मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१५५- भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान
| ६४२ | * मत्स्यपुराण * |
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| ततो गते भगवति नीललोहिते<br>सहोमया रतिमलभन्न भूधरः।<br>सबान्धवो भवति च कस्य नो मनो<br>विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः॥ ४९७<br>ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं<br>स्फुटद्युति स्फटिकगोपुरं पुरम्।<br>हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा<br>विसर्जितामरनिवहोऽविशत्स्वकम्॥ ४९८ | तदनन्तर नीललोहित भगवान् शङ्करके उमासहित चले जानेपर भाई-बन्धुओंसहित हिमाचलका मन खिन्न हो गया; क्योंकि जगत्में भला ऐसा कौन कन्याका पिता होगा, जिसका मन उसकी विदाईके समय विह्वल न हो जाता हो ? उधर मन्दराचलपर शिवजीका नगर बहुत पहलेसे ही विरचित था। वह चमकती हुई मणियों, स्फटिक-शिलाओं और स्वर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उसकी कान्ति फूटी पड़ती थी और उसमें स्फटिकके फाटक लगे हुए थे। वहाँ पहुँचकर शिवजी देवसमूहको विदा कर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए॥ ४९७-४९८॥ |
| तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा।<br>पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च॥ ४९९ | वहाँ भग-नेत्रहारी भगवान् शङ्कर उमासहित नगरके रमणीय उद्यानों तथा एकान्त वनोंमें विहार करने लगे। |
| सुरक्तहृदयो देव्या मकराङ्कपुरःसरः।<br>ततो बहुतिथे काले सुतकामा गिरेः सुता॥ ५०० | उस समय उनका हृदय कामके वशीभूत होनेके कारण पार्वतीदेवीके प्रति अतिशय अनुरक्त हो गया था। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके पश्चात् पार्वतीके मनमें पुत्रकी कामना उत्पन्न हुई, |
| सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः।<br>कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा॥ ५०१ | तब वे सखियोंके साथ कृत्रिम पुत्र बनाकर क्रीडा करने लगीं। किसी समय पार्वतींने सुगन्धित तेलसे शरीरको मलकर उसके मैल |
| चूर्णैरुद्वर्तयामास मलिनान्तरितां तनुम्।<br>तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्॥ ५०२ | जमे हुए अङ्गोंमें चूर्णका उबटन भी लगाया। फिर उस लेपनको इकट्ठाकर उससे हाथीके-से मुखवाले पुरुषकी आकृतिका निर्माण किया। |
| पुत्रकं क्रीडती देवी तं चाक्षिपयदम्भसि।<br>जाह्नव्यास्तु शिवासख्यास्ततः सोऽभूद् बृहद्वपुः॥ ५०३ | उसके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् पार्वतीदेवीने उसे अपनी सखी जाह्नवीके जलमें डलवा दिया। वहाँ वह विशाल शरीरवाला हो गया और |
| कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा।<br>पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्युचे च जाह्नवी॥ ५०४ | अपने उस अत्यन्त विशाल शरीरसे सारे जगत्को आच्छादित कर लिया। तब पार्वतीदेवीने उसे 'पुत्र' ऐसा कहा और उधर जाह्नवीने भी उसे 'पुत्र' कहकर पुकारा। |
| गाङ्गेय इति देवैस्तु पूजितोऽभूद्गजाननः।<br>विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः॥ ५०५ | अन्तमें वह गजानन 'गाङ्गेय' नामसे देवताओंद्वारा सम्मानित किया गया और ब्रह्माने उसे विनायकोंका आधिपत्य प्रदान किया। |
| पुनः सा क्रीडनं चक्रे पुत्रार्थं वरवर्णिनी।<br>मनोज्ञमङ्कुरं रूढमशोकस्य शुभानना॥ ५०६<br>वर्धयामास तं चापि कृतसंस्कारमङ्गला।<br>बृहस्पतिमुखैर्विप्रैर्दिवस्पतिपुरोगमैः ॥ ५०७ | तत्पश्चात् सुन्दर मुखवाली सुन्दरी पार्वतींने पुनः पुत्रकी कामनासे अशोकके नये निकले हुए सुन्दर अङ्कुरको खिलौना बनाया और बृहस्पति आदि विप्रों तथा इन्द्र आदि देवताओंद्वारा अपना माङ्गलिक संस्कार कराकर उसे पाला-पोसा। |
| ततो देवैश्च मुनिभिः प्रोक्ता देवी त्विदं वचः।<br>भवानि भवती भव्या सम्भूता लोकभूतये॥ ५०८ | यह देखकर देवताओं और मुनियोंने पार्वतीदेवीसे यह बात कही—'भवानि! आप तो परम सुन्दर रूपवाली हो और लोकके कल्याणके लिये प्रकट हुई हो। |
| प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते।<br>अपुत्रा च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते दैवहेतुतः॥ ५०९ | प्रायः संसार पुत्ररूप फलका ही प्रेमी है और वह फल पुत्र-पौत्रोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जगत्में जो प्रजाएँ पुत्रहीन हैं, वे प्रायः प्रारब्धके कारण ही वैसा दीख पड़ती हैं। |
