मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७८- कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति
७२४ * मत्स्यपुराण *
| एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।<br>विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान् महाहवे॥ १२<br><br>तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः।<br>वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३<br><br>तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेन्दू महाबलौ।<br>जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान्॥ १४<br><br>द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।<br>मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५<br><br>ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद्दानवमदृश्यत।<br>जगत्संवर्तकाम्भोदैः प्रविष्टैरिव संवृतम्॥ १६<br><br>तावुद्यताम्बुनाथौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ।<br>शमयामासतुर्मायां देवौ दैत्येन्द्रनिर्मिताम्॥ १७<br><br>शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे।<br>न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः॥ १८<br><br>शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमार्दिताः।<br>हिमाप्लावितसर्वाङ्गा निरुष्माण इवाग्नयः॥ १९<br><br>तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै।<br>विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ २०<br><br>तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादिताञ्शीतरश्मिभिः।<br>मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः॥ २१<br><br>स शिलाजालविततां खड्गचर्माट्टहासिनीम्।<br>पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम्॥ २२<br><br>सिंहव्याघ्रगणाकीर्णां नदद्भिर्गजयूथपैः।<br>ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम्॥ २३<br><br>निर्मितां स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम्।<br>प्रथितां पार्वतीं मायामसृजत् स समन्ततः॥ २४<br><br>सासिशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्द्भिश्च पादपैः।<br>जघान देवसङ्घांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत्॥ २५ | आप इस भीषण युद्धमें मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये शीतसे जले हुए, हिमपरिवेष्टित, माया और गर्वसे रहित इन दैत्यसिंहोंको देखिये। फिर तो वरुणके पाशसहित चन्द्रमाद्वारा छोड़ी गयी हिमवृष्टिने उन भयंकर दैत्योंको मेघसमूहकी तरह घेर लिया। वे दोनों महाबली पाशधारी वरुण और शीतांशु चन्द्रमा पाश और हिमके प्रहारसे दानवोंका संहार करने लगे। वे दोनों जलके स्वामी और समरमें पाश एवं हिमके द्वारा युद्ध करनेवाले थे, अतः वे रणभूमिमें जलसे क्षुब्ध हुए दो महासागरकी भाँति विचरण करने लगे। उन दोनोंके द्वारा जलमग्न की गयी हुई दानवोंकी वह सेना उमड़े हुए संवर्तक नामक बादलोंसे आच्छादित जगत्की तरह दीख रही थी। इस प्रकार जलके स्वामी उन दोनों देवता चन्द्रमा और वरुणने दैत्येन्द्रद्वारा निर्मित मायाको शान्त कर दिया। रणभूमिमें शीतल किरणसमूहोंसे जले हुए तथा पाशोंसे जकड़े हुए दैत्यगण शिखररहित पर्वतोंकी तरह चलनेमें भी असमर्थ हो गये। शीतांशुके आघातसे उन दैत्योंके सर्वाङ्ग हिमसे आप्लावित हो गये और वे जलकी ठण्डकसे ठिठुर गये। इस प्रकार वे गरमीरहित अग्निकी तरह दीख रहे थे। आकाशमण्डलमें विचरनेवाले उन दैत्योंके विचित्र विमानोंकी कान्ति विपरीत हो गयी और वे लड़खड़ाकर गिरने-पड़ने लगे॥ ११–२०॥<br><br>इस प्रकार जब मायावी मयदानवने आकाशमें उन दानवोंको वरुणके पाशद्वारा बँधे हुए तथा शीतल किरणोंद्वारा आच्छादित देखा, तब उसने चारों ओर सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकी सृष्टि की, जो शिलासमूहसे व्याप्त तथा ढाल-तलवारसे युक्त हो अट्टहास करनेवाली थी, जिसका अग्रभाग घने वृक्षोंसे आच्छादित होनेके कारण भयंकर था, जो कन्दराओंसे व्याप्त काननोंसे युक्त, सिंहों, व्याघ्रों, चिग्घाड़ते हुए गजयूथों और भेड़ियोंसे परिपूर्ण थी, जिसके वृक्ष वायुके झकोरेसे चक्कर काट रहे थे, जो अपने ही प्रयत्नसे निर्मित, घोर शब्द करनेवाली और आकाशमें स्वेच्छानुसार गमन करनेवाली थी। वह पार्वती-माया तलवारोंकी खनखनाहट, शिलाओंकी वृष्टि और गिरते हुए वृक्षोंसे देवसमूहोंका संहार करने लगी। उधर उसने दानवोंको जीवित भी कर दिया। |
