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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

११४- भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षका वर्णन

* अध्याय ११२ *३७५

| महेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः।<br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात्॥ १०<br>यस्मिञ्जुह्वन् स्वकं पापं नरकं च न पश्यति।<br>एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रयागे समहेश्वरः॥ ११<br>सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले।<br>रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १२<br>ये चान्ये बहवः सर्वे तिष्ठन्ति च युधिष्ठिर।<br>पृथिवीं तत्समाश्रित्य निर्मिता दैवतैस्त्रिभिः॥ १३<br>प्रजापतेरिदं क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम्।<br>एतत् पुण्यं पवित्रं वै प्रयागं च युधिष्ठिर।<br>स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽनघ॥ १४ | तथा परमेश्वर शिव अक्षयवटके रूपमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त गन्धर्वोंसहित देवगण, सिद्धसमूह तथा यूथ-के-यूथ परमर्षि पाप-कर्मसे निवारण करनेके निमित्त नित्य प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं, जिस मण्डलमें अपने पापोंका हवन करके प्राणी नरकका दर्शन नहीं करता, इस प्रकार प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, सातों द्वीप, सातों समुद्र और भूतलपर स्थित सभी पर्वत उसकी रक्षा करते हुए प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। युधिष्ठिर! इनके अतिरिक्त अन्य जो बहुत-से देवता पृथ्वीका आश्रय लेकर निवास करते हैं, उनके निवासस्थानका निर्माण इन्हीं तीनों देवताओंद्वारा हुआ है। यह प्रयाग प्रजापति ब्रह्माका क्षेत्र है—ऐसी प्रसिद्धि है। युधिष्ठिर! यह प्रयाग पुण्यप्रद एवं परम पवित्र है। निष्पाप राजेन्द्र! तुम अपने भाइयोंके साथ अपना राज्य-कार्य सँभालो॥ ७–१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १११॥


एक सौ बारहवाँ अध्याय

भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन

| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रौपद्या सह भार्यया।<br>ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरून् देवानतर्पयत्॥ १<br>वासुदेवोऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा।<br>पाण्डवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानस्तु माधवः॥ २<br>कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः।<br>अभिषिक्तः स्वराज्ये च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ३<br>एतस्मिन्नन्तरे चैव मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>ततः स्वस्तीति चोक्त्वा तु क्षणादाश्रममागमत्॥ ४<br>युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽवसत्।<br>महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः॥ ५<br>यस्त्विदं कल्य उत्थाय माहात्म्यं पठते नरः।<br>प्रयागं स्मरते नित्यं स याति परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सभी भाइयों तथा पत्नी द्रौपदीके साथ ब्राह्मणोंको नमस्कार कर देवताओं एवं अपने गुरुजनोंको तर्पणद्वारा तृप्त किया। भगवान् वासुदेव भी अकस्मात् उसी क्षण वहीं आ पहुँचे। तब सभी पाण्डवोंने मिलकर भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की। तत्पश्चात् सभी महात्माओंके साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्णने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसी बीच महामुनि मार्कण्डेय ‘स्वस्ति—तुम्हारा कल्याण हो’—यों कहकर क्षणमात्रमें अपने आश्रमको लौट गये। तदनन्तर महामना एवं धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर भी बड़ा-बड़ा दान देकर भाइयोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस माहात्म्यका पाठ करता है तथा नित्य प्रयागका स्मरण करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा समस्त पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको चला जाता है॥ १–६॥ |