- अध्याय १५४ * ६४३
| अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि।<br>फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः।<br>इत्युक्ता हर्षपूर्णाङ्गी प्रोवाचोमा शुभां गिरम्॥ ५१०<br><br>देव्युवाच<br><br>एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद् बुधः।<br>बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत् संवत्सरं दिवि॥ ५११<br><br>दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।<br>दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।<br>एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी॥ ५१२<br><br>इत्युक्तास्तु ततो विप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>जग्मुः स्वमन्दिराण्येव भवानीं वन्द्य सादरम्॥ ५१३<br><br>गतेषु तेषु देवोऽपि शङ्करः पर्वतात्मजाम्।<br>पाणिनाऽऽलम्ब्य वामेन शनैः प्रावेशयच्छुभाम्॥ ५१४<br><br>चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम्।<br>लम्बमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम्॥ ५१५<br><br>निर्धौतकलधौतं च क्रीडागृहमनोरमम्।<br>प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम् ॥ ५१६<br><br>किन्नरोद्गीतसङ्गीतगृहान्तरितभित्तिकम् ।<br>सुगन्धिधूपसङ्घातमनःप्रार्थ्यमलक्षितम् ॥५१७<br><br>क्रीडन्मयूरनारीभिर्वृतं वै ततवादिभिः।<br>हंससंघातसङ्घृष्टं स्फाटिकस्तम्भवेदिकम्॥ ५१८<br><br>अनारतमतिप्रीत्या बहुशः किन्नराकुलम्।<br>शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिताः॥५१९<br><br>भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रतिबिम्बितमौक्तिकाः।<br>तत्राक्षक्रीडया देवी विहर्तुमुपचक्रमे॥ ५२०<br><br>स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीडने यत्र धिष्ठितौ।<br>वपुःसहायतां प्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ॥ ५२१<br><br>एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशङ्करयोस्तदा।<br>प्रादुर्भवन्महाशब्दस्तद्गृहोदरगोचरः ॥५२२ | देवि! इस समय आप शास्त्रद्वारा प्रदर्शित मार्गकी मर्यादा निर्धारित करें। इन कल्पित तरुपुत्रकोंसे क्या लाभ उपलब्ध होगा?' ऐसा कही जानेपर उमाके अङ्ग हर्षसे पूर्ण हो गये, तब वे सुन्दर वाणीमें बोलीं ॥ ४९९—५१० ॥<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—'विप्रवरो! इस प्रकारके जलरहित प्रदेशमें जो बुद्धिमान् पुरुष कुआँ बनवाता है, वह कुएँके जलके एक-एक बूँदके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। इस प्रकार दस कुएँके समान एक बावली, दस बावलीके सदृश एक सरोवर, दस सरोवरकी तुलनामें एक पुत्र और दस पुत्रके समान एक वृक्ष माना गया है। यही लोकोंका कल्याण करनेवाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूँ। इस प्रकार कहे जानेपर बृहस्पति आदि विप्रगण भवानीको आदरपूर्वक नमस्कार कर अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। उन सबके चले जानेपर देवाधिदेव शङ्करने भी सुन्दरी पार्वतीको बायें हाथका सहारा देकर धीरे-धीरे अपने भवनमें प्रवेश कराया। चित्तको प्रसन्न करनेवाला वह भवन फाटकके निकट ही था। उसमें मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं, वेदिकाएँ पुष्पहारोंसे सुसज्जित थीं, तपाये हुए स्वर्णके मनोरम क्रीडागृह बने हुए थे, बिखरे हुए पुष्पोंकी सुगन्धसे उन्मत्त हुए भँवरे गुंजार कर रहे थे, किन्नरोंद्वारा गाये गये संगीतसे गृहकी भीतरी दीवाल प्रतिध्वनित हो रही थी, मनको अच्छी लगनेवाली सुगन्धित धूपोंकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। वह नाचती हुई मयूरियों तथा तारवाले बाजे बजानेवाले वादकोंसे व्याप्त था। वहाँ हंस-समूहोंकी ध्वनि गूँज रही थी, स्फटिकके खम्भोंसे युक्त वेदिकाएँ सुशोभित थीं, अधिकांश किन्नर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर उपस्थित रहते थे। उसमें पद्मराग मणिकी दीवालें बनी हुई थीं, जिनपर मोतियोंकी झलक पड़ रही थी, इस कारण अनारके भ्रमसे शुकसमूह उनपर अपने ठोरोंसे आघात कर रहे थे। ऐसे भवनमें पार्वतीदेवी द्यूतक्रीडाके माध्यमसे विहार करने लगीं। निर्मल इन्द्रनील मणिके बने हुए उस क्रीडा-स्थानपर क्रीडा करते हुए शिव-पार्वती विनोदके रसमें निमग्न हो परस्पर एक-दूसरेके शरीरकी सहायताको प्राप्त हुए॥ ५११—५२१॥<br><br>इस प्रकार वहाँ पार्वती और शंकरके क्रीडा करते समय उस गृहके भीतर महान् भयंकर शब्द प्रादुर्भूत हुआ। |