* अध्याय १७६ * ७२५
| नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः।<br>असिभिश्चायसगणैः किरन् देवगणान् रणे॥ २६<br><br>साश्मयन्त्रायुधघना द्रुमपर्वतसङ्कटा।<br>अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव॥ २७<br><br>अश्मना प्रहताः केचिच्छिलाभिः शकलीकृताः।<br>नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चन॥ २८<br><br>तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणाविलम्।<br>निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ २९<br><br>स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत।<br>सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः॥ ३०<br><br>कालज्ञः कालमेघाभः समीक्ष्य कालमाहवे।<br>देवासुरविमर्दं तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः॥ ३१ | उसके प्रभावसे चन्द्रमा और वरुणकी दोनों मायाएँ अन्तर्हित हो गयीं। वह दैत्य रणभूमिमें देवगणोंके ऊपर तलवारों और लोहनिर्मित अन्यान्य अस्त्रोंका प्रयोग कर रहा था। उसने रणभूमिको शिलाओं, यन्त्रों, अस्त्रों, वृक्षों और पर्वतोंसे ऐसा सघनरूपसे पाट दिया कि वहाँकी पृथ्वी पर्वतोंकी तरह चलने-फिरनेके लिये दुर्गम हो गयी। उस समय कुछ देवता पत्थरोंसे आहत कर दिये गये, कुछ शिलाओंकी मारसे खण्ड-खण्ड कर दिये गये तथा कोई भी देवता ऐसा नहीं दीख रहा था, जो वृक्षसमूहोंसे ढक न गया हो। इस प्रकार एकमात्र भगवान् गदाधरको छोड़कर देवताओंकी उस सेनाके धनुष छिन्न-भिन्न हो गये, अस्त्रसमूह नष्ट हो गये और वह प्रयत्नहीन हो गयी। शोभाशाली परमेश्वर गदाधर युद्धस्थलमें उपस्थित होनेपर भी विचलित नहीं हुए तथा सहनशील होनेके कारण उन जगदीश्वरको क्रोध भी नहीं आया। काले मेघकी-सी कान्तिवाले कालके ज्ञाता श्रीहरि रणभूमिमें देवताओं और असुरोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे कालकी प्रतीक्षा करते हुए स्थित थे॥ २१—३१॥ |
| ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारुतौ।<br>चोदितौ विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम्॥ ३२<br><br>ताभ्यामुद्भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे।<br>दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह॥ ३३<br><br>सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः।<br>दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ॥ ३४<br><br>वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम्।<br>चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनिलानलौ॥ ३५<br><br>भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च।<br>दानवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः॥ ३६<br><br>वातस्कन्धापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके।<br>मायाबन्धे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधरे॥ ३७<br><br>निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने।<br>सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः॥ ३८<br><br>जये दशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये।<br>दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे॥ ३९<br><br>अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिवाकरे।<br>प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु॥ ४० | तदनन्तर रणभूमिमें भगवान्को अग्नि और वायु दीख पड़े। तब भगवान् विष्णुने उन्हें प्रेरित किया कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट कर डालो। तब वृद्धिकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए उन प्रचण्ड वेगशाली वायु और अग्निके प्रभावसे उस महासमरमें वह पार्वती माया जलकर भस्म हो गयी और सर्वथा नष्ट हो गयी। इसके बाद अग्निसे संयुक्त वायु और वायुसे संयुक्त अग्नि—दोनों पूरी शक्ति लगाकर युगान्तकी तरह दैत्यसेनाको भस्म करने लगे। आगे-आगे वायुदेव चलते थे, फिर वायुदेवके पीछे अग्निदेव चलते थे। इस प्रकार अग्नि और वायु उस दानव-सेनामें क्रीडा करते हुए विचरण कर रहे थे। दानवोंकी सेना जलती हुई इधर-उधर भागने लगी और विमान चारों ओर जलकर गिरने लगे। दानवोंके कंधे वायुसे अकड़ गये। इस प्रकार अग्निद्वारा अपना कर्म कर चुकनेपर मायाका बन्धन निवृत्त हो गया, भगवान् गदाधरकी स्तुति की जाने लगी, दैत्यगण प्रयत्नहीन हो गये, त्रिलोकी बन्धनसे मुक्त हो गयी, परम प्रसन्न हुए देवगण सब ओर 'ठीक है, ठीक हैं' ऐसा शब्द बोलने लगे। इन्द्रकी विजय और दैत्योंकी पराजय हो गयी, सभी दिशाएँ शुद्ध हो गयीं, धर्मका विस्तार होने लगा।' चन्द्रमाका आवरण हट गया, सूर्य अपने स्थानपर स्थित हो गये, तीनों लोक निश्चिन्त हो गये, लोगोंमें |
