मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१५- पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन
५२
* मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| इक्ष्वाकुवंशं वक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः ॥ २५ | श्रेष्ठ ऋषियो ! अब मैं इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन करने जा रहा हूँ आपलोग ध्यानपूर्वक सुनिये । |
| इक्ष्वाकोः पुत्रतामाप विकुक्षिर्नाम देवराट् ।<br>ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद् दश पञ्च च तत्सुताः ॥ २६ | देवराज विकुक्षि इक्ष्वाकुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए । वे इक्ष्वाकुके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे । उन (विकुक्षि)-के पंद्रह पुत्र थे, |
| मेरोरुत्तरतस्ते तु जाताः पार्थिवसत्तमाः ।<br>चतुर्दशोत्तरं चान्यच्छतमस्य तथाभवत् ॥ २७ | जो सुमेरुगिरिकी उत्तर दिशामें श्रेष्ठ राजा हुए । विकुक्षिके एक सौ चौदह पुत्र और हुए थे, |
| मेरोर्दक्षिणतो ये वै राजानः सम्प्रकीर्तिताः ।<br>ज्येष्ठः ककुत्स्थो नाम्नाभूत्तत्सुतस्तु सुयोधनः ॥ २८ | जो सुमेरुगिरिकी दक्षिण दिशाके शासक कहे गये हैं । विकुक्षिका ज्येष्ठ पुत्र ककुत्स्थ नामसे विख्यात था । उसका पुत्र सुयोधन हुआ । |
| तस्य पुत्रः पृथुर्नाम विश्वगश्वः पृथोः सुतः ।<br>इन्दुस्तस्य च पुत्रोऽभूद् युवनाश्वस्ततोऽभवत् ॥ २९ | सुयोधनका पुत्र पृथु, पृथुका पुत्र विश्वग, विश्वगका पुत्र इन्दु और इन्दुका पुत्र युवनाश्व हुआ । |
| श्रावस्तश्च महातेजा वत्सकस्तत्सुतोऽभवत् ।<br>निर्मिता येन श्रावस्ती गौडदेशे द्विजोत्तमाः ॥ ३० | युवनाश्वका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसे वत्सक भी कहा जाता था । द्विजवरो ! उसीने गौडदेशमें श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी । |
| श्रावस्ताद् बृहदश्वोऽभूत् कुवलाश्वस्ततोऽभवत् ।<br>धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुनाम्ना हतः पुरा ॥ ३१ | श्रावस्तसे बृहदश्व और उससे कुबलाश्वका जन्म हुआ, जो पूर्वकालमें धुन्धुद्वारा मारे जानेके कारण धुन्धुमार नामसे विख्यात था । |
| तस्य पुत्रास्त्रयो जाता दृढाश्वो दण्ड एव च ।<br>कपिलाश्वश्च विख्यातो धौन्धुमारिः प्रतापवान् ॥ ३२ | धुन्धुमारके दृढाश्व, दण्ड और कपिलाश्व नामक तीन पुत्र हुए थे, जिनमें प्रतापी कपिलाश्व धौन्धुमारि नामसे भी प्रसिद्ध था । |
| दृढाश्वस्य प्रमोदश्च हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।<br>हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् संहताश्वस्ततोऽभवत् ॥ ३३ | दृढाश्वका पुत्र प्रमोद और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ । हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ तथा उससे संहताश्वका जन्म हुआ । |
| अकृताश्वो रणाश्वश्च संहताश्वसुतावुभौ ।<br>युवनाश्वो रणाश्वस्य मान्धाता च ततोऽभवत् ॥ ३४ | संहताश्वके अकृताश्व और रणाश्व नामक दो पुत्र हुए । उनमें रणाश्वका पुत्र युवनाश्व हुआ तथा उससे मान्धाताकी उत्पत्ति हुई । |
| मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूद् धर्मसेनश्च पार्थिवः ।<br>मुचुकुन्दश्च विख्यातः शत्रुजिच्च प्रतापवान् ॥ ३५ | मान्धाताके पुरुकुत्स, राजा धर्मसेन और शत्रुओंको पराजित करनेवाले सुप्रसिद्ध प्रतापी मुचुकुन्द—ये तीन पुत्र हुए । |
