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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश

* अध्याय १३४ *४७५

| स त्वं महौजसं नित्यं प्रपद्यस्व महेश्वरम्।<br>यास्यसे सह पुत्रेण दानवैः सह मानद॥ २३<br>इत्येवमावेद्य भयं दानवोपस्थितं महत्।<br>दानवानां पुनर्देवो देवेशपद्मागतः॥ २४ | इसलिये मानद! (तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि) तुम महान् ओजस्वी एवं अविनाशी महेश्वरकी शरण ग्रहण कर लो, अन्यथा तुम पुत्रों और दानवोंके साथ यमलोकके पथिक बन जाओगे। इस प्रकार देवर्षि नारद दानवोंको उनके ऊपर आये हुए महान् भयकी सूचना देकर पुनः देवेश्वर शङ्करजीके पास लौट आये॥ १७—२४॥ |
| नारदे तु मुनौ याते मयो दानवनायकः।<br>शूरसम्मतमित्येवं दानवानाह दानवः॥ २५<br>शूराः स्थ जातपुत्राः स्थ कृतकृत्याः स्थ दानवाः।<br>युध्यध्वं दैवतैः सार्धं कर्त्तव्यं चापि नो भयम्॥ २६<br>जित्वा वयं भविष्यामः सर्वेऽमरसभासदः।<br>देवांश्च सेन्द्रकान् हत्वा लोकान् भोक्ष्यामहेऽसुराः॥ २७<br>अट्टालकेषु च तथा तिष्ठध्वं शस्त्रपाणयः।<br>दंशिता युद्धसज्जाश्च तिष्ठध्वं प्रोद्यतायुधाः॥ २८<br>पुराणि त्रीणि चैतानि यथास्थानेषु दानवाः।<br>तिष्ठध्वं लङ्घनीयानि भविष्यन्ति पुराणि च॥ २९<br>नभोगतास्तथा शूरा देवता विदिता हि वः।<br>ताः प्रयत्नेन वार्याश्च विदार्याश्चैव सायकैः॥ ३०<br>इति दनुतनयानम्यस्तथोक्त्वा<br>सुरगणवारणवारणे वचांसि।<br>युवतिजनविषण्णमानसं तत्-<br>त्रिपुरपुरं सहसा विवेश राजा॥ ३१<br>अथ रजतविशुद्धभावभावो<br>भवमभिपूज्य दिगम्बरं सुगीर्भिः।<br>शरणमुपजगाम देवदेवं<br>मदनार्यन्धकयज्ञदेहघातम् ॥ ३२<br>मयमभयपदैषिणं प्रपन्नं<br>न किल बुबोध तृतीयदीप्तनेत्रः।<br>तदभिमतमदात् ततः शशाङ्की<br>स च किल निर्भय एव दानवोऽभूत्॥ ३३ | इधर नारद मुनिके चले जानेपर दानवराज मयदानवने (वहाँ उपस्थित) सभी दानवोंसे इस प्रकार शूरसम्मत वचन कहना आरम्भ किया—'दानवो! तुमलोग शूर-वीर हो, पुत्रवान् हो और (जीवनमें सुखका उपभोग करके) कृतकृत्य हो चुके हो, अतः देवताओंके साथ डटकर युद्ध करो। इसमें तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं मानना चाहिये। असुरो! देवताओंको जीतकर हमलोग देवसभाके सभासद हो जायेंगे, अर्थात् देवसभा अपने अधिकारमें आ जायगी। तब इन्द्रसहित देवताओंका वध करके हमलोग लोकोंका उपभोग करेंगे। तुमलोग युद्धकी साज-सज्जासे विभूषित हो कवच धारण कर लो और हथियार लेकर तैयार हो जाओ तथा हाथमें शस्त्र धारण कर अट्टालिकाओंपर चढ़ जाओ। दानवो! तुमलोग इन तीनों पुरोंपर यथास्थान (सजग होकर) बैठ जाओ; क्योंकि देवगण इन तीनों पुरोंपर आक्रमण करेंगे। शूरवीरो! यदि देवता आकाशमार्गसे धावा करें तो तुमलोग तो उन्हें पहचानते ही हो, तुरंत उन्हें प्रयत्नपूर्वक रोक दो और बाणोंके प्रहारसे विदीर्ण कर दो।' इस प्रकार दानवराज मय दनु-पुत्रोंसे सुरगणरूपी हाथियोंको रोकनेके लिये बातें बताकर सहसा उस त्रिपुर-पुरमें प्रविष्ट हुआ, जहाँकी स्त्रियोंका मन भयके कारण उद्विग्न हो उठा था। तदनन्तर वह चाँदीके समान निर्मल भावसे भावित होकर सुन्दर वाणीद्वारा दिगम्बर भगवान् शङ्करकी पूजा कर उन कामदेवके शत्रु तथा अन्धक और दक्ष-यज्ञके विनाशक देवदेवेश्वरकी शरणमें गया। यद्यपि शङ्करजीके तृतीय नेत्रमें उद्दीप्त अग्निका वास है, तथापि उन चन्द्रशेखरके ध्यानमें यह बात न आयी कि यह मयदानव शरणागत होकर अभयपद प्राप्त करना चाहता है, अतः उन्होंने उसे अभीष्ट वरदान दे दिया, जिससे वह दानव निर्भय हो गया और आगसे भी सुरक्षित रहकर जीवित बच गया॥२५—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे नारदागमनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें नारदागमन नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३४॥