| ७२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु।<br>अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने॥ ४१<br>यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च।<br>लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु॥ ४२<br>भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्।<br>देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति॥ ४३<br>त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।<br>अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्यथे॥ ४४<br>लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु च।<br>प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु॥ ४५<br>प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे।<br>अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि॥ ४६<br>तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां कृतजयक्रिया। | चरित्रबल और बन्धुत्वकी भावना जाग्रत् हो गयी, सभी प्राणी यज्ञकी भावनासे पूर्ण हो गये, पापोंका प्रशमन हो गया, मृत्युका बन्धन सुदृढ़ हो गया, अग्निमें आहुतियाँ पड़ने लगीं, यज्ञोंमें शोभा पानेवाले देवगण स्वर्गकी प्राप्तिके हेतु मार्गदर्शन करने लगे, लोकपालगण सभी दिशाओंके लिये प्रस्थित हो गये, सिद्धोंकी भावना तपस्यामें संलग्न हो गयी, पापकर्मोंका अभाव हो गया, देवपक्षमें आनन्द मनाया जाने लगा। दैत्यपक्षमें उदासी छा गयी, धर्म तीन चरणोंसे स्थित हुआ और अधर्मका एक चरण रह गया, महाद्वार (यममार्ग) बंद हो गया और सन्मार्गका प्रचार होने लगा। सभी लोग अपने-अपने वर्णधर्म एवं आश्रमधर्ममें प्रवृत्त हो गये, राजाओंका दल प्रजाकी रक्षामें तत्पर होकर सुशोभित होने लगा, दानवरूपी तमोगुणके शान्त हो जानेपर जगत्में पापका विनाश हो गया। इस प्रकार अग्नि और वायुद्वारा युद्धकर्म किये जानेपर सभी विशाल लोक उन्हींसे युक्त हो गये और उन्हींके द्वारा यह विजयकी क्रिया सम्पन्न हुई॥ ३२-४६ १/२॥ |
| पूर्वं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्॥ ४७<br>कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत।<br>भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः॥ ४८<br>मन्दराद्रिप्रतीकाशो महारजतपर्वतः।<br>शतप्रहरणोदग्रः शतबाहुः शताननः॥ ४९<br>शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः।<br>पक्षे महति संवृद्धो निदाघ इव पावकः॥ ५०<br>धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुः संदष्टौष्ठपुटाननः।<br>त्रैलोक्यान्तरविस्तारि धारयन् विपुलं वपुः॥ ५१<br>बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान्।<br>ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टियुक्तान् बलाहकान्॥ ५२<br>तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोद्रग्रवर्चसम्।<br>दिधक्षन्तमिवायातं सर्वान् देवगणान् मृधे॥ ५३<br>तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशो दश।<br>संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥ ५४ | तदनन्तर दैत्योंके लिये वायु और अग्निद्वारा उत्पन्न किये गये महान् भयको सुनकर सर्वप्रथम कालनेमि नामसे विख्यात दानव (युद्धभूमिमें) दिखायी पड़ा। वह सुवर्णसे युक्त मन्दराचलके समान विशालकाय था, उसके मस्तकपर सूर्य-सरीखा मुकुट चमक रहा था, वह मधुर शब्द करते हुए बाजूबंदसे विभूषित था, उसके सौ बाहु, सौ मुख और सौ मस्तक थे, वह परम भयानक सौ अस्त्रोंको एक साथ धारण किये हुए था, इस प्रकार वह सौ शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था, दैत्योंके विशाल पक्षमें आगे बढ़ा हुआ वह दानव ग्रीष्मकालीन अग्निकी तरह दीख रहा था, उसके बाल धूमिल थे, उसकी दाढ़ी हरे रंगकी थी, वह दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए मुखसे युक्त था, इस प्रकार वह समूची त्रिलोकीमें विस्तृत विशाल शरीर धारण किये हुए था। वह भुजाओंसे आकाशको नापता हुआ, पैरोंसे पर्वतोंको फेंकता हुआ और मुखके निःश्वाससे जलयुक्त बादलोंको तितर-बितर करता हुआ चल रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी लाल आँखें तिरछी मढ़ी हुई थीं। वह मन्दराचलके समान परम तेजस्वी था। वह युद्धस्थलमें समस्त देवगणोंको जलाते हुएकी तरह आ रहा था। वह देवगणोंको भयभीत कर रहा था, दसों दिशाओंको आच्छादित किये हुए था और प्रलयकालमें प्रकट हुए प्यासे मृत्युकी |
