मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१९१- नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
७८६ * मत्स्यपुराण *
| निर्दयो व्यदहद् वह्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>सहस्रशः प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जनाः॥ ३०<br>पुत्रमालिङ्ग्य ते गाढं दह्यन्ते त्रिपुराग्निना।<br>निदाघोऽभून्महावह्नेरन्तकालो यथा तथा॥ ३१<br>केचिद् गुप्ताः प्रदग्धास्तु भार्योत्सङ्गगतास्तथा।<br>पित्रा मात्रा च सुश्लिष्टा दग्धास्वे त्रिपुराग्निना ॥ ३२<br>अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ॥ ३३<br>अग्निज्वालाहतास्तत्र ह्यपतन् धरणीतले।<br>काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता ॥ ३४<br>धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले।<br>काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता ॥ ३५<br>भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि।<br>काचिदादित्यसङ्काशा प्रसुप्ता च गृहे स्थिता ॥ ३६<br>अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना।<br>उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः ॥ ३७<br>वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले।<br>मेघवर्णापरा नारी हारकेयूरभूषिता ॥ ३८<br>श्वेतवस्त्रपरीधाना बालं स्तन्यं न्यधापयत्।<br>दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदती मेघशब्दवत्॥ ३९<br>एवं स तु दहन्नग्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>काचिच्चन्द्रप्रभा सौम्या वज्रवैदूर्यभूषिता ॥ ४० | और घोड़ोंमें फैलकर निर्दयतापूर्वक जला रहे थे। हजारों जागे हुए एवं अनेकों सोये हुए व्यक्ति, जो पुत्रका गाढ़ आलिङ्गन किये हुए थे, त्रिपुराग्निसे जल रहे थे। वहाँ प्रचण्ड अग्निके कारण प्रलयकालीन संताप परिव्याप्त था। उस त्रिपुराग्निसे कुछ लोग पत्नीकी गोदमें छिपे हुए ही भस्म हो गये तो कुछ लोग माँ-बापसे चिपके हुए ही जलकर भस्मसात् हो गये। उस प्रज्वलित त्रिपुरमें अप्सराओंके समान सुन्दरी स्त्रियाँ अग्निकी ज्वालाओंसे झुलसकर पृथ्वीपर गिर रही थीं। कोई मोतीकी मालाओंसे अलंकृत विशाल नेत्रोंवाली षोडशवर्षीया नायिका धूएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई इन्द्रनील मणिसे अलंकृत स्वर्णके समान कान्तिवाली स्त्री पतिको गिरा हुआ देखकर उसीके ऊपर गिर पड़ी। कोई सूर्यके समान तेजस्विनी नारी घरमें ही स्थित रहकर सो रही थी, वह अग्निकी ज्वालासे चेतनारहित होकर धराशायी हो गयी। उसी समय अतिशय बलशाली एक दानव हाथमें तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ, किंतु अग्निसे जलकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेघके समान श्यामवर्णकी दूसरी स्त्री, जो हार और केयूरसे अलंकृत तथा श्वेतवस्त्र पहने हुए अपने दुधमुँहे बच्चेको सुलाये हुए थी, वह उस बच्चेको जलते हुए देखकर मेघके शब्दके समान रोने लगी। इस प्रकार शंकरजीके कोपसे प्रेरित वह अग्नि त्रिपुरको जला रही थी॥ २७-३९ १/२ ॥ |
| सुतमालिङ्ग्य वेपन्ती दग्धा पतति भूतले।<br>काचित् कुन्देन्दुवर्णाभा क्रीडन्ती स्वगृहे स्थिता ॥ ४१<br>गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्दिता।<br>पश्यन्ती ज्वलितं सर्वं हा सुतो मे कथं गतः ॥ ४२<br>सुतं संदग्धमालिङ्ग्य पतिता धरणीतले।<br>आदित्योदयवर्णाभा लक्ष्मीवदनशोभना ॥ ४३<br>त्वरिता दह्यमाना सा पतिता धरणीतले।<br>काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता ॥ ४४ | कोई चन्द्रके समान कान्तिवाली एवं हीरक और वैदूर्यसे अलंकृत सज्जन नायिका अपने पुत्रको गोदमें लेकर काँपती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान कान्तिवाली स्त्री क्रीडा करती हुई अपने घरमें ही सो रही थी, वह घरके जलनेपर अग्निशिखासे पीड़ित हो जाग उठी और सबको जलता हुआ देखकर 'हा! मेरा पुत्र कहाँ चला गया?' ऐसा कहती हुई जलते हुए पुत्रका आलिङ्गन कर पृथ्वीपर गिर पड़ी। उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिसे युक्त एवं लक्ष्मीके मुखके समान शोभायमान मुखवाली कोई स्त्री भागती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर गयी। कोई स्वर्णके समान कान्तिवाली नीलरत्नोंसे अलंकृत स्त्री |
| * अध्याय १८८ * | ७८७ |
|---|
| धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।<br>अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ॥ ४५<br>अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।<br>शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम् ॥ ४६<br>भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।<br>स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः ॥ ४७<br>पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।<br>न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः ॥ ४८<br>अनेन ह्यापसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।<br>किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्याः शत्रुयोषितः ॥ ४९<br>किंतु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति।<br>न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति ॥ ५०<br>दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।<br>म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः ॥ ५१<br>एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।<br>आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने ॥ ५२<br>दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताशिन् मन्दभाग्यक।<br>निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ॥ ५३<br>एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।<br>अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः ॥ ५४<br>दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।<br>पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च ॥ ५५<br>अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।<br>एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।<br>मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत् ॥ ५६ | धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं—'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलंकृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी—'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? अरे पापी! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियोंके प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है! अरे कायर! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी—) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुको स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले॥ ४०–५६॥ |
| अग्निरुवाच | अग्निदेवने कहा— |
| स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।<br>अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम् ॥ ५७<br>रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।<br>ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम् ॥ ५८<br>सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।<br>अल्पसत्त्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥ ५९ | मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला—'मैं देवताओंन्द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पबलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन |
७८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपरीक्ष्य त्वहं दग्धः शंकरेण महात्मना।<br>नान्यः शक्तिस्तु मां हन्तुं वर्जयित्वा त्रिलोचनम्॥ ६०<br>उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्गं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>निर्गतः स पुरद्वारात् परित्यज्य सुहृत्सुतान्॥ ६१<br>रत्नानि यान्यनर्घाणि स्त्रियो नानाविधास्तथा।<br>गृहीत्वा शिरसा लिङ्गं गच्छन् गगनमण्डलम्॥ ६२<br>स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिं शिवम्।<br>त्यक्ता पुरी मया देव यदि वध्योऽस्मि शंकर॥ ६३<br>त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं विनश्यतु।<br>अर्चितं हि मया देव भक्त्या परमया सदा॥ ६४<br>त्वत्कोपाद् यदि वध्योऽहं तदिदं मा विनश्यतु।<br>श्लाघ्यमेतन्महादेव त्वत्कोपाद् दहनं मम॥ ६५<br>प्रतिजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम्।<br>तोटकच्छन्दसा देव स्तौमि त्वां परमेश्वर॥ ६६ | किया और महात्मा शंकरने भी बिना विचारे ही मुझे जला दिया। उन त्रिलोचनको छोड़कर अन्य कोई भी मेरा विनाश नहीं कर सकता। तब वह सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और त्रिभुवनपति शंकरके लिङ्गको सिरपर धारणकर मित्र, पुत्र, बहुमूल्य रत्नों, स्त्रियों और अन्यान्य अनेक प्रकारके पदार्थोंको छोड़कर नगरद्वारसे बाहर निकला। वह लिङ्गको सिरपर धारण कर गगनमण्डलमें जा पहुँचा और देवदेवेश त्रिभुवनपति शिवकी स्तुति करते हुए कहने लगा—'देव! मैंने अपनी पुरीका परित्याग कर दिया है। शंकर! यदि मैं वस्तुतः वध करने योग्य हूँ तो महादेव! आपकी कृपासे मेरा यह लिङ्ग विनष्ट न हो। देव! मैंने परमभक्तिके साथ सदा इसकी पूजा की है, अतः यदि मैं आपके कोपके कारण वध्य हूँ तो यह लिङ्ग विनष्ट न हो। महादेव! आपके कोपसे मेरा यह जल जाना प्रशस्त ही है। महादेव! प्रत्येक जन्ममें मैं आपके चरणोंमें ही लीन हूँ, अतः देवाधिदेव परमेश्वर! मैं तोटक-छन्दद्वारा आपकी स्तुति कर रहा हूँ॥ ५७—६६॥ |