| पुरुकुत्सस्य पुत्रोऽभूद् वसुदो नर्मदापतिः ।<br>सम्भूतिस्तस्य पुत्रोऽभूत् त्रिधन्वा च ततोऽभवत् ॥ ३६ | इनमें पुरुकुत्सका पुत्र नर्मदापति वसुद हुआ । उसका पुत्र सम्भूति हुआ और सम्भूतिसे त्रिधन्वाका जन्म हुआ । |
| त्रिधन्वनः सुतो जातस्त्रय्यारुण इति स्मृतः ।<br>तस्मात् सत्यव्रतो नाम तस्मात् सत्यरथः स्मृतः ॥ ३७ | त्रिधन्वासे उत्पन्न हुआ पुत्र त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ । उससे सत्यव्रत और सत्यव्रतसे सत्यरथका जन्म हुआ । |
| तस्य पुत्रो हरिश्चन्द्रो हरिश्चन्द्राच्च रोहितः ।<br>रोहिताच्च वृको जातो वृकाद् बाहुरजायत ॥ ३८ | सत्यरथसे हरिश्चन्द्र, हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे वृक और वृकसे बाहुकी उत्पत्ति हुई । |
| सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद् राजा परमधार्मिकः ।<br>द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा ॥ ३९ | बाहुके पुत्र राजा सगर हुए, जो परम धर्मात्मा थे । उन सगरके प्रभा और भानुमती नामवाली दो पत्नियाँ थीं । |
| ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वोऽग्निः पुत्रकाम्यया ।<br>और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद् यथेष्टं वरमुत्तमम् ॥ ४० | उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे और्वाग्निकी आराधना की थी । उनकी आराधनासे संतुष्ट होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान करते हुए और्वने कहा— |
| एका षष्टिसहस्राणि सुतमेकं तथापरा ।<br>गृह्णातु वंशकर्तारं प्रभागृह्लाद् बहूंस्तदा ॥ ४१ | 'तुम दोनोंमेंसे एकको साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरीको केवल एक वंशप्रवर्तक पुत्र होगा । (तुम दोनोंमें जिसकी जैसी इच्छा हो, वह वैसा वरदान ग्रहण करे ।)' तब प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको स्वीकार किया और भानुमतीने एक ही पुत्र माँगा । |
| एकं भानुमती पुत्रमगृह्लादसमञ्जसम् ।<br>ततः षष्टिसहस्राणि सुषुवे यादवी प्रभा ॥ ४२<br>खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुना येऽश्वमार्गणे । | कुछ दिनोंके पश्चात् भानुमतीने असमञ्जसको पैदा किया तथा यदुवंशकी कन्या प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया, जो अश्वमेध-यज्ञके अश्वकी खोजमें जिस समय पृथ्वीको खोद रहे थे, उसी समय उन्हें विष्णु (भगवदवतार कपिल)-ने जलाकर भस्म कर दिया ॥ २५-४२ $\frac{१}{२}$ ॥ |
| * अध्याय १२ * | ५३ |
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| असमञ्जसस्तु तनयो योंऽशुमान् नाम विश्रुतः ॥ ४३<br>तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः ।<br>येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता ॥ ४४<br>भगीरथस्य तनयो नाभाग इति विश्रुतः ।<br>नाभागस्याम्बरीषोऽभूत् सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ॥ ४५<br>तस्यायुतायुः पुत्रोऽभूद् ऋतुपर्णस्ततोऽभवत् ।<br>तस्य कल्माषपादस्तु सर्वकर्मा ततः स्मृतः ॥ ४६<br>तस्यानरण्यः पुत्रोऽभून्निघ्नस्तस्य सुतोऽभवत् ।<br>निघ्नपुत्रावुभौ जातावनमित्ररघू नृपौ ॥ ४७<br>अनमित्रो वनमगाद् भविता स कृते नृपः ।<br>रघोरभूद् दिलीपस्तु दिलीपादजकस्तथा ॥ ४८<br>दीर्घबाहुरजाज्जातश्चाजपालस्ततो नृपः ।<br>तस्माद् दशरथो जातस्तस्य पुत्रचतुष्टयम् ॥ ४९<br>नारायणात्मकाः सर्वे रामस्तेष्वग्रजोऽभवत् ।<br>रावणान्तकरस्तद्वद् रघूणां वंशवर्धनः ॥ ५०<br>वाल्मीकिस्तस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ।<br>तस्य पुत्रौ कुशलवाविक्ष्वाकुकुलवर्धनौ ॥ ५१<br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ।<br>नलस्तु नैषधस्तस्मान्नभास्तस्मादजायत ॥ ५२<br>नभसः पुण्डरीकोऽभूत् क्षेमधन्वा ततः स्मृतः ।<br>तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान् ॥ ५३<br>अहीनगुस्तस्य सुतः सहस्राश्वस्ततः परः ।<br>ततश्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्ततोऽभवत् ॥ ५४<br>तस्यात्मजश्चन्द्रगिरिर्भानुश्चन्द्रस्ततोऽभवत् ।<br>श्रुतायुरभवत्तस्माद् भारते यो निपातितः ॥ ५५<br>नलौ द्वावेव विख्यातौ वंशे कश्यपसम्भवे ।<br>वीरसेनसुतस्तद्वन्नैषधश्च नराधिपः ॥ ५६<br>एते वैवस्वते वंशे राजानो भूरिदक्षिणाः ।<br>इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ॥ ५७ | असमञ्जसका पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। उसके पुत्र दिलीप और दिलीपसे भगीरथ हुए, जो तपस्या करके भागीरथी गङ्गाको स्वर्गसे भूतलपर ले आये। भगीरथके पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुए। नाभागके पुत्र अम्बरीष और उनसे सिन्धुद्वीपका जन्म हुआ। सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु हुआ तथा उससे ऋतुपर्णकी उत्पत्ति हुई। ऋतुपर्णका पुत्र कल्माषपाद और उससे सर्वकर्मा पैदा हुआ। उसका पुत्र अनरण्य और अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके अनमित्र और राजा रघु नामके दो पुत्र हुए, जिनमें अनमित्र वनमें चला गया, जो कृतयुगमें राजा होगा। रघुसे दिलीप तथा दिलीपसे अज हुए। अजसे दीर्घबाहु और उससे राजा अजपाल हुए। अजपालसे दशरथ पैदा हुए, जिनके चार पुत्र थे। वे सब-के-सब नारायणके अंशसे प्रादुर्भूत हुए थे। उनमें श्रीराम सबसे ज्येष्ठ थे, जो रावणका अन्त करनेवाले तथा रघुवंशके प्रवर्धक थे। भृगुवंशप्रवर महर्षि वाल्मीकिने श्रीरामके चरित्रका (रामायणरूपमें विस्तारपूर्वक) वर्णन किया है। श्रीरामके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए, जो इक्ष्वाकु-कुलके विस्तारक थे। कुशसे अतिथि और उससे निषधका जन्म हुआ। निषधका पुत्र नल हुआ और उससे नभकी उत्पत्ति हुई। नभसे पुण्डरीकका तथा उससे क्षेमधन्वाका जन्म हुआ। क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी वीरवर देवानीक हुआ। उसका पुत्र अहीनगु तथा उससे सहस्राश्वका जन्म हुआ। सहस्राश्वसे चन्द्रावलोक और उससे तारापीडकी उत्पत्ति हुई। तारापीडसे चन्द्रगिरि और उससे भानुचन्द्र पैदा हुआ। भानुचन्द्रका पुत्र श्रुतायु हुआ, जो महाभारत-युद्धमें मारा गया था। महर्षि कश्यपद्वारा उत्पन्न हुए इस वंशमें नल नामसे दो राजा विख्यात हुए हैं, उनमें एक वीरसेनका पुत्र तथा दूसरा राजा निषधका पुत्र था। इस प्रकार वैवस्वतवंशीय महाराज इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न होनेवाले ये सभी राजा अतिशय दानशील थे। मैंने इनका मुख्यरूपसे वर्णन कर दिया॥४३—५७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सूर्यवंशानुकीर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सूर्यवंशानुकीर्तन नामक बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२ ॥
| ५४ | * मत्स्यपुराण * |
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तेरहवाँ अध्याय
