मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६०- तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध
| ६५८ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शंकरका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति
| वीरक उवाच | **वीरकने कहा—**कमललोचने! मेरी स्नेहवत्सला माता पार्वती ने भी मुझे ऐसा ही आदेश दिया है, अतः कोई भी परायी स्त्री भवनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। वीरकद्वारा ऐसा कही जानेपर पार्वतीदेवी मनमें विचार करने लगीं कि वायुने मुझे जिस स्त्रीके विषयमें सूचना दी थी, वह स्त्री नहीं थी, प्रत्युत वह कोई दैत्य था। क्रोधके वशीभूत हो मैंने व्यर्थ ही वीरकको शाप दे दिया। क्रोधसे प्रेरित हुए मूर्खलोग प्रायः इसी प्रकार अकार्य कर बैठते हैं। क्रोध करनेसे कीर्ति नष्ट हो जाती है और क्रोध सुस्थिर लक्ष्मीका भी विनाश कर देता है। इसी कारण तत्त्वार्थको निश्चितरूपसे न जानकर मैंने अपने पुत्रको ही शाप दे दिया। जिनकी बुद्धि विपरीत अर्थको ग्रहण करती है, उन्हें विपत्तियाँ मिलती हैं। ऐसा विचारकर पार्वती कमल-सी कान्तिवाले मुखसे लज्जाका नाट्य करती हुई वीरकसे इस प्रकार कहने लगीं॥ १–५॥ |
| एवमुक्त्वा गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला।<br>प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने॥ १<br><br>इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा।<br>न सा नारीति दैत्योऽसौ वायुर्मे यामभाषत॥ २<br><br>वृथैव वीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया।<br>अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमीरितैः॥ ३<br><br>क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम्।<br>विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः॥ ४<br><br>संचिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा।<br>लज्जासज्जविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा॥ ५ | |
| देव्युवाच | **देवी बोलीं—**वीरक! तुम अपने मनमें मेरे प्रति संदेह मत करो। मैं ही हिमाचलकी पुत्री, शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी और तुम्हारी माता हूँ। बेटा! मेरे शरीरकी अभिनव शोभाके भ्रमसे तुम शङ्का मत करो। यह गौर कान्ति मुझे ब्रह्माने प्रसन्न होकर प्रदान की है। मुझे यह दैत्यद्वारा निर्मित वृत्तान्त ज्ञात नहीं था, अतः शंकरजीके एकान्तमें स्थित रहनेपर किसी अन्य नारीका प्रवेश (तुम्हारी असावधानीसे) जानकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया है। वह शाप तो अब टाला नहीं जा सकता, किंतु उससे उद्धारका उपाय तुम्हें बतला रही हूँ। तुम मनुष्य-योनिमें जन्म लेकर वहाँ अपना मनोरथ पूरा करके शीघ्र ही मेरे पास वापस आ जाओगे॥ ६–९॥ |
| अहं वीरक ते माता मा तेऽस्तु मनसो भ्रमः।<br>शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः॥ ६<br><br>मम गात्रच्छविभ्रान्त्या मा शङ्कां पुत्र भावय।<br>तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना॥ ७<br><br>मया शप्तोऽस्यविदिते वृत्तान्ते दैत्यनिर्मिते।<br>ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शङ्करे रहसि स्थिते॥ ८<br><br>न निवर्तयितुं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते।<br>शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्स त्वं कामसमन्वितः॥ ९ | |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर वीरक प्रसन्न मनसे उदय हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिवाली माता पार्वतीको सिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् बोला॥ १०॥ |
| शिरसा तु ततो वन्द्य मातरं पूर्णमानसः।<br>उवाचोदितपूर्णेन्दुद्युतिं च हिमशैलजाम्॥ १० | |
