मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२२- शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन
| * अध्याय १२० * | ४०७ |
|---|---|
| क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः।<br>मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥ २३<br>काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।<br>शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ॥ २४<br>काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।<br>कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना॥ २५ | जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा॥ ९—२५॥ |
| वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते ।<br>काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥ २६<br>पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।<br>काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७<br>काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।<br>पीत्वा पप्रच्छ रमणं क्व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८<br>त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।<br>तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव व्रीडिता भृशम्॥ २९<br>काचित् कान्तार्पितं सुभ्रूः कान्तपीतावशेषितम्।<br>सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥ ३०<br>आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।<br>शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम्॥ ३१<br>प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम्।<br>राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२<br>याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।<br>आवसन् संयुताः कान्तैः परर्द्धिरचितां गुहाम्॥ ३३<br>नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।<br>नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥ ३४<br>एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।<br>तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५<br>तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम॥ ३६<br>वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काङ्क्षितान् वरान्।<br>तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥ ३७ | राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थीं, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोलीं—'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये'॥ २६—३७॥ |
| राजोवाच<br>अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।<br>वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्॥ ३८ | राजाने कहा— गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह |
४०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| एवमस्त्वित्यथोक्तस्तैः स तु राजा पुरूरवाः।<br>तत्रोवास सुखी मासं पूजयन्तो जनार्दनम्॥ ३९<br>प्रिय एव सदैवासीद् गन्धर्वाप्सरसां नृपः।<br>तुतोष स जनो राज्ञस्तस्यालौल्येन कर्मणा॥ ४०<br>मासस्य मध्ये स नृपः प्रविष्ट-<br> स्तदाश्रमं रत्नसहस्रचित्रम्।<br>तोयाशनस्तत्र ह्युवास मासं<br> यावत्सितान्तो नृप फाल्गुनस्य॥ ४१<br>फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्ने पुरूरवाः।<br>तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम्॥ ४२<br>रात्र्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि।<br>तेन राजन् समागम्य कृतकृत्यो भविष्यसि॥ ४३<br>स्वप्नमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः।<br>प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः॥ ४४<br>कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम्।<br>ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्॥ ४५<br>स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः।<br>ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम्॥ ४६<br>एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा।<br>एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाज्जनार्दनात्॥ ४७<br>कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः।<br>सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८ | सुनकर वे 'एवमस्तु—ऐसा ही होगा'—ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धर्वों एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन्! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रत्नोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीं आ गयी। राजा पुरूरवाने फल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिकी रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना—'राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्न दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रातःकाल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवान्द्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने देवताओंद्धारा कहे हुए इस वचनको फिर सुना—'महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं॥३८—४८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२०॥
* अध्याय १२१ * ४०९
एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय
कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br><br>तस्याश्रमस्योत्तरतस्त्रिपुरारिनिषेवितः ।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः कल्पद्रुमसमन्वितैः ॥ १<br><br>मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः ।<br>तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः ॥ २<br><br>अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः ।<br>कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् ॥ ३<br><br>मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसंनिभम् ।<br>तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ ४<br><br>दिव्यं च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम् ।<br>प्रागुत्तरेण कैलासाद् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ॥ ५<br><br>सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति ।<br>चन्द्रप्रभो नाम गिरिः यः शुभ्रो रत्नसंनिभः ॥ ६<br><br>तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम् ।<br>तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ७<br><br>तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्ररथं शुभम् ।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति मणिभद्रः सहानुगः ॥ ८<br><br>यक्षसेनापतिः शूरो गुह्यकैः परिवारितः ।<br>पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! उस आश्रमकी उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतके पृष्ठ-भागके मध्यमें कैलास नामक पर्वत स्थित है। उसपर त्रिपुरासुरके संहारक शंकरजी निवास करते हैं। उसके शिखर नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं तथा उनपर कल्पवृक्ष शोभा पा रहे हैं। उस पर्वतपर श्रीमान् कुबेर गुह्यकोंके साथ निवास करते हैं। इस प्रकार अलकापुरीके अधीश्वर राजा कुबेर अप्सराओंद्वारा अनुगमन किये जाते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। कैलासके पाद (उपत्यका)-से एक मन्दोदक नामक सरोवर प्रकट हुआ है, जिसका जल बड़ा पवित्र, निर्मल एवं शीतल है। उसका जल दहीके समान उज्ज्वल है। उसी सरोवरसे मङ्गलमयी दिव्य मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती है। वहाँ उस नदीके तटपर नन्दन नामक दिव्य एवं महान् वन है। कैलासकी पूर्वोत्तर दिशामें चन्द्रप्रभ नामक पर्वत है, जो रत्न-सदृश चमकदार है। वह सभी प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा अनेकों प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित दिव्य सुबेल पर्वततक फैला हुआ है। उसके निकट अच्छोद (अच्छावत) नामसे विख्यात एक दिव्य सरोवर है, उससे अच्छोदिका (अच्छोदा) नामकी कल्याणमयी दिव्य नदी उद्भूत हुई है। उस नदीके तटपर चैत्ररथ नामक दिव्य एवं सुन्दर महान् वन है। उस पर्वतपर शूरवीर यक्ष-सेनापति मणिभद्र गुह्यकोंसे घिरे हुए अपने अनुयायियोंके साथ निवास करते हैं। पुण्यमयी मन्दाकिनी तथा कल्याणकारिणी अच्छोदा—ये दोनों नदियाँ पृथ्वी-मण्डलके मध्यभागसे प्रवाहित होती हुई महासागरमें मिली हैं॥ १—९ १/२ ॥ |
| महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टा सा महोदधिम् ।<br>कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वौषधिं गिरिम् ॥ १० | कैलासके दक्षिण-पूर्व दिशामें लाल वर्णवाला हेमशृङ्ग नामक एक विशाल पर्वत है। वह दिव्य सुवेल पर्वततक |
| ४१० | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| मनःशिलामयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति।<br>लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान्॥ ११<br><br>तस्य पादे महद् दिव्यं लोहितं सुमहत्सरः।<br>तस्मात् प्रभवते पुण्यो लौहित्यश्च नदो महान्॥ १२<br><br>दिव्यारण्यं विशोकं च तस्य तीरे महद् वनम्।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षो मणिधरो वशी॥ १३<br><br>सौम्यैः सुधार्मिकैश्चैव गुह्यकैः परिवारितः।<br>कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधिगिरिः॥ १४<br><br>ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः।<br>तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥ १५<br><br>सर्वधातुमयस्तत्र सुमहान् वैद्युतो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम्॥ १६<br><br>तस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी।<br>यस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नाम विश्रुतम्॥ १७<br><br>कुवेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो वशी।<br>ब्रह्मधाता निवसति राक्षसोऽनन्तविक्रमः॥ १८<br><br>कैलासात् पश्चिमामाशां दिव्यः सर्वौषधिगिरिः।<br>वरुणः पर्वतश्रेष्ठो रूक्मधातुविभूषितः॥ १९<br><br>भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हैमसंनिभः।<br>शातकौम्भमयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः॥ २०<br><br>शतसंख्यैस्तापनीयैः शृङ्गैर्दिवमिवोल्लिखन्।<br>शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गः शैलो महाचितः॥ २१<br><br>तस्मिन् गिरौ निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः।<br>तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥ २२ | फैला हुआ है। उसकी कान्ति सूर्यके समान है। वह मङ्गलप्रद पर्वत सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा मैनशिल नामक धातुसे परिपूर्ण है। उसके पाद-प्रान्तमें एक विशाल दिव्य सरोवर है, जिसका नाम लोहित है। वह पुण्यमय लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नामक महान् नदका उद्गमस्थान है। उस नदके तटपर विशोक नामक एक दिव्य एवं विस्तृत वन है। उस पर्वतपर मणिधर नामक यक्ष इन्द्रियोंको वशमें करके परम धार्मिक एवं सौम्य-स्वभाववाले गुह्यकोंके साथ निवास करता है। कैलासकी पश्चिमोत्तर दिशामें ककुद्मान् नामक पर्वत है, जिसपर सभी प्रकारकी ओषधियाँ सुलभ हैं। वह अञ्जन-जैसा काला तथा तीन शिखरोंसे सुशोभित है। उस ककुद्मान् पर्वतपर भगवान् रुद्रके गण ककुद्मी (नन्दिकेश्वर)-की उत्पत्ति हुई है। वहीं समस्त धातुओंसे सम्पन्न वैद्युत नामक अत्यन्त महान् पर्वत है, जो त्रिककुद् पर्वततक विस्तृत है। उसके पाद-प्रान्तमें सिद्धोंद्वारा सेवित एक महान् दिव्य मानस सरोवर है। उस सरोवरसे लोकपावनी पुण्य-सलिला सरयू* निकली हुई हैं, जिनके तटपर (वरुणका) वैभ्राज नामक सुप्रसिद्ध दिव्य वन है। उस वनमें प्रहेतिका पुत्र ब्रह्मधाता नामक राक्षस निवास करता है। वह जितेन्द्रिय, अनन्तपराक्रमी और कुबेरका अनुचर है॥ १०—१८॥<br><br>कैलासकी पश्चिम दिशामें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न वरुण नामक दिव्य पर्वत है। वह पर्वतश्रेष्ठ सुवर्ण आदि धातुओंसे विभूषित, भगवान् शंकरका प्रियपात्र, शोभाशाली, स्वर्णसदृश चमकीला और स्वर्णमयी दिव्य शिलाओंसे सम्पन्न है। वह अपने स्वर्णसरीखे चमकदार सैकड़ों शिखरोंसे आकाशको छूता हुआ-सा दीख पड़ता है। वहीं शृङ्गवान् नामका एक महान् दिव्य पर्वत है, जो समृद्धिशाली एवं दुर्गम है। उस पर्वतपर धूम्रलोचन भगवान् शिव निवास करते हैं। उस पर्वतके पाद-प्रान्तमें शैलोद नामक सरोवर है। उसीसे मङ्गलमयी पुण्यतोया शैलोदका नामकी नदी प्रवाहित होती है। उसे चक्षुषी |