पितृ-वंश-वर्णन तथा सतीके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें देवीके एक सौ आठ नामोंका विवरण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मनुरुवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>रवेश्च श्राद्धदेवत्वं सोमस्य च विशेषतः॥ १ | **मनुने पूछा—**भगवन्! अब मैं पितरोंके उत्तम वंशका वर्णन सुनना चाहता हूँ। उसमें भी विशेषरूपसे यह जाननेकी अभिलाषा है कि सूर्य और चन्द्रमा श्राद्धके देवता कैसे हो गये?॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>स्वर्गे पितृगणा सप्त त्रयस्तेषाममूर्त्तयः॥ २<br>मूर्तिमन्तोऽथ चत्वारः सर्वेषाममितौजसः।<br>अमूर्तयः पितृगणा वैराजस्य प्रजापतेः॥ ३<br>यजन्ति यान् देवगणा वैराजा इति विश्रुताः।<br>ये चैते योगविभ्रष्टाः प्राप्य लोकान् सनातनान्॥ ४<br>पुनर्ब्रह्मादिनान्ते तु जायन्ते ब्रह्मवादिनः।<br>सम्प्राप्य तां स्मृतिं भूयो योगं सांख्यमनुत्तमम्॥ ५<br>सिद्धिं प्रयान्ति योगेन पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>योगिनामेव देयानि तस्माच्छ्राद्धानि दातृभिः॥ ६<br>एतेषां मानसी कन्या पत्नी हिमवतो मता।<br>मैनाकस्तस्य दायादः क्रौञ्चस्तस्याग्रजोऽभवत्।<br>क्रौञ्चद्वीपः स्मृतो येन चतुर्थो घृतसंवृतः॥ ७<br>मेना च सुषुवे तिस्रः कन्या योगवतीस्ततः।<br>उमैकपर्णा पर्णा च तीव्रव्रतपरायणाः॥ ८<br>रुद्रस्यैका सितस्यैका जैगीषव्यस्य चापरा।<br>दत्ता हिमवता बालाः सर्वा लोके तपोऽधिकाः॥ ९ | **मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! बड़े आनन्दकी बात है, अब मैं तुमसे पितरोंके श्रेष्ठ वंशका वर्णन कर रहा हूँ; सुनो। स्वर्गमें पितरोंके सात गण हैं। उनमें तीन मूर्तिरहित और चार मूर्तिमान् हैं। वे सब-के-सब अमित तेजस्वी हैं। अमूर्त पितृगण वैराजनामक प्रजापतिकी संतान हैं, इसीलिये वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण उनकी पूजा करते हैं। ये सभी सनातन लोकोंको प्राप्त करनेके पश्चात् योगमार्गसे च्युत हो जाते हैं तथा ब्रह्माके दिनके अन्तमें पुनः ब्रह्मवादीरूपमें उत्पन्न होते हैं। उस समय ये पूर्वजन्मकी स्मृति हो जानेसे पुनः सर्वोत्तम सांख्ययोगका आश्रय लेकर योगाभ्यासद्वारा आवागमनके चक्रसे मुक्त करनेवाली सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इस कारण दाताओंद्वारा योगियोंको ही श्राद्धीय वस्तुएँ प्रदान करनी चाहिये। इन उपर्युक्त पितरोंकी मानसी कन्या मेना हिमवान्की पत्नी मानी गयी है। मैनाक उसका पुत्र है। क्रौञ्च उससे भी पहले पैदा हुआ था। इसी क्रौञ्चके नामपर घृतसे परिवेष्टित चतुर्थ द्वीप क्रौञ्चद्वीप नामसे विख्यात है। तत्पश्चात् मेनाने उमा, एकपर्णा और अपर्णा नामकी तीन कन्याओंको जन्म दिया, जो सब-की-सब योगाभ्यासमें निरत, कठोर व्रतमें तत्पर तथा लोकमें सर्वश्रेष्ठ तपस्विनी थीं। हिमवान्ने इनमेंसे एक कन्या रुद्रको, एक सितको तथा एक जैगीषव्यको प्रदान कर दी॥ २—९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कस्माद् दाक्षायणी पूर्वं ददाहात्मानमात्मना।<br>हिमवद्दुहिता तद्वत् कथं जाता महीतले॥ १०<br>संहरन्ती किमुक्तासौ सुता वा ब्रह्मसूनुना।<br>दक्षेण लोकजननी सूत विस्तरतो वद॥ ११ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें दक्ष-पुत्री सतीने अपने शरीरको अपने-आप ही क्यों जला डाला? तथा पुनः उसी प्रकारका शरीर धारणकर वे भूतलपर हिमवान्की कन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उस समय ब्रह्माके पुत्र दक्षने लोकजननी सतीको, जो उन्हींकी पुत्री थीं, कौन-सी ऐसी बात कह दी थी, जिससे वे स्वयं ही जल मरीं? ये सभी बातें हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये॥१०-११॥ |