४७६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय

शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्ध-विमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर नारदजी त्रिपुरसे लौटकर पुनः युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनामें सम्मिलित हो गये। वे स्वयं देव-सभामें उपस्थित हुए। इलावृत्त नामसे विख्यात विस्तृत वर्ष, जहाँ बलिकायज्ञ सम्पन्न हुआ था तथा जहाँ बलि बाँधे गये थे, तीनों लोकोंमें देवताओंकी जन्मभूमिके रूपमें प्रसिद्ध है। उसी इलावृत्तमें देवताओंके जातकर्म आदि संस्कार तथा यज्ञ और कन्यादान आदि कर्म सम्पन्न हुए हैं। यहाँ भगवान् शङ्कर अपने पार्षदगणोंको साथ लेकर नित्य विहार करते हैं। यहाँ लोकपालगण मेरुगिरिकी तरह सदा निवास करते हैं। इसी स्थानपर जिनके नेत्र मधुके समान पीले रंगके हैं तथा जो द्वितीयाके चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् महेश्वरने देवराज इन्द्र और अपने गणेश्वरोंसे इस प्रकार कहा—'इन्द्र! तुम्हारे शत्रुओंका यह त्रिपुर दिखायी पड़ रहा है। यह विमानों, पताकाओं और ध्वजोंसे सुशोभित है। यह सुदृढ़ है तथा इसके विषयमें ऐसी प्रसिद्धि है कि यह अग्निकी तरह अत्यन्त तापदायक है। इसके निवासी दानव किरीट-कुण्डल धारण किये उन्हीं पर्वतके समान दीख रहे हैं। इन दानवोंकी अङ्ग-कान्ति बादलकी-सी है और इनके मुख टेढ़े-मेढ़े हैं। ये सभी परकोटों, फाटकों और अट्टालिकाओंपर तथा कक्षान्तमें स्थित हैं। (वह देखो) वे सभी दैत्य विजयकी अभिलाषासे हथियारोंसे सुसज्जित हो नगरसे बाहर निकल रहे हैं। इसलिये तुम सहायकोंसहित अपना श्रेष्ठ अस्त्र वज्र लेकर सैकड़ों देवताओं तथा मेरे भृत्योंके साथ आगे बढ़कर इन महासुरोंका संहार करो। मैं इस श्रेष्ठ रथपर निश्चल पर्वतकी तरह स्थित रहकर तुमलोगोंकी विजयके लिये त्रिपुरके सम्मुख उसके छिद्रकी खोजमें खड़ा रहूँगा। वासव! जब पुष्य-नक्षत्रके योगके साथ ये तीनों पुर एक स्थानपर स्थित होंगे, तब मैं एक ही बाणसे इन्हें दग्ध कर डालूँगा'॥ १—१२॥
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।<br>आगत्य चैव त्रिपुरात् सभायामास्थितः स्वयं॥ १<br>इलावृतमिति ख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।<br>यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः॥ २<br>देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ३<br>देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।<br>रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः॥ ४<br>लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।<br>मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।<br>देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः॥ ५<br>वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते।<br>विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्॥ ६<br>इदं वृत्तमिदं ख्यातं वह्निवद् भृशतापनम्।<br>एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः॥ ७<br>प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।<br>इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः॥ ८<br>निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः॥ ९<br>स त्वं सुरशतैः सार्धं ससहायो वरायुधः।<br>सुहृद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्॥ १०<br>अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत्स्थितः।<br>पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः॥ ११<br>यदा तु पुष्ययोगेने एकत्वं स्थास्यते परम्।<br>तदेतन्निर्धहिष्यामि शरेणैकेन वासव॥ १२
* अध्याय १३५ *४७७
SanskritHindi
इत्युक्तो वै भगवता रुद्रेणेह सुरेश्वरः।<br>ययौ तत्त्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः ॥ १३<br><br>प्रक्रान्तरथभीमैस्तैः सदेवैः पार्षदां गणैः।<br>कृतसिंहरवोपेतेरुद्गच्छद्भिरिवाम्बुदैः ॥ १४<br><br>तेन नादेन त्रिपुराद् दानवा युद्धलालसाः।<br>उत्पत्य दुद्रुवुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान् ॥ १५<br><br>अन्ये पयोधररावाः पयोधरसमा बभुः।<br>ससिंहनादं वादित्रं वादयामासुरुद्धताः ॥ १६<br><br>देवानां सिंहनादश्च सर्वतूर्यरवो महान्।<br>ग्रस्तोऽभूद् दैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव ॥ १७<br><br>चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।<br>त्रिपुरं प्रभवत् तद्वद् भीमरूपमहासुरैः ॥ १८<br><br>प्राकारेषु पुरे तत्र गोपुरेष्वपि चापरे।<br>अट्टालकान् समारुह्य केचिच्चलितवादिनः ॥ १९<br><br>स्वर्णमालाधराः शूराः प्रभासितवराम्बराः।<br>केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमत्ता इवाम्बुदाः ॥ २०<br><br>इतश्चेतश्च धावन्तः केचिदुद्धूतवाससः।<br>किमेतदिति पप्रच्छुरन्योऽन्यं गृहमाश्रिताः ॥ २१<br><br>किमेतन्नैनं जानामि ज्ञानमन्तर्हितं हि मे।<br>ज्ञास्यसेऽनन्तरेणेति कालो विस्तारतो महान् ॥ २२<br><br>सोऽप्यसौ पृथ्वीसारं सिंहश्च रथमास्थितः।<br>तिष्ठते त्रिपुरं पीड्य देहव्याधिरिवोच्छ्रितः ॥ २३<br><br>य एषोऽस्ति स एषोऽस्तु का चिन्ता सम्भ्रमे सति।<br>एहि ह्यायुधमादाय क्व मे पृच्छा भविष्यति ॥ २४<br><br>इति तेऽन्योन्यमाविद्धा उत्तरोत्तरभाषिणः।<br>आसाद्य पृच्छन्ति तदा दानवास्त्रिपुरालयाः ॥ २५<br><br>तारकाख्यपुरे दैत्यास्तारकाख्यपुरःसराः।<br>निर्गताः कुपितास्तूर्णं बिलादिव महोरगाः ॥ २६भगवान् रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज इन्द्र उस विशाल सेनाके साथ उस त्रिपुरको जीतनेके लिये आगे बढ़े। चलते समय देवताओं और पार्षदगणोंके रथोंसे भीषण शब्द हो रहा था और वे सभी मेघकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उस शब्दको सुनकर दानवगण युद्धकी लालसासे अस्त्र लेकर त्रिपुरसे बाहर निकले और आकाशमें छलाँग मारते हुए गणेश्वरोंपर टूट पड़े। उनमें कुछ अन्य उद्दण्ड दानव, जो काले मेघके समान शोभा पा रहे थे, मेघकी तरह गर्जना कर रहे थे और सिंहनाद करते हुए बाजा बजा रहे थे। उस समय दैत्योंके सिंहनादसे देवताओंका सिंहनाद और सभी प्रकारके तुरही आदि बाजोंका महान् शब्द उसी प्रकार अभिभूत हो गया, जैसे बादलोंके बीच चन्द्रमा छिप जाते