| शिव शंकर शर्व हराय नमो<br>भव भीम महेश्वर सर्व नमः।<br>कुसुमायुधदेहविनाशकर<br>त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर॥ ६७<br><br>प्रमदाप्रिय कान्त विरक्त नमः<br>ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित।<br>हयवानरसिंहगजेन्द्रमुखै-<br>रतिह्रस्वसुदीर्घविशालमुखैः ॥ ६८<br><br>उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैः<br>प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैर्बहुभिः।<br>प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरत-<br>श्चलचन्द्रकलाङ्कुर देव नमः॥ ६९<br><br>न च पुत्रकलत्रहयादिधनं<br>मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम्।<br>व्यथितोऽस्मि शरीरशतैर्बहुभि-<br>र्गमिता च महानरकस्य गतिः॥ ७०<br><br>न निवर्तति जन्म न पापमतिः<br>शुचिकर्म निबद्धमपि त्यजति।<br>अनुकम्पति विभ्रमति त्रसति<br>मम चैव कुकर्म निवारयति॥ ७१ | आप शिव, शंकर, शर्व और हरको नमस्कार है। भव, भीम, महेश्वर और सर्वभूतमयको प्रणाम है। आप कामदेवके शरीरके नाशक, त्रिपुरान्तक, अन्धक, त्रिशूलधर, आनन्दप्रिय, कान्त, विरक्त और सुर-असुर-सिद्धगणोंसे नमस्कृत हैं, आपको नमस्कार है। मैं अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्रके-से मुखोंवाले, अतिशय छोटे, विस्तृत विशालमुखोंसे युक्त और सैकड़ों भुजाओंसे सम्पन्न बहुत-से अजेय असुरोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये अशक्यरूपसे विख्यात हूँ। शिवजीकी भक्तिमें लीन रहनेवाला वही मैं भवके चरणोंमें प्रणिपात कर रहा हूँ। चञ्चल चन्द्रकलासे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। ये पुत्र, स्त्री, अश्वादि वैभव मेरे नहीं हैं, मेरे लिये तो आपका चिन्तन ही एकमात्र शरण है। मैं सैकड़ों शरीर (जन्म) धारण कर पीड़ित हो चुका हूँ। आगे महानरकमें पड़नेकी सम्भावना है। न जन्मसे छुटकारा मिलेगा, न पापबुद्धि ही निवृत्त होगी, शुद्ध कर्ममें लगा हुआ भी मन उसे छोड़ देता है, काँपता है, भ्रमित होता है और भयभीत होता है। मेरे ही कुकर्म अच्छे कर्मोंसे मुझे हटाते हैं। |
| * अध्याय १८८ * | ७८९ |
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| यः पठेत् तोटकं दिव्यं प्रयत: शुचिमानसः।<br>बाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि वरदो भवेत्॥ ७२<br>इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः।<br>प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं वचनमब्रवीत्॥ ७३<br><br>महेश्वर उवाच<br>न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव।<br>पुत्रपौत्रसुहृद्बन्धुभार्याभृत्यजनैः सह॥ ७४<br>अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पाण्डव॥ ७५<br>अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः।<br>ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा॥ ७६<br>तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना।<br>भ्रमत्तु गगने दिव्यं रुद्रतेजःप्रभावतः॥ ७७<br>एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना।<br>ज्वालामालाप्रदीप्तं तत् पतितं धरणीतले॥ ७८<br>एकं निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके।<br>द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ७९<br>दग्धेषु तेषु राजेन्द्र रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>ज्वलत्तदपतत् तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः॥ ८०<br>ऊर्ध्वेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवं गताः।<br>हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृतो महान्॥ ८१<br>शरमस्तम्भयद् रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे।<br>एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८२<br>चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः॥ ८३<br>ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः।<br>पृथिवीमेकच्छत्रेण भुङ्क्ते स तु न संशयः॥ ८४<br><br>एवं पुण्यो महाराज पर्वतोऽमरकण्टकः।<br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम्॥ ८५<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्॥ ८६<br><br>ब्रह्महत्या गमिष्यन्ति राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तदेवं निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८७ | जो मनुष्य संयत होकर पवित्र मनसे इस दिव्य तोटकछन्दमें रचित स्तोत्रको पढ़ता है, उसके लिये भी रुद्र बाणके समान वरदायक होते हैं। उस समय स्वयं महेश्वरदेव इस महादिव्य स्तोत्रको सुनकर उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले॥ ६७-७३॥<br><br>भगवान् महेश्वरने कहा—वत्स! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। दानव! तुम पुत्र, मित्र, बन्धु, पत्नी और भृत्यजनोंके साथ सुवर्णनिर्मित नगरमें निवास करो। बाण! आजसे तुम देवताओंद्वारा अवध्य हो गये। अब तुम लोकमें सर्वथा निर्भय, अव्यय और अक्षय होकर विचरण करो। पाण्डुनन्दन! इस प्रकार देवाधिदेवने बाणको पुनः वर प्रदान किया। तदनन्तर रुद्रने अग्निको जलानेसे मना कर दिया। इस प्रकार महात्मा शंकरने बाणासुरके तृतीय पुरकी रक्षा की। वह पुर रुद्रके तेजके प्रभावसे गगनमण्डलमें घूमने लगा। इस प्रकार महात्मा शंकरने त्रिपुरको जलाया। वह ज्वालामालासे प्रदीप्त होकर पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। उनमेंसे एक पुर त्रिपुरान्तकके श्रीशैलपर गिरा और द्वितीय उस अमरकण्टक पर्वतपर गिरा। राजेन्द्र! उनके जल जानेपर उसपर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हुए। वह जलता हुआ गिरा था, इस कारण ज्वालेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसकी दिव्य ज्वालाएँ ऊपरको उठती हुई स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। उस समय देवों और असुरोंके द्वारा किया गया भयंकर हाहाकार व्याप्त हो गया। तब रुद्रने अमरकण्टक पर्वतपर उत्तम माहेश्वरपुरमें शरको स्तम्भित कर दिया। पाण्डुनन्दन! (इस प्रकार अमरकण्टकपर्वतपर जो व्यक्ति रुद्रकोटिकी अर्चना करता है) वह तीस करोड़ एक हजार वर्षपर्यन्त चौदहों भुवनोंका उपभोग कर अन्तमें पृथ्वीपर जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है। वह एकच्छत्र सम्राट् होकर पृथ्वीका उपभोग करता है—इसमें संदेह नहीं है॥ ७४-८४॥<br><br>महाराज! यह अमरकण्टक पर्वत ऐसा पुण्यजनक है। जो व्यक्ति चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टक पर्वतपर जाता है, वह अश्वमेध-यज्ञसे दसगुना फल प्राप्त करता है और वहाँ महेश्वरका दर्शन करके स्वर्गलोकको प्राप्त करता है—ऐसा मनीषियोंने कहा है। सूर्यग्रहणके अवसरपर अमरकण्टकपर जानेसे ब्रह्महत्याएँ निवृत्त हो जाती हैं। इस प्रकार अमरकण्टक पर्वतपर अशेष पुण्य |
७९० * मत्स्यपुराण *
| मनसापि स्मरेद् यस्तं गिरिं त्वमरकण्टकम्।<br>चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥८८ | प्राप्त होता है। जो मनसे भी उस अमरकण्टकपर्वतका स्मरण करता है, उसे निःसंदेह सौ चान्द्रायणव्रतसे भी अधिक फल मिलता है। |
| त्रयाणामपि लोकानां विख्यातोऽमरकण्टकः।<br>एष पुण्यो गिरिश्रेष्ठः सिद्धगन्धर्वसेवितः॥८९ | अमरकण्टक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। यह पुण्यमय श्रेष्ठ पर्वत सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित, |
| नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः।<br>मृगव्याघ्रसहस्रैस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥९० | विविध वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत हजारों मृगों और व्याघ्रोंसे सेवित है। |
| यत्र संनिहितो देवो देव्या सह महेश्वरः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह॥९१ | जहाँ देवी पार्वतीके साथ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु तथा विद्याधरोंके साथ इन्द्र सदा उपस्थित रहते हैं, |
| ऋषिभिः किन्नरैर्यक्षैर्नित्यमेव निषेवितः।<br>वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते पन्नगोत्तमैः॥९२ | वह अमरकण्टक पर्वत ऋषियों, किन्नरों और यक्षोंके द्वारा सदा सेवित रहता है। श्रेष्ठ सर्पोंके साथ वासुकि वहाँ क्रीड़ा करते रहते हैं। |
| प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥९३ | जो मनुष्य अमरकण्टक पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। |
| तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥९४ | वहाँ सिद्धोंद्वारा सेवित ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है, उसमें स्नानकर मानव स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं और जो वहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। |
| ज्वालेश्वरे महाराज यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु तस्यापि शृणु यत्फलम्॥९५ | महाराज! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर जो व्यक्ति ज्वालेश्वरमें प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। |
| सर्वकर्मविनिर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानसंयुतः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥९६ | वह व्यक्ति सभी कर्मोंसे विनिर्मुक्त तथा ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो प्रलयकालपर्यन्त रुद्रलोकको प्राप्त करता है। |
| अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे।<br>तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत॥९७ | सुव्रत! अमरकण्टकपर्वतके दोनों तटोंपर करोड़ों ऋषिगण तपस्यामें रत रहते हैं। |