३७६* मत्स्यपुराण *
वासुदेव उवाच
मम वाक्यं च कर्तव्यं महाराज ब्रवीम्यहम्।<br>नित्यं जपस्व जुह्वस्व प्रयागे विगतज्वरः ॥ ७<br>प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर।<br>स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र स्वर्गलोकं न संशयः ॥ ८<br>प्रयागमनुगच्छेद् वा वसते वापि यो नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः।<br>अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥ १०<br>अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढव्रतः।<br>आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ॥ ११<br>ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम्।<br>न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते ॥ १२<br>बहुपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः।<br>प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् ॥ १३<br>यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर।<br>तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १४<br>ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम।<br>तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेभ्योऽपि विशिष्यते ॥ १५<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथाऽपगाः।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ ॥ १६<br>स्वस्थो भव महाराज भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।<br>पुनर्द्रक्ष्यसि राजेन्द्र यजमानो विशेषतः ॥ १७**भगवान् वासुदेवने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! मैं जैसा कह रहा हूँ, मेरे उस वचनका पालन कीजिये। आप प्रयागमें जाकर संतापरहित हो नित्य भगवन्नामका जप और हवन कीजिये तथा हमलोगोंके साथ नित्य प्रयागका स्मरण कीजिये। राजेन्द्र! ऐसा करनेसे आप स्वयं स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो मनुष्य प्रयागकी यात्रा करता है अथवा वहाँ निवास करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह रुद्रलोकको चला जाता है। जो प्रतिग्रह (दान लेने)-से विमुख, संतुष्ट, जितेन्द्रिय, पवित्र और अहंकारसे दूर रहता है, उसे तीर्थफलकी प्राप्ति होती है। जो क्रोधरहित, ईमानदार, सत्यवादी, दृढ़व्रत और समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही व्यवहार करता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। महीपते! ऋषियोंने तथा देवताओंने क्रमशः जिन यज्ञोंका विधान बतलाया है, उन यज्ञोंका अनुष्ठान निर्धन मनुष्य नहीं कर सकता; क्योंकि उन यज्ञोंमें बहुत-से उपकरणों तथा नाना प्रकारकी सामग्रियोंकी आवश्यकता पड़ती है। इनका अनुष्ठान तो राजा अथवा कहीं-कहीं कुछ समृद्धिशाली मनुष्य ही कर सकते हैं। नरेश्वर युधिष्ठिर! निर्धन मनुष्योंद्वारा भी जिस विधिका पालन किया जा सकता है और जो पुण्यमें यज्ञफलके समान है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनो! भरतसत्तम! यह पुण्यमयी तीर्थयात्रा ऋषियोंके लिये भी परम गोपनीय है तथा यज्ञोंसे भी बढ़कर फलदायक है। भरतर्षभ! दस हजार तीर्थ तथा तीन करोड़ नदियाँ माघमासमें गङ्गामें आकर निवास करती हैं। महाराज! आप स्वस्थ हो जायँ और निष्कण्टक राज्यका उपभोग करें। राजेन्द्र! पुनः कभी विशेषरूपसे यज्ञ करते समय आप मुझे देख सकेंगे॥ ७—१७॥
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्युक्त्वा स महाभागो वासुदेवो महातपाः।<br>युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८<br>ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः।<br>यथोक्तेनाथ विधिना परां निर्वृतिमागमत् ॥ १९<br>तथा त्वमपि देवर्षे प्रयागाभिमुखो भव।<br>अभिषेकं तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २०**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! महान् भाग्यशाली एवं महान् तपस्वी वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर महाराज युधिष्ठिरने सकुदुम्ब प्रयागमें जाकर यथोक्त विधिके अनुसार स्नान किया, जिससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई। देवर्षे! इसलिये आप भी प्रयागकी ओर पधारिये और वहाँ स्नान कर आज ही कृतकृत्य हो जाइये॥ १८—२०॥
सूत उवाच
एवमुक्त्वाथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुखस्तथा ॥ २१**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर नन्दिकेश्वर ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये तथा नारदजी भी शीघ्र ही प्रयागकी ओर चल दिये।
* अध्याय ११३ *३७७

| तत्र स्नात्वा च जप्त्वा च विधिदृष्टेन कर्मणा।<br>दानं दत्त्वा द्विजाग्र्येभ्यो गतः स्वभवनं तदा॥ २२ | वहाँ पहुँचकर उन्होंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान एवं जप आदि कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देकर वे अपने आश्रमकी ओर चले गये॥ २१-२२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्यं नाम द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११२॥