हैं। जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर पूर्णिमा तिथिको समुद्र वृद्धिंगत हो जाता है, वैसे ही उन भयंकर रूपवाले महान् असुरोंसे त्रिपुर उद्दीप्त हो उठा। उस पुरमें कुछ दानव परकोटोंपर तथा कुछ फाटकों और अट्टालिकाओंपर चढ़कर 'चलो, निकलो' ऐसा कहकर ललकार रहे थे। कुछ शूर-वीर दानव सुन्दर एवं श्रेष्ठ वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके गलेमें स्वर्णकी जंजीर शोभा पा रही थी और वे जलसे भरे हुए बादलकी भाँति सिंहनाद कर रहे थे। कुछ वस्त्र फहराते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे और घरपर आकर परस्पर एक-दूसरेसे पूछ रहे थे—'यह क्या हो रहा है?' (दूसरा उत्तर देता था कि) 'क्या हो रहा है, यह तो मैं नहीं जानता; क्योंकि उसकी जानकारी मुझसे छिपी हुई है। कुछ समयके बाद तुम्हें भी ज्ञात हो जायगा। अभी तो बहुत समय शेष है। (देखो न) वहाँ पृथ्वीके सारभूत रथपर बैठा हुआ वह जो सिंह खड़ा है, वह त्रिपुरको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे बढ़ी हुई व्याधि शरीरको कष्ट देती है। वह जो हो, सो रहे; ऐसे हलचलके उपस्थित होनेपर चिन्ता करना व्यर्थ है। अब हथियार लेकर मैदानमें आ जाओ, फिर मुझसे पूछनेकी आवश्यकता नहीं रह जायगी।' उसी समय त्रिपुरनिवासी दानव परस्पर एक-दूसरेको पकड़कर इसी प्रकार पूछते थे और परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर देते थे ॥ १३–२५ ॥<br><br>इधर तारकाक्षपुरके निवासी दैत्य क्रोधसे भरे हुए तारकाक्षको आगे करके तुरंत नगरसे उसी प्रकार बाहर निकले, मानो बिलसे विषधर सर्प निकल रहे हों।

४७८ * मत्स्यपुराण *


| निर्यावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः।<br>निरुद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः॥ २७<br><br>दर्पितानां ततश्चैषां दर्पितानामिवाग्निनाम्।<br>रूपाणि जज्वलुस्तेषामग्नीनामिव धम्यताम्॥ २८<br><br>ततो बृहन्ति चापानि भीमनादानि सर्वशः।<br>निकृष्य जघ्नुरन्योऽन्यमिषुभिः प्राणभोजनैः॥ २९<br><br>मार्जारमृगभीमास्यान् पार्षदान् विकृताननान्।<br>दृष्ट्वा दृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा॥ ३०<br><br>बाहुभिः परिघाकारैः कृष्यतां धनुषां शराः।<br>भटवर्मेषु विविशुस्तडागानीव पक्षिणः॥ ३१<br><br>मृताः स्थ क्व नु यास्यध्वं हनिष्यामो निवर्तताम्।<br>इत्येवं परुषाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्षभान्॥ ३२<br><br>बिभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्यपादा इवाम्बुदान्।<br>प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः।<br>खण्डशैलशिलावृक्षैर्बिभिदुर्देत्यदानवान् ॥ ३३<br><br>अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमिवाम्बरम्।<br>दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं बभौ॥ ३४<br><br>विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम्।<br>इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम्॥ ३५<br><br>इषुभिस्ताड्यमानास्ते भूयो भूयो गणेश्वराः।<br>चक्रूस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः॥ ३६<br><br>तेऽथ वृक्षशिलावज्रशूलपट्टिशपरश्वधैः।<br>चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव॥ ३७<br><br>तारकाख्यो जयत्येष इति दैत्या अघोषयन्।