २१—२९॥ |
| संकृतिश्च त्रिमाष्टिश्च मनुः सम्बधिरेव वा।<br>तण्डिश्चेनातकिश्चैव तैलका दक्ष एव च॥ ३०<br>नारायणिर्शाषिणिश्च लौक्षिर्गार्ग्यहरिस्तथा।<br>गालवश्च अनेहश्च सर्वेषां प्रवरो मतः॥ ३१<br>अङ्गिराः संकृतिश्चैव गौरवीतिस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२<br>कात्यायनो हरितकः कौत्सः पिंगस्तथैव च।<br>हण्डिदासो वात्स्यायनिर्माद्रिमौलिः कुबेरणिः॥ ३३<br>भीमवेगः शाश्वदर्भिः सर्वे त्रिप्रवराः स्मृताः।<br>अङ्गिरा बृहदश्वश्च जीवनाश्वस्तथैव च॥ ३४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>बृहदुक्थो वामदेवस्तथा त्रिप्रवरा मताः॥ ३५<br>अङ्गिरा बृहदुक्थश्च वामदेवस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ३६<br>कुत्सगोत्रोद्भवाश्चैव तथा त्रिप्रवरा मताः।<br>अङ्गिराश्च सदस्युश्च पुरुकुत्सस्तथैव च।<br>कुत्साः कुत्सैरवैवाह्या एवमाहुः पुरातनाः॥ ३७<br>रथीतराणां प्रवरास्त्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च तथैव च रथीतरः।<br>रथीतरा ह्यवैवाह्या नित्यमेव रथीतरैः॥ ३८<br>विष्णुसिद्धिः शिवमत्तिर्जतृणः कतृणस्तथा।<br>पुत्रवश्च महातेजास्तथा वैरपरायणः॥ ३९<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च वृषपर्वस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४० | संकृति, त्रिमाष्टि, मनु, सम्बधि, तण्डि, एनातकि (नाचिकेत), तैलक, दक्ष, नारायणिशार्षिणि, लौक्षि, गार्ग्य, हरि, गालव तथा अनेह—इन सबके प्रवर अङ्गिरा, संकृति तथा गौरवीति माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कात्यायन, हरितक, कौत्स, पिङ्ग, हण्डिदास, वात्स्यायनि, माद्रि, मौलि, कुबेरणि, भीमवेग तथा शाश्वदर्भि—इन सभीके तीन प्रवर कहे गये हैं। उनके नाम हैं—अङ्गिरा, बृहदश्व तथा जीवनाश्व। इनके वंशवालोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। बृहदुक्थ तथा वामदेवके भी तीन प्रवर माने गये हैं। उनके नाम है—अङ्गिरा, बृहदुक्थ तथा वामदेव। इन वंशवालोंमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कुत्सगोत्रमें उत्पन्न होनेवालोंके तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, सदस्यु तथा पुरुकुत्स। प्राचीन लोग बतलाते हैं कि कुत्सगोत्रवालोंसे कुत्सगोत्रवालोंका विवाह नहीं होता। रथीतरके वंशमें उत्पन्न होनेवालोंके भी तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, विरूप तथा रथीतर। ये लोग आपसमें विवाह नहीं करते। विष्णुसिद्धि, शिवमत्ति, जतृण, कतृण, महातेजस्वी पुत्र तथा वैरपरायण—ये सभी अङ्गिरा, विरूप और वृषपर्व—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। राजन्! इन ऋषियोंके वंशमें परस्पर विवाह-कर्म नहीं होता॥ ३०—४०॥ |
| सात्यमुग्रिर्महातेजा हिरण्यस्तम्बिमुद्गलौ।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप॥ ४१<br>अङ्गिरा मत्स्यदग्धश्च मुद्गलश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२ | महातेजस्वी सात्यमुग्रि, हिरण्यस्तम्बि तथा मुद्गल—ये सभी अङ्गिरा, मत्स्यदग्ध तथा महातपस्वी मुद्गल—इन तीन ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इन तीन ऋषियोंके गोत्रोंमें उत्पन्न होनेवालोंका परस्पर विवाह नहीं होता। |