एक सौ तेरहवाँ अध्याय

भूगोलका विस्तृत वर्णन

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
कति द्वीपाः समुद्रा वा पर्वता वा कति प्रभो।<br>कियन्ति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः॥ १<br>महाभूमिप्रमाणं च लोकालोकस्तथैव च।<br>पर्याप्तिः परिमाणं च गतिश्चन्द्रार्कयोस्तथा॥ २<br>एतद् ब्रवीहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थवित्।<br>त्वदुक्तमेतत् सकलं श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ३प्रभो! इस भूतलपर कितने द्वीप हैं? कितने समुद्र और पर्वत हैं? कितने वर्ष (पृथ्वीके खण्ड) हैं? उनमें कौन-कौन-सी नदियाँ बतलायी जाती हैं? इस विस्तृत भूमिका प्रमाण कितना है? लोकालोक पर्वत कैसा है? तथा चन्द्रमा और सूर्यकी गति, अवस्थिति और परिमाण कितना है? यह सब हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये, क्योंकि आप यथार्थवेत्ता हैं। हमलोग यह सारा विषय आपके मुखसे सुनना चाहते हैं॥ १-३॥
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
द्वीपभेदसहस्राणि सप्त चान्तर्गतानि च।<br>न शक्यन्ते क्रमेणेह वक्तुं वै सकलं जगत्॥ ४<br>सप्तैव तु प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सह।<br>तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते॥ ५<br>अचिन्त्याः खलु ये भावास्तांस्तु तर्केण साधयेत्।<br>प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥ ६<br>सप्त वर्षाणि वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथाविधिम्।<br>विस्तरं मण्डलं यच्च योजनैस्तन्निबोधत॥ ७<br>योजनानां सहस्राणि शतं द्वीपस्य विस्तरः।<br>नानाजनपदाकीर्णं पुरैश्च विविधैः शुभैः॥ ८<br>सिद्धचारणसंकीर्णं पर्वतैरुपशोभितम्।<br>सर्वधातुपिनद्धैस्तैः शिलाजालसमुद्गतैः॥ ९ऋषियो! द्वीपोंके तो हजारों भेद हैं, परंतु वे सभी इन्हीं सात प्रधान द्वीपोंके अन्तर्गत हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का क्रमशः वर्णन करना सम्भव नहीं है, अतः चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंके साथ उन सात द्वीपोंका ही वर्णन कर रहा हूँ। साथ ही मनुष्यके अनुमानानुसार उनका प्रमाण भी बतला रहा हूँ; क्योंकि जो अचिन्त्य भाव हैं, उन्हें बुद्धि, ज्ञान एवं अनुमानद्वारा ही सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये*। जो प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यका लक्षण है। अब मैं सातों वर्षोंका वर्णन प्रारम्भ कर रहा हूँ। इनमें सर्वप्रथम योजनके परिमाणसे जम्बूद्वीपका जितना बड़ा विस्तृत मण्डल है, उसे बतला रहा हूँ, सुनिये। जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। यह अनेकों प्रकारके सुन्दर देशों एवं नगरोंसे परिपूर्ण है। इसमें सिद्ध और चारण निवास करते हैं। यह सभी प्रकारकी धातुओंसे संयुक्त एवं शिलासमूहोंसे समन्वित पर्वतोंद्वारा सुशोभित

* महाभारत ६। ६। १२ आदिका पाठ-अर्थ कुछ भिन्न होनेपर भी यहाँ यही पाठ एवं अर्थ युक्तियुक्त है।

