मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८१- अविमुक्तक्षेत्र-(वाराणसी) का माहात्म्य
| * अध्याय १८० * | ७४५ |
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| सूत उवाच<br><br>शृणुध्वं वै यथा लेभे गणेशत्वं स पिङ्गलः।<br>अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं वाराणसीं त्विह॥ ४<br>पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासीद्यक्षः प्रतापवान्।<br>हरिकेश इति ख्यातो ब्रह्मण्यो धार्मिकश्च ह॥ ५<br>तस्य जन्मप्रभृत्येव शर्वे भक्तिरनुत्तमा।<br>तदासीत्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ॥ ६<br>आसीनश्च शयानश्च गच्छंस्तिष्ठन्ननुव्रजन्।<br>भुञ्जानोऽथ पिबन् वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत्॥ ७<br>तमेवं युक्तमनसं पूर्णभद्रः पिताब्रवीत्।<br>न त्वां पुत्रमहं मन्ये दुर्जातो यस्त्वमन्यथा॥ ८<br>न हि यक्षकुलीनानामेतद् वृत्तं भवत्युत।<br>गुह्यका बत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसः॥ ९<br>क्रव्यादाम्रैव किम्भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रक।<br>मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना॥ १०<br>स्वयम्भुवा यथाऽऽदिष्टा त्यक्तव्या यदि नो भवेत्।<br>आश्रमान्तरजं कर्म न कुर्युर्गृहिणस्तु तत्॥ ११<br>हित्वा मनुष्यभावं च कर्मभिर्विविधैश्चर।<br>यत्त्वमेवं विमार्गस्थो मनुष्याजात एव च॥ १२<br>यथावद् विविधं तेषां कर्म तज्जातिसंश्रयम्।<br>मयापि विहितं पश्य कर्मैतन्नात्र संशयः॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पिंगलको जिस प्रकार गणेशत्व, लोकोंके लिये अन्नदत्व और वाराणसी-जैसा स्थान प्राप्त हुआ था वह प्रसङ्ग बतला रहा हूँ, सुनिये। प्राचीनकालमें हरिकेश नामसे विख्यात एक सौन्दर्यशाली यक्ष हो गया है, जो पूर्णभद्रका पुत्र था। वह महाप्रतापी, ब्राह्मणभक्त और धर्मात्मा था। जन्मसे ही उसकी शंकरजीमें प्रगाढ़ भक्ति थी। वह तन्मय होकर उन्हींको नमस्कार करनेमें, उन्हींकी भक्ति करनेमें और उन्हींके ध्यानमें तत्पर रहता था। वह बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, घूमते तथा खाते-पीते समय सदा शिवजीके ध्यानमें ही मग्न रहता था। इस प्रकार शंकरजीमें लीन मनवाले उससे उसके पिता पूर्णभद्रने कहा—'पुत्र! मैं तुम्हें अपना पुत्र नहीं मानता। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अन्यथा ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यक्षकुलमें उत्पन्न होनेवालोंका ऐसा आचरण नहीं होता। तुम गुह्यक* हो। राक्षस ही स्वभावसे क्रूर चित्तवाले, मांसभक्षी, सर्वभक्षी और हिंसापरायण होते हैं। महात्मा ब्रह्माद्वारा ऐसा ही निर्देश दिया गया है। तुम ऐसा मत करो; क्योंकि तुम्हारे लिये ऐसी वृत्ति नहीं बतलायी गयी है। गृहस्थ भी अन्य आश्रमोंका कर्म नहीं करते। इसलिये तुम मनुष्यभावका परित्याग करके यक्षोंके अनुकूल विविध कर्मोंका आचरण करो। यदि तुम इस प्रकार विमार्गपर ही स्थित रहोगे तो मनुष्यसे उत्पन्न हुआ ही समझे जाओगे। अतः तुम यक्षजातिके अनुकूल विविध कर्मोंका ठीक-ठीक आचरण करो। देखो, मैं भी निःसंदेह वैसा ही आचरण कर रहा हूँ॥ ४-१३॥ |
| सूत उवाच<br><br>एवमुक्त्वा स तं पुत्रं पूर्णभद्रः प्रतापवान्।<br>उवाच निष्क्रम क्षिप्रं गच्छ पुत्र यथेच्छसि॥ १४<br>ततः स निर्गतस्त्यक्त्वा गृहं सम्बन्धिनस्तथा।<br>वाराणसीं समासाद्य तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १५<br>स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः।<br>संनियम्येन्द्रियग्राममवातिष्ठत निश्चलः॥ १६<br>अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य तदाशिषः।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां दिव्यमप्यभ्यवर्तत॥ १७<br>वल्मीकेन समाक्रान्तो भक्ष्यमाणः पिपीलिकैः।<br>वज्रसूचीमुखैस्तीक्ष्णैर्विध्यमानस्तथैव च॥ १८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रतापी पूर्णभद्रने अपने उस पुत्रसे इस प्रकार (कहा; किंतु जब उसपर कोई प्रभाव पड़ते नहीं देखा, तब वह पुनः कुपित होकर) बोला—'पुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे घरसे निकल जाओ और जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाओ।' तब वह हरिकेश गृह तथा सम्बन्धियोंका त्याग कर निकल पड़ा और वाराणसीमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह इन्द्रियसमुदायको संयमित कर सूखे काष्ठ और पत्थरकी भाँति निश्चल हो एकटक स्थाणु (ठूँठ)-की तरह स्थित हो गया। इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले हरिकेशके एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये। उसके शरीरपर बामवट जम गयी। वज्रके समान कठोर और सूई-जैसे पतले एवं तीखे मुखवाली चींटियोंने उसमें छेद कर उसे खा डाला। |