<br>जयतीन्द्रश्च रुद्रश्च इत्येव च गणेश्वराः॥ ३८ | बाहर निकलकर उन दैत्योंने देवसेनापर धावा बोल दिया, परंतु प्रमथगणोंके यूथपतियोंने उन्हें ऐसा रोक दिया, जैसे सिंहसमूह गजराजोंके दलको स्तम्भित कर देते हैं। उन गर्वीले दानवोंका रूप तो यों ही (क्रोधके कारण) अग्निकी तरह उद्दीप्त हो उठा था, इधर रोक दिये जानेपर वे धौंकी जाती हुई आगकी तरह जल उठे। फिर तो सब ओर भयंकर सिंहनाद होने लगा। दानवगण बड़े-बड़े धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर प्राण-हरण करनेवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। प्रमथगणोंमें किन्हींके मुख बिलाव और किन्हींके मृगके समान भयंकर थे तथा किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे। उन्हें देख-देखकर ठहाका मारकर सौन्दर्यशाली दानव हँसने लगे। परिघकी-सी आकारवाली भुजाओंद्वारा खींचे जाते हुए धनुषोंसे छूटे हुए बाण योद्धाओंके कवचोंमें उसी प्रकार घुस जाते थे, जैसे पक्षी तालाबोंमें प्रवेश करते हैं। उस समय दानवगण पार्षदयूथपतियोंको ललकारकर कह रहे थे—'अरे! अब तो तुमलोग मरे ही हो। हमारे हाथोंसे छूटकर कहाँ जाओगे! लौट आओ। हमलोग तुम्हें मार डालेंगे।' ऐसी कठोर बातें कहकर वे अपने तीखे बाणोंसे उन्हें इस प्रकार विदीर्ण कर रहे थे, जैसे सूर्यकी किरणें बादलोंको भेदकर पार कर जाती हैं। उधरसे सिंहके समान पराक्रमी एवं सिंह-सदृश नेत्रोंवाले प्रमथगण भी शिलाओं, शिलाखण्डों और वृक्षोंके प्रहारसे दैत्यों और दानवोंको चूर्ण-सा कर दे रहे थे। उस समय बादलोंसे आच्छादित एवं हंसोंसे व्याप्त आकाशकी तरह वह सारा पुर दानवोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जैसे इन्द्र-धनुषसे चिह्नित मध्यभागवाले बादल जलकी वृष्टि कर दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस) उत्पन्न कर लेते हैं, उसी प्रकार दैत्येन्द्रगण अपने धनुषोंकी प्रत्यञ्चाको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा कर अन्धकार उत्पन्न कर रहे थे। दानवोंके बाणोंसे बारम्बार घायल होनेके कारण गणेश्वरोंके शरीरोंसे रक्तकी धार बह रही थी, जो ऐसी प्रतीत होती थी, मानो पर्वतोंसे सुवर्णधातु निकल रही हो। उधर गणेश्वरोंद्वारा चलाये गये वृक्ष, शिला, वज्र, शूल, पट्टिश और कुठारके प्रहारसे दैत्यगण ऐसे चूर-चूर कर दिये जा रहे थे जैसे कुल्हाड़ी या छेनीके प्रहारसे काच छिन्न-भिन्न हो जाता है। उधर दैत्यगण 'यह देखो, तारकाक्ष जीत रहा है'—ऐसी घोषणा कर रहे थे। तभी इधरसे गणेश्वर सिंहनाद करते हुए बोल रहे थे—'देखो-देखो, इन्द्र और रुद्र विजयी हो रहे हैं'॥ २६–३८॥ |

* अध्याय १३५ *४७९

| वारिता दारिता बाणैर्योधास्तस्मिन् बलोभये।<br>निःस्वनन्तोऽम्बुसमये जलगर्भा इवाम्बुदाः ॥ ३९<br>करैश्छिन्नैः शिरोभिश्च ध्वजैश्छत्रैश्च पाण्डुरैः ।<br>युद्धभूमिर्भयवती मांसशोणितपूरिता ॥ ४०<br>व्योम्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं वरायुधैः ।<br>दृढाहताः पतन पूर्वं दानवाः प्रमथास्तथा ॥ ४१<br>सिद्धाश्चाप्सरसश्चैव चारणाश्च नभोगताः ।<br>दृढप्रहारहर्षिताः साधु साध्विति चुक्रुशुः ॥ ४२<br>अनाहताश्च वियति देवदुन्दुभयस्तथा।<br>नदन्तो मेघशब्देन शरभा इव रोषिताः ॥ ४३<br>ते तस्मिंस्त्रिपुरे दैत्या नद्यः सिन्धुपताविव ।