३७८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पर्वतप्रभावैश्च नदीभिस्तु समंततः।<br>प्रागायता महापाश्र्वाः षडिमे वर्षपर्वताः॥ १०<br>अवगाह्य ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ।<br>हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान्॥ ११<br>सर्वतः सुमुखश्चापि निषधः पर्वतो महान्।है; उन पर्वतोंसे निकलनेवाली नदियोंसे यह चारों ओरसे व्याप्त है। इसमें पूर्वसे पश्चिम तक फैले हुए अत्यन्त विस्तृत छः वर्षपर्वत हैं। इसमें पूर्व और पश्चिम—दोनों ओरके समुद्रोंतक फैला हुआ हिमवान् नामक पर्वत है, जो सदा बर्फसे ढका रहता है। इसके बाद सुवर्णसे व्याप्त हेमकूट नामक पर्वत है। तत्पश्चात् जो चारों ओरसे देखनेमें अत्यन्त सुन्दर है, वह निषध नामक महान् पर्वत है॥४—११½॥
चातुर्वर्ण्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बममयः स्मृतः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णं च चतुर्दिशम्॥ १२<br>वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्रः समाहितः।<br>नानावर्णैः समः पाश्र्वैः प्रजापतिगुणान्वितः॥ १३<br>नाभीबन्धनसम्भूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>पूर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै॥ १४<br>पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते।<br>भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वितः।<br>तेनास्य शूद्रता सिद्धा मेरोनामार्थकर्मतः॥ १५<br>पाश्र्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णं स्वभावतः।<br>तेनास्य क्षत्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः॥ १६<br>नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः पीतो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णश्च शातकौम्भः स शृङ्गवान्॥ १७<br>एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमुच्यते॥ १८इसके एक ओर सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसके चारों पार्श्वभाग चार रंगोंके हैं और जो उल्बममय (गर्भाशयके समान) कहा जाता है। यह चारों दिशाओंमें चौबीस हजार योजनोंतक फैला हुआ है। इसका ऊपरी भाग वृत्तकी आकृतिका अर्थात् गोलाकार है तथा निचला भाग चौकोर है। इसके पार्श्वभाग नाना प्रकारकी रंग-बिरंगी समतल भूमियोंसे युक्त हैं, जिससे प्रजापतिके गुणोंसे युक्त-सा दीखता है। यह अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके नाभि-बन्धनसे उद्भूत हुआ है। इसका पूर्वी भाग श्वेत रंगका है, इसीसे इसकी ब्राह्मणता झलकती है। इसका दक्षिणी भाग पीले रंगका है, इसीसे इसमें वैश्यत्वकी प्रतीति होती है। इसका पश्चिमी भाग भौंरेके पंख-सरीखा काला है, इसीसे इसकी शूद्रता तथा अर्थ और काम—दोनों दृष्टियोंसे मेरुके नामकी सार्थकता सिद्ध होती है। इसका उत्तरी भाग स्वभावसे ही लाल रंगका है, इसीसे इसका क्षत्रियत्व सूचित होता है। इस प्रकार मेरुके चारों रंगोंका विवरण बतलाया गया है। तदनन्तर नील पर्वत है, जो वैदूर्यमणिसे व्याप्त है। पुनः श्वेत पर्वत है, जो सुवर्णमय होनेके कारण पीले रंगका है तथा सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित शृङ्गवान् पर्वत है, जो मयूर-पिच्छ-सरीखे चित्र-विचित्र रंगोंवाला है। ये सभी पर्वतराज सदा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित होते रहते हैं। उनका भीतरी व्यास नौ हजार योजन बतलाया जाता है॥१२—१८॥
मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णो योजनैः समः॥ १९<br>मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः।<br>वेद्यर्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्धं तथोत्तरम्॥ २०<br>वर्षाणि यानि सप्तात्र तेषां वै वर्षपर्वताः।<br>द्वे द्वे सहस्त्रे विस्तीर्णा योजनैर्दक्षिणोत्तरम्॥ २१<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारस्तेषामायाम उच्यते।<br>नीलश्च निषधश्चैव तेषां हीनाश्च ये परे॥ २२पृथ्वीके मध्य भागमें इलावृत नामक वर्ष है, जो महामेरु पर्वतके चारों ओर फैला हुआ है। यह चौबीस हजार योजनकी समतल भूमिमें विस्तृत है। इसके मध्य भागमें महामेरु नामक पर्वत है, जो धूमरहित अग्निके समान चमकता रहता है। मेरु पर्वतका आधा दक्षिणी भाग दक्षिण मेरु और आधा उत्तरी भाग उत्तर मेरुके नामसे प्रसिद्ध है। इस प्रकार जो सात वर्ष बतलाये गये हैं, उनमें पृथक्-पृथक् सात वर्षपर्वत हैं, जो दक्षिणसे उत्तरतक दो-दो हजार योजनके परिमाणमें फैले हुए हैं। जम्बूद्वीपका विस्तार इन्हीं वर्षों तथा पर्वतोंके विस्तारके बराबर कहा जाता है। इनमें नील और निषध—ये दोनों विशाल पर्वत हैं