* अमर, व्याडि, हलायुध आदि कोशों एवं भारतादि प्रायः सभी ग्रन्थोंमें यक्षोंकी निधिरक्षक श्रेणीको ही गुह्यक कहा गया है—'निधिं गृह्णन्ति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः।'
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| निर्मांसरुधिरत्वक् च कुन्दशङ्खेन्दुसप्रभः।<br>अस्थिशेषोऽभवच्छर्वं देवं वै चिन्तयन्नपि॥ १९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे देवी व्यज्ञापयत शङ्करम्॥ २० | इस प्रकार वह मांस, रुधिर और चमड़ेसे रहित हो अस्थिमात्र अवशेष रह गया, जो कुन्द, शङ्ख और चन्द्रमाके समान चमक रहा था। इतनेपर भी वह भगवान् शंकरका ध्यान कर ही रहा था। इसी बीच पार्वती देवीने भगवान् शंकरसे निवेदन किया॥ १४—२०॥ |
| देव्युवाच<br>उद्यानं पुनरेवेदं द्रष्टुमिच्छामि सर्वदा।<br>क्षेत्रस्य देव माहात्म्यं श्रोतुं कौतूहलं हि मे।<br>यतश्च प्रियमेतत् ते तथास्य फलमुत्तमम्॥ २१<br>इति विज्ञापितो देवः शर्वाण्या परमेश्वरः।<br>सर्वं पृष्टं ते यथातथ्यमाख्यातुमुपचक्रमे॥ २२<br>निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सह शङ्करः।<br>उद्यानं दर्शयामास देव्या देवः पिनाकधृक्॥ २३ | देवीने कहा— देव! मैं इस उद्यानको पुनः देखना चाहती हूँ। साथ ही इस क्षेत्रका माहात्म्य सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि यह आपको परम प्रिय है और इसके श्रवणका फल भी उत्तम है। इस प्रकार भवानीद्वारा निवेदन किये जानेपर परमेश्वर शंकर प्रश्नानुसार सारा प्रसंग यथार्थरूपसे कहनेके लिये उद्यत हुए। तदनन्तर पिनाकधारी देवेश्वर भगवान् शंकर पार्वतीके साथ वहाँसे चल पड़े और देवीको उस उद्यानका दर्शन कराते हुए बोले॥ २१—२३॥ |
| देवदेव उवाच<br>प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभितं<br>लताप्रतानावनतं मनोहरम्।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः<br>सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ २४<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभिः<br>सकर्णिकारैर्बकुलैश्च सर्वशः।<br>अशोकपुन्नागवरैः सुपुष्पितै-<br>र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ २५<br>क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणूरूषितै-<br>र्विहङ्गमैश्चारुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसमण्डनादिभिः<br>प्रमत्तदात्यूहरुतैश्च वल्गुभिः॥ २६<br>क्वचिच्च चक्राह्वरवोपनादितं<br>क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम्।<br>क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्॥ २७<br>मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि-<br>र्निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पम् ।<br>क्वचित् सुपुष्पैः सहकारवृक्षै-<br>र्लतोपगूढैस्तिलकद्रुमैश्च ॥ २८ | देवाधिदेव शंकरने कहा— प्रिये! यह उद्यान खिले हुए नाना प्रकारके गुल्मोंसे सुशोभित है। यह लताओंके विस्तारसे अवनत होनेके कारण मनोहर लग रहा है। इसमें चारों ओर पुष्पोंसे लदे हुए प्रियङ्गुके तथा भली-भाँति खिली हुई कँटीली केतकीके वृक्ष दीख रहे हैं। यह सब ओर तमालके गुल्मों, सुगन्धित कनेर और मौलसिरी तथा फूलोंसे लदे हुए अशोक और पुंनागके उत्तम वृक्षोंसे, जिसके पुष्पोंपर भ्रमरसमूह गुञ्जार कर रहे हैं, व्याप्त है। कहीं पूर्णरूपसे खिले हुए कमलके परागसे धूसरित अङ्गवाले पक्षी सुन्दर कलनाद कर रहे हैं, कहीं सारसोंका दल बोल रहा है। कहीं मतवाले चातकोंकी मधुर बोली सुनायी पड़ रही है। कहीं चक्रवाकोंका शब्द गूँज रहा है। कहीं यूथ-के-यूथ कलहंस विचर रहे हैं। कहीं बतखोंके नादसे निनादित हो रहा है। कहीं झुंड-के-झुंड मतवाले भौंरे गुनगुना रहे हैं। कहीं मदसे मतवाली हुई देवाङ्गनाएँ सुन्दर एवं सुगन्धित पुष्पोंका सेवन कर रही हैं। कहीं सुन्दर पुष्पोंसे आच्छादित आमके वृक्ष और लताओंसे आच्छादित तिलकके वृक्ष शोभा पा रहे हैं। |