<br>विशन्ति क्रुद्धवदना वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ४४<br>तारकाख्यपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः ।<br>सशस्त्रा निपतन्ति स्म सपक्षा इव भूधराः ॥ ४५<br>योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः ।<br>विद्युन्माली मयश्चैव मग्नौ च द्रुमवद्रणे ॥ ४६<br>विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरीन्द्रसदृशद्युतिः ।<br>आदाय परिघं घोरं ताडयामास नन्दिनम् ॥ ४७<br>स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण दृढाहतः ।<br>भ्रमते मधुनाऽव्यक्तः पुरा नारायणो यथा ॥ ४८ | उन दोनों सेनाओंमें बाणोंद्वारा रोके एवं घायल किये गये वीर इतने जोरसे सिंहनाद कर रहे थे जैसे वर्षाकालमें जलसे भरे हुए बादल गरजते हैं। कटे हुए हाथों, मस्तकों, पीले रंगकी पताकाओं और छत्रोंसे तथा मांस और रुधिरसे भरी हुई युद्धभूमि बड़ी भयावनी लग रही थी। दानव तथा प्रमथगण उत्तम अस्त्र धारण कर पहले तो सहसा ताड़-वृक्षकी ऊँचाई-बराबर आकाशमें उछल पड़ते थे और पुनः सुदृढ़रूपसे घायल होकर भूतलपर गिर पड़ते थे। गगनमण्डलमें स्थित सिद्ध, अप्सरा और चारणोंके समूह (दानवोंपर) सुदृढ़ प्रहार होनेसे हर्षित होकर 'ठीक है, ठीक है', ऐसा कहते हुए चिल्लाने लगते थे। उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना चोट किये ही बज रही थीं। उनसे मेघकी गर्जना तथा क्रुद्ध हुए शरभ (अष्टपदी)-की दहाड़के समान शब्द हो रहे थे। दैत्यगण उस त्रिपुरमें इस प्रकार प्रविष्ट हो रहे थे जैसे नदियाँ समुद्रमें और क्रुद्ध मुखवाले सर्प बिमवटमें प्रवेश करते हैं। इधर अस्त्रधारी, शूरवीर देवगण तारकाक्षके उस नगरके ऊपर चारों ओर इस प्रकार छाये हुए थे, मानो पंखधारी पर्वत मँडरा रहे हों। गणेश्वर त्रिपुरमें तीन भागोंमें विभक्त होकर युद्ध कर रहे थे। उस समय विद्युन्माली और मय—ये दोनों युद्धस्थलमें वृक्षकी भाँति डटे हुए थे। इसी बीच हिमालय-तुल्य कान्तिमान् दैत्येन्द्र विद्युन्मालीने अपना भयंकर परिघ उठाकर नन्दीपर प्रहार किया। दानवेन्द्रके उस परिघके आघातसे नन्दी विशेषरूपसे घायल हो गये और वे ऐसा चक्कर काटने लगे, जैसे पूर्वकालमें दैत्यराज मधुके प्रहारसे अव्यक्तस्वरूप भगवान् नारायण भ्रमित हो गये थे ॥ ३९–४८ ॥ |
| नन्दीश्वरे गते तत्र गणपाः ख्यातविक्रमाः ।<br>दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युन्मालिनमासुरम् ॥ ४९<br>घण्टाकर्णः शङ्कुकर्णो महाकालश्च पार्षदाः ।<br>ततश्च सायकैः सर्वान् गणपान् गणपाकृतीन् ॥ ५०<br>भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान् ।<br>भित्त्वा भित्त्वा रुरावोच्चैर्नभस्यम्बुधरो यथा ॥ ५१<br>तस्यारम्भितशब्देन नन्दी दिनकरप्रभः ।<br>संज्ञां लभ्य ततः सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत् ॥ ५२ | नन्दीश्वरके घायल होकर रणभूमिसे हट जानेपर विख्यातपराक्रमी घण्टाकर्ण, शङ्कुकर्ण और महाकाल आदि प्रधान पार्षदगण क्रुद्ध होकर एक साथ राक्षस विद्युन्मालीके ऊपर टूट पड़े। तब विद्युन्मालीने उन सभी गणेश्वरोंको जो गणेश-सदृश आकृतिवाले तथा गणेश्वरोंमें प्रधान थे, बाणोंद्वारा लगातार बींधना आरम्भ किया। वह उन्हें घायल करके इतने उच्च स्वरसे सिंहनाद करता था मानो आकाशमें बादल गरज रहे हों। उसके उस सिंहनादसे सूर्य-सरीखे प्रभाशाली नन्दीकी मूर्च्छा भंग हो गयी, तब वे भी विद्युन्मालीपर चढ़ धाये। |