| समंताद् योजनक्षेत्रो गिरिश्चामरकण्टकः॥९८ | यह अमरकण्टकपर्वत चारों ओरसे एक योजनमें विस्तृत है। |
| अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले।<br>स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥९९ | अकाम हो या सकाम, जो मनुष्य नर्मदाके शुभदायक जलमें स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है और रुद्रलोकको प्राप्त करता है॥८५-९९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णनमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥
- अध्याय १८९ * | ७९१
एक सौ नवासीवाँ अध्याय
नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>पृच्छन्ति ते महात्मानो मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>युधिष्ठिरपुरोगास्ते ऋषयश्च तपोधनाः॥ १<br>आख्याहि भगवंस्तथ्यं कावेरीसंगमो महान्।<br>लोकानां च हितार्थाय अस्माकं च विवृद्धये॥ २<br>सदा पापरता ये च नरा दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो गच्छन्ति परं पदम्।<br>एतदिच्छाम विज्ञातुं भगवन् वक्तुमर्हसि॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! युधिष्ठिरको आगे कर वे तपोधन महात्मा-ऋषिगण महामुनि मार्कण्डेयसे पूछने लगे—'भगवन्! आप हमलोगोंके अभ्युदय और लोकके कल्याणके लिये उस नर्मदा और कावेरीके संगमका माहात्म्य भलीभाँति वर्णन कीजिये। भगवन्! जिसके प्रभावसे सदा पापमें रत एवं दुराचारमें प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और परमपदको प्राप्त करते हैं, उसे हमलोग जानना चाहते हैं, आप बतानेकी कृपा करें॥ १—३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृण्वन्त्ववहिताः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>अस्ति वीरो महायक्षः कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ४<br>इदं तीर्थमनुप्राप्य राजा यक्षाधिपोऽभवत्।<br>सिद्धिं प्राप्तो महाराज तन्मे निगदतः शृणु॥ ५<br>कावेरी नर्मदा यत्र सङ्गमो लोकविश्रुतः।<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ६<br>तपोऽतप्यत यक्षेन्द्रो दिव्यं वर्षशतं महत्।<br>तस्य तुष्टो महादेवः प्रादाद् वरमनुत्तमम्॥ ७<br>भो भो यक्ष महासत्त्व वरं ब्रूहि यथेप्सितम्।<br>ब्रूहि कार्यं यथेष्टं तु यत्ते मनसि वर्तते॥ ८ | मार्कण्डेयजीने कहा—युधिष्ठिरसहित ऋषिगण! आपलोग सावधान होकर सुनिये। सत्य पराक्रमी एवं शूरवीर महायक्ष कुबेरने इस तीर्थमें आकर सिद्धि प्राप्त की और वे यक्षोंके अधीश्वर बने। महाराज! मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। किसी समय सत्यपराक्रमी यक्षपति कुबेरने जहाँ कावेरी और नर्मदाका लोकप्रसिद्ध संगम है, वहाँ स्नानकर पवित्र हो सौ दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की। तब संतुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा—'महाबलशाली यक्ष! तुम अपना अभीष्ट वर माँग लो। तुम्हारे मनमें जो यथेष्ट कार्य वर्तमान है, उसे बतलाओ'॥ ४—८॥ |
| कुबेर उवाच<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>अद्यप्रभृति सर्वेषां यक्षाणामधिपो भवे॥ ९<br>कुबेरस्य वचः श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः।<br>एवमस्तु ततो देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०<br>सोऽपि लब्धवरो यक्षः शीघ्रं लब्धफलोदयः।<br>पूजितः स तु यक्षैश्च ह्यभिषिक्तस्तु पार्थिव॥ ११<br>कावेरीसङ्गमं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्।<br>ये नरा नाभिजानन्ति वञ्चितास्ते न संशयः॥ १२ | कुबेर बोले—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मैं आजसे सभी यक्षोंका अधीश्वर हो जाऊँ। कुबेरका वचन सुनकर महेश्वर परम प्रसन्न हुए और 'ऐसा ही हो'—यों कहकर वे देवाधिदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। राजन्! इस प्रकार उस यक्षने वर प्राप्त कर शीघ्र ही फलको भी प्राप्त किया। वह यक्षोंद्वारा पूजित होकर राजाके पदपर अभिषिक्त किया गया। वहीं सभी पापोंको नाश करनेवाला कावेरी-संगम है जो मनुष्य उसे नहीं जानते, वे निःसंदेह ठगे |