| * अध्याय १७७ * | ७२७ |
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| सुतलेनोच्छ्रयवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा।<br>लम्बाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितवर्मणा॥ ५५<br><br>उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता।<br>दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन्॥ ५६<br><br>तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालचेष्टितम्।<br>वीक्षन्ते स्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः॥ ५७<br><br>तं वीक्षन्ति स्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्।<br>त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्॥ ५८<br><br>सोऽत्युच्छ्रयपुरःपादमरुताघूर्णिताम्बरः ।<br>प्रक्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः॥ ५९<br><br>स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।<br>कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मन्दरः॥ ६०<br><br>अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।<br>कालनेमिं समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम्॥ ६१ | तरह दीख रहा था। जो सुतलसे निकला था, जिसकी अंगुलियोंके पर्व (पोरु) विशाल थे, जो आभरणोंसे युक्त था, जिसका कवच कुछ हिल रहा था और जिसके दाहिने हाथका अग्रभाग उठा हुआ था, ऐसे शरीरसे युक्त कालनेमिने देवताओंद्धारा मारे गये दानवोंसे कहा— 'अब तुमलोग उठकर खड़े हो जाओ'॥ ४७—५६॥<br><br>इस प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके प्रति कालकी-सी भीषण चेष्टा करनेवाले उस कालनेमिकी ओर सभी देवता एकटक निहारने लगे। उस समय उनके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। इस प्रकार चलते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणी ऐसे देख रहे थे मानो तीन पगसे त्रिलोकीको नापनेके लिये चलते हुए दूसरे नारायण हों। अत्यन्त विशाल शरीरवाले कालनेमिके चलते हुए पैरोंकी वायुसे आकाश चक्कर-सा काटने लगता था, इस प्रकार वह असुर युद्धभूमिमें विचरण करता हुआ देवताओंको भयभीत करने लगा। तदुपरान्त रणक्षेत्रमें असुरराज मयने कालनेमिका आलिङ्गन किया। उस समय वह दैत्य विष्णुसहित मन्दराचलके समान सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता दूसरे कालकी तरह कालनेमिको आया हुआ देखकर अत्यन्त व्यथित हो गये॥ ५७—६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धे षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामययुद्धमें एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७६॥
एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! महान् तेजस्वी |
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| दानवानामनीकेषु कालनेमिर्महासुरः।<br>व्यवधर्त महातेजास्तपान्ते जलदो यथा॥ १<br><br>तं त्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः।<br>उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः पीत्वामृतमनुत्तमम्॥ २<br><br>ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः।<br>तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः॥ ३ | महासुर कालनेमि दानवोंकी सेनामें उसी प्रकार वृद्धिंगत होने लगा, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल उमड़ पड़ते हैं। तब वे सभी दानव-यूथपति कालनेमिको त्रिलोकीमें व्याप्त देखकर श्रमरहित हो गये और सर्वोत्तम अमृतका पान कर उठ खड़े हुए। उनके भय और त्रास समाप्त हो चुके थे। वे तारकामय-संग्राममें मय और तारकको आगे रखकर सदा विजयी होते रहे हैं। |
| ७२८ | * मत्स्यपुराण * |
