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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१६- श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण

* अध्याय १३ * ५५


सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
दक्षस्य यज्ञे वितते प्रभूतवरदक्षिणे।<br>समाहूतेषु देवेषु प्रोवाच पितरं सती ॥ १२<br><br>किमर्थं तात भर्ता मे यज्ञेऽस्मिन्नाभिमन्त्रितः।<br>अयोग्य इति तामाह दक्षो यज्ञेषु शूलभृत्॥ १३<br><br>उपसंहारकृद् रुद्रस्तेनामङ्गलभागयम्।<br>चुकोपाथ सती देहं त्यक्ष्यामीति त्वदुद्भवम्॥ १४<br><br>दशानां त्वं च भविता पितॄणामेकपुत्रकः।<br>क्षत्रियत्वेऽश्वमेधे च रुद्रात् त्वं नाशमेष्यसि ॥ १५<br><br>इत्युक्त्वा योगमास्थाय स्वदेहोद्भवतेजसा।<br>निर्दहन्ती तदात्मानं सदेवासुरकिन्नरैः ॥ १६<br><br>किं किमेतदिति प्रोक्ता गन्धर्वगणगुह्यकैः।<br>उपगम्याब्रवीद् दक्षः प्रणिपत्याथ दुःखितः ॥ १७<br><br>त्वमस्य जगतो माता जगत्सौभाग्यदेवता।<br>दुहितृत्वं गता देवि ममानुग्रहकाम्यया ॥ १८<br><br>न त्वया रहितं किंचिद् ब्रह्माण्डे सचराचरम्।<br>प्रसादं कुरु धर्मज्ञे न मां त्यक्तुमिहार्हसि ॥ १९<br><br>प्राह देवी यदारब्धं तत् कार्यं मे न संशयः।<br>किन्त्ववश्यं त्वया मर्त्ये हतयज्ञेन शूलिना ॥ २०<br><br>प्रसादे लोकसृष्ट्यर्थं तपः कार्यं ममान्तिके।<br>प्रजापतिस्त्वं भविता दशानामङ्गजोऽप्यलम्॥ २१<br><br>मदंशेनाङ्गनाषष्टिर्भविष्यन्त्यङ्गजास्तव ।<br>मत्संनिधौ तपः कुर्वन् प्राप्स्यसे योगमुत्तमम् ॥ २२<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् दक्षः केषु केषु मयानघे।<br>तीर्थेषु च त्वं द्रष्टव्या स्तोतव्या कैश्च नामभिः ॥ २३ऋषियो! प्राचीनकालमें दक्षने एक विशाल यज्ञका अनुष्ठान किया था; उसमें प्रचुर धनराशि दक्षिणाके रूपमें बाँटी गयी थी तथा सभी देवता (अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये) आमन्त्रित किये गये थे। (परंतु द्वेषवश शिवजीको निमन्त्रण नहीं भेजा गया था। तब वहाँ अपने पतिका भाग न देखकर) सतीने पिता दक्षसे पूछा—'पिताजी! अपने इस विशाल यज्ञमें आपने मेरे पतिदेवको क्यों नहीं आमन्त्रित किया?' तब दक्षने सतीसे कहा—'बेटी! तुम्हारा पति त्रिशूल धारण कर रुद्ररूपसे जगत्‌का उपसंहार करता है, जिससे वह अमङ्गल-भागी है, इस कारण वह यज्ञोंमें भाग पानेके लिये अयोग्य है।' यह सुनकर सती क्रोधसे तमतमा उठीं और बोलीं—'तात! अब मैं तुम्हारे पापी शरीरसे उत्पन्न हुए अपनी देहका परित्याग कर दूँगी। तुम दस पितरोंके एकमात्र पुत्र होगे और क्षत्रिय-योनिमें जन्म लेनेपर