* इस अध्यायका हिमालयसे सम्बद्ध भौगोलिक विवरण बड़े महत्त्वका है और यह वर्णन बहुत कुछ कालिकापुराणसे मिलता है।
* अध्याय १२१ * । ४११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा।<br>सा चक्षुषी तयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम्॥ २३<br>अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वौषधो गिरिः।<br>गौरं तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति॥ २४<br>हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं सरः काञ्चनवालुकम्॥ २५<br>रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः।<br>गङ्गार्थे स तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः॥ २६<br>दिवं यास्यन्तु मे पूर्वे गङ्गातोयाप्लुतास्थिकाः।<br>तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता॥ २७<br>सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते।<br>यूपा मणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मयाः॥ २८<br>तत्रेष्ट्वा क्रतुभिः सिद्धः शक्रः सुरगणैः सह।<br>दिव्यश्छायापथस्तत्र नक्षत्राणां तु मण्डलम्॥ २९<br>दृश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा।<br>अन्तरिक्षं दिवं चैव भावयित्वा भुवं गता॥ ३०<br>भवोत्तमाङ्गे पतिता संरुद्धा योगमायया।<br>तस्या ये बिन्दवः केचित्क्रुद्धायाः पतिता भुवि॥ ३१<br>कृतं तु तैर्बहुसरस्ततो बिन्दुसरः स्मृतम्।<br>ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहसा रुषा॥ ३२<br>ज्ञात्वा तस्या ह्यभिप्रायं क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>भित्त्वा विशामि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्॥ ३३<br>अथावलेपं तं ज्ञात्वा तस्याः क्रुद्धस्तु शङ्करः।<br>तिरोभावयितुं बुद्धिरासीदङ्गेषु तां नदीम्॥ ३४<br>एतस्मिन्नेव काले तु दृष्ट्वा राजानमग्रतः।<br>धमनीसंततं क्षीणं क्षुधाव्याकुलितेन्द्रियम्॥ ३५ | भी कहते हैं। वह उन दोनों पर्वतोंके बीचसे बहती हुई पश्चिम-सागरमें जा मिली है। कैलासकी उत्तर दिशामें हिरण्यशृङ्ग नामका अत्यन्त विशाल पर्वत है, जो हरितालसे परिपूर्ण पर्वतश्रेष्ठ गौरतक फैला हुआ है। इस कल्याणकारी पर्वतपर दिव्य ओषधियाँ प्राप्त होती हैं। इसके पादप्रान्तमें बिन्दुसर नामक अत्यन्त रमणीय दिव्य सरोवर है, जो सुवर्णके समान बालुकासे युक्त है। यहींपर राजर्षि भगीरथने 'मेरे पूर्वज गङ्गाजलसे हड्डियोंके अभिषिक्त हो जानेपर स्वर्गलोकको चले जायँ, इस भावनासे भावित होकर गङ्गाको भूतलपर लानेके लिये बहुत वर्षोंतक (तप करते हुए) निवास किया था। इसलिये त्रिपथगा* गङ्गादेवी सर्वप्रथम वहीं प्रतिष्ठित हुई थीं और सोम पर्वतके पादसे निकलकर सात भागोंमें विभक्त हो गयीं। उस सरोवरके तटपर अनेकों मणिमय यज्ञस्तम्भ तथा स्वर्णमय विमान शोभा पा रहे थे। वहाँ देवताओंके साथ इन्द्रने यज्ञोंका अनुष्ठान कर सिद्धि लाभ किया था। वहाँ दिव्य छायापथ तथा नक्षत्रोंका मण्डल विद्यमान है। वहाँ त्रिपथगा गङ्गादेवी रातमें चमकती हुई दीख पड़ती हैं॥ १९—२९ १/२ ॥<br><br>गङ्गादेवी स्वर्गलोक और अन्तरिक्षलोकको पवित्र कर भूतलपर आयीं और वे शिवजीके मस्तकपर गिरीं। तब शिवजीने अपनी योगमायाके बलसे उन्हें वहीं रोक दिया। (इससे गङ्गादेवी क्रुद्ध हो गयीं।) उस समय उन कुपित हुई गङ्गादेवीकी जो कुछ बूँदें पृथ्वीपर गिरीं, उनसे 'बहुसर' नामक एक सरोवर बन गया, वही आगे चलकर 'बिन्दुसर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस समय शिवजीके सहसा रोक लिये जानेपर गङ्गादेवी क्रुद्ध होकर ऐसा विचार करने लगीं कि मैं अपनी धाराके साथ शङ्करको बहाती हुई पृथ्वीको फोड़कर पातालमें प्रवेश कर जाऊँगी। जब शङ्करजीको गङ्गाकी यह कुचेष्टा और क्रूर अभिप्राय ज्ञात हुआ, तब वे उसे गङ्गाका अभिमान समझकर क्रुद्ध हो गये और उस नदी-रूपिणी गङ्गाको अपने अङ्गोंमें ही लीन कर लेनेका विचार करने लगे; परंतु ठीक इसी समय राजा भगीरथ, जिनकी इन्द्रियाँ भूखसे व्याकुल हो गयी थीं तथा जिनके शरीरमें नसेंमात्र दीख रही थीं, शिवजीके सम्मुख आ गये। |