* अध्याय ११३ *
३७१

| श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्छृङ्गवांश्च यः।<br>जम्बूद्वीपप्रमाणेन ऋषभः परिकीर्त्यते॥ २३<br>तस्माद् द्वादशभागेन हेमकूटोऽपि हीयते।<br>हिमवान् विंशभागेन तस्मादेव प्रहीयते।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि हेमकूटो महागिरिः॥ २४<br>अशीतिर्हिमवाञ्छैल आयतः पूर्वपश्चिमे।<br>द्वीपस्य मण्डलीभावाद् ह्रासवृद्धी प्रकीर्तिते॥ २५<br>वर्षाणां पर्वतानां च यथाभेदं तथोत्तरम्।<br>तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै॥ २६<br>प्रपातविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु।<br>सप्त तानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम्॥ २७<br>वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः।<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्॥ २८ | तथा श्वेत, हेमकूट, हिमवान् और शृङ्गवान्—ये अपेक्षाकृत उनसे छोटे हैं। ऋषभ पर्वत जम्बूद्वीपके समान ही विस्तारवाला बतलाया जाता है। हेमकूट पर्वत ऋषभ पर्वतके बारहवें भागसे न्यून है और हिमवान् उसके बीसवें अंशसे कम है। हेमकूट नामक महान् पर्वत अठासी हजार योजनके परिमाणवाला कहा जाता है तथा हिमवान् पर्वत पूर्वसे पश्चिमतक अस्सी हजार योजनमें फैला हुआ है। जम्बूद्वीपके मण्डलाकारमें स्थित होनेके कारण इन पर्वतोंका न्यूनाधिक्य बतलाया गया है। पर्वतोंकी ही भाँति वर्षोमें भी भिन्नता है। वे सभी एक-दूसरेसे उत्तर दिशाकी ओर फैले हुए हैं। इनके बीचमें देश बसे हुए हैं, जो सात वर्षोंमें विभक्त हैं। ये सभी वर्ष ऐसे पर्वतोंसे घिरे हुए हैं, जो झरनोंके कारण अगम्य हैं। इसी प्रकार सात नदियोंके विभाजनसे ये परस्पर गमनागमनरहित हैं। इन वर्षोंमें सब ओर अनेकों जातियोंके प्राणी निवास करते हैं। यह हिमवान् पर्वतसे सम्बन्धित वर्ष भारतवर्षके नामसे विख्यात है॥ १९—२८॥ |
| हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्।<br>हेमकूटाच्च निषधं हरिवर्षं तदुच्यते॥ २९<br>हरिवर्षात् परं चापि मेरोस्तु तदिलावृतम्।<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्॥ ३०<br>रम्यकादपरं श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्मयकम्।<br>हिरण्यकात् परं चैव शृङ्गशाकं कुरुं स्मृतम्॥ ३१<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये देवर्षे दक्षिणोत्तरे।<br>दीर्घाणि तस्य चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम्॥ ३२<br>पूर्वतो निषधस्येदं वेद्यर्धं दक्षिणं स्मृतम्।<br>परं त्विलावृतं पश्चाद् वेद्यर्धं तु तदुत्तरम्॥ ३३<br>तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्यत्र त्विलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ३४<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान् नाम पर्वतः।<br>द्वात्रिंशता सहस्रेण प्रतीच्यां सागरानुगः॥ ३५<br>माल्यवान् वै सहस्रैक आनीलनिषधायतः।<br>द्वात्रिंशत् त्वेवमप्युक्तः पर्वतो गन्धमादनः॥ ३६ | हिमवान्‌के बाद हेमकूटतकका प्रदेश किम्पुरुष नामसे कहा जाता है तथा हेमकूटसे आगे निषध पर्वततक हरिवर्ष कहलाता है। हरिवर्षके बाद मेरुपर्वततकका प्रदेश इलावृतवर्षके नामसे तथा इलावृतके बाद नीलपर्वततकका प्रदेश रम्यकवर्षके नामसे विख्यात है। रम्यकवर्षके बाद श्वेतपर्वततकका जो प्रदेश है, वह हिरण्यकवर्षके नामसे प्रसिद्ध है। हिरण्यकवर्षके बाद शृङ्गशाक नामक वर्ष है, जिसे कुरुवर्ष भी कहते हैं। मेरुपर्वतके दक्षिण और उत्तर दिशामें धनुषके आकारमें दो वर्ष स्थित हैं। उन्हींके मध्यमें इलावृतवर्ष है। निषध पर्वतके पूर्व दिशामें मेरुकी वेदीका अर्धभाग दक्षिणवेदी और इलावृतसे पश्चिमकी ओर वेदीका आधा भाग उत्तरवेदीके नामसे विख्यात है। इन्हीं दोनोंके बीचमें मेरुकी स्थिति समझनी चाहिये, जहाँ इलावृतवर्ष अवस्थित है। नील पर्वतके दक्षिण और निषध पर्वतके उत्तर माल्यवान् नामक पर्वत है, जिसकी गणना विशाल पर्वतोंमें है। यह उत्तरसे दक्षिणकी ओर लम्बा है। यह पश्चिम दिशामें सागरपर्यन्त बत्तीस हजार योजनमें फैला हुआ है। इस प्रकार माल्यवान् पर्वत नील और निषध पर्वतोंके बीचमें एक हजार योजनके विस्तारमें स्थित है। इसी तरह गन्धमादन पर्वत भी बत्तीस हजार |