अश्वमेध-यज्ञके अवसरपर रुद्रद्वारा तुम्हारा विनाश हो जायगा।' ऐसा कहकर सतीने योगबलका आश्रय लिया और स्वतः शरीरसे प्रकट हुए तेजसे अपने शरीरको जलाना प्रारम्भ कर दिया। तब देवता, असुर और किन्नरोंके साथ गन्धर्व एवं गुह्यकगण 'अरे! यह क्या हो रहा है? यह क्या हो रहा है?' इस प्रकार हो-हल्ला मचाने लगे। यह देखकर दक्ष भी दुःखी हो सतीके निकट गये और प्रणाम करके बोले—'देवि! तुम इस जगत्‌की जननी तथा जगत्‌को सौभाग्य प्रदान करनेवाली देवता हो। तुम मुझपर अनुग्रह करनेकी कामनासे ही मेरी पुत्री होकर अवतीर्ण हुई हो। धर्मज्ञे! इस निखिल ब्रह्माण्डमें—समस्त चराचर वस्तुओंमें कुछ भी तुमसे रहित नहीं है अर्थात् सबमें तुम्हारी सत्ता व्याप्त है। मुझपर कृपा करो। इस अवसरपर तुम्हें मेरा परित्याग नहीं करना चाहिये।' (दक्षके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर) देवीने कहा—'दक्ष! मैंने जिस कार्यका आरम्भ कर दिया है, उसे तो निःसंदेह अवश्य ही पूर्ण करूँगी, किंतु त्रिशूलधारी शिवजीद्वारा यज्ञ-विध्वंस हो जानेपर उनको प्रसन्न करनेके लिये तुम मृत्युलोकमें लोक-सृष्टिकी इच्छासे मेरे निकट तपस्या करना। उसके प्रभावसे तुम प्रचेता नामके दस पिताओंके एकमात्र पुत्र होनेपर भी प्रजापति हो जाओगे। उस समय मेरे अंशसे तुम्हें साठ कन्याएँ उत्पन्न होंगी तथा मेरे समीप तपस्या करते हुए तुम्हें उत्तम योगकी प्राप्ति हो जायगी।' ऐसा कहे जानेपर दक्षने पूछा—'पाप-रहित देवि! इस कार्यके निमित्त मुझे किन-किन तीर्थस्थानोंमें जाकर तुम्हारा दर्शन करना चाहिये तथा किन-किन नामोंद्वारा तुम्हारा स्तवन करना चाहिये'॥ १२—२३॥

५६ * मत्स्यपुराण *


देव्युवाचदेवीने कहा—
सर्वदा सर्वभूतेषु द्रष्टव्या सर्वतो भुवि।<br>सर्वलोकेषु यत् किंचिद् रहितं न मया विना॥ २४<br>तथापि येषु स्थानेषु द्रष्टव्या सिद्धिमीप्सुभिः।<br>स्मर्तव्या भूतिकामैर्वा तानि वक्ष्यामि तत्त्वतः॥ २५<br>वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिङ्गधारिणी।<br>प्रयागे ललिता देवी कामाक्षी गन्धमादने॥ २६<br>मानसे कुमुदा नाम विश्वकाया तथाम्बरे॥ २७<br>गोमन्ते गोमती नाम मन्दरे कामचारिणी।<br>मदोत्कटा चैत्ररथे जयन्ती हस्तिनापुरे॥ २८<br>कान्यकुब्जे तथा गौरी रम्भा मलयपर्वते।<br>एकाम्रके कीर्तिमती विश्वा विश्वेश्वरे विदुः॥ २९<br>पुष्करे पुरुहूतेति केदारे मार्गदायिनी।<br>नन्दा हिमवतः पृष्ठे गोकर्णे भद्रकर्णिका॥ ३०<br>स्थाण्वीश्वरे भवानी तु बिल्वके बिल्वपत्रिका।<br>श्रीशैले माधवी नाम भद्रा भद्रेश्वरे तथा॥ ३१<br>जया वराहशैले तु कमला कमलालये।<br>रुद्रकोट्यां च रुद्राणी काली कालंजरे गिरौ॥ ३२<br>महालिङ्गे तु कपिला मर्कंटे मुकुटेश्वरी।<br>शालग्रामे महादेवी शिवलिङ्गे जलप्रिया॥ ३३<br>मायापुर्यां कुमारी तु संताने ललिता तथा।<br>उत्पलाक्षी सहस्राक्षे कमलाक्षे महोत्पला॥ ३४<br>गङ्गायां मङ्गला नाम विमला पुरुषोत्तमे।<br>विपाशायाममोघाक्षी पाटला पुण्ड्रवर्धने॥ ३५<br>नारायणी सुपार्श्वे तु विकूटे भद्रसुन्दरी।<br>विपुले विपुला नाम कल्याणी मलयाचले॥ ३६<br>कोटवी कोटितीर्थे तु सुगन्धा माधवे वने।<br>गोदाश्रमे त्रिसंध्या तु गङ्गाद्वारे रतिप्रिया॥ ३७<br>शिवकुण्डे शिवानन्दा नन्दिनी देविकातटे।<br>रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृन्दावने वने॥ ३८दक्ष! यद्यपि भूतलपर समस्त प्राणियोंमें सब ओर सर्वदा मेरा ही दर्शन करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें जो कुछ पदार्थ है, वह सब मुझसे रहित नहीं है, अर्थात् सभी पदार्थोंमें मेरी सत्ता विद्यमान है, तथापि सिद्धिकी कामनावाले अथवा ऐश्वर्याभिलाषी जनोंद्वारा जिन-जिन तीर्थस्थानोंमें मेरा दर्शन और स्मरण करना चाहिये, उनका मैं यथार्थरूपसे वर्णन कर रही हूँ। मैं वाराणसीमें विशालाक्षी, नैमिषारण्यमें लिङ्गधारिणी, प्रयागमें ललितादेवी, गन्धमादन पर्वतपर कामाक्षी, मानसरोवरतीर्थमें कुमुदा, अम्बरमें विश्वकाया, गोमन्त (गोआ)-में गोमती, मन्दराचलपर कामचारिणी, चैत्ररथवनमें मदोत्कटा, हस्तिनापुरमें जयन्ती, कान्यकुब्जमें गौरी, मलयपर्वतपर रम्भा, एकाम्रक (भुवनेश्वर)-तीर्थमें कीर्तिमती, विश्वेश्वरमें विश्वा, पुष्करमें पुरुहूता, केदारतीर्थमें मार्गदायिनी, हिमवान्‌के पृष्ठभागमें नन्दा, गोकर्णतीर्थमें भद्रकर्णिका, स्थानेश्वर (थानेश्वर)-में भवानी, बिल्वतीर्थमें बिल्वपत्रिका, श्रीशैलपर माधवी, भद्रेश्वरतीर्थमें भद्रा, वराहशैलपर जया, कमलालयतीर्थमें कमला, रुद्रकोटिमें रुद्राणी, कालञ्जर गिरिपर काली, महालिङ्गतीर्थमें कपिला, मर्कटमें मुकुटेश्वरी, शालग्रामतीर्थमें महादेवी, शिवलिङ्गमें जलप्रिया, मायापुरी (ऋषिकेश)-में कुमारी, संतानतीर्थमें ललिता, सहस्राक्षतीर्थमें उत्पलाक्षी, कमलाक्षतीर्थमें महोत्पला, गङ्गामें मङ्गला, पुरुषोत्तमतीर्थ (जगन्नाथपुरी)-में विमला, विपाशामें अमोघाक्षी, पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, सुपार्श्वतीर्थमें नारायणी, विकूटमें भद्रसुन्दरी, विपुलमें विपुला, मलयाचलपर कल्याणी, कोटितीर्थमें कोटवी, माधव-वनमें सुगन्धा, गोदाश्रममें त्रिसंध्या, गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में रतिप्रिया, शिवकुण्डतीर्थमें शिवानन्दा, देविका (पंजाबकी देवनदी)-के तटपर नन्दिनी, द्वारकापुरीमें रुक्मिणी और वृन्दावनमें राधा हूँ॥ २४-३८॥