* वाल्मी० रामायण (१। ४४। ६)-के अनुसार गङ्गा भू, पाताल, स्वर्ग—इन तीन पथों—मार्गोंको भावित—पवित्र करनेके कारण 'त्रिपथगा' कही जाती हैं—'त्रीन् पथो भावयतीति तस्मात्त्रिपथगा स्मृता।'
४१२ * मत्स्यपुराण *
| अनेन तोषितश्चाहं नद्यर्थे पूर्वमेव तु।<br>बुद्ध्वास्य वरदानं तु ततः कोपं न्ययच्छत॥ ३६<br><br>ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा यदुक्तं धारयन् नदीम्।<br>ततो विसर्जयामास संरुद्धां स्वेन तेजसा॥ ३७<br><br>नदीं भगीरथस्यार्थे तपसोग्रेण तोषितः।<br>ततो विसर्जयामास सप्त स्रोतांसि गङ्गया॥ ३८ | उन क्षीणकाय नरेशको देखकर शङ्करजी विचारमें पड़ गये कि इसने तो पहले ही इस नदीको भूतलपर लानेके लिये तपस्याद्वारा मुझे संतुष्ट कर लिया है। फिर अपने द्वारा राजाको दिये गये वरदानको यादकर उन्होंने अपने क्रोधको रोक लिया। तत्पश्चात् गङ्गा नदीको धारण करते समय ब्रह्माद्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर तथा भगीरथकी उग्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने अपने तेजसे रोकी हुई गङ्गा नदीको छोड़ दिया। इसके बाद गङ्गा सात धाराओंमें विभक्त होकर प्रवाहित हुई॥ ३०—३८॥ |
| त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं त्रीण्यथैव तु।<br>स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा॥ ३९<br><br>नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः।<br>सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च तिस्त्रस्ता वै प्रतीच्यगाः॥ ४०<br><br>सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम्।<br>तस्माद् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४१<br><br>सप्त चैताः प्लावयन्ति वर्षं तु हिमसाह्वयम्।<br>प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा बिन्दुसरोद्भवाः॥ ४२<br><br>तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्वशः।<br>सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् बर्बरान् यवनान् खसान्॥ ४३<br><br>पुलिन्दांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलौक्यान् वरांश्च यान्।<br>कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४४ | त्रिपथगा गङ्गाकी तीन धाराएँ पूर्वाभिमुखी तथा तीन पश्चिमाभिमुखी प्रवाहित हुई (और सातवीं धारा स्वयं भागीरथी गङ्गा थीं)। इस प्रकार वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। उनमें पूर्व दिशामें बहनेवाली धाराओंका नाम नलिनी, ह्लादिनी और पावनी है तथा पश्चिम दिशामें प्रवाहित होनेवाली तीनों धाराएँ सीता, चक्षु और सिंधु नामसे कही गयी हैं। उनमें सातवीं धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर चली और दक्षिणसागरमें प्रविष्ट हो गयी, इसी कारण वह भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। ये ही सातों धाराएँ हिमवर्षको आप्लावित करती हैं। इस प्रकार ये सातों नदियाँ बिन्दुसरसे निकली हुई हैं। ये सब ओरसे उन म्लेच्छप्राय देशोंको सींचती हैं, जो पर्वतीय कुकुर, रौध्र, बर्बर, यवन, खस, पुलिन्द, कुलत्थ, अङ्गलौक्य और वर नामसे कहे जाते हैं। इस प्रकार गङ्गा हिमवान्को दो भागोंमें विभक्त कर दक्षिणसमुद्रमें प्रवेश कर गयी हैं। |
| अथ वीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैव शूलिकान्।<br>तुषारान् बर्बरान् कारान् पह्लवान् पारदाञ्छकान्॥ ४५<br><br>एताञ्जनपदांश्चक्षुः प्लावयित्वोदधिं गता।<br>दरदोर्जगुडांश्चैव गान्धारानौरसान् कुहून्॥ ४६<br><br>शिवपौरानिन्द्रमरून् वसतीन् समतेजसम्।<br>सैन्धवानुर्वशांन् बर्बान् कुपथान् भीमरोमकान्॥ ४७<br><br>शुनामुखांश्चोर्दमरून् सिन्धुरेतान् निषेवते।<br>गन्धर्वान् किंनरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान्॥ ४८<br><br>कलापग्रामकांश्चैव तथा किम्पुरुषान् नरान्।<br>किरातांश्च पुलिन्दांश्च कुरून् वै भारतानपि॥ ४९ | इसके बाद चक्षु (वंक्षु) नदी वीरमरु, कालिक, शूलिक, तुषार, बर्बर, कार, पह्लव, पारद और शक—इन देशोंको आप्लावित कर समुद्रमें मिल गयी है। सिन्धु नदी दरद, उर्जगुड, गान्धार, औरस, कुहू, शिवपौर, इन्द्रमरु, वसति, सैन्धव, उर्वश, वर्ब, कुपथ, भीमरोभक, शुनामुख और उर्दमरु—इन देशोंकी सेवा करती अर्थात् इन देशोंमें बहती है। मङ्गलमयी गङ्गा गन्धर्व, किंनर, यक्ष, राक्षस, विद्याधर, नाग, कलापग्रामवासी जन, किम्पुरुष, किरात, पुलिन्द, कुरु, भारत, पाञ्चाल, कौशिक मत्स्य (विराट), मगध, अङ्ग, |