३८०* मत्स्यपुराण *

| परिमण्डलयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः।<br>चातुर्वर्ण्यसमो वर्णैश्चतुरस्रः समुच्छ्रितः॥ ३७<br><br>नानावर्णः स पार्श्वेषु पूर्वान्ते श्वेत उच्यते।<br>पीतं तु दक्षिणं तस्य भृङ्गिपत्रनिभं परम्।<br>उत्तरं तस्य रक्तं वै इति वर्णसमन्वितः॥ ३८<br><br>मेरुस्तु शुशुभे दिव्यो राजवत् स तु वेष्टितः।<br>आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः॥ ३९<br><br>योजनानां सहस्राणि चतुराशीति सूच्छ्रितः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः॥ ४०<br><br>विस्तराद् द्विगुणश्चास्य परीणाहः समंततः।<br>स पर्वतो महादिव्यो दिव्यौषधिसमन्वितः॥ ४१<br><br>भुवनैरावृतः सर्वैर्जातरूपपरिष्कृतैः।<br>तत्र देवगणाश्चैव गन्धर्वासुरराक्षसाः।<br>शैलराजे प्रमोदन्ते सर्वतोऽप्सरसां गणैः॥ ४२<br><br>स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः।<br>यस्येमे चतुरो देशा नानापार्श्वेषु संस्थिताः॥ ४३<br><br>भद्राश्वं भारतं चैव केतुमालं च पश्चिमे।<br>उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥ ४४<br><br>विष्कम्भपर्वतास्तद्वन्मन्दरो गन्धमादनः।<br>विपुलश्च सुपार्श्वश्च सर्वरत्नविभूषिताः॥ ४५<br><br>अरुणोदं मानसं च सितोदं भद्रसंज्ञितम्।<br>तेषामुपरि चत्वारि सरांसि च वनानि च॥ ४६<br><br>तथा भद्रकदम्बस्तु पर्वते गन्धमादने।<br>जम्बूवृक्षस्तथाश्वत्थो विपुलेऽथ वटः परम्॥ ४७<br><br>गन्धमादनपार्श्वे तु पश्चिमेऽमरगण्डिकः।<br>द्वात्रिंशतिसहस्राणि योजनैः सर्वतः समः॥ ४८<br><br>तत्र ते शुभकर्माणः केतुमालाः परिश्रुताः।<br>तत्र कालानलाः सर्वे महासत्त्वा महाबलाः॥ ४९<br><br>स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः।<br>तत्र दिव्यो महावृक्षः पनसः पत्रभासुरः॥ ५० | योजन विस्तृत बतलाया गया है। इन दोनोंके मण्डलके मध्यमें मेरु नामक स्वर्णमय पर्वत है। यह चार प्रकारके रंगोंसे युक्त, चौकोर और अत्यन्त ऊँचा है॥ २९—३७॥