| * अध्याय १५८ * | ६५९ |
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| वीरक उवाच<br>नतसुरासुरमौलिमिलन्मणि-<br>प्रचयकान्तिकरालनखाङ्किते।<br>नगसुते शरणागतवत्सले<br>तव नतोऽस्मि नतार्त्तिविनाशिनि॥ ११<br><br>तपनमण्डलमण्डितकन्धरे<br>पृथुसुवर्णसुवर्णनगद्युते।<br>विषभुजङ्गनिषङ्गविभूषिते<br>गिरिसुते भवतीमहमाश्रये॥ १२<br><br>जगति कः प्रणताभिमतं ददौ<br>झटिति सिद्धनुते भवती यथा।<br>जगति कां च न वाञ्छति शङ्करो<br>भुवनधृत्तनये भवतीं यथा॥ १३<br><br>विमलयौगविनिर्मितदुर्जय-<br>स्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले।<br>विदलितान्धकबान्धवसंहतिः<br>सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता॥ १४<br><br>सितसटापटलोद्धतकन्धरा-<br>भरमहामृगराजस्थिता।<br>विकलशक्तिमुखानलपिङ्गलायत<br>भुजौघ विपिष्टमहासुरा ॥ १५<br><br>निगदिता भुवनैरिति चण्डिका<br>जननि शुम्भनिशुम्भनिषूदनी।<br>प्रणतचिन्तितदानवदानव-<br>प्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि॥ १६<br><br>वियति वायुपथे ज्वलनोज्ज्वले-<br>ऽवनितले तव देवि च यद्वपुः।<br>तदजितेऽप्रतिमे प्रणमाम्यहं<br>भुवनभाविनि ते भववल्लभे॥ १७<br><br>जलधयो ललितोद्धतवीचयो<br>हुतवहद्युतयश्च चराचरम्।<br>फणसहस्रभृतश्च भुजङ्गमा-<br>स्त्वदभिधास्यति मय्यभयंकराः॥ १८<br><br>भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये<br>प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयम्।<br>करणजातमिहास्तु ममाचलं<br>नुतिलवाप्तिफलाशयहेतुतः ॥ १९ | वीरकने कहा—गिरिराजकुमारी! आपके चरण-नख प्रणत हुए सुरों और असुरोंके मुकुटोंमें लगी हुई मणिसमूहोंकी उत्कट कान्तिसे सुशोभित होते रहते हैं। आप शरणागतवत्सला तथा प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाली हैं। मैं आपके चरणोंमें नमस्कार कर रहा हूँ। गिरिनन्दिनि! आपके कन्धे सूर्य-मण्डलके समान चमकते हुए सुशोभित हो रहे हैं। आपकी शरीरकान्ति प्रचुर सुवर्णसे परिपूर्ण सुमेरु गिरिकी तरह है। आप विषैले सर्परूपी तरकससे विभूषित हैं, मैं आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। सिद्धोंद्वारा नमस्कार की जानेवाली देवि! आपके समान जगत्में प्रणतजनोंके अभीष्टको तुरंत प्रदान करनेवाला दूसरा कौन है? गिरिजे! इस जगत्में भगवान् शंकर आपके समान किसी अन्य स्त्रीकी इच्छा नहीं करते। आपने महेश्वर-मण्डलको निर्मल योगबलसे निर्मित अपने शरीरके तुल्य दुर्जय बना दिया है। आप मारे गये अन्धकासुरके भाई-बन्धुओंका संहार करनेवाली हैं। सुरेश्वरोंने सर्वप्रथम आपकी स्तुति की है। आप श्वेत वर्णकी जटा (केश)-समूहसे आच्छादित कंधेवाले विशालकाय सिंहरूपी रथपर आरूढ़ होती हैं। आपने चमकती हुई शक्तिके मुखसे निकलनेवाली अग्निकी कान्तिसे पीला पड़नेवाली लम्बी भुजाओंसे प्रधान-प्रधान असुरोंको पीसकर चूर्ण कर दिया है॥ ११—१५॥<br><br>जननि! त्रिभुवनके प्राणी आपको शुम्भ-निशुम्भका संहार करनेवाली चण्डिका कहते हैं। एकमात्र आप इस भूतलपर विनम्र जनोंद्वारा चिन्तना किये गये प्रधान-प्रधान दानवोंका वेगपूर्वक मर्दन करनेमें उत्साह रखनेवाली हैं। देवि! आप अजेय, अनुपम, त्रिभुवन-सुन्दरी और शिवजीकी प्राणप्रिया हैं, आपका जो शरीर आकाशमें, वायुके मार्गमें, अग्निकी भीषण ज्वालाओंमें तथा पृथ्वीतलपर भासमान है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। रुचिर एवं भीषण लहरोंसे युक्त महासागर, अग्निकी लपटें, चराचर जगत् तथा हजारों फण धारण करनेवाले बड़े-बड़े नाग—ये सभी आपका नाम लेनेवाले मेरे लिये भयंकर नहीं दीख पड़ते। अनन्य भक्तजनोंकी आश्रयभूता भगवति! मैं आपके चरणोंकी शरणमें आ पड़ा हूँ। आपके चरणोंमें प्रणत होनेसे प्राप्त हुए थोड़े-से फलके कारण मेरा इन्द्रियसमुदाय आपके चरणोंमें अटल स्थान प्राप्त करे। |