- अध्याय १२१ * ४१३
| पाञ्चालान् कौशिकान् मत्स्यान् मागधाङ्गांस्तथैव च।<br>सुह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च ताम्रलिप्तांस्तथैव च॥ ५०<br>एताञ्जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा।<br>ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ५१ | उत्तरसुह्म, वङ्ग और ताम्रलिप्त—इन आर्य देशोंको पवित्र करती हैं। इस प्रकार वे (हिमालयसे निकलकर) विन्ध्यपर्वतसे अवरुद्ध होकर पूर्वकी ओर आगे बढ़ती हुई दक्षिणसमुद्रमें मिल गयी हैं॥ ३९–५१॥ |
| ततस्तु ह्लादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखी ययौ।<br>प्लावयन्त्युपकांश्चैव निषादानपि सर्वशः॥ ५२<br>धीवरानृषिकांश्चैव तथा नीलमुखानपि।<br>केकरानेककर्णांश्च किरातानपि चैव हि॥ ५३<br>कालञ्जरान् विकर्णांश्च कुशिकान् स्वर्गभौमकान्।<br>सा मण्डले समुद्रस्य तीरे भूत्वा तु सर्वशः॥ ५४<br>ततस्तु नलिनी चापि प्राचीमेव दिशं ययौ।<br>कुपथान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि॥ ५५<br>तथा खरपथान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि।<br>मध्येनोजानकमरून् कुथप्रावरणान् ययौ॥ ५६<br>इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम्।<br>ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशां जवेन तु॥ ५७<br>तोमरान् प्लावयन्ती च हंसमार्गान् समूहकान्।<br>पूर्वान् देशांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधा गिरिम्।<br>कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि॥ ५८<br>सिक्त्वा पर्वतमेरुं सा गत्वा विद्याधरानपि।<br>शैमिमण्डलकोष्ठं तु सा प्रविष्टा महत्सरः॥ ५९<br>तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः॥ ६० | इसी प्रकार पुण्यतोया ह्लादिनी, जो पूर्वाभिमुखी प्रवाहित होती है, उपका, निषाद, धीवर, ऋषिक, नीलमुख, केकर, अनेककर्ण, किरात, कालेंजर, विकर्ण, कुशिक और स्वर्गभौमक—इन सभी देशोंको सींचती हुई समुद्रमण्डलके तटपर पहुँचकर उसमें लीन हो गयी है।<br><br>नलिनी नदी भी बिन्दुसरसे निकलकर पूर्व दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। वह कुपथ, इन्द्रद्युम्नसर, खरपथ, वेत्र (ट) द्वीप, शङ्कुपथ आदि प्रदेशोंको सींचती हुई उज्जानक (जूनागढ़) मरुके मध्यभागसे बहती हुई कुथप्रावरणकी ओर चली गयी है तथा इन्द्रद्वीपके निकट लवणसागरमें मिल गयी है। उसी (मूल) सरोवरसे पावनी नदी बड़े वेगसे पूर्व दिशाकी ओर बहती है। वह तोमर, हंसमार्ग और समूहक देशोंको सींचती हुई पूर्वी देशोंमें जा पहुँचती है। वहाँ अनेकों प्रकारसे पर्वतको विदीर्ण करके कर्णप्रावरणमें पहुँचकर अश्वमुख देशमें चली जाती है। इसके बाद मेरु पर्वतको सींचती हुई विद्याधरोंके लोकोंमें जाकर शैमिमण्डलकोष्ठ नामक महान् सरोवरमें प्रवेश कर जाती है। इनकी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों सहायक नदियाँ भी हैं, जो पृथक्-पृथक् इन्हींमें आकर मिली हैं। इन्हींके जलको ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ ५२–६०॥ |
| तीरे वंशौकसारायाः सुरभिर्नाम तद् वनम्।<br>हिरण्यशृङ्गो वसति विद्वान् कौबेरको वशी॥ ६१<br>यज्ञादपेतः सुमहान्मितौजाः सुविक्रमः।<br>तत्रागस्त्यैः परिवृता विद्वद्भिर्ब्रह्मराक्षसैः॥ ६२<br>कुबेरानुचरा ह्येते चत्वारस्तत्समाशिताः।<br>एवमेव तु विज्ञेया सिद्धिः पर्वतवासिनाम्॥ ६३ | वंशौकसाराके तटपर सुरभि नामक वह वन है, जिसमें जितेन्द्रिय एवं विद्वान् हिरण्यशृङ्ग निवास करता है। वह कुबेरका अनुचर, यज्ञसे विमुख, अमित तेजस्वी एवं परम पराक्रमी है। वहीं अगस्त्यगोत्रीय विद्वान् ब्रह्मराक्षसोंका भी निवासस्थान है। (उनकी संख्या चार है।) वे चारों कुबेरके अनुचर हैं, जो उसी हिरण्यशृङ्गके आश्रममें रहते हैं। इसी प्रकार पर्वतनिवासियोंकी सिद्धि समझनी चाहिये। |