<br><br>उसके पार्श्वभाग अनेक प्रकारके रंगोंसे विभूषित हैं। इसका पूर्वीय भाग श्वेत, दक्षिणी भाग पीला, पश्चिमका भाग भ्रमरके पंखके समान काला और उत्तरी हिस्सा लाल है। इस प्रकार यह चार रंगोंसे युक्त कहा जाता है। इस तरह चारों ओरसे पर्वतोंसे घिरा हुआ दिव्य पर्वत मेरु राजाकी भाँति सुशोभित होता है। इसकी कान्ति तरुण सूर्य अर्थात् मध्याह्नकालिक सूर्यकी-सी है। यह धूमरहित अग्निके सदृश चमकता रहता है। पृथ्वीके ऊपर इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह सोलह हजार योजनतक पृथ्वीके नीचे धँसा हुआ है और अट्ठाईस हजार योजनतक फैला हुआ है। चारों ओरसे इसका फैलाव विस्तारसे दुगुना है। यह महान् दिव्य पर्वत मेरु दिव्य ओषधियोंसे परिपूर्ण तथा सभी सुवर्णमय भुवनोंसे घिरा हुआ है। इस पर्वतराजपर देवगण, गन्धर्व, असुर और राक्षस सर्वत्र अप्सराओंके साथ रहकर आनन्दका अनुभव करते हैं। यह मेरु प्राणियोंके निमित्त-कारणभूत भुवनोंसे घिरा हुआ है। इसके विभिन्न पार्श्वभागोंमें चार देश अवस्थित हैं। उनके नाम हैं—(पूर्वमें) भद्राश्व, (दक्षिणमें) भारत, (पश्चिममें) केतुमाल और (उत्तरमें) किये हुए पुण्योंके आश्रयस्थानरूप उत्तरकुरु। इसी प्रकार उसके चारों दिशाओंमें सभी प्रकारके रत्नोंसे विभूषित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक विष्कम्भ पर्वत भी विद्यमान हैं। उनके ऊपर अरुणोद, मानस, सितोद और भद्र नामक सरोवर और अनेकों वन हैं तथा मन्दर पर्वतपर भद्रकदम्ब, गन्धमादनपर जामुन, विपुलपर पीपल और सुपार्श्वपर बरगदका वृक्ष है॥ ३८—४७॥<br><br>गन्धमादनके पश्चिम भागमें अमरगण्डिक नामक पर्वत है, जो सब ओरसे बत्तीस हजार योजनकी समतल भूमिसे सम्पन्न है। वहाँके शुभ कर्म करनेवाले निवासी केतुमाल नामसे विख्यात हैं। वे सभी कालाग्निके समान भयानक, महान् सत्त्वसम्पन्न एवं महाबली होते हैं। वहाँकी स्त्रियोंके शरीरका रंग लाल कमलके समान होता है। वे परम सुन्दरी एवं देखनेमें आह्लादकारिणी होती हैं। उसपर कटहलका एक महान् दिव्य वृक्ष है, जिसके पत्ते अत्यन्त चमकीले हैं। |

