मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६३- नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति
| ६७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देवा ऊचुः<br>वरप्रदानाद् भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः।<br>तत्प्रसीदाशु भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ १९<br>भगवन् सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।<br>स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्बुधः॥ २०<br>सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः।<br>आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः॥ २१<br>अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम्।<br>तपसान्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति॥ २२<br>तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः।<br>स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजग्मुर्मुदान्विताः॥ २३ | देवताओंने कहा—भगवन्! आपके इस वरप्रदानसे तो वह असुर हमलोगोंका वध कर डालेगा। अतः प्रभो! कृपा कीजिये और शीघ्र ही उसके वधका भी उपाय सोचिये। भगवन्! आप स्वयं सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिकर्ता, स्वामी, हव्य एवं कव्यके स्रष्टा, अव्यक्तप्रकृति और सर्वज्ञ हैं। देवताओंके समस्त लोकोंके लिये हितकारक ऐसे वचनको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने अपने परम शीतल वचनरूपी जलसे देवताओंको संसिक्त एवं आश्वस्त करते हुए बोले—'देवगण! उसे अपनी तपस्याका फल तो अवश्य ही मिलना चाहिये। हाँ, तपस्याके पुण्यफलके समाप्त हो जानेपर भगवान् विष्णु उसका वध करेंगे।' कमलजन्मा ब्रह्माकी वह बात सुनकर सभी देवता हर्षपूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये॥ १९—२३॥ |
| लब्धमात्रे वरे चाथ सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः॥ २४<br>आश्रमेषु महाभागान् स मुनीञ्छंसितव्रतान्।<br>सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्षयामास दानवः॥ २५<br>देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः॥ २६<br>यदा वरमदोत्सिक्तश्चोदितः कालधर्मतः।<br>यज्ञियानकरोद् दैत्यानयज्ञियांश्च देवताः॥ २७<br>तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा।<br>सेन्द्रा देवगणा यक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः॥ २८<br>शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम्।<br>देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम्॥ २९ | उधर वर प्राप्त होते ही उस वरदानसे गर्वित हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु सभी प्रजाओंको कष्ट देना प्रारम्भ किया। उस दानवने आश्रमोंमें जाकर उन महान् भाग्यशाली मुनियोंको, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यधर्म-परायण और जितेन्द्रिय थे, धर्षित कर दिया। उस महान् असुरने त्रिभुवनमें स्थित सभी देवताओंको पराजित कर दिया। तब वह दानव त्रिलोकीको अपने अधीन करके स्वर्गमें निवास करने लगा। इस प्रकार कालधर्मकी प्रेरणासे जब उसने वरदानके मदसे उन्मत्त हो दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बनाया और देवताओंको उनके समुचित यज्ञभागोंसे वञ्चित कर दिया, तब आदित्यगण, साध्यगण, विश्वेदेव, वसुगण, इन्द्रसहित देवगण, यक्ष, सिद्धगण और महर्षिगण—ये सभी उन महाबली विष्णुकी शरणमें गये, जो शरणदाता, देवाधिदेव, यज्ञमूर्ति, वसुदेवके पुत्र और अविनाशी हैं॥ २४—२९॥ |