| हंसजिह्वो देवजिह्वो ह्यग्निजिह्वो विराडपः।<br>अपाग्नेयस्त्वश्वयुश्च परण्यस्ता विमौद्गलाः॥ ४३ | हंसजिह्व, देवजिह्व, अग्निजिह्व, विराडप, अपाग्नेय, अश्वयु, परण्यस्त तथा विमौद्गल— |
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८२२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्र्यार्षेयाभिमतास्तेषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अङ्गिराश्चैव ताण्डिश्च मौद्गल्यश्च महातपाः॥ ४४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अपाण्डुश्च गुरुश्चैव तृतीयः शाकटायनः।<br>ततः प्रागाथमा नारी मार्कण्डो मरणः शिवः॥ ४५<br>कटुर्मर्कटपश्चैव तथा नाडायनो ह्यृषिः।<br>श्यामायनस्तथैवैषां त्र्यार्षेयाः प्रवराः शुभाः॥ ४६<br>अङ्गिराश्चाजमीढश्च कत्यश्चैव महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४७ | ये सभी अङ्गिरा, ताण्डि तथा महातपस्वी मौद्गल्य—इन तीनों ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इनके वंशधरोंमें भी विवाह नहीं होता। अपाण्डु, गुरु, शाकटायन, प्रागाथमा, नारी, मार्कण्ड, मरण, शिव, कटु, मर्कटप, नाडायन तथा श्यामायन—ये सभी अङ्गिरा, अजमीढ तथा महातपस्वी कत्य—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते। |
| तित्तिरिः कपिभूश्चैव गार्ग्यश्चैव महानृषिः।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ४८<br>अङ्गिरास्तित्तिरिश्चैव कपिभूश्च महानृषिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४९ | तित्तिरि, कपिभू और महर्षि गार्ग्य—इन सबके अङ्गिरा, तित्तिरि तथा कपिभू नामक तीन प्रवर कहे गये हैं, जिनमें एक-दूसरेका विवाह निषिद्ध है। |
| अथ ऋक्षभरद्वाजौ ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ५०<br>अङ्गिरा सभरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५१ | ऋक्ष, भरद्वाज, ऋषिवान्, मानव तथा मैत्रवर—ये पाँच आर्षेय कहे गये हैं। इनके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मैत्रवर, ऋषिवान् तथा मानव नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। |
| भारद्वाजो हुतः शौङ्गः शैशिरेयस्तथैव च।<br>इत्येते कथिताः सर्वे द्वयामुष्यायणगोत्रजाः॥ ५२<br>पञ्चार्षेयास्तथा ह्येषां प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च भरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः॥ ५३<br>मौद्गल्यः शैशिरश्चैव प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५४ | भारद्वाज, हुत, शौङ्ग तथा शैशिरेय—ये सभी द्व्यामुष्यायण गोत्रमें उत्पन्न कहे गये हैं। इन सबके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मौद्गल्य तथा शैशिर नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। |
| एते तवोक्ताङ्गिरसस्तु वंशे<br>महानुभावा ऋषिगोत्रकाराः।<br>येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ५५ | इस प्रकार मैंने आपसे इस अङ्गिरा-वंशमें उत्पन्न होनेवाले गोत्रप्रवर्तक महानुभाव ऋषियोंका वर्णन कर दिया, जिनके नामका उच्चारण करनेसे पुरुष अपने सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है॥ ४१—५५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तनेऽङ्गिरोवंशकीर्तनं नाम षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनप्रसङ्गमें अङ्गिरावंशवर्णन नामक एक सौ छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९६॥