देवकी मथुरायां तु पाताले परमेश्वरी।<br>चित्रकूटे तथा सीता विन्ध्ये विन्ध्याधिवासिनी॥ ३९<br>सह्याद्रावेकवीरा तु हरिश्चन्द्रे तु चन्द्रिका।<br>रमणा रामतीर्थे तु यमुनायां मृगावती॥ ४०<br>करवीरे महालक्ष्मीरुमादेवी विनायके।<br>अरोग्रा वैद्यनाथे तु महाकाले महेश्वरी॥ ४१<br>अभयेत्युष्णातीर्थेषु चामृता विन्ध्यकन्दरे।<br>माण्डव्ये माण्डवी नाम स्वाहा माहेश्वरे पुरे॥ ४२मैं मथुरापुरीमें देवकी, पातालमें परमेश्वरी, चित्रकूटमें सीता, विन्ध्यपर्वतपर विन्ध्याधिवासिनी, सह्याद्रिपर एकवीरा, हरिश्चन्द्रतीर्थमें चन्द्रिका, रामतीर्थमें रमणा, यमुनामें मृगावती, करवीर (कोल्हापुर)-में महालक्ष्मी, विनायकतीर्थमें उमादेवी, वैद्यनाथमें अरोग्रा, महाकालमें महेश्वरी, उष्णतीर्थोंमें अभया, विन्ध्यकन्दरमें अमृता, माण्डव्यतीर्थमें माण्डवी, माहेश्वरपुरमें स्वाहा,
  • अध्याय १३ *
    ५७

| छागलाण्डे प्रचण्डा तु चण्डिका मकरन्दके।<br>सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती॥ ४३<br>देवमाता सरस्वत्यां पारावारतटे मता।<br>महालये महाभागा पयोष्ण्यां पिङ्गलेश्वरी॥ ४४<br>सिंहिका कृतशौचे तु कार्त्तिकेये यशस्करी।<br>उत्पलावर्तके लोला सुभद्रा शोणसंगमे॥ ४५<br>माता सिद्धपुरे लक्ष्मीरङ्गना भरताश्रमे।<br>जालंधरे विश्वमुखी तारा किष्किन्धपर्वते॥ ४६<br>देवदारुवने पुष्टिर्मेधा काश्मीरमण्डले।<br>भीमा देवी हिमाद्रौ तु पुष्टिर्विश्वेश्वरे तथा॥ ४७<br>कपालमोचने शुद्धिर्माता कायावरोहणे।<br>शङ्खोद्धारे ध्वनिर्माता धृतिः पिण्डारके तथा॥ ४८<br>काला तु चन्द्रभागायामच्छोदे शिवकारिणी।<br>वेणायाममृता नाम बदर्यामुर्वशी तथा॥ ४९<br>औषधी चोत्तरकुरौ कुशद्वीपे कुशोदका।<br>मन्मथा हेमकूटे तु मुकुटे सत्यवादिनी॥ ५०<br>अश्वत्थे वन्दनीया तु निधिर्वैश्रवणालये।<br>गायत्री वेदवदने पार्वती शिवसंनिधौ॥ ५१<br>देवलोके तथेन्द्राणी ब्रह्मास्येषु सरस्वती।<br>सूर्यबिम्बे प्रभा नाम मातृणां वैष्णवी मता॥ ५२<br>अरुंधती सतीनां तु रामांसु च तिलोत्तमा।<br>चित्ते ब्रह्मकला नाम शक्तिः सर्वशरीरिणाम्॥ ५३ | छागलाण्डमें प्रचण्डा, मकरन्दमें चण्डिका, सोमेश्वरतीर्थमें वरारोहा, प्रभासमें पुष्करावती, सरस्वतीमें देवमाता, समुद्रतटवर्ती महालयतीर्थमें महाभागा, पयोष्णी-(पैनगङ्गा)-में पिङ्गलेश्वरी, कृतशौचतीर्थमें सिंहिका, कार्त्तिकेयमें यशस्करी, उत्पलावर्तकमें लोला, शोणसंगममें सुभद्रा, सिद्धपुरमें लक्ष्मी माता, भरताश्रममें अङ्गना, जालन्धरपर्वतपर विश्वमुखी, किष्किन्धापर्वतपर तारा, देवदारुवनमें