| देवा ऊचुः<br>नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः।<br>त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो॥ ३०<br>त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः।<br>त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम॥ ३१ | देवताओंने कहा—महाभाग्यशाली नारायण! हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध कीजिये। सुरोत्तम! आप ही हमलोगोंके परम पालक हैं, आप ही हमलोगोंके सर्वोत्कृष्ट गुरु हैं और आप ही हम ब्रह्मा आदि देवताओंके परम देव हैं॥ ३०-३१॥ |
| विष्णुरुवाच<br>भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।<br>तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम्॥ ३२ | भगवान् विष्णुने कहा—देवताओ! तुमलोग भय छोड़ दो। मैं तुमलोगोंको अभयदान दे रहा हूँ। पहलेकी तरह पुनः तुमलोगोंका शीघ्र ही स्वर्गपर अधिकार हो जायगा। |
| * अध्याय १६१ * | ६७१ |
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| एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम्।<br>अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम्॥ ३३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान्।<br>वधं संकल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः॥ ३४<br>साहाय्यं च महाबाहुरोङ्कारं गृह्य सत्वरम्।<br>अर्थोंकारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः॥ ३५<br>हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः।<br>तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्यैव चापरः॥ ३६<br>नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं तथा।<br>नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना॥ ३७<br>ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम्।<br>सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम्॥ ३८<br>विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।<br>वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनविस्तृताम्॥ ३९<br>जराशोकक्लमापेतां निष्प्रकम्पां शिवां सुखाम्।<br>वेश्महर्म्यवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा॥ ४० | मैं सेनासहित उस दानवराज दैत्यका, जो वरदानकी प्राप्तिसे गर्वीला और देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, वध करूँगा। ऐसा कहकर महाबाहु भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा कर दिया और स्वयं शीघ्रतापूर्वक ओंकारको (सहायकरूपमें) साथ लेकर हिरण्यकशिपुके वधका विचार करने लगे। तदनन्तर जो सर्वव्यापक, अविनाशी, परमेश्वर, सूर्यके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके-से कान्तिमान् थे, वे भगवान् श्रीहरि ओंकारको साथ लेकर हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये। उस समय वे आधा मनुष्यका और आधा सिंहका शरीर धारण कर नरसिंहारूपसे स्थित हो हाथसे हाथ मल रहे थे। तदनन्तर उन्होंने हिरण्यकशिपुकी चमकती हुई दिव्य सभा देखी, जो विस्तृत, अत्यन्त रुचिर, मनको लुभानेवाली और सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंसे युक्त थी। सौ योजनके विस्तारमें फैली हुई वह सभा पचास योजन लम्बी और पाँच योजन चौड़ी थी। वह स्वेच्छानुसार आकाशमें उड़नेवाली तथा बुढ़ापा, शोक और थकावटसे रहित, निश्चल, कल्याणकारिणी, सुखदायिनी और परम रमणीय थी। उसमें अट्टालिकाओंसे युक्त भवन बने थे और वह तेजसे प्रज्वलित-सी हो रही थी॥ ३२—४०॥ |
| अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।<br>दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम्॥ ४१<br>नीलपीतसितश्यामैः कृष्णैर्लोहितकैरपि।<br>अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः॥ ४२<br>सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत।<br>रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा॥ ४३<br>सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा।<br>न क्षुत्पिपासे ग्लानिं वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते॥ ४४<br>नानारूपैरुपकृतां विचित्रैरतिभास्वरैः।<br>स्तम्भैर्न बिभृता सा वै शाश्वती चाक्षपा सदा॥ ४५<br>अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा।<br>दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयन्तीव भास्करान्॥ ४६ | उसके भीतर जलाशय थे। वह फल-पुष्प प्रदान करनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे संयुक्त थी। उसे विश्वकर्माने बनाया था। वह नीले, पीले, श्वेत, श्याम, कृष्ण और लोहित रंगके आवरणों और सैकड़ों मंजरियोंसे युक्त गुल्मोंसे आच्छादित होनेके कारण श्वेत बादलकी तरह उड़ती हुई-सी दीख रही थी। उसमेंसे किरणें फूट रही थीं। वह चमकीली और दिव्य गन्धसे युक्त होनेके कारण मनोरम थी। वह सर्वथा सुखदायिनी थी। उसमें दुःख, सर्दी और धूपका नाम-निशान नहीं था। उसमें पहुँचकर दानवोंको भूख-प्यास और ग्लानिकी प्राप्ति नहीं होती थी। वह चित्र-विचित्र रंगवाले एवं अत्यन्त चमकीले नाना प्रकारके खम्भोंसे युक्त थी, परंतु उन खम्भोंपर आधारित नहीं थी। वहाँ रात नहीं होती थी, अपितु निरन्तर दिन ही बना रहता था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निका तिरस्कार कर रही थी तथा स्वर्गलोकमें स्थित होकर अनेकों सूर्योंको उद्भासित करती हुई-सी उद्दीप्त हो रही थी। |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>रसयुक्तं प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यमनन्तकम्॥ ४७<br><br>पुण्यगन्धस्रजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः।<br>उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति च॥ ४८<br><br>पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रवालाङ्कुरधारिणः।<br>लतावितानसंछन्ना नदीषु च सरःसु च॥ ४९<br><br>वृक्षान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः।<br>गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च॥ ५०<br><br>नातिशीतानि नोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च।<br>अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः॥ ५१ | सभी प्रकारके मनोरथ, चाहे वे दिव्य हों या मानुष, सब-के-सब वहाँ प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे। वहाँ असंख्य प्रकारके अधिक-से-अधिक रसीले भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ और पुण्यगन्धमयी मालाएँ सुलभ थीं। वहाँके वृक्ष नित्य पुष्प और फल देनेवाले थे। वहाँका जल गर्मीमें शीतल और सर्दीमें उष्ण रहता था। वहाँ नदियों और सरोवरोंके तटपर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष लगे थे, जिनके अग्रभागमें पुष्प खिले हुए थे और जो लाल-लाल पल्लवों और अङ्कुरोंसे सुशोभित एवं लतारूपी वितानसे आच्छादित थे। भगवान् नृसिंह वहाँ ऐसे अनेकों प्रकारके वृक्ष देखे, जो सुगन्धित पुष्पों और रसदार फलोंसे लदे हुए थे। वहाँ यत्र-तत्र सरोवर भी थे, जिनमें न तो अत्यन्त शीतल और न गरम जल भरा रहता था॥ ४१-५० १/२ ॥ |
| नलिजैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।<br>रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संवृतानि च॥ ५२<br>सुकान्तैर्धार्तराष्ट्रैश्च राजहंसैश्च सुप्रियैः।<br>कारण्डवैश्चक्रवाकैः सारसैः कुररैरपि॥ ५३<br>विमलैः स्फाटिकाभैश्च पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः।<br>बहुहंसोपगीतानि सारसाभिरुतानि च॥ ५४<br>गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्पमञ्जरिधारिणीः।<br>दृष्टवान् पर्वताग्रेषु नानापुष्पधरा लताः॥ ५५ | भगवान् नृसिंहने उसकी सभामें सभी पुण्यक्षेत्रोंको भी देखा, जो सुगन्धयुक्त कमल, श्वेत कमल, लाल कमल, नील कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पोंसे तथा अत्यन्त सुन्दर काली चोंच और काले पैरोंवाले हंसों, परमप्रिय लगनेवाले राजहंसों, बतखों, चक्रवाकों, सारसों, कराँकुलों एवं स्फटिककी-सी कान्तिवाले निर्मल और पीले पंखोंसे सुशोभित अन्यान्य पक्षियोंसे आच्छादित थे। उनमें बहुत-से हंस कूर्ज रहे थे और सर्वत्र सारसोंकी बोली सुनायी पड़ती थी। भगवान् नृसिंहने पर्वत-शिखरोंपर पुष्पोंसे लदी हुई अनेकों प्रकारकी लताओंको भी देखा, जो सुन्दर मंजरियोंसे सुशोभित थीं और जिनसे मनोरम गन्ध फैल रही थी। उस सभामें |
| केतक्यशोकसरलाः पुन्नागतिलकार्जुनाः।<br>चूता नीपाः प्रस्थपुष्पाः कदम्बा बकुला धवाः॥ ५६<br>प्रियङ्गुपाटलावृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च चम्पकाश्र्च मनोरमाः॥ ५७<br>तथैवान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः।<br>विद्रुमाश्च द्रुमाश्चैव ज्वलिताग्निसमप्रभाः॥ ५८<br>स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः।<br>अर्जुनाशोकवर्णाश्च बहवश्चित्रका द्रुमाः॥ ५९<br>वरुणो वत्सनाभश्च पनसाः सह चन्दनैः।<br>नीपाः सुमनसश्चैव निम्बा अश्वत्थतिन्दुकाः॥ ६०<br>पारिजाताश्च लोध्राश्च मल्लिका भद्रदारवः।<br>आमलक्यस्तथा जम्बूलकुचाः शैलवालुकाः॥ ६१ | केतकी, अशोक, सरल (चीड़), पुन्नाग, तिलक, अर्जुन, आम, नीप, प्रस्थपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियंगु, पाटल, शाल्मली, हरिद्रक, साल, ताल, तमाल, मनोरम चम्पक, विद्रुम तथा प्रज्वलित अग्निकी-सी कान्तिवाले अन्यान्य वृक्ष फूलोंसे लदे हुए शोभा पा रहे थे। वहाँ अर्जुन और अशोकके-से वर्णवाले मोटी-मोटी डालों एवं सुन्दर शाखाओंसे युक्त बहुत-से चित्रक (रेंड़ या तिलक)-के वृक्ष थे, जिनकी ऊँचाई अनेकों तालवृक्षोंके बराबर थी। वहाँ वरुण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, सुन्दर पुष्पोंसे युक्त नीप, नीम, पीपल, तिन्दुक, पारिजात, लोध्र, मल्लिका, भद्रदारु, आमला, जामुन, बड़हर, शैलबालुक, |
| * अध्याय १६१ * | ६७३ |
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| खर्जूर्यो नारिकेलाश्च हरीतग्विभीतकाः ।<br>कालीयका द्रुकालाश्च हिङ्गवः पारियात्रकाः ॥ ६२<br>मन्दारकुन्दलक्ताश्च पतङ्गाः कुटजास्तथा।<br>रक्ताः कुरण्टकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह ॥ ६३<br>कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमा बीजपूरकाः।<br>सप्तपर्णाश्च बिल्वाश्च मधुपैरावृतास्तथा ॥ ६४<br>अशोकाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः।<br>मधूकाः सप्तपर्णाश्च बहवस्तीरगा द्रुमाः ॥ ६५ | खजूर, नारियल, हरीतकी, विभीतक, कालीयक, द्रुकाल, हींग, पारियात्रक, मन्दार, कुन्द, लक्त, पतंग, कुटज, लाल कुरण्टक, अगुरु, कदम्ब, सुन्दर अनार, बिजौरा नींबू, सप्तपर्ण, बेल, भँवरोंसे घिरे हुए अशोक, अनेकों गुल्मों और लताओंसे आच्छादित तमाल, महुआ और सप्तपर्ण आदि बहुत-से वृक्ष तटपर उगे हुए थे॥ ५१–६५॥ |
| लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः।<br>एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ॥ ६६<br>नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समंततः।<br>चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ६७<br>पुष्पिताः पुष्पिताग्रैश्च सम्पतन्ति महाद्रुमाः।<br>रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगताः खगाः ॥ ६८<br>परस्परमवेक्षन्ते प्रहृष्टा जीवजीवकाः।<br>तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ ६९<br>स्त्रीसहस्रैः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः।<br>अनर्घ्यमणिवज्रार्चिः शिखाज्वलितकुण्डलः ॥ ७०<br>आसीनश्चासने चित्रे दशनल्वप्रमाणतः।<br>दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ७१<br>दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः ॥ ७२<br>उपचेरुर्महादैत्यं हिरण्यकशिपुं तदा।<br>दिव्यतानेन गीतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः ॥ ७३ | वहाँ पत्र, पुष्प और फलसे सुशोभित अनेकों प्रकारकी लताएँ फैली हुई थीं। ये तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से जंगली वृक्ष नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे लदे हुए चारों ओर शोभा पा रहे थे। चकोर, शतपत्र (कठफोड़वा), मतवाली कोयल और मैना एक पुष्पित वृक्षके पल्लवसे उड़कर दूसरे पुष्पित महान् वृक्षपर बैठ रही थीं। वहाँ रक्त, पीत और अरुण वर्णवाले बहुतेरे पक्षी वृक्षोंके शिखरोंपर बैठे थे तथा चकोर प्रसन्न मनसे परस्पर एक-दूसरेकी ओर देख रहे थे। उसी सभामें उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपु सूर्यके समान चमकीले एवं दिव्य बिछौनोंसे आच्छादित एक दस नल्व* प्रमाणवाले रमणीय दिव्य सिंहासनपर आसीन था। वह विचित्र ढंगके आभूषणों और वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरा हुआ था। उसके कुण्डल बहुमूल्य मणियों और हीरेकी प्रभासे उद्भासित हो रहे थे। ऐसे उद्दीप्त कुण्डलोंसे विभूषित दैत्यराज हिरण्यकशिपु वहाँ विराजमान था। उस समय दिव्य गन्धसे युक्त परम सुखदायिनी वायु चल रही थी। परिचारकगण महादैत्य हिरण्यकशिपुकी सेवामें जुटे हुए थे। गन्धर्वश्रेष्ठ दिव्य तानद्वारा गीत आलाप रहे थे॥ ६६–७३॥ |
| विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।<br>दिव्याथ सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थली ॥ ७४<br>मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रलेखा शुचिस्मिता।<br>चारुकेशी घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥ ७५<br>एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः।<br>उपत्तिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ७६ | उस समय विश्वाची, सहजन्या, सुविख्यात प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुंजिकस्थली, मिश्रकेशी, रम्भा, पवित्र मुसकानवाली चित्रलेखा, चारुकेशी, घृताची, मेनका तथा उर्वशी—ये तथा अन्य हजारों नाचने-गानेमें निपुण अप्सराएँ सामर्थ्यशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित थीं। |
* चार सौ हाथका या किसी-किसीके मतसे एक सौ हाथका प्राचीन माप।
| ६७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम्।<br>उपासते दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा ॥ ७७<br>तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्रशः।<br>बलिवैरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः ॥ ७८<br>प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः।<br>सुरहन्ता दुःखहन्ता सुनामा सुमतिर्वरः ॥ ७९<br>घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा।<br>विश्वरूपः सुरूपश्च स्वबलश्च महाबलः ॥ ८०<br>दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महासुरः।<br>घटास्योऽकम्पनश्चैव प्रजनश्चेन्द्रतापनः ॥ ८१<br>दैत्यदानवसङ्घाते सर्वे ज्वलितकुण्डलाः।<br>स्रग्विणोवाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः ॥ ८२<br>सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्युवः।<br>एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ८३<br>उपासन्ति महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः।<br>विमानैर्विविधाकारैर्भ्राजमानैरिवाग्निभिः ॥ ८४<br>महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्राङ्गदबाहवः।<br>भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्त सर्वशः ॥ ८५<br>तस्यां सभायां दिव्यायामसुराः पर्वतोपमाः।<br>हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकर समप्रभाः ॥ ८६<br>न श्रुतं नैव दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा।<br>ऐश्वर्यं दैत्यसिंहस्य यथा तस्य महात्मनः ॥ ८७ | अनुपम कर्म करनेवाले सामर्थ्यशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुके वहाँ विराजमान होनेपर वरप्राप्तिवाले सैकड़ों-हजारों दैत्य उसकी सेवा करते रहते थे। बलि, विरोचन, भूमि-पुत्र नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, सुरहन्ता, दुःखहन्ता, सुनामा, असुरश्रेष्ठ सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, सुरूप, महाबली स्वबल, दशग्रीव, वाली, महान् असुर मेघवासा, घटास्य, अकम्पन, प्रजन और इन्द्रतापन—ये तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दैत्यों एवं दानवोंके समुदाय महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुकी सेवा कर रहे थे। उन सभीके कानोंमें चमकीले कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें माला शोभा पा रही थी। वे सभी बोलनेमें निपुण तथा सदा व्रतका पालन करनेवाले थे। वे सभी शूरवीर, वरदानसे सम्पन्न, मृत्युरहित और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। वे अग्निके समान चमकीले विविध प्रकारके विमानोंसे सम्पन्न थे। उनके शरीर आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी भुजाओंपर विचित्र केयूर बँधा हुआ था और उनके शरीर महेन्द्रके समान सुन्दर थे। इस प्रकार वे दैत्य सब तरहसे हिरण्यकशिपुकी उपासना कर रहे थे। उस दिव्य सभामें बैठनेवाले सभी असुर पर्वतके समान विशालकाय थे। उनका शरीर स्वर्णके समान चमकीला था और उनकी कान्ति सूर्यके समान थी। महान् आत्मबलसे सम्पन्न उस दैत्यसिंह हिरण्यकशिपुका जैसा ऐश्वर्य था, वैसा न कभी देखा गया था और न सुना ही गया था॥ ७७–८७॥ |
| कनकरजतचित्रवेदिकायां<br>परिहतरलविचित्रवीथिकायाम् ।<br>स ददर्श मृगाधिपः सभायां<br>सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम् ॥ ८८<br>कनकविमलहारविभूषिताङ्गं<br>दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।<br>दिवसकरमहाप्रभाव्वलन्तं<br>दितिजसहस्रशतैर्निषेव्यमाणम् ॥ ८९ | जिसमें सुवर्ण और चाँदीकी सुन्दर वेदिकाएँ बनी थीं, रत्नजटित होनेके कारण जिसकी गलियाँ अत्यन्त मनोहर लग रही थीं और जो सुन्दर ढंगसे बनाये गये रत्नोंके झरोखोंसे सुशोभित थी। उस सभामें भगवान् नृसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा, उसका शरीर स्वर्णनिर्मित विमल हारसे विभूषित था, वह सूर्यकी उत्कट प्रभाके समान उद्दीप्त हो रहा था और उसकी सैकड़ों-हजारों दैत्य सेवा कर रहे थे॥ ८८-८९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावे एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नारसिंहप्रादुर्भावप्रसङ्गमें एक सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६१॥
| * अध्याय १६२ * | ६७५ |
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एक सौ बासठवाँ अध्याय
प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध
| सूत उवाच | |