| ७९२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायीत मानवः।<br>कावेरी च महापुण्या नर्मदा च महानदी॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम्।<br>अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते॥ १४<br>अग्निप्रवेशं यः कुर्याद् यश्च कुर्यादनाशकम्।<br>अनिवर्त्या गतिस्तस्य यथा मे शंकोरोऽब्रवीत्॥ १५<br>सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडते दिवि रुद्रवत्।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः॥ १६<br>मोदते रुद्रलोकस्थो यत्र तत्रैव गच्छति।<br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १७<br>भोगवान् दानशीलश्च महाकुलसमुद्भवः।<br>तत्र पीत्वा जलं सम्यक् चान्द्रायणफलं लभेत्॥ १८<br>स्वर्गं गच्छन्ति ते मर्त्या ये पिबन्ति शुभं जलम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यत्फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>कावेरीसंगमे स्नात्वा तत्फलं तस्य जायते॥ १९<br>एवमादि तु राजेन्द्र कावेरीसंगमे महत्।<br>पुण्यं महत्फलं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्॥ २० | गये। इसलिये मनुष्यको सब तरहसे प्रयत्न करके वहाँ स्नान करना चाहिये। राजेन्द्र! कावेरी और नर्मदा—ये दोनों अतिशय पुण्यशालिनी महानदी हैं। उसमें स्नानकर जो मनुष्य वृषभध्वज शिवकी पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य वहाँ अग्निमें प्रवेश करता है या जो उपवासपूर्वक निवास करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित गति प्राप्त होती है—ऐसा शंकरजीने मुझे बतलाया था। वह पुरुष स्वर्गलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंद्वारा सेवित होकर रुद्रके समान साठ करोड़ साठ हजार वर्षोंतक क्रीड़ा करता है एवं रुद्रलोकमें स्थित होकर आनन्दका भोग करता है तथा जहाँ चाहता है वहाँ चला जाता है। पुनः पुण्य क्षीण होनेपर वह भ्रष्ट होकर उत्तम कुलमें उत्पन्न, भोगवान्, दानशील और धार्मिक राजा होता है। इस संगममें जलका सम्यक् पानकर मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका फल प्राप्त करता है। जो मानव इसके पवित्र जलको पीते हैं, वे स्वर्गको चले जाते हैं। गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे कावेरीके संगममें स्नान करनेसे मिलता है। राजेन्द्र! इस तरह कावेरी और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे सभी पापोंका नाश करनेवाला अतिशय पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है॥ ९–२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदाका माहात्म्यवर्णन नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८९॥
एक सौ नब्बेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
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| नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं योजनविस्तृतम्।<br>यन्त्रेश्वरेति विख्यातं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते।<br>पञ्च वर्षसहस्राणि क्रीडते कामरूपधृक्॥ २<br>गर्जनं च ततो गच्छेद् यत्र मेघचयोत्थितः।<br>इन्द्रजिन्नाम सम्प्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ३<br>मेघनादं ततो गच्छेद् यत्र मेघानुगर्जितम्।<br>मेघनादो गणस्तत्र परमां गणतां गतः॥ ४ | राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर एक योजन विस्तृत यन्त्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नानकर मानव देवताओंके साथ आनन्द मनाता है और इच्छानुसार रूप धारणकर पाँच हजार वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता है। वहाँ गर्जन नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघसमूह ऊपर उठते रहते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे मेघनादको इन्द्रजित् नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे मेघनाद जाना चाहिये, जहाँ मेघके गर्जनकी-सी ध्वनि होती रहती है। इसी स्थानपर मेघनाद-गण गणके श्रेष्ठ पदको प्राप्त किया था। |
| * अध्याय १९० * | ७९३ |
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| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थमाम्रातकेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५<br>नर्मदोत्तरतीरे तु धारा तीर्थं तु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ६<br>सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा ये विचिन्तिताः।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम्॥ ७<br>तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ब्रह्मलोके महीयते॥ ८ | राजेन्द्र! इसके बाद आम्रातकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके उत्तर तटपर प्रसिद्ध धारातीर्थ है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य यदि पितरों और देवताओंका तर्पण करता है तो उसे मनोऽभिलषित कामनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। राजेन्द्र! इसके बाद ब्रह्मावर्त नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान रहते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है॥ १—८॥ |
| ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलादानमाप्नुयात्॥ १०<br>गच्छेत् करञ्जतीर्थं तु देवर्षिगणसेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोलोकं समवाप्नुयात्॥ ११<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितो रुद्रस्तिष्ठते ह्युमया सह॥ १२<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र स वन्द्यस्त्रिदशैरपि।<br>पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र रुद्रलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्॥ १४<br>तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता।<br>तत्र प्राणपरित्यागाद् रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ १५<br>ततः पुष्करिणीं गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र हीन्द्रस्यार्थासनं लभेत्॥ १६ | वहाँ नियमपूर्वक संयत भोजन करता हुआ अङ्गारेश्वर जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है। राजेन्द्र! वहाँसे कपिला नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कपिला गौके दानका फल प्राप्त करता है। इसके बाद देवों और ऋषियोंसे सेवित करंज नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको गोलोककी प्राप्ति होती है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ कुण्डलेश्वर नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ उमाके साथ रुद्र सदा निवास करते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर वह देवताओंद्वारा भी वन्दनीय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सभी पापोंके नाशक पिप्पलेश-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! वहाँसे श्रेष्ठ विमलेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ महेश्वरद्वारा निर्मित एक देवशिला है। उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदुपरान्त पुष्करिणीतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे, वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही मानव इन्द्रका आधा आसन प्राप्त कर लेता है॥ ९—१६॥ |
| नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १७ | नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा रुद्रके शरीरसे निकली है, यह स्थावर और जंगम सभी जीवोंका उद्धार करती है। |
| सर्वदेवाधिदेवेन त्वीश्वरेण महात्मना।<br>कथिता ऋषिसंघेभ्यो ह्यस्माकं च विशेषतः॥ १८ | ऐसा सभी देवताओंके अधीश्वर महात्मा शंकरने स्वयं ऋषिगणको और विशेषकर मुझे बताया है। |
| मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।<br>रुद्रदेहाद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥ १९ | मुनियोंने इस श्रेष्ठ नर्मदा नदीकी स्तुति की है। यह नर्मदा संसारके हितकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। |
| ७९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।<br>संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥ २०<br>नमः पुण्यजले ह्लाद्ये नमः सागरगामिनि।<br>नमस्ते पावनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥ २१<br>नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते<br>नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।<br>नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे<br>नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने॥ २२<br>यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।<br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।<br>अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः॥ २४<br>नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।<br>तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५ | यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये॥ १७-२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९०॥
एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सेवन्ते नर्मदां राजन् रागक्रोधविवर्जिताः॥ १<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>कस्मिन् निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले।<br>तत्र पुण्यं समाख्याहि यथावन्मुनिसत्तम॥ २<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शूलभेदमिति ख्यातं तीर्थं पुण्यतमं महत्।<br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br><br>त्रिरात्रं कारयेद् यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तभीसे ब्रह्मा आदि देवता और तपस्वी ऋषिगण क्रोध-रागसे रहित होकर नर्मदाका सेवन करते हैं॥ १॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर महादेवजीका त्रिशूल किस स्थानपर गिरा था? उस स्थानका पुण्य यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥<br><br>मार्कण्डेयजी बोले— वह महान् पुण्यमय तीर्थ शूलभेद नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे, उससे एक हजार गो-दानका फल प्राप्त होता है। नराधिप! जो मनुष्य उस तीर्थस्थानमें तीन राततक महादेवजीकी पूजा करके निवास करता है, उसका पुनर्जन्म |