पुष्टि, काश्मीरमण्डलमें मेधा, हिमगिरिपर भीमादेवी, विश्वेश्वरमें पुष्टि, कपालमोचनमें शुद्धि, कायावरोहण (कारावन, गुजरात)-में माता, शङ्खोद्धारमें ध्वनि, पिण्डारक-क्षेत्रमें धृति, चन्द्रभागा (चनाब)-में काला, अच्छोदमें शिवकारिणी, वेणामें अमृता, बदरीतीर्थमें उर्वशी, उत्तरकुरुमें औषधी, कुशद्वीपमें कुशोदका, हेमकूटपर्वतपर मन्मथा, मुकुटमें सत्यवादिनी, अश्वत्थतीर्थमें वन्दनीया, वैश्रवणालयमें निधि, वेदवदनमें गायत्री, शिव-सन्निधिमें पार्वती, देवलोकमें इन्द्राणी, ब्रह्माके मुखोंमें सरस्वती, सूर्य-बिम्बमें प्रभा, माताओंमें वैष्णवी, सतियोंमें अरुन्धती, सुन्दरी स्त्रियोंमें तिलोत्तमा, चित्तमें ब्रह्मकला और अखिल शरीरधारियोंमें शक्ति-नामसे निवास करती हूँ।*॥ ३९–५३॥ |
| एतदुद्देशतः प्रोक्तं नामाष्टशतमुत्तमम्।<br>अष्टोत्तरं च तीर्थानां शतमेतदुदाहृतम्॥ ५४ | इस प्रकार मैंने अपने एक सौ आठ श्रेष्ठ नामोंका वर्णन कर दिया। इसीके साथ एक सौ आठ तीर्थोंका भी नामोल्लेख हो गया। |
| यः स्मरेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>एषु तीर्थेषु यः कृत्वा स्नानं पश्यति मां नरः॥ ५५<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः कल्पं शिवपुरे वसेत्। | जो मनुष्य मेरे इन नामोंका स्मरण करेगा अथवा दूसरेके मुखसे श्रवणमात्र कर लेगा, वह अपने निखिल पापोंसे मुक्त हो जायगा। इसी प्रकार जो मनुष्य इन उपर्युक्त तीर्थोंमें स्नान करके मेरा दर्शन करेगा, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर कल्पपर्यन्त शिवपुरमें निवास करेगा |
| यस्तु मत्परमं कालं करोत्येतेषु मानवः॥ ५६<br>स भित्त्वा ब्रह्मसदनं पदमभ्येति शाङ्करम्। | तथा जो मानव इन तीर्थोंमें मेरे इस परम अन्तिम समयका स्मरण करेगा, वह ब्रह्माण्डका भेदन करके शङ्करजीके परम पद (शिवलोक)-को प्राप्त हो जायगा। |
| नाम्नामष्टशतं यस्तु श्रावयेच्छिवसन्निधौ॥ ५७<br>तृतीयायामथाष्टम्यां बहुपुत्रो भवेन्नरः। | जो मनुष्य तृतीया अथवा अष्टमी तिथिके दिन शिवजीके संनिकट जाकर मेरे इन एक सौ आठ नामोंका पाठ करके उन्हें सुनायेगा, वह बहुत-से पुत्रोंवाला हो जायगा। |
| गोदाने श्राद्धदाने वा अहन्यहनि वा बुधः॥ ५८<br>देवार्चनविधौ विद्वान् पठन् ब्रह्माधिगच्छति। | जो विद्वान् गोदान, श्राद्धदान अथवा प्रतिदिन देवार्चनके समय इन नामोंका पाठ करेगा, वह परब्रह्म-पदको प्राप्त हो जायगा। |
| एवं वदन्ती सा तत्र ददाहात्मानमात्मना॥ ५९ | इस प्रकारकी बातें कहती हुई सतीने दक्षके उस यज्ञमण्डपमें अपने-आप ही अपने शरीरको जलाकर भस्म |