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| ततो दृष्ट्वा महात्मानं कालचक्रमिवागतम्।<br>नरसिंहवपुश्छन्नं भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ १<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नाम वीर्यवान्।<br>दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम्॥ २<br>तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमाश्रितम्।<br>विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर राखमें छिपी हुई अग्निकी तरह नरसिंह-शरीरमें छिपे हुए महात्मा विष्णुको कालचक्रकी भाँति आया देख हिरण्यकशिपुके पुत्र पराक्रमी प्रह्लादने दिव्य दृष्टिसे सिंहको देखकर समझ लिया कि भगवान् विष्णु आ गये। सुमेरु पर्वतकी-सी कान्तिवाले अपूर्व शरीरको धारण किये हुए उस सिंहको देखकर हिरण्यकशिपुसहित सभी दानव घबरा गये॥ १—३॥ |
| प्रह्लाद उवाच | तब प्रह्लादने कहा— |
| महाबाहो महाराज दैत्यानामादिसम्भवः।<br>न श्रुतं न च नो दृष्टं नारसिंहमिदं वपुः॥ ४<br>अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमागतम्।<br>दैत्यान्तकरणं घोरं संशतीव मनो मम॥ ५<br>अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितश्च याः।<br>हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः॥ ६<br>चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरादित्यैर्वसुभिः सह।<br>धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः॥ ७<br>मरुतो देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः॥ ८<br>ब्रह्मा देवः पशुपतिर्ललाटस्था भ्रमन्ति वै।<br>स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानि तथैव च॥ ९<br>भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्दैत्यगणैर्वृतः।<br>विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा॥ १०<br>सर्वे त्रिभुवनं राजँल्लोकधर्माश्च शाश्वताः।<br>दृश्यन्ते नारसिंहेऽस्मिंस्तथैदमखिलं जगत्॥ ११<br>प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा<br>ग्रहाश्च योगाश्च महीरुहाश्च।<br>उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च<br>रतिश्च सत्यं च तपो दमश्च॥ १२ | महाबाहु महाराज! आप दैत्योंके मूल पुरुष हैं। आपके इस नरसिंह-शरीरके विषयमें अबतक कभी कुछ न सुना ही गया और न इसे कभी देखा ही गया, अज्ञातरूपसे उत्पन्न होनेवाला यह कौन-सा दिव्यरूप आ पहुँचा है? मुझे लगता है कि आपका यह भयंकर रूप दैत्योंका अन्त ही करनेवाला है। इस सिंहके शरीरमें सभी देवता, समुद्र, सभी नदियाँ, हिमवान्, पारियात्र (विन्ध्य) आदि सभी कुलपर्वत, नक्षत्रों, आदित्यगणों और वसुगणोंसहित चन्द्रमा, कुबेर, वरुण, यमराज, शचीपति इन्द्र, मरुद्गण, देवगन्धर्व, तपोधन महर्षि, नाग, यक्ष, पिशाच, भयंकर पराक्रमी राक्षस, ब्रह्मा और भगवान् शंकर स्थित हैं। ये सभी ललाटमें स्थित होकर भ्रमण कर रहे हैं। राजन्! सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी, हमलोगोंसहित तथा समस्त दैत्यगणोंसे घिरे हुए आप, सैकड़ों विमानोंसे भरी हुई आपकी यह सभा, सारी त्रिलोकी, शाश्वत लोकधर्म तथा यह अखिल जगत् इस नरसिंहके शरीरमें दिखायी पड़ रहे हैं। साथ ही इस शरीरमें प्रजापति, महात्मा मनु, ग्रह, योग, वृक्ष, उत्पात, काल, धृति, |
| ६७६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमारश्च महानुभावो<br>विश्वे च देवा ऋषयश्च सर्वे।<br>क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षो<br>धर्मश्च मोहः पितरश्च सर्वे॥ १३ | मति, रति, सत्य, तप, दम, महानुभाव सनत्कुमार, विश्वेदेवगण, सभी ऋषिगण, क्रोध, काम, हर्ष, धर्म, मोह और सभी पितृगण भी विद्यमान हैं॥४—१३॥ |