| ४१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृतम्॥ ६४<br>सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या।<br>अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ ६५<br>सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे।<br>यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते॥ ६६<br>मेरोः पार्श्वात् प्रभवति हृदश्चन्द्रप्रभो महान्।<br>जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदं स्मृतम्॥ ६७<br>पयोदस्तु ह्रदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान्।<br>पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६८<br>सरसस्तु सरस्वैतत् स्मृतमुत्तरमानसम्।<br>मृग्या च मृगकान्ता च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६९<br>ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः।<br>नाम्ना ते वैजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः॥ ७०<br>तेभ्यः शान्ती च मध्वी च द्वे नद्यौ सम्प्रसूतयाम्।<br>किम्पुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवो न वर्षति॥ ७१<br>उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः।<br>बलाहकश्च ऋषभो चक्रो मैनाक एव च॥ ७२ | वह धर्म, काम और अर्थके अनुसार परस्पर दुगुना फल देनेवाली होती है। हेमकूट पर्वतके पृष्ठभागपर जो सर्पोंका सरोवर बतलाया जाता है, उसीसे सरस्वती और ज्योतिष्मती नामकी दो नदियाँ निकली हैं। वे क्रमशः पूर्व और पश्चिम समुद्रमें जाकर मिली हैं। पर्वतश्रेष्ठ निषधपर विष्णुपद नामक सरोवर है, जो उसी पर्वतके अग्रभागसे निकला हुआ है। वे दोनों (नाग और विष्णुपद) सरोवर गन्धर्वोंके अनुकूल हैं। मेरुके पार्श्वभागसे चन्द्रप्रभ नामक महान् सरोवर तथा पुण्यसलिला जम्बू नदी निकलती है। जम्बू नदीमें जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है। वहीं पयोद और पुण्डरीकवान् नामक दो सरोवर और हैं, जिनका जल क्रमशः नील और श्वेत है। इन पुण्डरीक और पयोद सरोवरोंसे दो सरोवर और प्रकट हुए हैं। उनमें एक सरोवरसे निकला हुआ सर उत्तरमानस नामसे प्रसिद्ध है। उससे मृग्या और मृगकान्ता नामकी दो नदियाँ निकली हैं। कुरुदेशमें सागरके समान अगाध एवं विस्तृत बारह ह्रद हैं, जो कमलों और मछलियोंसे भरे रहते हैं, वे 'वैजय' नामसे विख्यात हैं। उनसे शान्ती और मध्वी नामकी दो नदियाँ निकली हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें इन्द्रदेव वर्षा नहीं करते, अपितु वहाँकी बड़ी-बड़ी नदियाँ ही अन्नोत्पादक जलको प्रवाहित करती हैं॥ ६१—७१ ½॥ |
| विनिविष्टाः प्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्।<br>चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणः सुमहांच्छ शिलोच्चयः॥ ७३ | बलाहक, ऋषभ, चक्र और मैनाक—ये चारों पर्वत क्रमशः चारों दिशाओंमें लवणसागरतक फैले हुए हैं। |
| उद्गायता उदीच्यां तु अवगाढा महोदधिम्।<br>चक्रो बधिरकश्चैव तथा नारदपर्वतः॥ ७४ | चन्द्रकान्त, द्रोण तथा सुमहान्—इन पर्वतोंका विस्तार उत्तर दिशामें महासागरतक है। |
| प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्ठास्ते महोदधिम्।<br>जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाकश्चन्द्रपर्वतः॥ ७५ | चक्र, बधिरक और नारद—ये पर्वत पश्चिम दिशामें फैले हुए हैं। इनका विस्तार महासागरतक है। |
| आयतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणां प्रति।<br>चक्रमैनाकयोर्मध्ये दिवि संदक्षिणापथे॥ ७६ | जीमूत, द्रावण, मैनाक और चन्द्र—ये महापर्वत दक्षिण दिशामें दक्षिण समुद्रतक विस्तृत हैं। दक्षिणापथके समुद्रमें चक्र और मैनाक पर्वतके मध्यमें संवर्तक नामक अग्निका निवास है। वह उस सागरके जलको पीता है। समुद्रमें निवास करनेवाला और्व नामक अग्नि है, |