*यह शक्तिपीठ-वर्णन पद्म, देवीभागवत एवं स्कन्दादि अन्य ४ पुराणोंमें भी यों ही है। इनकी पाठशुद्धि तथा स्थानोंके परिचयपर डी० सी० सरकार तथा नरपति मिश्रके शोधप्रबन्ध श्रेष्ठ हैं।

५८* मत्स्यपुराण *

| स्वायम्भुवोऽपि कालेन दक्षः प्राचेतसोऽभवत्।<br>पार्वती साभवद् देवी शिवदेहार्धधारिणी ॥ ६०<br>मेनागर्भसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।<br>अरुन्धती जपन्त्येतत् प्राप योगमनुत्तमम्॥ ६१<br>पुरूरवाश्च राजर्षिर्लोके व्यजेयतामगात्।<br>ययातिः पुत्रलाभं च धनलाभं च भार्गवः ॥ ६२<br>तथान्ये देवदैत्याश्च ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।<br>वैश्याः शूद्राश्च बहवः सिद्धिमीयैर्यथेप्सिताम् ॥ ६३<br>यत्रैतल्लिखितं तिष्ठेत् पूज्यते देवसंनिधौ।<br>न तत्र शोको दौर्गत्यं कदाचिदपि जायते ॥ ६४ | कर दिया। पुनः यथोक्त समय आनेपर ब्रह्माके पुत्र दक्ष प्रचेताओैंके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा सतीदेवी शिवजीके अर्द्धाङ्गमें विराजमान होनेवाली पार्वतीरूपसे मेनाके गर्भसे प्रादुर्भूत हुई, जो भुक्ति (भोग) और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाली हैं। इन्हीं पूर्वोक्त एक सौ आठ नामोंका जप करनेसे अरुन्धतीने सर्वोत्तम योगसिद्धि प्राप्त की, राजर्षि पुरूरवा लोकमें अजेय हो गये, ययातिने पुत्र-लाभ किया और भृगुनन्दनको धन-सम्पत्तिकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार अन्यान्य बहुत-से देवता, दैत्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंने भी (इन नामोंके जपसे) मनोवाञ्छित सिद्धियाँ प्राप्त कीं। जहाँ यह नामावली लिखकर रखी रहती है अथवा किसी देवताके संनिकट रखकर इसकी पूजा होती है, वहाँ कभी शोक और दुर्गर्तिका प्रवेश नहीं होता ॥ ५४—६४ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पितृवंशान्वये गौरीनामाष्टोत्तरशतकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितरोंके वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें गौरीनामाष्टोत्तरशतकथन नामक तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! मरीचिके वंशज
लोकाः सोमपथा नाम यत्र मारीचनन्दनाः।<br>वर्तन्ते देवपितरो देवा यान् भावयन्त्यलम् ॥ १देवताओंके पितृगण जहाँ निवास करते हैं, वे लोक सोमपथके नामसे विख्यात हैं। देवतालोग उन पितरोंका ध्यान किया करते हैं।
अग्निष्वात्ता इति ख्याता यज्वानो यत्र संस्थिताः।<br>अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी ॥ २वे यज्ञपरायण पितृगण अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं। जहाँ वे रहते हैं, वहीं अच्छोदा* नामकी एक नदी प्रवाहित होती है, जो उन्हीं पितरोंकी मानसी कन्या है।
अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा।<br>अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ३प्राचीनकालमें पितरोंने वहीं एक अच्छोद नामक सरोवरका भी निर्माण किया था। पूर्वकालमें अच्छोदाने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की।
आजग्मुः पितरस्तुष्टाः किल दातुं च तां वरम्।<br>दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्यमाल्यानुलेपनाः ॥ ४उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर पितृगण उसे वर प्रदान करनेके लिये उसके समीप पधारे। वे सब-के-सब पितर दिव्यरूपधारी थे। उनके शरीरपर दिव्य सुगन्धका अनुलेप लगा हुआ था तथा गलेमें दिव्य पुष्पमाला लटक रही थी।
सर्वे युवानो बलिनः कुसुमायुधसंनिभाः।<br>तन्मध्येऽमावसुं नाम पितरं वीक्ष्य साङ्गना ॥ ५वे सभी नवयुवक, बलसम्पन्न एवं कामदेवके सदृश सौन्दर्यशाली थे। उन पितरोंमें अमावसु नामक पितरको

* इस अध्यायके अन्तमें वर्णित अच्छोद सरोवर और अच्छोदा नदी—दोनों कश्मीरमें हैं तथा परम प्रसिद्ध हैं। सरोवरको आजकल वहाँके लोग 'अच्छावत' कहते हैं।

  • अध्याय १४ *
    ५९

| वव्रे वरार्थिनी सङ्गं कुसुमायुधपीडिता ।<br>योगाद् भ्रष्टा तु सा तेन व्यभिचारेण भामिनी ॥ ६<br><br>धरां तु नास्पृशत् पूर्वं पपाताथ भूतले ।<br>तिथावमावसुर्यस्यामिच्छां चक्रे न तां प्रति ॥ ७<br><br>धैर्येण तस्य सा लोकैरमावास्येति विश्रुता ।<br>पितॄणां वल्लभा तस्मात्तस्यामक्षयकारकम् ॥ ८<br><br>अच्छोदाधोमुखी दीना लज्जिता तपसः क्षयात् ।<br>सा पितॄन् प्रार्थयामास पुरे चात्मप्रसिद्धये ॥ ९<br><br>विलप्यमाना पितृभिरिदमुक्ता तपस्विनी ।<br>भविष्यमर्थमालोक्य देवकार्यं च ते तदा ॥ १०<br><br>इदमूचुर्महाभागाः प्रसादशुभया गिरा ।<br>दिवि दिव्यशरीरेण यत्किञ्चित् क्रियते बुधैः ॥ ११<br><br>तेनैव तत्कर्मफलं भुज्यते वरवर्णिनि ।<br>सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे ॥ १२<br><br>तस्मात् त्वं पुत्रि तपसः प्राप्स्यसे प्रेत्य तत्फलम् ।<br>अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा ॥ १३<br><br>व्यतिक्रमात् पितॄणां त्वं कष्टं कुलमवाप्स्यसि ।<br>तस्माद् राज्ञो वसोः कन्या त्वमवश्यं भविष्यसि ॥ १४<br><br>कन्या भूत्वा च लोकान् स्वान् पुनराप्स्यसि दुर्लभान् ।<br>पराशरस्य वीर्येण पुत्रमेकमवाप्स्यसि ॥ १५<br><br>द्वीपे तु बदरीप्राये बादरायणमच्युतम् ।<br>स वेदमेकं बहुधा विभजिष्यति ते सुतः ॥ १६<br><br>पौरवस्यात्मजौ द्वौ तु समुद्रांशस्य शांतनोः ।<br>विचित्रवीर्यस्तनयस्तथा चित्राङ्गदो नृपः ॥ १७<br><br>इमावुत्पाद्य तनयौ क्षेत्रजावस्य धीमतः ।<br>प्रौष्ठपद्यष्टकारूपा पितृलोके भविष्यसि ॥ १८ | देखकर वरकी अभिलाषावाली सुन्दरी अच्छोदा व्यग्र हो उठी और उनके साथ रहनेकी याचना करने लगी। इस मानसिक कदाचारके कारण सुन्दरी अच्छोदा योगसे भ्रष्ट हो गयी और (उसके परिणामस्वरूप वह स्वर्गलोकसे) भूतलपर गिर पड़ी। उसने पहले कभी पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया था। जिस तिथिको अमावसुने अच्छोदाके साथ निवास करनेकी अनिच्छा प्रकट की, वह तिथि उनके धैर्यके प्रभावसे लोगोंद्वारा अमावस्या नामसे प्रसिद्ध हुई। इसी कारण यह तिथि पितरोंको परम प्रिय है। इस तिथिमें किया हुआ श्राद्धादि कार्य अक्षय फलदायक होता है॥ १-८॥<br><br>इस प्रकार (बहुकालार्जित) तपस्याके नष्ट हो जानेसे अच्छोदा लज्जित हो गयी। वह अत्यन्त दीन होकर नीचे मुख किये हुए देवपुरमें पुनः अपनी प्रसिद्धिके लिये पितरोंसे प्रार्थना करने लगी। तब रोती हुई उस तपस्विनीको पितरोंने सान्त्वना दी। वे महाभाग पितर भावी देव-कार्यका विचार कर प्रसन्नता एवं मङ्गलसे परिपूर्ण वाणीद्वारा उससे इस प्रकार बोले—'वरवर्णिनि ! बुद्धिमान् लोग स्वर्गलोकमें दिव्य शरीरद्वारा जो कुछ शुभाशुभ कर्म करते हैं, वे उसी शरीरसे उन कर्मोंके फलका उपभोग करते हैं; क्योंकि देव-योनिमें कर्म तुरन्त फलदायक हो जाते हैं। उसके विपरीत मानव-योनिमें मृत्युके पश्चात् (जन्मान्तरमें) कर्मफल भोगना पड़ता है। इसलिये पुत्रि ! तुम मृत्युके पश्चात् जन्मान्तरमें अपनी तपस्याका पूर्ण फल प्राप्त करोगी। अट्ठाईसवें द्वापरमें तुम मत्स्य-योनिमें उत्पन्न होओगी। पितृकुलका व्यतिक्रमण करनेके कारण तुम्हें उस कष्टदायक योनिकी प्राप्ति होगी। पुनः उस योनिसे मुक्त होकर तुम राजा (उपरिचर) वसुकी कन्या होओगी। कन्या होनेपर तुम अपने दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त करोगी। उस कन्यावस्थामें तुम्हें बदरी (बेर)-के वृक्षोंसे व्यास द्वीपमें महर्षि पराशरसे एक ऐसे पुत्रकी प्राप्ति होगी, जो बादरायण नामसे प्रसिद्ध होगा और कभी अपने कर्मसे च्युत न होनेवाले नारायणका अवतार होगा। तुम्हारा वह पुत्र एक ही वेदको अनेक (चार) भागोंमें विभक्त करेगा। तदनन्तर समुद्रके अंशसे उत्पन्न हुए पुरुवंशी राजा शांतनुके संयोगसे तुम्हें विचित्रवीर्य एवं महाराज चित्राङ्गद नामक दो पुत्र प्राप्त होंगे। बुद्धिमान् विचित्रवीर्यके दो क्षेत्रज धृतराष्ट्र और पाण्डु-पुत्रोंको उत्पन्न कराकर तुम प्रौष्ठपदी (भाद्रपदकी पूर्णिमा और पौषकृष्णाष्टमी आदि)-में अष्टकारूपसे पितृलोकमें जन्म ग्रहण करोगी। |