* अध्याय ११३ * ३८१

| तस्य पीत्वा फलरसं संजीवन्ति समायुतम्।<br>तस्य माल्यवतः पार्श्वे पूर्वे पूर्वा तु गण्डिका।<br>द्वात्रिंशच्च सहस्राणि तत्रापि शतमुच्यते॥ ५१<br><br>भद्राश्वस्तत्र विज्ञेयो नित्यं मुदितमानसः।<br>भद्रमालवनं तत्र कालाभ्रश्च महाद्रुमः॥ ५२<br><br>तत्र ते पुरुषाः श्वेता महासत्त्वा महाबलाः।<br>स्त्रियः कुमुदवर्णाभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः॥ ५३<br><br>चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।<br>चन्द्रशीतलगात्राश्च स्त्रियो ह्युत्पलगन्धिकाः॥ ५४<br><br>दशवर्षसहस्राणि आयुस्तेषामनामयम्।<br>कालाभ्रस्य रसं पीत्वा ते सर्वे स्थिरयौवनाः॥ ५५ | उसके फलोंका रस पीकर वहाँके निवासी दस हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। माल्यवान्के पूर्वी भागमें पूर्वगण्डिका नामक पर्वत है, जो बत्तीस हजार योजन लम्बा और सौ योजन चौड़ा कहा जाता है। उसकी तलहटीमें भद्राश्व नामक देश है, जहाँके निवासी सदा प्रसन्न-मन रहते हैं। वहाँ भद्रमाल नामक वन है, जिसमें कालाभ्र नामक एक महान् वृक्ष है। वहाँके निवासी पुरुष गोरे, महान् सत्त्वसम्पन्न एवं महाबली होते हैं तथा कुछ स्त्रियाँ कुमुदिनीकी-सी कान्तिवाली, परम सुन्दरी एवं देखनेमें प्रिय लगनेवाली होती हैं। इसी प्रकार कुछ स्त्रियाँ गौर वर्णवाली होती हैं, उनकी कान्ति चन्द्रमा-सरीखी उज्ज्वल होती है और उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान चमकदार होता है। उनका शरीर भी चन्द्रमाके समान शीतल होता है और उससे कमलकी-सी गन्ध निकलती है। कालाभ्र वृक्षोंके फलोंका रस पान कर वहाँके सभी निवासियोंकी युवावस्था स्थिर बनी रहती है और वे नीरोग रहकर दस हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं॥ ४८–५५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तवानृषीन् ब्रह्मा वर्षाणि च निसर्गतः।<br>पूर्वं ममानुग्रहकृद् भूयः किं वर्णयामि वः॥ ५६<br>एतच्छ्रुत्वा वचस्ते तु ऋषयः संशितव्रताः।<br>जातकौतूहलाः सर्वे प्रत्यूचुस्ते मुदान्विताः॥ ५७ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वभावतः मुझपर कृपा कर जिन वर्षोंका वर्णन किया था, उनका विवरण मैं आपलोगोंको बतला चुका। अब पुनः आपलोगोंसे किसका वर्णन करूँ? सूतजीकी यह बात सुनकर वे सभी व्रतनिष्ठ ऋषि विस्मयविमुग्ध हो गये। तत्पश्चात् वे प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ५६–५७॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>पूर्वापरौ समाख्यातौ यौ देशौ तौ त्वया मुने।<br>उत्तराणां च वर्षाणां पर्वतानां च सर्वशः॥ ५८<br>आख्याहि नो यथातथ्यं ये च पर्वतवासिनः।<br>एवमुक्तस्तु ऋषिभिस्तेभ्यस्त्वाख्यातवान् पुनः॥ ५९ | **ऋषियोंने पूछा—**मुने! पूर्व और पश्चिम दिशामें स्थित जो देश हैं; उनके विषयमें तो आप हमलोगोंको बतला चुके। अब उत्तर दिशामें स्थित वर्षों और पर्वतोंका वर्णन कीजिये। साथ ही उन पर्वतोंपर निवास करनेवाले लोगोंका चरित्र भी यथार्थरूपसे बतलाइये। ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सूतजीने पुनः उनसे वर्णन करना आरम्भ किया॥ ५८–५९॥ |
| सूत उवाच<br>शृणुध्वं यानि वर्षाणि पूर्वोक्तानि च वै मया।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ६०<br>वर्षं रमणकं नाम जायन्ते यत्र वै प्रजाः। | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पहले मैं आपलोगोंसे जिन वर्षोंके विषयमें वर्णन कर चुका हूँ, (उनके अतिरिक्त अन्य वर्षोंका वर्णन) सुनिये। नीलपर्वतसे दक्षिण और निषध पर्वतसे उत्तर दिशामें रमणक नामक वर्ष है, जहाँकी |