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- अध्याय १९७ *
८२३
| एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय |
|---|
महर्षि अत्रिके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच | |
|---|---|
| अत्रिवंशसमुत्पन्नान् गोत्रकारान् निबोध मे।<br>कर्दमायनशाखेयास्तथा शारायणाश्च ये॥ १<br>उद्दालकिः शौनकणिरथः शौक्रतवश्च ये।<br>गौरग्रीवो गौरजिनस्तथा चैत्रायणाश्च ये॥ २<br>अर्धपण्या वामरथ्या गोपनास्तकिबिन्दवः।<br>कर्णजिह्वो हरप्रीतिलैंद्राणिः शाकलायनिः॥ ३<br>तैलपश्च सवैलेयो अत्रिर्गोणीपतिस्तथा।<br>जलदो भगपादश्च सौपुषिborderश्च महातपाः॥ ४<br>छन्दोगेयस्तथैतेषां त्र्यार्षेयाः प्रवरा मताः।<br>श्यावाश्वश्च तथात्रिश्च आर्चनानश एव च॥ ५<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>दाक्षिर्बलिः पर्णविborderश्च ऊर्णनाभिः शिलार्दनिः॥ ६<br>बीजवापी शिरीषश्च मौञ्जकेशो गविष्ठिरः।<br>भलन्दनस्तथैतेषां त्र्यार्षेयाः प्रवरा मताः॥ ७<br>अत्रिर्गविष्ठिरश्चैव तथा पूर्वातिथिः स्मृतः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ८<br>आत्रेयपुत्रिकापुत्रानत ऊर्ध्वं निबोध मे।<br>कालेयाश्च सवालेया वामरथ्यास्तथैव च॥ ९<br>धात्रेयाश्चैव मैत्रेयास्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>अत्रिश्च वामरथ्यश्च पौत्रिश्चैव महार्नृषिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १०<br>इत्यत्रिवंशप्रभवास्त्ववोक्ता<br> महानुभावा नृप गोत्रकाराः।<br>येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br> पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ११ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजेन्द्र! अब मुझसे महर्षि अत्रिके वंशके उत्पन्न हुए कर्दमायन तथा शारायणशाखीय गोत्रकर्ता मुनियोंका वर्णन सुनिये। ये हैं—उद्दालकि, शौनकणिरथ, शौक्रतव, गौरग्रीव, गौरजिन, चैत्रायण, अर्धपण्य, वामरथ्य, गोपन, अस्तकि, बिन्दु, कर्णजिह्व, हरप्रीति, लैंद्राणि, शाकलायनि, तैलप, सवैलेय, अत्रि, गोणीपति, जलद, भगपाद, महातपस्वी सौपुष्पि तथा छन्दोगेय—ये शरायणके वंशमें कर्दमायनशाखामें उत्पन्न हुए ऋषि हैं। इनके प्रवर श्यावाश्व, अत्रि और आर्चनानश—ये तीन हैं। इनमें परस्परमें विवाह नहीं होता। दाक्षि, बलि, पर्णवि, ऊर्णनाभि, शिलार्दनि, बीजवापी, शिरीष, मौञ्जकेश, गविष्ठिर तथा भलन्दन—इन ऋषियोंके अत्रि, गविष्ठिर तथा पूर्वातिथि—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध हैं। इसके बाद अब मुझसे अत्रिकी पुत्रिका आत्रेयीसे उत्पन्न प्रवरकर्ता ऋषियोंका विवरण सुनिये—कालेय, वालेय, वामरथ्य, धात्रेय तथा मैत्रेय—इन ऋषियोंके अत्रि, वामरथ्य और महर्षि पौत्रि—ये तीन प्रवर ऋषि माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। राजन्! इस प्रकार मैंने आपको इन अत्रिवंशमें उत्पन्न होनेवाले गोत्रकार महानुभाव ऋषियोंका नाम सुना दिया, जिनके नामसंकीर्तनमात्रसे मनुष्य अपने सभी पाप-कर्मोंसे छुटकारा पा जाता है॥ १-११॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तनेऽत्रिवंशानुकीर्तनं नाम सप्तनवड्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनप्रसङ्गमें अत्रिवंशवर्णन नामक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९७॥