| प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>उवाच दानवान् सर्वान् गणांश्च स गणाधिपः ॥ १४<br>मृगेन्द्रो गृह्यतामेष अपूर्वां तनुमास्थितः।<br>यदि वा संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः॥ १५<br>ते दानवगणाः सर्वे मृगेन्द्रं भीमविक्रमम्।<br>परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ॥ १६<br>सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः।<br>बभञ्ज तां सभां सर्वां व्यादितास्य इवान्तकः ॥ १७<br>सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>चिक्षेपास्त्राणि सिंहस्य रोषाद् व्याकुललोचनः ॥ १८ | इस प्रकार प्रह्लादकी बात सुनकर दानवगणोंके अधीश्वर सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने सभी दानवगणोंको आदेश देते हुए कहा—'दानवो! अपूर्व शरीर धारण करनेवाले इस मृगेन्द्रको पकड़ लो। अथवा यदि पकड़नेमें कोई संदेह हो तो इस बनैले जीवको मार डालो।' यह सुनकर वे सभी दानवगण हर्षपूर्वक उस भयंकर पराक्रमी मृगेन्द्रपर टूट पड़े और बलपूर्वक त्रास देने लगे। तदनन्तर मुख फैलाये हुए कालकी तरह भीषण दीखनेवाले महाबली नरसिंहने सिंहनाद करके उस सारी सभाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। सभाको विध्वंस होते देखकर हिरण्यकशिपुके नेत्र क्रोधसे व्याकुल हो गये, तब वह स्वयं नरसिंहपर अस्त्र छोड़ने लगा॥१४—१८॥ |
| सर्वास्त्राणामथ ज्येष्ठं दण्डमस्त्रं सुदारुणम्।<br>कालचक्रं तथा घोरं विष्णुचक्रं तथा परम्॥ १९<br>पैतामहं तथाप्युग्रं त्रैलोक्यदहनं महत्।<br>विचित्रामशनीं चैव शुष्कार्द्रा चाशनिद्वयम्॥ २०<br>रौद्रं तथोग्रं शूलं च कङ्कालं मुसलं तथा।<br>मोहनं शोषणं चैव सन्तापनविलापनम्॥ २१<br>वायव्यं मथनं चैव कापालमथ कैङ्करम्।<br>तथाप्रतिहतां शक्तिं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ॥ २२<br>अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव सोमास्त्रं शिशिरं तथा।<br>कम्पनं शातनं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुभैरवम्॥ २३<br>कालमुद्गरमक्षोभ्यं तपनं च महाबलम्।<br>संवर्तनं मादनं च तथा मायाधरं परम्॥ २४<br>गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम्।<br>प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम्।<br>अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः॥ २५<br>अस्त्रं हयशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च।<br>नारायणास्त्रमैन्द्रं च सार्पमस्त्रं तथाद्भुतम् ॥ २६<br>पैशाचमस्त्रमजितं शोषदं शामनं तथा।<br>महाबलं भावनं च प्रस्थापनविकम्पने ॥ २७<br>एतान्यस्त्राणि दिव्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा।<br>असृजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाहुतिम्॥ २८ | उस समय हिरण्यकशिपु सम्पूर्ण अस्त्रोंमें सबसे बड़ा दण्ड अस्त्र, अत्यन्त भीषण कालचक्र, अतिशय भयंकर विष्णुचक्र, त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला अत्यन्त उग्र पितामहका महान् अस्त्र ब्रह्मास्त्र, विचित्र वज्र, सूखी और गीली दोनों प्रकारकी अशनि, भयानक तथा उग्र शूल, कंकाल, मूसल, मोहन, शोषण, संतापन, विलापन, वायव्य, मथन, कापाल, कैंकर, अमोघ शक्ति, क्रौञ्चास्त्र, ब्रह्मशिरा अस्त्र, सोमास्त्र, शिशिर, कम्पन, शातन, अत्यन्त भयंकर त्वाष्ट्रास्त्र, कभी क्षुब्ध न होनेवाला कालमुद्गर, महाबलशाली तपन, संवर्तन, मादन, परमोत्कृष्ट मायाधर, परमप्रिय गान्धर्वास्त्र, असिरत्न नन्दक, प्रस्वापन, प्रमथन, सर्वोत्तम वारुणास्त्र, जिसकी गति अप्रतिहत होती है ऐसा पाशुपतास्त्र, हयशिरा अस्त्र, ब्राह्म अस्त्र, नारायणास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, अद्भुत नागास्त्र, अजेय पैशाचास्त्र, शोषण, शामन, महाबलसे सम्पन्न भावन, प्रस्थापन, विकम्पन—इन सभी दिव्यास्त्रोंको नरसिंहके ऊपर उसी प्रकार छोड़ रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निमें आहुति डाल रहा हो। |