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| रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः।<br>मन्त्रमभ्यसतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ॥ ४<br>प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम्।<br>ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरःसराः ॥ ५<br>ते तु सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः।<br>मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ६<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरलम्बावुभावपि।<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च किशोराख्यस्तथैव च ॥ ७<br>स्वर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्त्रयोधी महासुरः।<br>एतेऽस्त्रवेदिनः सर्वे सर्वे तपसि सुस्थिताः ॥ ८<br>दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिं तमुद्धतम्।<br>ते गदाभिर्भुशुण्डीभिश्चक्रैरथ परश्वधैः ॥ ९<br>कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः।<br>अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दारुणैः ॥ १०<br>पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च परिघैश्चोत्तमयसैः।<br>घातनीभिः सुगुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ ११<br>युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्मार्गणैरूग्रताडितैः।<br>दोर्भिश्चायतदीर्घैश्च प्रासैः पाशैश्च मूर्च्छनैः ॥ १२<br>भुजङ्गवक्त्रैर्लोलिहानैर्विसर्पद्भिश्च सायकैः।<br>वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ॥ १३<br>विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः।<br>दैत्याः संदीप्तमनसः प्रगृहीतशरासनाः ॥ १४<br>ततः पुरस्कृत्य तदा कालनेमिं महाहवे।<br>सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां रुरुचे चमूः ॥ १५<br>द्यौर्निमीलितसर्वाङ्गा घनानीलाम्बुदागमे। | युद्धाभिलाषी वे दानव युद्धभूमिमें उपस्थित होकर शोभा पा रहे थे। उनमें कुछ परस्पर मन्त्रणा कर रहे थे, कुछ व्यूहकी रचना कर रहे थे और कुछ रक्षकके रूपमें थे। उन सबका कालनेमि दानवके प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया। तत्पश्चात् वहाँ मयदानवके जितने मुख्य-मुख्य युद्धके अगुआ थे, वे सभी भय छोड़कर हर्षपूर्वक युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुए। फिर मय, तारक, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, खर, लम्ब, बलिकाय पुत्र अरिष्ट, किशोर और देवरूपसे प्रसिद्ध मुखसे युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु—ये सभी अस्त्रवेत्ता थे और सभी तपोबलसे सम्पन्न थे। वे सभी सफल प्रयत्नवाले दानव उस उद्दण्ड कालनेमिके निकट गये। गदा, भुशुण्डि, चक्र, कुठार, काल-सदृश मुसल, क्षेपणीय (ढेलवाँस), मुद्गर, पर्वत-सदृश पत्थर, भीषण गण्डशैल, पट्टिश, भिन्दिपाल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ, संहारकारिणी बड़ी-बड़ी तोप, यन्त्र, हाथोंसे छूटनेपर भयानक चोट करनेवाले बाण, लम्बे चमकीले भाले, पाश, मूर्छन (बेहोश करनेका यन्त्र), रेंगते हुए जीभ लपलपानेवाले सर्पमुख बाण, फेंकने योग्य वज्र, चमचमाते हुए तोमर, म्यानसे बाहर निकली हुई तीखी तलवार और तीखे निर्मल शूलोंसे युक्त तथा धनुष धारण करनेवाले उन दैत्योंके मन उत्साहसे सम्पन्न थे, वे उस महासमरमें कालनेमिको आगे करके खड़े हो गये। उस समय देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त दैत्योंकी वह सेना इस प्रकार शोभा पा रही थी मानो सघन नील बादलोंके छा जानेपर सर्वथा आच्छादित हुआ आकाशमण्डल हो॥ १-१५ १/२॥ |
| देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता ॥ १६<br>उपेतसितकृष्णाभ्यां ताराभ्यां चन्द्रसूर्ययोः।<br>वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ॥ १७<br>तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी।<br>यमेन्द्रवरुणैर्गुप्ता धनदेन च धीमता ॥ १८<br>सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा।<br>सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ॥ १९ | दूसरी ओर इन्द्रद्वारा सुरक्षित देवताओंकी सेना भी अट्टहास कर रही थी। वह चन्द्रमा और सूर्यकी श्वेत और कृष्ण ताराओंसे युक्त, वायुकी-सी वेगशालिनी, सौम्य और तारागणको पताकारूपमें धारण करनेवाली थी। उसके वस्त्र बादलोंसे संयुक्त थे। वह ग्रहों और नक्षत्रोंका उपहास-सी कर रही थी। बुद्धिमान् कुबेर, यम, इन्द्र और वरुण उसकी रक्षा कर रहे थे। वह प्रज्वलित अग्निरूप नेत्रोंवाली और नारायणके आश्रित थी। इस प्रकार यक्षों एवं गन्धर्वोंसे युक्त सागरसमूहकी तरह भयंकर देवताओंकी वह विशाल दिव्य सेना अस्त्र |
* अध्याय १७७ * । ७२९
| रजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी।<br>तयोश्चम्वोस्तदानीं तु बभूव स समागमः॥ २०<br>द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये।<br>तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्॥ २१<br>क्षमापराक्रमपरं दर्पस्य विनयस्य च।<br>निष्क्रमुर्बलाभ्यां तु भीमास्तत्र सुरासुराः॥ २२<br>पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः।<br>ताभ्यां बलाभ्यां संहृष्टाश्चेरूस्ते देवदानवाः॥ २३<br>वनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः। | धारण किये हुए शोभा पा रही थी। उस समय उन दोनों सेनाओंका ऐसा समागम हुआ जैसे प्रलयकालमें पृथ्वी और आकाशमण्डलका संयोग होता है। देवताओं और दानवोंसे व्याप्त तथा दर्प और विनयकी क्षमा और पराक्रमसे युक्त वह युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ दोनों सेनाओंमेंसे कुछ ऐसे भयंकर देवता और राक्षस निकल रहे थे, जो पूर्वी एवं पश्चिमी सागरोंसे निकलते हुए संक्षुब्ध बादलों-जैसे प्रतीत हो रहे थे। उन दोनों सेनाओंसे निकले हुए वे देवता और दानव इस प्रकार हर्षपूर्वक विचरण कर रहे थे, मानो खिले हुए पुष्पोंसे युक्त पर्वतीय वनोंसे गजराज निकल रहे हों॥ १६-२३ १/२ ॥ |
| समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुborder/रनेकशः॥ २४<br>स शब्दो द्यां भुवं खं च दिशश्च समपूरयत्।<br>ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च॥ २५<br>दुन्दुभीनां च निनदो दैत्यमन्तर्दधुः स्वनम्।<br>तेऽन्योन्यमभिसम्प्रेत्यः पातयन्तः परस्परम्॥ २६<br>बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः।<br>देवास्तु चाशनिं घोरं परिघांश्चोत्तमायसान्॥ २७<br>निस्त्रिंशान् ससृजुः संख्ये गदा गुर्वीश्च दानवाः।<br>गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः॥ २८<br>परिपेतर्भृशं केचित् पुनः केचित् तु जघ्निरे।<br>ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः॥ २९<br>समीयुस्ते सुसंरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे।<br>संवर्तमानाः समरे संदष्टौष्ठपुटाननाः॥ ३०<br>रथा रथैर्निरुद्ध्यन्ते पादाताश्च पदातिभिः।<br>तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्॥ ३१<br>नभोनभश्व हि यथा नभस्यैर्जलदस्वनैः।<br>बभञ्जुस्तु रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः॥ ३२<br>सम्बाधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः।<br>अन्योन्यमन्ये समरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दंशिताः॥ ३३<br>संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रापि चर्मिणः। | तदनन्तर नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं और अनेकों शङ्ख बज उठे। वह शब्द अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश और दिशाओंमें व्याप्त हो गया। धनुषोंकी प्रत्यञ्चा चढ़ानेके शब्द तथा सैनिकोंके कोलाहल होने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियोंका निनाद दैत्योंके वाद्यशब्दको पराभूत कर दिया। फिर तो वे एक-दूसरेपर टूट पड़े और परस्पर एक-दूसरेको मारकर गिराने लगे। कुछ द्वन्द्व-युद्ध करनेवाले वीर अपनी भुजाओंसे शत्रु की भुजाओंको मरोड़ दिये। रणभूमिमें देवगण भयंकर अशनि और उत्तम लोहेके बने हुए परिघोंसे प्रहार कर रहे थे तो दानवगण भारी गदाओं और खड्गोंका प्रयोग कर रहे थे। गदाके आघातसे बहुतोंके अङ्ग चूर हो गये। कुछ लोग तो बाणोंकी चोटसे टुकड़े-टुकड़े हो गये। कुछ अत्यन्त घायल होकर धराशायी हो गये। कुछ पुनः उठकर प्रहार करने लगे। तदनन्तर वे क्रोधसे विक्षुब्ध हो रणभूमिमें घोड़े जुते रथों और शीघ्रगामी विमानोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये। युद्ध करते समय वे क्रोधवश अपने होंठोंको दाँतों-तले दबाये हुए थे। इस प्रकार रथ रथोंके साथ तथा पैदल पैदलोंके साथ उलझ गये। शब्द करनेवाले उन रथोंका ऐसा भयंकर शब्द होने लगा मानो भाद्रपदमासमें बादल गरज रहे हों। कुछ लोग रथोंको तोड़ रहे थे और कुछ लोग रथोंके धक्केसे रौंदे जा चुके थे। दूसरे रथ मार्गके अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये। कुछ कवचधारी वीर समरभूमिमें एक-दूसरेको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक देते थे। उस समय उनके आभूषण खनखना रहे थे। वहाँ कुछ ढाल धारण करनेवाले दूसरे अस्त्रोंद्वारा भी विपक्षियोंपर प्रहार कर रहे थे॥ २४-३३ १/२ ॥ |